Krishna Bhajan मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

मेरे मन में बस गयी है मोहन छवि तुम्हार?? (Pandit Neeraj Ji)

मेरे मन में बस गयी है मोहन छवि तुम्हारी भजन के बोल, अर्थ और आध्यात्मिक महत्व जानें। संदर्भ एवं व्याख्या सहित पढ़ें Bhaktilok पर।

"मेरे मन में बस गयी है मोहन छवि तुम्हारी" एक अत्यंत भावपूर्ण और हृदयस्पर्शी कृष्ण भजन है, जो भक्त के हृदय में भगवान श्री कृष्ण की मनमोहक छवि के प्रति अटूट श्रद्धा और प्रेम को दर्शाता है। पंडित नीरज जी द्वारा स्वरबद्ध यह भजन श्रोताओं को गोकुल और वृंदावन की उस दिव्य अनुभूति में ले जाता है, जहाँ भगवान की मंद मुस्कान और उनके नयनों की चमक भक्त के समस्त दुखों को हर लेती है। सनातन धर्म की भक्ति परंपरा में 'रूप ध्यान' का विशेष महत्व है, और यह भजन उसी ध्यान की एक संगीतमय अभिव्यक्ति है। जब एक साधक संसार की नश्वरता को त्यागकर प्रभु के शाश्वत सौंदर्य में लीन हो जाता है, तब उसके अंतर्मन से ऐसी ही पुकार निकलती है। यह भजन न केवल सुनने में मधुर है, बल्कि यह आत्मा को परमात्मा से जोड़ने वाला एक आध्यात्मिक सेतु भी है, जो विशेष रूप से राधा-कृष्ण के अनन्य उपासकों के लिए एक अनमोल उपहार है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ ध्रुवपद ॥

मेरे मन में बस गयी है मोहन छवि तुम्हारी,
छवि तुम्हारी मोहन, छवि तुम्हारी प्यारी।
मेरे मन में बस गयी है मोहन छवि तुम्हारी॥

॥ अंतरा - 1 ॥

शीश पे मुकुट कान में कुंडल, गल वैजयंती माला,
श्याम सलोना रूप तुम्हारा, मन को हरने वाला।
तेरी मंद-मंद मुस्कनिया, लागे है सबसे न्यारी,
मेरे मन में बस गयी है मोहन छवि तुम्हारी॥

॥ अंतरा - 2 ॥

अधरन पे साजे मुरली सुहानी, तान सुनाए मीठी,
सुनकर सुध-बुध भूल गयी है, गोपी और गोपी की।
बांकी अदा पे तेरी कान्हा, जाऊं मैं बलिहारी,
मेरे मन में बस गयी है मोहन छवि तुम्हारी॥

॥ अंतरा - 3 ॥

नैनों में कजरा, माथे पे तिलक, सोहे केसरिया बागा,
तुझसे प्रीत लगा के कान्हा, सोया भाग्य है जागा।
चरणों में तेरे बीत जाए, अब ये उमर हमारी,
मेरे मन में बस गयी है मोहन छवि तुम्हारी॥

॥ अंतरा - 4 ॥

पंडित नीरज शरण तुम्हारी, विनती करे है भारी,
हाथ पकड़ लो गिरधारी अब, नैया है मझधारी।
भव सागर से पार लगा दो, ओ बांके बिहारी,
मेरे मन में बस गयी है मोहन छवि तुम्हारी॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन "मेरे मन में बस गयी है मोहन छवि तुम्हारी" भगवान श्री कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण और उनके दिव्य स्वरूप की वंदना का प्रतीक है। इसका भावार्थ अत्यंत गहरा है, जो जीवात्मा और परमात्मा के संबंध को परिभाषित करता है।

प्रथम भाव: भजन की शुरुआत में भक्त स्वीकार करता है कि उसके हृदय के सिंहासन पर अब केवल भगवान श्री कृष्ण की मनमोहक छवि विराजमान है। 'मोहन' का अर्थ है वह जो मन को मोह ले। संसार की चकाचौंध से थककर जब मन प्रभु के चरणों में आता है, तो उसे जो शांति मिलती है, वही इस भजन का आधार है।

