सनातन धर्म में आदिशक्ति माँ दुर्गा की आराधना का विशेष महत्व है, और नवरात्रि के पावन अवसर पर देवी गीतों का गायन व श्रवण भक्तों के हृदय में भक्ति की अविरल धारा प्रवाहित करता है। लखबीर सिंह लखा द्वारा गाया गया प्रसिद्ध भजन "अब मेरी भी सुनो (Ab Meri Bhi Suno)" एक ऐसा ही कालजयी और भावपूर्ण गीत है, जो माँ भगवती के चरणों में पूर्ण समर्पण और करुण पुकार को दर्शाता है। इस भजन में एक व्याकुल जीवात्मा अपनी आराध्या माँ जगदम्बा से अपनी व्यथा सुनने और संकटों का निवारण करने की प्रार्थना कर रही है। लखबीर सिंह लखा की ओजस्वी और भावुक आवाज ने इस भजन को घर-घर में लोकप्रिय बना दिया है। इस लेख में हम इस पावन भजन के सम्पूर्ण बोल, उसका विस्तृत भावार्थ, आध्यात्मिक महत्व और इससे मिलने वाली जीवन सीख का गहराई से विश्लेषण करेंगे।
सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics
अब मेरी भी सुनो हे मात भवानी, अब मेरी भी सुनो
(कोरस)
अब मेरी भी सुनो हे मात भवानी, अब मेरी भी सुनो।
तुम तो सबकी सुनती आई, मेरी बार क्यों देर लगाई,
अब मेरी भी सुनो हे मात भवानी, अब मेरी भी सुनो॥
(अंतरा - 1)
भीड़ पड़ी जब-जब भक्तों पर, तुमने रूप धरा है न्यारा।
दुष्टों का संहार किया माँ, भक्तों को दिया सहारा।
महिषासुर को मारने वाली, चंड-मुंड की करने वाली खाली,
अब मेरी भी सुनो हे मात भवानी, अब मेरी भी सुनो॥
(अंतरा - 2)
दीन-दुखी और अनाथों की माँ, तुम ही तो रखवाली हो।
जिसके सिर पर हाथ तुम्हारा, उसकी झोली खाली न हो।
मैं भी बालक द्वार खड़ा हूँ, आस लगाए द्वार पड़ा हूँ,
अब मेरी भी सुनो हे मात भवानी, अब मेरी भी सुनो॥
(अंतरा - 3)
भवसागर में नैया मेरी, डगमग-डगमग डोल रही।
कोई न मेरा खेवनहारा, विपदा मुख को खोल रही।
तुम ही मेरी पतवार बनो माँ, इस नैया को पार करो माँ,
अब मेरी भी सुनो हे मात भवानी, अब मेरी भी सुनो॥
(अंतरा - 4)
लखा तो बस शरण में आया, चरणों में शीश झुकाता है।
शर्मा भी माँ तेरी महिमा, दिन-रात प्रेम से गाता है।
हम पर भी उपकार करो माँ, बिगड़ी बात संवारो माँ,
अब मेरी भी सुनो हे मात भवानी, अब मेरी भी सुनो॥
गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth
यह भजन जीवात्मा और परमात्मा (माँ दुर्गा) के बीच के अत्यंत घनिष्ठ और वात्सल्यपूर्ण संबंध को उजागर करता है। यहाँ भक्त अपनी माँ से शिकायत भी करता है और उन पर अपना अधिकार भी जताता है।
मुखड़े का भावार्थ
भजन के मुखड़े में भक्त अत्यंत आर्त भाव से पुकारता है कि "हे मात भवानी! अब मेरी भी पुकार सुन लीजिए।" वह माँ से कहता है कि हे जननी, आप तो इस चराचर जगत की माता हैं और आपने हमेशा से अपने सभी भक्तों की पुकार सुनी है। फिर मेरी बारी आने पर आपने इतनी देर क्यों लगा दी? यह "देर लगाने" की शिकायत वास्तव में भक्त का माँ के प्रति अनन्य प्रेम और अधिकार भाव है, जहाँ वह अपनी व्याकुलता को व्यक्त कर रहा है।
प्रथम अंतरे का भावार्थ
पहले अंतरे में भक्त माँ के ऐतिहासिक और पौराणिक स्वरूपों का स्मरण करता है। वह कहता है कि जब-जब पृथ्वी पर धर्म की हानि हुई और भक्तों पर संकट आया, तब-तब आपने अत्यंत दिव्य और रौद्र रूप धारण करके असुरों का नाश किया। आपने महिषासुर, चंड और मुंड जैसे भयानक राक्षसों का संहार करके देवताओं और ऋषियों को अभयदान दिया। भक्त का विश्वास है कि जो देवी इतने बड़े-बड़े संकट टाल सकती है, वह उसके जीवन के छोटे-छोटे दुखों को अवश्य दूर करेगी।
द्वितीय अंतरे का भावार्थ
दूसरे अंतरे में माँ के करुणामयी और वात्सल्यमयी रूप का वर्णन है। भक्त कहता है कि इस संसार में जो दीन, दुखी, अनाथ और असहाय हैं, उन सभी की रक्षक केवल आप ही हैं। जिसके मस्तक पर आपका वरदहस्त (आशीर्वाद का हाथ) होता है, उसका जीवन कभी भी अभावों में नहीं बीतता। भक्त स्वयं को एक अबोध बालक मानकर माँ के द्वार पर खड़ा है और अपनी झोली फैलाने की आस लगाए बैठा है।
