Chhath Puja Geet मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

फलवा जनि जुठरिह सुग्गा (Phalwa Jani Juthariha) - Rani Thakur Chhath Puja Geet

पढ़ें फलवा जनि जुठरिह सुग्गा (Phalwa Jani Juthariha) - Rani Thakur Chhath Puja Geet - BhaktiLok का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं

छठ पूजा लोकगीत

रानी ठाकुर छठ पूजा गीत

प्रसिद्ध लोक गायिका रानी ठाकुर की मधुर वाणी में गाया गया यह छठ पूजा गीत 'फलवा जनि जुठरिह सुग्गा' लोक आस्था के महापर्व छठ की पावन पवित्रता, अनुशासन और प्रकृति के प्रति अगाध प्रेम को सजीव करता है। सूर्य देव और छठी मैया की आराधना में समर्पित यह पारंपरिक गीत न केवल उत्तर भारत के लोक संगीत की थाती है, बल्कि यह मानव मन और प्रकृति के बीच के उस पवित्र बंधन को भी रेखांकित करता है जहाँ हर एक फल, हर एक तिनका भगवान को समर्पित करने के लिए पूरी शुचिता और पवित्रता के साथ सुरक्षित रखा जाता है। इस विस्तृत आलेख में हम इस पावन गीत के बोल, उसके गहरे आध्यात्मिक अर्थ, छठ पूजा की सांस्कृतिक महत्ता तथा जीवन दर्शन पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

गीत एक नजर में (Quick Overview)

यह गीत भोजपुरी और अंगिका अंचल की लोक संस्कृति का वह अनमोल मोती है जो व्रति महिलाओं के अंतःकरण की उस भावना को व्यक्त करता है जहाँ वे सूर्य उपासना के पवित्र सूप और डाग़ (दउरा) के फलों को किसी भी प्रकार की जूठन या अपवित्रता से बचाने के लिए प्रकृति के जीवों, विशेषकर सुग्गा (तोता) से सविनय निवेदन करती हैं।

सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics

॥ स्तुति / मुखड़ा ॥

उग हे सुरुज देव भइले अरघिया के बेर,

फलवा जनि जुठरिह सुग्गा रे दउरा के फेर...

॥ अंतरा १ ॥

घाट पर सोहे केरा के घवदवा,

सुगा ले आवेला मनभावन गवनवा।

जोड़ जोड़ नारियल नींबू के गड़उआ,

सुग्गा भईले नादान जनि जुठरिहू सुग्वा हे...

॥ अंतरा २ ॥

चारो पहर हमरा मैया के बरतिया,

साफ सुथरा राखब पूजा के बरतिया।

पवित्र भईले घाट आ कोना के मड़इया,

सुग्गा जनि चोंच लगाइह दउरा के फलवा हे...

॥ अंतरा ३ ॥

रानी ठाकुर गावे छठी मैया के भजनिया,

सूर्य भगवान से मांगे कुल के सुखधनिया।

घर-परिवार में बरसे अइसन रे दुलरिया,

सबके जीवन में होखे मंगल पुजरिया हे...

गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth

रानी ठाकुर द्वारा स्वरबद्ध यह लोकगीत छठ महापर्व के दौरान अपनाई जाने वाली अत्यंत सूक्ष्म पवित्रता (नहाय-खाय से लेकर पारण तक की शुचिता) का सुंदर काव्यात्मक रूप है। आइए इस गीत के प्रत्येक चरण के गहरे आध्यात्मिक और व्यावहारिक अर्थ को समझें:

मुखड़ा का भाव: गीत की शुरुआत व्रति महिला के उस आह्वान से होती है जहाँ वह भगवान भास्कर से उगने का अनुरोध करती है क्योंकि अर्घ्य देने का समय हो चुका है। साथ ही, वह आकाश में उड़ने वाले और पेड़ों पर मंडराने वाले सुग्गा (तोते) से करबद्ध प्रार्थना करती है कि हे पक्षीराज! ये जो सूप और दउरे में सजाए गए फल हैं, इन्हें जूठा या खराब मत करना, क्योंकि ये प्रत्यक्ष देवता सूर्य नारायण और छठी मैया को समर्पित करने के लिए हैं।

अंतरा का भाव: छठ घाट की शोभा केले के हरे-पीले घवदों (झुंडों) और नाना प्रकार के मौसमी फलों से होती है। व्रति कहती है कि हमने अपने मन को साधकर और अत्यंत कठिन अनुशासन का पालन करते हुए इस पूजा की तैयारी की है। यह केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धता का उत्सव है। सुग्गा को नादान मानकर उससे प्रेमपूर्वक विनती की जाती है कि वह अपनी चोंच से इन पवित्र फलों को खंडित न करे।

गीत की मुख्य भावना, थीम एवं संदेश | Theme, Emotion & Message

इस लोकगीत की मूल भावना समर्पण, शुचिता और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की है। छठ पूजा एक ऐसा पर्व है जिसमें प्रकृति के हर घटक—नदी, जल, वायु, अग्नि, सूर्य, और यहाँ तक कि जीव-जंतुओं और वनस्पतियों का भी सम्मान किया जाता है। सुग्गा (तोते) को भगाने के बजाय उससे विनय करना भारतीय संस्कृति की उस महान उदारता को दर्शाता है जिसमें जीव-हत्या या क्रूरता का कोई स्थान नहीं है, बल्कि प्रेम और संवाद से प्रकृति के साथ समन्वय स्थापित किया जाता है।

