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Vishwakarma Chalisa - भगवान श्री विश्वकर्मा का पावन चालीसा (Vishwakarma Puja)

भगवान श्री विश्वकर्मा चालीसा का सम्पूर्ण पाठ, हिंदी अर्थ और इसके लाभ पढ़ें। संदर्भ एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत है यह पावन सामग्री।

चालीसा विश्वकर्मा पूजा शिल्प कला

भगवान श्री विश्वकर्मा का पावन चालीसा | Vishwakarma Puja 2020 | Ravi Raj - Bhaktilok

प्रकाशित: 2022/01/vishwakarma-chalisa-vishwakarma-puja.html | श्रेणी: चालीसा एवं स्तोत्र | संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

भगवान श्री विश्वकर्मा केवल देव शिल्पी ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण ब्रह्मांड के आदिशिल्पी, रचनाकार और सृजन के अधिष्ठाता हैं। हिंदू पौराणिक परंपराओं और वेदों के अनुसार, इस सृष्टि की समस्त रचनाओं, भवनों, महलों, रथों और अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण भगवान विश्वकर्मा के दिव्य कौशल का परिणाम है। "Vishwakarma Chalisa" का नियमित पाठ करने से साधक को शिल्प कला, तकनीकी ज्ञान, व्यापार में उन्नति और जीवन में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। रवि राज जी द्वारा प्रस्तुत यह पावन चालीसा भगवान विश्वकर्मा की महिमा, उनके स्वरूप और उनके द्वारा रचे गए महान नगरों (जैसे स्वर्ण नगरी लंका, इंद्रपुरी, द्वारका) के स्मरण का अद्भुत माध्यम है। विशेष रूप से विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर इस चालीसा का सस्वर पाठ करने से समस्त बाधाएं दूर होती हैं और कर्मक्षेत्र में अपार सफलता मिलती है।

सम्पूर्ण भजन एवं चालीसा लिरिक्स | Complete Vishwakarma Chalisa Lyrics

दोहा आदि पुरुष को सुमिरि के, करूँ विश्वकर्मा पाठ। कृपा करहु गुरुदेव मम, पूर्ण होय सब काठ॥ विश्वकर्मा प्रभु दया करो, हरहु सकल अज्ञान। शिल्प कला विद्या दियो, बुद्धि बढ़ाओ मान॥ चौपाई जय जय श्री विश्वकर्मा देवा, करत सकल सुर नर तेरी सेवा। आदि सृष्टि के तुम हो ज्ञाता, पालनकर्ता जग के त्राता॥ लोह काष्ठ और ताम्र सुधारा, स्वर्ण शिल्प का रूप संवारा। मशीन और औजार बनाए, दुनिया में उद्योग चलाए॥ ब्रह्मा जी के पुत्र कहाए, ऋषि अंगिरा वंश बढ़ाए। शिल्प वेद के तुम हो रचयिता, त्रिभुवन में हो कीर्ति महिमा॥ सुरपति का आसन बनवाया, पुष्पक विमान नया सजवाया। लंका सोने की रच डारी, द्वारका पुरी बसाई प्यारी॥ हस्तिनापुर और इंद्रप्रस्थ रचना, देख चकित रह गई त्रिगुणा। जगन्नाथ पुरी के विग्रह धारी, तुम हो शिल्पकार त्रिपुरारी॥ जो कोई ध्यावे मन लाई, ताकी पूर्ति हो अधिकाई। कारखाने और मिल जो चलावे, लाभ अपार सदा वह पावे॥ इंजीनियर और कारीगर जो ध्यावे, मनवांछित फल निश्चय पावे। दुर्घटना से रक्षा करते, संकट सारे पल में हरते॥ जो यह पढ़े विश्वकर्मा चालीसा, होय सिद्ध मनवांछित ईसा। प्रातःकाल उठ जो नित गावे, सुख-संपत्ति घर में ले आवे॥ दोहा ध्यान धरे जो भक्त जन, विश्वकर्मा भगवान। संकट मोचन वे सदा, कृपा करैं महान॥ इति श्री विश्वकर्मा चालीसा सम्पूर्णम्॥

चालीसा का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Chalisa Meaning & Bhavarth

भगवान श्री विश्वकर्मा की यह चालीसा उनके विराट स्वरूप और सृजनात्मक शक्तियों का बखान करती है। चालीसा के प्रारंभिक दोहे में आदि पुरुष का स्मरण कर गुरुदेव और भगवान विश्वकर्मा से बुद्धि, विद्या और शिल्प कौशल की याचना की गई है।

चौपाइयों में भगवान विश्वकर्मा को लोह, काष्ठ (लकड़ी), ताम्र और स्वर्ण शिल्प का ज्ञाता बताया गया है। इस संसार में जितने भी उद्योग, मशीनें, औजार और निर्माण कार्य संचालित होते हैं, वे सभी उन्हीं की प्रेरणा से संभव हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, उन्होंने देवराज इंद्र का सिंहासन, रावण की सोने की लंका, भगवान श्रीकृष्ण की द्वारका नगरी और हस्तिनापुर जैसे भव्य नगरों की रचना की है। पुरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर के विग्रहों का निर्माण भी उन्हीं के द्वारा माना जाता है।

इस चालीसा का भावार्थ यह है कि जो भी इंजीनियर, शिल्पकार, मैकेनिक, कारीगर या उद्यमी सच्चे मन से भगवान विश्वकर्मा का स्मरण करता है, उसे अपने कार्यक्षेत्र में कभी असफलता का सामना नहीं करना पड़ता। यह पाठ साधक को तकनीकी बुद्धि, सुरक्षा और समृद्धि प्रदान करता है।