द्वितीय भाव: प्रभु के श्रृंगार का वर्णन करते हुए भक्त कहता है कि उनके मस्तक पर मोर मुकुट, कानों में कुंडल और गले में वैजयंती माला की शोभा निराली है। यह केवल बाह्य श्रृंगार नहीं है, बल्कि यह भगवान के ऐश्वर्य और उनकी सौम्यता का प्रतीक है। उनकी 'मंद-मंद मुस्कान' भक्त के अहंकार को नष्ट कर उसे प्रेम के सागर में डुबो देती है।

तृतीय भाव: मुरली की मधुर तान और भगवान की बांकी अदा का वर्णन भक्त को आत्मविस्मृति की स्थिति में ले जाता है। जैसे गोपियाँ मुरली की ध्वनि सुनकर अपना सर्वस्व भूल जाती थीं, वैसे ही आज का भक्त भी प्रभु की भक्ति में लीन होकर सांसारिक बंधनों को भूलना चाहता है।

चतुर्थ भाव: अंत में, भक्त अपनी नैया (जीवन) को प्रभु के हाथों में सौंप देता है। 'भव सागर' से पार उतरने की प्रार्थना केवल मृत्यु के बाद की मुक्ति नहीं है, बल्कि जीते-जी मानसिक क्लेशों और विकारों से मुक्ति की कामना है। पंडित नीरज जी के शब्दों में यह शरणागति की पराकाष्ठा है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

भगवान श्री कृष्ण का यह भजन आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसकी कुछ प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • रूप ध्यान की प्रधानता: यह भजन साधक को भगवान के सगुण साकार रूप का ध्यान करने में सहायता करता है, जिसे 'लीला चिंतन' कहा जाता है।
  • भक्ति रस का संचार: इसमें 'मधुर भाव' और 'दास्य भाव' का सुंदर मिश्रण है, जो भक्त के हृदय में कोमलता उत्पन्न करता है।
  • मानसिक शांति: इस भजन का श्रवण और गायन तनावपूर्ण जीवन में मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।
  • सांस्कृतिक धरोहर: पंडित नीरज जी जैसे कलाकारों ने पारंपरिक भजनों को आधुनिक शैली में प्रस्तुत कर युवा पीढ़ी को सनातन संस्कृति से जोड़ने का कार्य किया है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

भक्ति में समय का कोई बंधन नहीं होता, परंतु कुछ विशेष समय पर इस भजन का प्रभाव और भी बढ़ जाता है:

  1. ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4 से 6 बजे के बीच इस भजन का पाठ करने से मन एकाग्र होता है और दिन की शुरुआत सात्विक होती है।
  2. संध्या आरती: शाम के समय मंदिर या घर के पूजा स्थल पर दीपक जलाकर इस भजन को गाना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
  3. विशेष अवसर: जन्माष्टमी, राधाष्टमी, और फाल्गुन मास के उत्सवों पर इस भजन का सामूहिक संकीर्तन किया जाना चाहिए।
  4. विधि: शांत चित्त होकर, आँखें बंद कर भगवान के स्वरूप का मानसिक दर्शन करते हुए पूर्ण भाव के साथ इसे गाएं।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्री कृष्ण (मोहन/बांके बिहारी) को समर्पित है। श्री कृष्ण को 'सोलह कलाओं' का पूर्ण अवतार माना गया है। उनके 'मोहन' स्वरूप की पूजा विशेष रूप से ब्रज क्षेत्र में की जाती है।

इस भजन के गायक और रचनाकार पंडित नीरज जी हैं, जिन्होंने अपनी मधुर आवाज के माध्यम से कृष्ण भक्ति को जन-जन तक पहुँचाया है। उनकी गायकी में एक विशेष प्रकार का 'आर्त भाव' (पुकार) होता है, जो सीधे ईश्वर के चरणों तक पहुँचता है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल और सुबोध हिंदी (ब्रज मिश्रित) है। इसमें अलंकारों का सुंदर प्रयोग किया गया है:

