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यहाँ छठ पूजा हो रही है (Yahan Chhath Pooja Ho Rahi Hai) - Khesari lal Yadav New Chhath Song

खेसारी लाल यादव का भक्ति गीत 'यहाँ छठ पूजा हो रही है' के बोल और छठ महापर्व के आध्यात्मिक महत्व को विस्तार से जानें। संदर्भ एवं व्याख्या सहित।

एक अनुपम भक्तिमय विश्लेषण

सनातन धर्म में लोक आस्था का महापर्व 'छठ पूजा' केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति, शुचिता, और सूर्य उपासना का सबसे जीवंत उत्सव है। इस पावन अवसर पर संगीत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। "यहाँ छठ पूजा हो रही है" (Yahan Chhath Pooja Ho Rahi Hai) एक ऐसा ही हृदयस्पर्शी और भक्ति रस से सराबोर भजन है, जो श्रोताओं को सीधे गंगा के पावन घाटों और आस्था के सागर में ले जाता है। अंजलि तिवारी की मधुर आवाज, लोरिक सिंह के भावपूर्ण शब्द और गोलू गुलजार के संगीत से सजा यह गीत छठ महापर्व की महिमा, व्रतियों की कठिन साधना और समाज में व्याप्त हर्षोल्लास को अत्यंत सुंदरता से प्रदर्शित करता है। इस लेख में हम इस पावन गीत के बोल, इसके गहरे आध्यात्मिक भावार्थ, सांस्कृतिक महत्व और इससे जुड़ी परंपराओं का विस्तृत अध्ययन करेंगे।

सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics

यहाँ छठ पूजा हो रही है - पावन गीत

कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए।
होईहे ना बलम जी कहरिया, बहंगी घाट पहुंचाए।
यहाँ छठ पूजा हो रही है, सब मिलके अरघ चढ़ाओ रे।
यहाँ छठ पूजा हो रही है, मिलके मंगल गाओ रे।

गंगा के पावन तीरे, घाट सजल बा नीके,
दीपक जलत बा धीरे, मन हरषत बा सबके।
दउरा सजवले बाड़े भइया, सिर पर उठवले बाड़े,
छठी माई के महिमा अपार, सब शीश झुकवले बाड़े।
यहाँ छठ पूजा हो रही है, सब मिलके अरघ चढ़ाओ रे...

सूपे में फल और ठेकुआ, नारियल और कसार बा,
व्रती ठाढ़ बाड़े जल में, श्रद्धा अपरम्पार बा।
उग हो सुरुज देव भोर भइल, अरघ के बेर भइल,
छठी माई के किरपा से, सबकर कल्याण भइल।
यहाँ छठ पूजा हो रही है, मिलके मंगल गाओ रे...

गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth

यह गीत छठ महापर्व के दौरान गंगा घाटों पर दिखने वाले विहंगम और अत्यंत पवित्र दृश्य का सजीव चित्रण करता है। गीत के प्रथम भाग में पारंपरिक लोकगीत "कांच ही बांस के बहंगिया" का संदर्भ लेते हुए आधुनिक भक्ति भाव को जोड़ा गया है। इसमें कहा गया है कि कच्चे बांस से बनी बहंगी (पूजा सामग्री ले जाने का ढांचा) भार के कारण लचक रही है। व्रती अपने जीवनसाथी से अनुरोध करती है कि वे कहार (भार उठाने वाले) बनकर इस पवित्र बहंगी को नदी के घाट तक पहुंचाएं, क्योंकि यह पूजा अत्यंत पवित्र और नियमों से बंधी है।

गीत के अंतरा में गंगा नदी के किनारे सजे सुंदर घाटों का वर्णन है। चारों ओर मिट्टी के दीये जल रहे हैं, जिनकी मंद-मंद रोशनी मन को शांति प्रदान करती है। परिवार के पुरुष सदस्य (भैया) अपने सिर पर पूजा की टोकरी (दउरा) उठाकर घाट की ओर बढ़ रहे हैं। यह दृश्य परिवार की एकजुटता और सामूहिक जिम्मेदारी को दर्शाता है।

अंतिम भाग में छठ पूजा के मुख्य प्रसाद जैसे ठेकुआ, नारियल, कसार और विभिन्न मौसमी फलों का उल्लेख है। व्रती महिलाएं और पुरुष ठंडे जल में खड़े होकर भगवान सूर्य के उदय होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। जैसे ही सुबह की पहली किरण फूटती है, सभी मिलकर "उग हो सुरुज देव" का जयकारा लगाते हैं और अर्घ्य अर्पित करते हैं। यह संपूर्ण प्रक्रिया मानव जीवन में सूर्य देव और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम है।

गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message

इस गीत की मुख्य भावना 'पूर्ण समर्पण' और 'सामुदायिक समरसता' है। छठ पूजा एक ऐसा पर्व है जिसमें किसी पुरोहित या बिचौलिए की आवश्यकता नहीं होती। भक्त सीधे प्रकृति के प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्य और उनकी शक्ति छठी मैया की उपासना करते हैं। यह गीत संदेश देता है कि ईश्वर की साधना के लिए किसी आडंबर की नहीं, बल्कि शुद्ध अंतःकरण, कठिन अनुशासन और सामूहिक सहयोग की आवश्यकता होती है। गीत में प्रयुक्त शब्द समाज के हर वर्ग को एक साथ मिलकर उत्सव मनाने की प्रेरणा देते हैं।

गीत की जानकारी | Song Information

विवरण (Parameter) जानकारी (Details)
गीत का नाम (Song Name) यहाँ छठ पूजा हो रही है (Yahan Chhath Pooja Ho Rahi Hai)
गायक (Singer) अंजलि तिवारी (Anjali Tiwari)
गीतकार (Lyricist) लोरिक सिंह (Lorik Singh)
संगीतकार (Music Composer) गोलू गुलजार (Golu Guljar)
डिजिटल प्रमुख (Digital Head) शाहबाज अंसारी (Sahabaj Ansari)
भाषा (Language) भोजपुरी / हिंदी (Bhojpuri / Hindi)
मुख्य विषय (Theme) छठ पूजा महात्म्य एवं सूर्य उपासना (Chhath Puja Devotion)

गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators

इस सुंदर भजन को अपनी मधुर आवाज से सजाया है सुप्रसिद्ध लोक गायिका अंजलि तिवारी ने। उनकी गायकी में मिट्टी की सोंधी खुशबू और पारंपरिक छठ गीतों का अनूठा सम्मिश्रण देखने को मिलता है। गीतकार लोरिक सिंह ने बहुत ही सरल लेकिन प्रभावशाली शब्दों का चयन किया है, जो सीधे श्रोताओं के हृदय को छूते हैं। गोलू गुलजार का संगीत पारंपरिक वाद्यों जैसे ढोलक, मंजीरा और बांसुरी के साथ आधुनिक सिंथेसाइज़र का एक बेहतरीन संतुलन प्रस्तुत करता है, जिससे गीत की दिव्यता और बढ़ जाती है। डिजिटल प्रस्तुति में शाहबाज अंसारी का योगदान इस गीत को देश-विदेश के कोने-कोने में बैठे भोजपुरी और हिंदी भाषियों तक पहुंचाने में सहायक रहा है।

कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings

शब्द (Word) सरल अर्थ (Meaning) सांस्कृतिक संदर्भ (Context)
बहंगिया (Bahangiya) बांस से बना लचीला ढांचा छठ पूजा की सामग्री को दोनों तरफ लटकाकर ले जाने के लिए प्रयुक्त।
कहरिया (Kahariya) कंधे पर भार उठाने वाला यहाँ पति या भाई द्वारा आदरपूर्वक पूजा की टोकरी उठाने का संदर्भ है।
अरघ (Arghya) पवित्र जल या दूध की अंजलि देना अस्ताचलगामी और उदीयमान सूर्य को दिया जाने वाला अर्घ्य।
दउरा (Daura) बांस की बड़ी टोकरी जिसमें छठ पूजा का मुख्य प्रसाद और फल रखे जाते हैं।
ठेकुआ (Thekua) गेहूं के आटे और गुड़ का बना प्रसाद छठ पूजा का सबसे महत्वपूर्ण और अत्यंत पवित्र महाप्रसाद।
कसार (Kasar) चावल के आटे और गुड़ के लड्डू छठ पर्व पर बनाया जाने वाला एक पारंपरिक सूखा प्रसाद।

गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance

छठ पूजा का आध्यात्मिक आधार ऋग्वेद और यजुर्वेद में मिलता है, जहाँ सूर्य को जगत की आत्मा और ऊर्जा का मुख्य स्रोत माना गया है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी, कार्तिक मास में सूर्य की किरणों का पृथ्वी पर विशेष प्रभाव पड़ता है, और नदी के जल में खड़े होकर सूर्य की किरणों को ग्रहण करने से शरीर और मन दोनों का शुद्धिकरण होता है।

यह गीत इस वैज्ञानिक और आध्यात्मिक सत्य को लोक संगीत के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाता है। गीत में वर्णित "घाट सजल बा नीके" केवल भौतिक सजावट नहीं है, बल्कि यह साधक के अंतःकरण की शुचिता का प्रतीक है। जब हम बाहरी वातावरण को स्वच्छ और सुंदर बनाते हैं, तो हमारा अंतर्मन भी स्वतः ही ईश्वर की आराधना के लिए तैयार हो जाता है।

गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons

  • प्रकृति के प्रति कृतज्ञता: यह गीत हमें सिखाता है कि हमें जीवन देने वाले सूर्य, जल और वायु के प्रति सदैव आभारी रहना चाहिए।
  • कठिन अनुशासन और धैर्य: छठ व्रत की कठिन साधना हमें जीवन की विपरीत परिस्थितियों में भी अडिग रहने और धैर्य बनाए रखने की सीख देती है।
  • पारिवारिक और सामाजिक एकता: दउरा उठाने से लेकर घाट सजाने तक के कार्य सामूहिक रूप से किए जाते हैं, जो आपसी प्रेम और भाईचारे को बढ़ावा देते हैं।
  • समानता का संदेश: छठ महापर्व में अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं होता। सभी एक ही घाट पर, एक जैसे सूप और दउरा लेकर खड़े होते हैं।

गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing

यद्यपि इस पावन गीत को कार्तिक मास के प्रारंभ होते ही सुना जाने लगता है, लेकिन इसका वास्तविक आनंद छठ महापर्व के चार दिनों के दौरान आता है:

  1. नहाय-खाय (प्रथम दिन): इस दिन घर की साफ-सफाई के बाद व्रती पवित्र भोजन ग्रहण करते हैं। इस समय यह गीत मन में पवित्रता का संचार करता है।
  2. खरना (द्वितीय दिन): संध्या काल में खीर-रोटी का प्रसाद ग्रहण करने के बाद से ही इस गीत की गूंज हर घर में सुनाई देने लगती है।
  3. संध्या अर्घ्य (तृतीय दिन): जब पूरा परिवार घाट की ओर प्रस्थान करता है, तब यह गीत वातावरण को पूरी तरह भक्तिमय बना देता है।
  4. उषा अर्घ्य (चतुर्थ दिन): उगते सूर्य को अर्घ्य देने के समय इस गीत का गायन और श्रवण अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है।

एक नजर में गीत की जानकारी | Song at a Glance

मुख्य बिंदु संक्षिप्त विवरण
मुख्य पर्व छठ पूजा (महापर्व)
मुख्य देवता भगवान सूर्य देव एवं छठी मैया
संगीत की शैली पारंपरिक भोजपुरी लोक-भक्ति गीत
मुख्य वाद्य यंत्र ढोलक, मंजीरा, बांसुरी, शहनाई
आध्यात्मिक संदेश प्रकृति पूजा, शुचिता, और लोक कल्याण

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस पावन और मधुर छठ गीत की मुख्य गायिका अंजलि तिवारी हैं, जिन्होंने अपनी सुरीली आवाज से इस भजन को जीवंत किया है।

इस गीत के भावपूर्ण बोल लोरिक सिंह द्वारा लिखे गए हैं और इसका कर्णप्रिय संगीत गोलू गुलजार द्वारा तैयार किया गया है।

बहंगी बांस से बना एक पारंपरिक ढांचा होता है, जिसके दोनों सिरों पर टोकरियां लटकी होती हैं। इसमें छठ पूजा का पवित्र प्रसाद और फल रखकर घाट तक ले जाया जाता है। यह सादगी और शुद्धता का प्रतीक है।

छठ पूजा में प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्य (सूर्य देव) और उनकी मानस पुत्री या शक्ति 'छठी मैया' (उषा और प्रत्यूषा) की पूजा की जाती है।

नहीं, यह गीत बिहार के साथ-साथ झारखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, मुंबई और जहाँ भी प्रवासी भारतीय छठ महापर्व मनाते हैं, वहाँ अत्यंत चाव से सुना जाता है।

छठ पूजा का मुख्य प्रसाद 'ठेकुआ' है, जिसे गेहूं के आटे, गुड़ और शुद्ध घी से बनाया जाता है। इसके अलावा चावल के आटे के लड्डू (कसार) और मौसमी फल जैसे डाभ नींबू, गन्ना और नारियल भी चढ़ाए जाते हैं।

इस गीत का मुख्य संदेश ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण, प्रकृति का सम्मान और समाज के सभी वर्गों का एक साथ मिलकर बिना किसी भेदभाव के पर्व मनाना है।

मुख्य रूप से छठ पूजा वर्ष में दो बार मनाई जाती है - पहली चैत्र मास में (चैती छठ) और दूसरी कार्तिक मास में (कार्तिकी छठ), जो कि सबसे बड़े पैमाने पर मनाई जाती है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख लोक आस्था के महापर्व छठ और उससे जुड़े पारंपरिक संगीत के महत्व को रेखांकित करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। गीत के बोल और उसके भावार्थ को सनातन परंपराओं और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आलोक में विश्लेषित किया गया है। यह "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" पाठकों को प्रामाणिक और भक्तिमय जानकारी प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • ऋग्वेद एवं यजुर्वेद - सूर्य उपासना सूक्त
  • भोजपुरी लोक संस्कृति एवं पारंपरिक छठ गीत संग्रह
  • अंजलि तिवारी आधिकारिक संगीत एल्बम - "यहाँ छठ पूजा हो रही है"

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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