चालीसा की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

  • सृजन के देवता: यह चालीसा ब्रह्मांड के पहले वास्तुकार और शिल्पी को समर्पित है, जो भौतिक और आध्यात्मिक निर्माण के प्रतीक हैं।
  • कर्म और श्रम का सम्मान: यह पाठ हर उस व्यक्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है जो श्रम, तकनीकी कार्य, उद्योग और निर्माण से जुड़ा हुआ है।
  • व्यापारिक उन्नति: कारखानों, कार्यशालाओं और कार्यालयों में इस चालीसा के पाठ से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
  • सुरक्षा और सफलता: कारीगरों और इंजीनियरों के लिए यह चालीसा अस्त्र-शस्त्र, मशीनों और उपकरणों के संचालन में दुर्घटनाओं से रक्षा का कवच मानी जाती है।

चालीसा पाठ का समय एवं विधि | When & How to Recite

भगवान श्री विश्वकर्मा की कृपा प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित विधि से चालीसा का पाठ करना चाहिए:

  • शुभ अवसर: प्रतिवर्ष कन्या संक्रांति (17 सितंबर) के दिन मनाए जाने वाले 'विश्वकर्मा पूजा' के दिन इसका विशेष पाठ किया जाता है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक मंगलवार, गुरुवार या किसी भी नए उद्योग के शुभारंभ पर इसका पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • नित्य पाठ: कारखाने, दुकान, या ऑफिस के खुलने के समय प्रात:काल स्नान करके भगवान विश्वकर्मा के चित्र या औजारों की पूजा के पश्चात इसका सस्वर पाठ करना चाहिए।
  • सामग्री: पूजा स्थल पर गंगाजल छिड़क कर शुद्ध करें, दीप प्रज्वलित करें, धूप दिखाएं और पुष्प अर्पित करें। भोग के रूप में मिष्ठान या फल अर्पित करें।

कठिन शब्दों के अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / पदावली सरल हिंदी अर्थ संदर्भ / प्रसंग
आदि पुरुष प्रथम सृष्टिकर्ता या परमात्मा सृष्टि के आरंभ में विद्यमान शक्ति
शिल्प वेद वास्तु और वास्तुकला का ग्रंथ/विज्ञान विश्वकर्मा जी द्वारा रचित ज्ञान
त्रिगुणा सत्त्व, रज और तम तीनों गुण प्रकृति की रचना से संबंधित
विग्रह धारी मूर्ति या स्वरूप को प्रकट करने वाले भगवान जगन्नाथ की मूर्तियां
सुरपति देवताओं के स्वामी (इंद्र) स्वर्ग के राजा इंद्र

एक नजर में भजन की जानकारी | Quick Information Table

भजन / चालीसा नाम Vishwakarma Chalisa (श्री विश्वकर्मा चालीसा)
आराध्य देव भगवान श्री विश्वकर्मा (ब्रह्मांड के आदिशिल्पी)
प्रस्तुति कलाकार रवी राज (Ravi Raj)
भाषा अवधी / हिंदी / संस्कृतनिष्ठ हिंदी
मुख्य विषय शिल्प कला, तकनीकी सफलता, उद्योग और समृद्धि
मुख्य अवसर विश्वकर्मा पूजा, कार्यशाला उद्घाटन, नया व्यवसाय आरंभ
संबंधित लेख विश्वकर्मा पूजा विधि एवं कथा

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

विश्वकर्मा चालीसा के पाठ से शिल्प कला, वास्तुकला, तकनीकी ज्ञान और व्यवसाय में उन्नति होती है। इसके साथ ही कार्यक्षेत्र में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और अस्त्र-शस्त्र व मशीनों से सुरक्षा मिलती है।

विश्वकर्मा पूजा प्रतिवर्ष कन्या संक्रांति (आमतौर पर 17 सितंबर) को पूरे भारत में विशेष रूप से फैक्ट्रियों, कारखानों, उद्योगों और तकनीकी संस्थानों में मनाई जाती है।

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान विश्वकर्मा ने सतयुग में स्वर्ण नगरी लंका, त्रेतायुग में लंका (बाद में रावण की), द्वापरयुग में भगवान श्रीकृष्ण की द्वारका नगरी और इंद्रपुरी तथा हस्तिनापुर जैसे भव्य नगरों की रचना की थी।

हाँ, इंजीनियर, कारीगर, मैकेनिक, श्रमिक, विद्यार्थी और व्यवसायी सहित कोई भी व्यक्ति जो अपनी कला और बुद्धि को बढ़ाना चाहता है, इस चालीसा का पाठ कर सकता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख पूरी तरह से पारंपरिक स्रोतों, पुराणों के वर्णनों और लोक-आस्था के आधार पर संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इसका उद्देश्य पाठकों को भगवान श्री विश्वकर्मा के पावन चालीसा के सटीक बोल, अर्थ और उसके आध्यात्मिक-सांस्कृतिक महत्व से अवगत कराना है।

स्रोत एवं संदर्भ: स्कंद पुराण, शिल्प शास्त्र ग्रंथ, और पारंपरिक भक्ति साहित्य। संबंधित विषयों के लिए हमारे अन्य लेख जैसे गोवर्धन पूजा व्रत कथा और माँ सरस्वती वंदना भी अवश्य पढ़ें।

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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