Punjabi Devi Bhajan मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

सातो बहिनीय झुला झुलेल?? (Bhakti)

अंजलि भारद्वाज का लोकप्रिय देवी गीत 'सातो बहिनीय झुला झुलेली' का आनंद लें। संदर्भ एवं व्याख्या सहित माँ दुर्गा और नौ देवियों के इस लोक भजन के बोल व महिमा पढ़ें।

देवी गीत एवं लोक परंपरा

सातो बहिनीय झुला झुलेली | Anjali Bhardwaj Devigeet Bhakti Song | Bhakti Bhajan

प्रकाशन तिथि: 2026 | श्रेणी: देवी गीत, शक्ति उपासना, भोजपुरी लोक भजन | स्वर: अंजलि भारद्वाज

सनातन संस्कृति और लोक परंपराओं में आदिशक्ति माँ दुर्गा की उपासना के अनेक रूप प्रचलित हैं। जहाँ एक ओर वैदिक स्तोत्रों और दुर्गा सप्तशती के माध्यम से माँ की स्तुति की जाती है, वहीं दूसरी ओर लोकगीतों और देविगीतों के माध्यम से जनमानस अपनी आत्मीयता और अनन्य प्रेम को प्रकट करता है। अंजलि भारद्वाज द्वारा स्वरबद्ध लोकप्रिय देविगीत 'सातो बहिनीय झुला झुलेली' इसी लोक-आस्था का एक अत्यंत मधुर, मार्मिक और ऊर्जावान प्रतीक है। इस भजन में माँ दुर्गा के साथ उनकी सप्त बहनों (सात देवियों - महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती, ब्राह्मणी, माहेश्वरी, कौमारी, वाराही अथवा स्थानीय कुलदेवियों के रूप में) के एक साथ झूला झूलने का अलौकिक दृश्य प्रस्तुत किया गया है। यह प्रसंग न केवल उत्सव और उल्लास का है, बल्कि यह इस बात का भी द्योतक है कि भक्तगण अपनी आराध्य शक्तियों को अपने घर-आँंगण में आमंत्रित कर उनके साथ सपरिवार आनंदोत्सव मनाते हैं। नवरात्रि, चैती छठ, या किसी भी मांगलिक अवसर पर इस प्रकार के देविगीत गाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा, सुख, शांति और माँ भगवती की असीम अनुकंपा प्राप्त होती है।

भक्तिलोक विशेष टिप्पणी

यह आलेख 'सातो बहिनीय झुला झुलेली' भजन के संपूर्ण लिरिक्स, उसके गहरे आध्यात्मिक अर्थ, लोक परंपरा में इसके महत्व और माता की शक्ति स्वरूपा बहनों की महिमा को समर्पित है। यदि आप अन्य पावन स्तोत्रों का पाठ करना चाहते हैं, तो हमारे दुर्गा सप्तशती पाठ और नवदुर्गा स्तोत्र के लेखों का भी अवश्य अवलोकन करें।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

मखड़ा (स्थाई):

सातो बहिनीय झुला झुलेली, ए माई...
झुलेली झुलेली हो झुलेली, ए माई...
सातो बहिनीय झुला झुलेली, ए माई झुलेली!

अंतरा 1:

पहिला पहिरवा के झुमके झुलेली,
दूसरा पहिरवा के हरवा झुलेली,
सातो बहिनीय झुला झुलेली, ए माई झुलेली!

अंतरा 2:

हाथवा में कंकणवा खनके झुलेली,
पाँववा में पैंजनिया बाजे झुलेली,
सातो बहिनीय झुला झुलेली, ए माई झुलेली!

अंतरा 3:

भक्तन के मनवा हरषे झुलेली,
मैया के दरसवा बरसे झुलेली,
सातो बहिनीय झुला झुलेली, ए माई झुलेली!

अंतिम चरण / समापन:

अंजलि गावे मैया तेरी महिमा अपार,
चरणन में झुके संसार, ए माई झुलेली!
सातो बहिनीय झुला झुलेली, ए माई...
झुलेली झुलेली हो झुलेली, ए माई!

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

अंजलि भारद्वाज द्वारा गाए गए इस लोकप्रिय देविगीत 'सातो बहिनीय झुला झुलेली' का भावार्थ अत्यंत गहरा और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध है। भारतीय सनातन परंपरा में आदिशक्ति माँ दुर्गा को केवल एक निर्जीव या अमूर्त शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि अपने परिवार की एक स्नेहिल बहन, पुत्री और करुणामयी माता के रूप में देखा जाता है।

सात बहनों का प्रतीक और झूलने का उत्सव

भजन में 'सातो बहिनीय' (सात बहनें) शब्द का प्रयोग देवी के विभिन्न स्वरूपों—महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती, और उनके अन्य मातृका स्वरूपों (ब्राह्मणी, माहेश्वरी, कौमारी आदि) का प्रतिनिधित्व करता है। लोक संस्कृति में जब सातों बहनें एक साथ झूला झूलती हैं, तो यह इस बात का प्रतीक है कि प्रकृति की समस्त शक्तियां और ऊर्जाएं एक्य के साथ ब्रह्मांड में संतुलन और आनंद स्थापित कर रही हैं। झूला झूलना भारतीय संस्कृति में उल्लास, सावन के महीने, और उत्सव का प्रतीक है। जब देवी माँ झूला झूलती हैं, तो इसका अर्थ है कि भक्त का जीवन भी दुखों से ऊपर उठकर आनंद और भक्ति के हिंडोले में झूलने लगा है।

