Maa Kushmanda Shambhu Lahari Chanchal K. Lahari - Bhaktilok
URL Slug: 2022/09/maa-kushmanda-shakti-prapti-day-4.html | श्रेणियां: गायत्री मंत्र, हरि भजन, लक्ष्मी गायत्री मंत्र, पापमोचनी एकादशी व्रत कथा, देशभक्ति गीत
सनातन धर्म की महान आध्यात्मिक परंपरा में शक्ति स्वरूपा आदिशक्ति जगदम्बिका भवानी की उपासना का विशेष स्थान है। शारदीय और चैत्र नवरात्रि के पावन पर्व पर माँ दुर्गा के चतुर्थ स्वरूप, अष्टभुजाधारिणी, सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी माँ कूष्माण्डा की आराधना साधक को असीम ऊर्जा, आरोग्य, यश और तेजस्विता प्रदान करती है। चंचल के. लहरी जी द्वारा रचित और शंभू लहरी जी के निर्देशन में प्रस्फुटित यह पावन भजन "शक्ति प्राप्ति (Shakti Prapti) - Maa Kushmanda Shambhu Lahari Chanchal K. Lahari - Bhaktilok" केवल एक संगीत रचना नहीं है, अपितु यह जीवात्मा की उस मूल परम चेतना से मिलने की तड़प और अनन्य समर्पण का जीवंत दस्तावेज है। इस भजन का प्रत्येक शब्द साधक के अंतर्मन में स्थित कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत करने तथा जीवन के विकारों को दूर करने का सामर्थ्य रखता है। कलयुग के इस भौतिकतावादी युग में जहाँ मन चंचल और अशांत रहता है, वहाँ इस प्रकार के दिव्य संकीर्तन एवं भजन साधक को आंतरिक स्थिरता, मानसिक शांति और परम शक्ति (Shakti) की प्राप्ति का अचूक मार्ग दिखाते हैं। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम माँ कूष्माण्डा की कृपा, भजन के गूढ़ अर्थ, भावार्थ और आध्यात्मिक रहस्यों का रसास्वादन करेंगे।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
॥ मुखड़ा ॥
जय जय माँ कूष्माण्डा भवानी, जगत की पालनहारी।
तुझसे ही शक्ति पावें सब, हे माँ जगमग महतारी॥
शंभू लहरी गाए महिमा, चंचल मन हरसावे।
जो शरण तुम्हारी आवे, वह सब कुछ पावे॥
॥ प्रथम अंतरा ॥
अंडमान विस्तार तुम्हारा, ब्रह्मांड की हो तुम ज्योति।
तुम्हारी एक दृष्टि पाकर, जलती जीवन की जोति॥
अष्टभुज रूप विराजे हाथों, कमण्डल चाप बाण सोहे।
अमृत कलश चक्र गदा धरि, रूप ये मन को मोहे॥
॥ द्वितीय अंतरा ॥
सूर्य लोक की शक्ति तुम हो, तेज तुम्हारा न्यारा।
अंधकार मिटा जगत का, तुमने जग को उजियारा॥
रोग शोक सब दूर भगाओ, बल बुद्धि का दान दो माई।
चरणों में तेरे झुक, शीश झुकाए महिमा गाई गाई॥
॥ समापन अंतरा ॥
चंचल मन की चंचलता को, भक्ति में तुम मोड़ो जी।
शंभू लहरी कहे भवानी, नाता कभी न तोड़ो जी॥
शक्ति प्राप्ति हो साधक को, ऐसा वरदान दो माता।
जय माता दी गूंजे नारा, जग में तेरा यश गाता॥
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
यह अत्यंत पावन भजन साधक की उस आंतरिक भावना को व्यक्त करता है जहाँ वह अपनी आराध्य देवी माँ कूष्माण्डा से केवल भौतिक सुखों की नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शक्ति और आत्मबल की याचना करता है। भजन के मुखड़े में माँ को पूरे जगत की पालनहारी बताते हुए उनके चरणों में पूर्ण समर्पण का भाव प्रकट किया गया है। रचनाकार चंचल के. लहरी और संगीतकार शंभू लहरी ने इस बात को रेखांकित किया है कि जो भी भक्त सच्चे हृदय से माँ की शरण में जाता है, उसे इस लोक और परलोक दोनों में अक्षय शक्ति की प्राप्ति होती है।