इस विषय पर अधिक जानकारी के लिए आप हमारे अन्य लेख जैसे छठ पूजा गीत संग्रह और सूर्य देव स्तोत्र एवं वंदना पढ़ सकते हैं जो आपकी उपासना को और अधिक समृद्ध बनाएंगे।

गीत की जानकारी | Song Information

विवरण बिंदु तथ्य / जानकारी
गीत का शीर्षकफलवा जनि जुठरिह सुग्गा (Phalwa Jani Juthariha)
गायिकारानी ठाकुर (Rani Thakur)
विधाछठ पूजा लोकगीत / भक्ति संगीत
भाषाभोजपुरी / अंगिका लोकभाषा
प्रमुख देवताभगवान सूर्य एवं छठी मैया (माता षष्ठी)
मुख्य थीमपवित्रता, प्रकृति प्रेम, सूर्य उपासना और पारिवारिक कल्याण
प्रसारण परंपराकार्तिक मास में छठ महापर्व के दौरान घर-घर और घाटों पर गायन

कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings

शब्द / पदावली सरल हिंदी अर्थ सांस्कृतिक एवं गीत का संदर्भ
फलवाफलछठ पूजा के सूप और दउरे में रखे जाने वाले पवित्र मौसमी फल।
जुठरिहजूठा करना / खंडित करनापक्षियों या अन्य माध्यमों से फलों का स्पर्श कर उन्हें अपवित्र करना।
सुग्गातोता (पक्षी)प्रकृति का एक जीव, जिससे लोकगीत में प्रेमपूर्वक संवाद किया गया है।
दउराबांस की टोकरीछठ पूजा में प्रसाद और फल सजाकर रखने का पारंपरिक पात्र।
घवदवाकेले का पूरा घडूला / गुच्छाघाट पर पूजा की सजावट के लिए उपयोग होने वाला मुख्य वनस्पति स्तम्भ।
बरतियाव्रत / अनुष्ठानछठ महापर्व का अत्यंत कठिन और नियमों से बंधा हुआ 36 घंटे का निर्जला व्रत।

गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance

छठ पर्व भारतीय सनातन संस्कृति में एकमात्र ऐसा अनुष्ठान है जिसमें अस्त होते और उदय होते सूर्य दोनों की पूजा की जाती है। यह जीवन के चक्र—संध्या (विश्राम) और प्रातः (उदय)—का द्योतक है। 'फलवा जनि जुठरिह सुग्गा' गीत इस बात का प्रतीक है कि जब हम परमात्मा को कुछ समर्पित करते हैं, तो वह सर्वोत्तम, निष्कलंक और पूर्णतः शुद्ध होना चाहिए। मन की शुचिता के साथ-साथ बाहरी स्वच्छता का यह अद्भुत समन्वय छठ महापर्व की पहचान है। इस गीत को सुनने और गाने से मन में एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और व्रतियों को कठिन उपवास के दौरान मानसिक संबल प्राप्त होता है।

गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons

पवित्रता और अनुशासन

जीवन में जो भी कर्म या कर्मफल हम ईश्वर या समाज को समर्पित करें, वह प्रलोभन, छल और विकारों से मुक्त होना चाहिए।

प्रकृति के प्रति सहिष्णुता

सनातन संस्कृति सिखाती है कि प्रकृति के जीवों को भगाने या नष्ट करने के बजाय, उनसे संवाद स्थापित कर उनके साथ सामंजस्य बिठाया जाए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह पारंपरिक लोकगीत मुख्य रूप से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में मनाए जाने वाले लोक आस्था के महापर्व 'छठ पूजा' के दौरान, विशेषकर खरना और अर्घ्य के दिन महिलाओं द्वारा सामूहिक रूप से गाया जाता है।

इस गीत में 'सुग्गा' का अर्थ 'तोता' पक्षी से है। लोकगीत की नायिका (व्रति महिला) प्रकृति के उस छोटे जीव से आग्रह करती है कि वह पूजा के लिए रखे गए फलों को जूठा या खराब न करे।

रानी ठाकुर एक प्रसिद्ध लोक गायिका हैं जिन्होंने अपनी मधुर और सधी हुई आवाज में इस पारंपरिक छठ गीत को स्वरबद्ध किया है, जिससे यह गीत आज घर-घर में लोकप्रिय हो चुका है।

छठ महापर्व में शुचिता (पवित्रता) का अत्यधिक महत्व है क्योंकि प्रसाद के रूप में अर्पित किए जाने वाले फल और ठेकुआ पूर्णतः शुद्ध, सात्विक और बिना जूठे किए हुए भगवान सूर्य और छठी मैया को समर्पित किए जाते हैं।

यह गीत प्रकृति के एक जीव (तोते) के साथ संवाद की शैली पर आधारित है, जो इसे अन्य साधारण स्तुति गीतों की तुलना में अधिक काव्यात्मक, सजीव और अनूठा बनाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह आलेख लोक संस्कृति, पारंपरिक लोकगीतों और सनातन आस्था के सांस्कृतिक पहलुओं के अध्ययन पर आधारित है। इसे पाठकों की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जानकारी को समृद्ध करने के लिए संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

संदर्भ स्रोत: पारंपरिक भोजपुरी लोकगायन परंपरा, क्षेत्रीय छठ पूजा अनुष्ठान पद्धतियाँ एवं लोक साहित्य संकलन।

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 10 Oct 2026

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