तृतीय अंतरे का भावार्थ
तीसरे अंतरे में संसार को एक विशाल और भयानक समुद्र (भवसागर) के रूप में चित्रित किया गया है। भक्त कहता है कि इस संसार रूपी सागर में मेरी जीवन रूपी नैया डगमगा रही है। वासनाओं, चिंताओं और कठिनाइयों के थपेड़े इसे डुबोने का प्रयास कर रहे हैं। इस संसार में मेरा कोई ऐसा रक्षक या खेवनहार नहीं है जो मुझे इस संकट से बचा सके। इसलिए, हे माँ! आप ही मेरी पतवार बनिए और मेरी इस नैया को सुरक्षित किनारे पर लगा दीजिए।
चतुर्थ अंतरे का भावार्थ
अंतिम अंतरे में समर्पण की पराकाष्ठा है। गायक लखबीर सिंह लखा और गीतकार माँ के चरणों में अपना सर्वस्व समर्पित करते हुए कहते हैं कि हम केवल आपकी शरण में आए हैं और आपके चरणों में अपना मस्तक झुकाते हैं। हम निरंतर आपकी महिमा का गान कर रहे हैं। हे माँ! हमारी बिगड़ी हुई परिस्थितियों को सुधार दीजिए और हम पर अपनी असीम कृपा बरसाइए।
गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message
इस भजन की मुख्य भावना "करुणा" और "शरणागति" है। सनातन भक्ति परंपरा में भगवान के प्रति पाँच प्रकार के भाव माने गए हैं - शांत, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर। यह भजन मुख्य रूप से वात्सल्य भाव और दास्य भाव का सुंदर मिश्रण है, जहाँ भक्त स्वयं को बालक और देवी को परम माता मानकर पुकारता है।
इस भजन का मुख्य संदेश यह है कि मनुष्य चाहे कितने भी बड़े संकट में क्यों न हो, यदि वह सच्चे मन और पूर्ण विश्वास के साथ जगदम्बा की शरण में जाता है, तो माँ उसकी पुकार अवश्य सुनती हैं। यह गीत हमें सिखाता है कि अहंकार को त्यागकर ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण ही दुखों से मुक्ति का एकमात्र मार्ग है।
गीत की जानकारी | Song Information
| विवरण बिंदु | महत्वपूर्ण जानकारी |
|---|---|
| गीत का नाम | अब मेरी भी सुनो (Ab Meri Bhi Suno) |
| मुख्य गायक | लखबीर सिंह लखा (Lakhbir Singh Lakha) |
| समर्पित देवता | माँ दुर्गा / मात भवानी |
| मुख्य अवसर | शारदीय एवं चैत्र नवरात्रि, दुर्गा पूजा, माता की चौकी, जागरण |
| गीत की भाषा | सरल हिंदी (खड़ी बोली) |
| संगीत शैली | पारंपरिक भक्ति संगीत (भजन) |
| मुख्य रस | भक्ति रस, करुण रस |
गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators
इस भजन की सफलता में इसके कलाकारों का बहुत बड़ा योगदान है:
- लखबीर सिंह लखा: भारत के सबसे प्रतिष्ठित और लोकप्रिय देवी-गीत गायकों में से एक हैं। उनकी बुलंद और भावपूर्ण आवाज में गाया गया हर भजन सीधे श्रोताओं के हृदय को छूता है। "प्यारा सजा है दरबार", "बेटा जो बुलाए माँ को आना चाहिए" जैसे भजनों के साथ "अब मेरी भी सुनो" भी उनकी सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुतियों में गिना जाता है।
- संगीतकार और लेखक: इस भजन के शब्द अत्यंत सरल परंतु गहरे अर्थ वाले हैं। पारंपरिक धुनों पर आधारित इसका संगीत भक्तों को झूमने और अश्रुपूर्ण नेत्रों से प्रार्थना करने पर विवश कर देता है।
कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings
| शब्द | सरल अर्थ | भजन के संदर्भ में महत्व |
|---|---|---|
| मात भवानी | माता पार्वती / दुर्गा | सृष्टि की जननी और कल्याणकारी देवी। |
| भीड़ पड़ी | संकट या विपत्ति आना | जब भक्तों पर असुरों या कठिनाइयों का संकट आया। |
| भवसागर | संसार रूपी समुद्र | जन्म और मृत्यु का चक्र जिसमें मनुष्य फंसा रहता है। |
| खेवनहारा | नाव चलाने वाला (नाविक) | जीवन की नैया को पार लगाने वाले ईश्वर। |