अंतरों के माध्यम से माँ कूष्माण्डा के स्वरूप का अत्यंत सुंदर वर्णन किया गया है। 'अंडमान विस्तार तुम्हारा' पंक्तियाँ इस पौराणिक सत्य की ओर संकेत करती हैं कि इस संपूर्ण ब्रह्मांड की रचना, उसका विस्तार और संचालन माँ की मंद मुस्कान (कूष्माण्ड) से ही हुआ है। उनके आठ हाथों में सुशोभित कमण्डल, धनुष-बाण, कमल पुष्प, अमृत कलश, चक्र, गदा और जपमाला साधक को जीवन के संघर्षों से लड़ने का अदम्य साहस प्रदान करते हैं। सूर्य मंडल को दिशा देने वाली माँ जब अपने भक्तों पर दृष्टि डालती हैं, तो उनके जीवन का समस्त अंधकार स्वतः समाप्त हो जाता है। यह भजन हमें सिखाता है कि सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर यदि माँ के चरणों में ध्यान लगाया जाए, तो आंतरिक दुर्बलता दूर होकर अनंत शक्ति का संचार होता है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
"शक्ति प्राप्ति" शीर्षक यह भजन नवरात्रि के चौथे दिन विशेष रूप से गाया और सुना जाता है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- दिव्य शक्ति का आह्वान: यह भजन साधक के भीतर छिपी हुई आत्मिक ऊर्जा और संकल्प शक्ति को जागृत करने का माध्यम है।
- भक्ति और संगीत का अद्भुत संगम: चंचल के. लहरी के भावपूर्ण शब्दों और शंभू लहरी के मधुर संगीत संयोजन से यह रचना श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देती है।
- सूर्य चक्र जागरण: माँ कूष्माण्डा का संबंध सूर्य मंडल से है, अतः इस भजन का पाठ करने से शरीर में सूर्य के समान तेज और ओज की वृद्धि होती है।
- मानसिक शांति: चंचल मन को स्थिर करने और एकाग्रता बढ़ाने के लिए यह एक अचूक संकीर्तन है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस पावन भजन का गायन और श्रवण करने के लिए विशेष नियमों का पालन करने से इसकी प्रभावशीलता और अधिक बढ़ जाती है:
- सर्वोत्तम समय: नवरात्रि के चौथे दिन (माँ कूष्माण्डा के पूजन दिवस) प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त या संध्या बेला में इसका पाठ करना अत्यंत फलदायी है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक मंगलवार और शुक्रवार को भी इसका गायन किया जा सकता है।
- स्थान की पवित्रता: अपने पूजा गृह को स्वच्छ कर, माँ कूष्माण्डा के चित्र या विग्रह के समक्ष घी का दीपक प्रज्वलित करें।
- माला जाप के साथ: भजन प्रारंभ करने से पहले माँ के बीज मंत्र ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कूष्माण्डायै नमः का कम से कम एक माला जाप करें।
- भावपूर्ण गायन: इसे पूर्ण भक्ति भाव, ताली बजाकर या संगीत के साथ सामूहिक रूप से गाना चाहिए, जिससे वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो सके।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
इस भजन की केंद्र बिंदु हैं माँ दुर्गा की चतुर्थ शक्ति माँ कूष्माण्डा। सनातन पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, चारों ओर अंधकार ही अंधकार था, तब माँ ने अपने 'ईषत्' (हल्के) हास्य से इस ब्रह्मांड की रचना की थी, इसलिए इन्हें 'कूष्माण्डा' कहा गया। इनके शरीर की प्रभा सूर्य के समान दैदीप्यमान है।
