Hanuman Bhajan मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa) - Shankar Mahadevan Hanuman Bhajan

शंकर महादेवन की आवाज में हनुमान चालीसा का पाठ करें। बल, बुद्धि और विद्या प्रदान करने वाली इस स्तुति का अर्थ और महत्व जानें। आज ही सुनें | Bhaktilok

हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa) भगवान श्री राम के परम भक्त संकटमोचन हनुमान जी की स्तुति का सर्वाधिक प्रचलित और पवित्र पाठ है। गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित यह चालीसा अवधी भाषा में 40 चौपाइयों और दो दोहों में निबद्ध है। प्रस्तुत भजन "हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa) - Shankar Mahadevan Hanuman Bhajan" में प्रसिद्ध गायक शंकर महादेवन जी ने अपनी दिव्य वाणी से इस पाठ को एक नई भक्ति-ऊर्जा प्रदान की है। संगीत डॉ. संजयराज गौरीनंदन (SRG) जी ने संयोजित किया है, जबकि मूल रचना संत तुलसीदास जी की है। यह भजन बल, बुद्धि, विद्या और भक्ति का संचार करने वाला है। कलयुग के जागृत देव श्री हनुमान जी की महिमा अपार है। इस भजन का मुख्य उद्देश्य साधक के भीतर के भय को दूर कर उसमें आत्मगौरव और निष्काम सेवा भाव जागृत करना है। भजन की चौपाइयों और पंक्तियों में हनुमान जी की लंका दहन, संजीवनी बूटी लाना और प्रभु श्री राम के प्रति अनन्य प्रेम का वर्णन होता है। हनुमान जी की शरण में जाने पर बड़े से बड़ा संकट भी क्षण भर में समाप्त हो जाता है, यही इस भजन की मूल भावना है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Hanuman Chalisa Lyrics

॥ दोहा ॥

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥

॥ चौपाई ॥

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥
महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै॥
संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन॥
बिद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचंद्र के काज सँवारे॥
लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा॥
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना॥
जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥
दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥
राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डर ना॥
आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै॥
भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥
नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥
सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥
और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै॥
चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥
साधु-संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥
राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥
तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम-जनम के दुख बिसरावै॥
अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥
और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥
संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
जय जय जय हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥
जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥

॥ दोहा ॥

पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

हनुमान चालीसा का प्रारंभ गुरु वंदना से होता है। तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीगुरु के चरण कमलों की रज से अपने मन रूपी दर्पण को स्वच्छ करके मैं श्री रघुवर (श्री राम) के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फल (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) देने वाला है। फिर वे स्वयं को बुद्धिहीन जानकर पवनपुत्र हनुमान जी का स्मरण करते हैं और बल, बुद्धि, विद्या तथा क्लेशों और विकारों के नाश की प्रार्थना करते हैं।

इसके बाद की चौपाइयों में हनुमान जी की महिमा का विस्तृत वर्णन है। उन्हें ज्ञान और गुणों का सागर, तीनों लोकों को प्रकाशित करने वाला, श्री राम का दूत, अतुलित बल का धाम, अंजनी पुत्र और पवनसुत कहा गया है। वे महावीर, विक्रम और बजरंगी हैं, जो कुमति (दुर्बुद्धि) को दूर कर सुमति (सद्बुद्धि) के संगी हैं। उनका स्वरूप स्वर्ण के समान कांतिमान, कानों में कुंडल और घुंघराले केशों वाला है। हाथ में वज्र और ध्वजा तथा कंधे पर मूंज का जनेऊ शोभा पाता है।

भावार्थ की दृष्टि से यह चालीसा भक्ति, शरणागति और निष्काम सेवा का श्रेष्ठतम उदाहरण है। हनुमान जी शिव के अंश (संकर सुवन) और केसरीनंदन हैं। उनका तेज और प्रताप पूरे जगत में वंदनीय है। वे विद्यावान, गुणी और अत्यंत चतुर हैं तथा श्री राम के कार्य करने के लिए सदा आतुर रहते हैं। प्रभु के चरित्र सुनने में उन्हें विशेष रस है और श्री राम, लक्ष्मण तथा सीता जी उनके मन में बसे हुए हैं। उन्होंने सूक्ष्म रूप धारण कर सीता जी को दर्शन दिए और विकट रूप धारण कर लंका को जलाया। भीम रूप धारण कर असुरों का संहार किया और श्री रामचंद्र जी के सभी कार्य सँवारे। संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण जी को जीवित किया, जिससे श्री रघुवीर ने उन्हें हर्षित होकर हृदय से लगाया।