साहित्यिक तत्व विवरण
शैली गेय पद (संगीतमय)
रस भक्ति रस एवं श्रृंगार रस
अलंकार अनुप्रास (मंद-मंद मुस्कनिया) और रूपक
छंद मुक्तक छंद, लयबद्ध पंक्तियाँ

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द/वाक्यांश सरल अर्थ संदर्भ
मोहन मन को मोह लेने वाला श्री कृष्ण का एक नाम
छवि सुंदर आकृति/प्रतिबिंब भगवान का दिव्य स्वरूप
वैजयंती माला पांच रंगों के फूलों की माला भगवान विष्णु/कृष्ण का प्रिय आभूषण
अधरन होठों पर मुरली धारण करने का स्थान
बलिहारी न्योछावर होना पूर्ण समर्पण का भाव
भव सागर संसार रूपी समुद्र जन्म-मृत्यु का चक्र

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

भगवान श्री कृष्ण की इस मनमोहक छवि का वर्णन शास्त्रों में भी मिलता है। इस भजन के साथ निम्नलिखित मंत्रों का जाप करना अत्यंत शुभ होता है:

कस्तूरीतिलकं ललाटपटले वक्षःस्थले कौस्तुभं,
नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले वेणुं करे कङ्कणम्।

अर्थ: जिनके ललाट पर कस्तूरी का तिलक है, वक्षस्थल पर कौस्तुभ मणि है, और हाथों में मुरली सुशोभित है।

इसके अतिरिक्त, श्री कृष्ण मंत्र "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जाप इस भजन के भाव को और गहरा करता है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम मेरे मन में बस गयी है मोहन छवि तुम्हारी
मुख्य देवता भगवान श्री कृष्ण (बांके बिहारी)
गायक/कलाकार पंडित नीरज जी
भाषा हिंदी / ब्रज
मुख्य भाव प्रेम, समर्पण और शरणागति
उपयुक्त अवसर सत्संग, जन्माष्टमी, दैनिक पूजा

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

'मोहन छवि' का अर्थ है भगवान का वह स्वरूप जो जीवात्मा को माया के बंधनों से मुक्त कर अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। यह शुद्ध प्रेम और आनंद का प्रतीक है।

पंडित नीरज जी एक प्रसिद्ध भक्ति गायक हैं, जो अपने पारंपरिक और शास्त्रीय पुट वाले भजनों के लिए जाने जाते हैं। उनकी आवाज में भक्ति की गहराई और सरलता का अद्भुत संगम है।

हाँ, यह भजन जन्माष्टमी के उत्सव के लिए अत्यंत उपयुक्त है, क्योंकि इसमें भगवान के जन्म के बाद के उनके बाल और किशोर स्वरूप की सुंदरता का वर्णन है।

वैजयंती माला भगवान विष्णु और कृष्ण का प्रिय आभूषण है। माना जाता है कि यह माला विजय और सौभाग्य प्रदान करने वाली है।

इसे सुनने से मानसिक तनाव कम होता है, एकाग्रता बढ़ती है और मन में सात्विक विचारों का संचार होता है।

इसका तात्पर्य है इस नश्वर संसार के दुखों, मोह-माया और जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति पाकर ईश्वर के परम धाम को प्राप्त करना।

बिल्कुल, इसकी सरल भाषा और मधुर लय बच्चों को संस्कार देने और उन्हें अपनी संस्कृति से जोड़ने का एक बेहतरीन माध्यम है।

इसका मुख्य संदेश है कि ईश्वर की भक्ति ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है और उनकी शरण में जाने से ही परम शांति संभव है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा धार्मिक ग्रंथों और पारंपरिक भजन संग्रहों के आधार पर तैयार किया गया है। सामग्री का उद्देश्य पाठकों को शुद्ध और प्रामाणिक भक्ति जानकारी प्रदान करना है। "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत हमने भजन के भावार्थ और उसके आध्यात्मिक पक्ष को गहराई से समझाने का प्रयास किया है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भागवत पुराण (कृष्ण लीला प्रसंग)
  • पंडित नीरज जी के आधिकारिक भक्ति संकलन
  • सनातन धर्म की संकीर्तन परंपरा
  • भक्तिलोक डिजिटल आर्काइव

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 12 Oct 2026

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