इस भजन के रفاकार एवं कलाकार चंचल के. लहरी और शंभू लहरी हैं, जिन्होंने अपनी साधना और संगीत साधना के माध्यम से सनातन संस्कृति की इस अद्भुत गाथा को जन-जन तक पहुँचाने का महान कार्य किया है। संतों और कलाकारों का यह मिलन समाज में धर्म और अध्यात्म का प्रकाश फैलाने का कार्य करता है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
भजन की रचना लोककल्याण और माता के प्रति अनन्य प्रेम की पृष्ठभूमि में हुई है। आधुनिक युग में जहाँ मनुष्य तनाव, भय और ऊर्जा की कमी से जूझ रहा है, वहाँ इस प्रकार की रचनाएँ संजीवनी बूटी का कार्य करती हैं। रचनाकार ने शास्त्रीय कथाओं को सरल बोलचाल की भाषा में ढालकर सामान्य जनमानस तक पहुँचाया है ताकि हर आयु वर्ग का व्यक्ति इसे आसानी से गा सके और माँ की कृपा का पात्र बन सके।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
यह भजन सरल और सुबोध हिंदी (खड़ी बोली मिश्रित ब्रज-अवधि के प्रभाव वाली लोक भाषा) में रचित है। इसमें अनुप्रास और रूपक अलंकारों का सहज प्रयोग हुआ है। 'शंभू लहरी' और 'चंचल' शब्दों का अंत्याप्रास और तुकबंदी भजन को लयबद्ध बनाते हैं जिससे यह श्रोताओं की जुबान पर आसानी से चढ़ जाता है। काव्य शैली आत्मकथात्मक और प्रार्थनापरक है, जो सीधे हृदय को स्पर्श करती है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
इस भजन से हमें निम्नलिखित अमूल्य जीवन सीख मिलती हैं:
- शरणगति का महत्व: जीवन के कठिन समय में जब सब रास्ते बंद प्रतीत हों, तब परम शक्ति की शरण में जाने से सारे संकट दूर हो जाते हैं।
- सकारात्मक ऊर्जा का संचार: आंतरिक दुर्बलता को त्यागकर माता से 'शक्ति प्राप्ति' की प्रार्थना करना ही सच्चा पुरुषार्थ है।
- चंचल मन का नियंत्रण: मन की चंचलता को भटकाव से हटाकर ईश्वर की भक्ति में लगाना ही असली साधना है।
- नियमित साधना: निरंतर नाम जप और संकीर्तन से जीवन में तेज और आरोग्य की प्राप्ति होती है।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल अर्थ | संदर्भ / प्रसंग |
|---|---|---|
| कूष्माण्डा | कुम्हड़े (कोहड़े) जैसी बलि या त्रैलोक्य को अपने उदर में धारण करने वाली | माँ दुर्गा का चौथा स्वरूप |
| अंडमान / ब्रह्मांड | समस्त सृष्टि और ब्रह्मांड | माँ की सृजन शक्ति |
| अष्टभुज | आठ भुजाओं वाली | माँ का दिव्य स्वरूप |
| शंभू लहरी | संगीतकार / शिव भक्त का नाम | भजन के रचनाकार/गायक संदर्भ |
| महतारी | माता / जननी | जगदम्बा के प्रति वात्सल्य भाव |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"जय जय माँ कूष्माण्डा भवानी, जगत की पालनहारी..."
इस पंक्ति में माँ की वंदना करते हुए उन्हें संपूर्ण ब्रह्मांड का पोषण करने वाली महामाता के रूप में स्वीकार किया गया है।
"अष्टभुज रूप विराजे हाथों, कमण्डल चाप बाण सोहे..."
यहाँ माँ के अस्त्र-शस्त्रों और उनके पवित्र स्वरूप का वर्णन है, जो दुष्टों का संहार और भक्तों की रक्षा का प्रतीक है।
"चंचल मन की चंचलता को, भक्ति में तुम मोड़ो जी..."