चालीसा में यह भी वर्णित है कि हनुमान जी ने सुग्रीव को श्री राम से मिलाया और राजपद दिलाया। विभीषण ने उनका मंत्र माना और लंकेश्वर बने। सहस्र योजन दूर स्थित सूर्य को बाल्यकाल में मीठा फल जानकर निगल लिया था। प्रभु की मुद्रिका मुख में रखकर समुद्र लाँघ गए। जगत के जो भी दुर्गम कार्य हैं, वे उनकी कृपा से सुगम हो जाते हैं। वे श्री राम के द्वार के रखवारे हैं, जिनकी आज्ञा के बिना कोई प्रवेश नहीं कर सकता। उनकी शरण में जाने वाले को सभी सुख प्राप्त होते हैं और किसी का भय नहीं रहता।

भूत, पिशाच उनके नाम सुनते ही निकट नहीं आते। निरंतर हनुमत बलवीर का जप करने से रोग नष्ट होते हैं और सभी पीड़ाएँ हर ली जाती हैं। जो मन, वचन और कर्म से ध्यान लगाता है, उसे संकट से छुटकारा मिलता है। चारों युगों में उनका प्रताप परसिद्ध है। वे साधु-संतों के रक्षक और असुरों का नाश करने वाले श्री राम के दुलारे हैं। माता जानकी ने उन्हें आठ सिद्धियाँ और नौ निधियाँ देने का वरदान दिया है। श्री राम का रसायन (भक्ति-रस) उनके पास है और वे सदा रघुपति के दास रहते हैं। उनके भजन से श्री राम की प्राप्ति होती है और जन्म-जन्म के दुख विसर जाते हैं। अंत समय में वे रघुवर के धाम को जाते हैं, जहाँ जन्म लेकर हरि-भक्त कहलाते हैं।

अंत में तुलसीदास जी कहते हैं कि जो सौ बार पाठ करता है, वह बंधन से छूट जाता है और महासुख प्राप्त करता है। जो यह हनुमान चालीसा पढ़ता है, उसे सिद्धि प्राप्त होती है, गौरीश (शिव) इसके साक्षी हैं। तुलसीदास सदा हरि के दास हैं और हनुमान जी से प्रार्थना करते हैं कि हे नाथ, आप मेरे हृदय में निवास कीजिए। अंतिम दोहे में पवनपुत्र को संकट हरने वाला और मंगलमूर्ति कहकर श्री राम, लक्ष्मण और सीता सहित हृदय में बसने की प्रार्थना की गई है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

हनुमान चालीसा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह सरल अवधी भाषा में रचित होने के कारण सामान्य जन भी इसे सहजता से गा और पढ़ सकते हैं। शंकर महादेवन जी की प्रस्तुति में इस भजन को एक नई श्रवण-अनुभूति मिली है, जिससे नई पीढ़ी भी इस पवित्र पाठ से जुड़ रही है। इस भजन में भक्ति, वीरता और शरणागति का त्रिवेणी संगम है।

धार्मिक दृष्टि से हनुमान जी कलयुग के जागृत देव माने जाते हैं। मान्यता है कि हनुमान चालीसा का नियमित पाठ करने से भय, रोग, शोक और संकट दूर होते हैं। यह पाठ साधक में आत्मविश्वास, साहस और निष्काम सेवा का भाव जागृत करता है। विद्यार्थियों के लिए यह बुद्धि और स्मरण शक्ति बढ़ाने वाला, गृहस्थों के लिए सुख-शांति देने वाला और साधकों के लिए आध्यात्मिक उन्नति करने वाला माना जाता है।