| विपदा | मुसीबत / संकट | सांसारिक कष्ट और मानसिक अशांति। |
| शीश | मस्तक / सिर | समर्पण और विनम्रता का प्रतीक। |
गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance
सांस्कृतिक रूप से, यह भजन उत्तर और मध्य भारत में नवरात्रि के त्योहार का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। नवरात्रि के नौ दिनों के दौरान मंदिरों, पंडालों और घरों में सुबह-शाम इस भजन को बजाया जाता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से, यह भजन साधक को यह याद दिलाता है कि सांसारिक संबंध अस्थाई हैं। जब जीवन में कोई सहारा नहीं बचता, तब केवल ईश्वरीय सत्ता ही हमारी रक्षक होती है। यह भजन सुनने से मन को असीम शांति मिलती है और नकारात्मक विचारों का नाश होता है। जैसे गायत्री मंत्र बुद्धि को सन्मार्ग पर ले जाता है और लक्ष्मी गायत्री मंत्र समृद्धि प्रदान करता है, वैसे ही यह देवी भजन साधक के अंतःकरण में भक्ति और साहस का संचार करता है।
गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons
यह भजन केवल एक प्रार्थना नहीं है, बल्कि यह हमें जीवन जीने के कई महत्वपूर्ण सिद्धांत भी सिखाता है:
- धैर्य और विश्वास: जब भक्त कहता है कि "मेरी बार क्यों देर लगाई", तो यह दर्शाता है कि देर होने पर भी भक्त का विश्वास डगमगाया नहीं है। हमें भी कठिन समय में ईश्वर पर अटूट विश्वास रखना चाहिए।
- अहंकार का त्याग: स्वयं को "बालक" और "दीन-दुखी" कहना यह दर्शाता है कि ईश्वर के सामने हमारा कोई अहंकार नहीं होना चाहिए। समर्पण ही कृपा प्राप्ति की पहली सीढ़ी है।
- कृतज्ञता का भाव: माँ द्वारा पूर्व में किए गए उपकारों (जैसे महिषासुर वध) को याद करना हमें सिखाता है कि हमें ईश्वर के प्रति हमेशा कृतज्ञ रहना चाहिए।
गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing
यद्यपि ईश्वर की आराधना किसी भी समय की जा सकती है, परंतु इस भजन को सुनने और गाने के कुछ विशेष अवसर निम्नलिखित हैं:
- नवरात्रि उत्सव: चैत्र और शारदीय नवरात्रि के दौरान इस भजन का श्रवण अत्यंत फलदायी माना जाता है।
- माता की चौकी व जागरण: किसी भी मांगलिक कार्य की शुरुआत में देवी माँ की प्रसन्नता के लिए इस भजन को गाया जाता है।
- संध्या आरती के समय: प्रतिदिन शाम को घर के मंदिर में इस भजन को सुनने से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है।
- संकट के समय: जब मन अशांत हो या जीवन में कोई बड़ी कठिनाई हो, तब इस भजन को सुनने से मानसिक संबल मिलता है।
एक नजर में गीत की जानकारी | Song at a Glance
| मुख्य श्रेणी | विवरण |
|---|---|
| भजन का शीर्षक | अब मेरी भी सुनो हे मात भवानी |
| मुख्य गायक | लखबीर सिंह लखा |
| मुख्य रस | करुण और भक्ति रस |
| संबंधित त्योहार | नवरात्रि, दुर्गा पूजा |
| मुख्य संदेश | पूर्ण शरणागति और संकट निवारण की प्रार्थना |
| काव्य शैली | गेय पद (भजन) |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन का संकलन और इसकी व्याख्या सनातन धर्म की पारंपरिक भक्ति पद्धतियों और प्रामाणिक स्रोतों के आधार पर की गई है। लखबीर सिंह लखा के भजनों ने भारतीय जनमानस में देवी भक्ति को एक नया आयाम दिया है। इस भजन की प्रत्येक पंक्ति भक्त के हृदय में ईश्वर के प्रति अगाध श्रद्धा उत्पन्न करने वाली है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्देवीभागवत पुराण - माँ दुर्गा की महिमा और उनके विभिन्न अवतारों का वर्णन।
- पारंपरिक देवी संकीर्तन पद्धति एवं भजन संग्रह।
- लखबीर सिंह लखा के आधिकारिक भक्ति एल्बम और संगीत प्रस्तुतियां।
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