यह साधक की व्यक्तिगत प्रार्थना है कि उसका मन संसार में भटकता है, जिसे माता अपनी कृपा से अपने चरणों में स्थिर कर लें।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
माँ कूष्माण्डा की आराधना के समय निम्नलिखित पौराणिक श्लोक का स्मरण करना अत्यंत फलदायी माना गया है:
अर्थात: अमृत से परिपूर्ण कलश और रक्त से सने हुए हाथों से सुशोभित, कमल के समान हाथों वाली माँ कूष्माण्डा हमें शुभ फल प्रदान करें। इसके साथ ही आप पापमोचनी एकादशी व्रत कथा और लक्ष्मी गायत्री मंत्र का पाठ करके भी अपने आध्यात्मिक जीवन को समृद्ध बना सकते हैं।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | शक्ति प्राप्ति (Shakti Prapti) - Maa Kushmanda |
|---|---|
| समर्पित देवी | माँ कूष्माण्डा (दुर्गा का चतुर्थ स्वरूप) |
| गायक / रचनाकार | चंचल के. लहरी एवं शंभू लहरी |
| भाषा | हिंदी / लोक भाषा |
| मुख्य विषय | शक्ति साधना, भक्ति और शरणागति |
| उपयुक्त अवसर | शारदीय / चैत्र नवरात्रि (चौथा दिन), दैनिक पूजा |
| प्लेटफॉर्म | भक्तिलोक (Bhaktilok.in) |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
माँ कूष्माण्डा की पूजा किस दिन की जाती है?
माँ कूष्माण्डा की पूजा नवरात्रि के चतुर्थ दिवस (चौथे दिन) पर की जाती है। इस दिन इनकी उपासना से अनाहत चक्र जाग्रत होता है।
"शक्ति प्राप्ति" भजन के रचयिता कौन हैं?
यह पावन भजन चंचल के. लहरी द्वारा रचित है तथा इसे शंभू लहरी के संकीर्तन और निर्देशन में प्रस्तुत किया गया है।
इस भजन को गाने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है?
इस भजन के नियमित गायन और श्रवण से मन की चंचलता समाप्त होती है, आत्मबल बढ़ता है और माँ कूष्माण्डा की विशेष कृपा से आरोग्य व तेज की प्राप्ति होती है।
क्या इस भजन को घर पर सामान्य पूजा के दौरान गाया जा सकता है?
हाँ, इसे प्रतिदिन की संध्या आरती या नवरात्रि के विशेष दिनों में परिवार के साथ मिलकर अत्यंत श्रद्धापूर्वक गाया जा सकता है।
माँ कूष्माण्डा का वाहन क्या है?
माँ कूष्माण्डा का वाहन सिंह (शेर) है, जो शक्ति, पराक्रम और निर्भीकता का प्रतीक है।
सूर्य मंडल से माँ कूष्माण्डा का क्या संबंध है?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सूर्य मंडल के भीतर लोक स्थापित करने की क्षमता केवल माँ कूष्माण्डा में ही है, इसलिए वे सूर्य को दिशा और ऊर्जा प्रदान करती हैं।
भजन में 'चंचल मन' का क्या तात्पर्य है?
'चंचल मन' मनुष्य के उस स्वभाव को दर्शाता है जो भौतिक इच्छाओं और चिंताओं में भटकता रहता है, जिसे भक्ति के द्वारा स्थिर किया जाना आवश्यक है।
इस भजन को भक्तिलोक पर कहाँ खोजा जा सकता है?
आप इसे Bhaktilok.in पर नवरात्रि विशेष, भजन, और देवी स्तुति श्रेणियों के अंतर्गत आसानी से प्राप्त कर सकते हैं।
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह मार्गदर्शिका सनातन धर्म के ग्रंथों, नवरात्रि पूजन परंपराओं और लोक भजनों के पारंपरिक स्वरूप को ध्यान में रखते हुए संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इसका उद्देश्य पाठकों को माँ कूष्माण्डा की महिमा और शक्ति प्राप्ति के आध्यात्मिक रहस्यों से अवगत कराना है। सभी तथ्यों और अर्थों को प्रामाणिक परंपराओं के आधार पर सरल हिंदी में प्रस्तुत किया गया है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- दुर्गा सप्तशती एवं देवी पुराण - गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशन
- शारदीय एवं चैत्र नवरात्रि व्रत कथा एवं पूजन पद्धति
- पारंपरिक भक्ति संगीत एवं संकीर्तन संग्रह - चंचल के. लहरी एवं शंभू लहरी प्रस्तुति
- वैदिक सनातन पंचांग एवं धार्मिक ग्रंथ संदर्भ
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