हनुमान जी की उपासना का विशेष महत्व मंगलवार और शनिवार को माना जाता है। अनेक भक्त प्रातःकाल स्नान करके, दीपक और धूप जलाकर, हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं। यह भजन केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि आत्म-शुद्धि और ईश्वर-प्राप्ति का साधन है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

हनुमान चालीसा का पाठ या श्रवण किसी भी शुभ अवसर पर किया जा सकता है, परंतु कुछ समय और अवसर विशेष रूप से फलदायी माने जाते हैं:

  • प्रातःकाल: स्नान के बाद, पूर्व दिशा की ओर मुख करके, दीपक और धूप जलाकर पाठ करना उत्तम माना जाता है।
  • सायंकाल: संध्या आरती के समय भी इसका पाठ किया जा सकता है।
  • मंगलवार एवं शनिवार: हनुमान जी की उपासना के ये विशेष दिन माने जाते हैं।
  • हनुमान जयंती, राम नवमी, दीपावली: इन पर्वों पर विशेष पाठ का महत्व है।
  • संकट काल: किसी भी प्रकार के संकट, भय या रोग में इसका पाठ शरणागति भाव से किया जाता है।

पाठ की विधि में शुद्ध वस्त्र धारण करना, आसन पर बैठना, हनुमान जी की मूर्ति या चित्र के सम्मुख दीपक जलाना और 'श्री राम' या 'जय हनुमान' का स्मरण करते हुए चालीसा का पाठ करना शामिल है। पाठ के बाद हनुमान जी की आरती की जाती है और प्रसाद वितरित किया जाता है। श्रवण करते समय भी मन को एकाग्र रखना और भावपूर्ण श्रद्धा रखना आवश्यक माना जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

हनुमान चालीसा किसने लिखी है?

हनुमान चालीसा की रचना गोस्वामी तुलसीदास जी ने की है। यह अवधी भाषा में 40 चौपाइयों और दो दोहों में निबद्ध है।

हनुमान चालीसा का पाठ कब करना चाहिए?

प्रातःकाल स्नान के बाद या सायंकाल आरती के समय पाठ करना उत्तम माना जाता है। मंगलवार और शनिवार को इसका विशेष महत्व है।

हनुमान चालीसा का पाठ करने से क्या लाभ होते हैं?

मान्यता है कि इसके नियमित पाठ से भय, रोग, शोक और संकट दूर होते हैं, बुद्धि और बल में वृद्धि होती है तथा मन में शांति और आत्मविश्वास जागृत होता है।

क्या हनुमान चालीसा का पाठ करते समय किसी विशेष नियम का पालन करना चाहिए?

पाठ करते समय शुद्ध वस्त्र, स्वच्छ स्थान, एकाग्र मन और श्रद्धा भाव का होना आवश्यक माना जाता है। पाठ के बाद आरती और प्रसाद का विधान है।

शंकर महादेवन द्वारा गाई गई हनुमान चालीसा की क्या विशेषता है?

शंकर महादेवन जी की प्रस्तुति में भजन को एक नई भक्ति-ऊर्जा और संगीतमयता प्राप्त हुई है। संगीत डॉ. संजयराज गौरीनंदन (SRG) जी ने संयोजित किया है, जिससे यह भजन नई पीढ़ी में भी लोकप्रिय हुआ है।

क्या हनुमान चालीसा का पाठ घर में कर सकते हैं?

हाँ, हनुमान चालीसा का पाठ घर में श्रद्धा और शुद्धता के साथ किया जा सकता है। इसके लिए किसी विशेष स्थान की आवश्यकता नहीं होती, केवल भक्ति भाव आवश्यक है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसमें हनुमान चालीसा के मूल पाठ, भावार्थ और महत्व को शास्त्रीय एवं परंपरागत संदर्भों के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। सामग्री में गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित मूल चालीसा का पाठ, शंकर महादेवन जी की प्रस्तुति की जानकारी तथा भक्ति-साहित्य की परंपरा का समावेश है। पाठकों से अनुरोध है कि वे इस सामग्री को श्रद्धा और विवेक के साथ ग्रहण करें तथा किसी भी धार्मिक अनुष्ठान के लिए अपने कुल-गुरु या विद्वान का मार्गदर्शन अवश्य लें।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 12 Oct 2026

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