आभूषणों की खनक और आंतरिक आनंद

भजन की पंक्तियों में हाथों के कंकण और पैरों की पैंजनिया (पायल) की आवाज का सुंदर वर्णन है। यह वर्णन देवी के जीवंत स्वरूप को हमारे समक्ष लाता है। यह दर्शाता है कि देवी कोई दूर बैठी हुई शक्ति नहीं हैं, बल्कि वे भक्तों के बीच उनके घर-परिवार की तरह निवास करती हैं। उनके आभूषणों की खनक इस बात का संकेत है कि जहाँ माँ की भक्ति होती है, वहाँ नकारात्मकता दूर भागती है और चारों ओर सकारात्मकता, संगीत तथा उल्लास का वातावरण बन जाता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

लोक संस्कृति का संगम

यह भजन शास्त्रीय जटिलताओं से दूर लोक की सहज भाषा में रचा गया है, जो सीधे आम जनमानस के हृदय को स्पर्श करता है। इसे गाते समय ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के भक्त एक जैसी दिव्यता का अनुभव करते हैं।

सामूहिक भक्ति का भाव

अंजलि भारद्वाज की मधुर और सधी हुई आवाज में यह गीत नवरात्रि के पंडालों, महिला संगीत, और घरों में होने वाले माता के जगराते में विशेष रूप से गाया जाता है, जो सामूहिक नृत्य और उल्लास को प्रेरित करता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

माता के इन लोकगीतों और भजनों को सुनने और गाने के लिए किसी कठोर शास्त्रीय नियमों की आवश्यकता नहीं होती, अपितु इसमें श्रद्धा और निर्मल भाव का महत्व सर्वोपरि है। फिर भी, इसे निम्नलिखित अवसरों पर विशेष रूप से करने से विशेष लाभ मिलता है:

  • नवरात्र के पावन दिन: शारदीय या चैत्र नवरात्रि के नौ दिनों में सुबह और संध्या काल की बेला में माता की चौकी सजाते समय।
  • महिला मंगल गीत / सोहर / जवांरा: घरों में होने वाले मांगलिक कार्यों, विवाह, मुंडन या देवी जागरण के दौरान महिला मंडली द्वारा।
  • दैनिक पूजा और ध्यान: मंगलवार या शुक्रवार को माता की विशेष आराधना करते समय मन को शांत करने और आनंदित करने के लिए।

भजन सुनते समय दीप प्रज्वलित करें, माता को पुष्प और मिष्ठान का भोग अर्पित करें तथा पूरी तन्मयता के साथ स्वर में स्वर मिलाएं। इससे मन के सारे तनाव दूर होते हैं और आत्मिक शांति प्राप्त होती है। माता की स्तुति के लिए आप श्री दुर्गा चालीसा का पाठ भी कर सकते हैं।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / पद सरल अर्थ आध्यात्मिक / सांस्कृतिक संदर्भ
सातो बहिनीय सात बहनें देवी दुर्गा के विभिन्न रूप और मातृका शक्तियां।
झुला झुलेली झूला झूल रही हैं आनंद, उल्लास और उत्सव का प्रतीक।
पहिरवा आभूषण / श्रृंगार माता का दिव्य और भव्य रूप।
पैलिनिया पायल / घुंघरू देवी के आगमन और उनकी उपस्थिति की ध्वनि।
दरसवा दर्शन भक्त को मिलने वाली दिव्य कृपा और शांति।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह लोकप्रिय देविगीत प्रसिद्ध लोक गायिका अंजलि भारद्वाज (Anjali Bhardwaj) द्वारा गाया गया है, जो अपनी मधुर आवाज और पारंपरिक देवी गीतों के लिए जानी जाती हैं।

लोक परंपरा में 'सातो बहिनीय' से तात्पर्य माँ दुर्गा के विभिन्न रूपों और सात प्रमुख देवियों (सप्तमाता) से है, जिन्हें ग्रामीण अंचलों में बहन के रूप में पूजकर आत्मीयता व्यक्त की जाती है।

यह गीत विशेष रूप से शारदीय और चैत्र नवरात्रि, माता के जगराते, और महिला संगीत के कार्यक्रमों में बहुत उत्साह के साथ गाया जाता है।

हाँ, पारंपरिक भक्ति संगीत और देवी गीत मन को शांत करने, नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने और सकारात्मकता का संचार करने में अत्यंत प्रभावी होते हैं।

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संपादकीय टिप्पणी: यह सामग्री पारंपरिक लोक साहित्य, सांस्कृतिक संदर्भों और जन-आस्था के आधार पर प्रस्तुत की गई है।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री © Bhaktilok.in

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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