Punjabi Devi Bhajan बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

भोजपुरी भक्ति जागरण - निमिया के डाढ़ मईया (Nimiya Ke Dadh Maiya Suruchi Singh Jagran)

सुरुचि सिंह द्वारा गाए लोकप्रिय भोजपुरी देवी गीत 'निमिया के डाढ़ मईया' के बोल, अर्थ और महत्व जानें। भक्ति और श्रद्धा से पूर्ण इस भजन का आनंद लें।

"निमिया के डाढ़ मईया" (Nimiya Ke Dadh Maiya) भोजपुरी लोक संस्कृति और देवी आराधना का एक अत्यंत लोकप्रिय, पारंपरिक और कालजयी देवी गीत है। यह भजन आदिशक्ति महामाया, शीतला माता और जगदंबा के प्रति अगाध श्रद्धा, वात्सल्य और पूर्ण समर्पण को दर्शाता है। सुरुचि सिंह की सुमधुर और भावपूर्ण आवाज में प्रस्तुत यह देवी गीत जागरण, चैत्र व शारदीय नवरात्रि और विभिन्न मांगलिक अवसरों पर भक्तों के हृदय में असीम भक्ति रस का संचार करता है। सनातन हिंदू परंपरा में नीम के वृक्ष को अत्यंत पवित्र, पूजनीय और औषधीय गुणों से भरपूर माना गया है, जिसे साक्षात देवी का वास स्थान स्वीकार किया गया है। इस भजन के माध्यम से भक्त अपनी आराध्या देवी को नीम की डालियों पर झूला झूलते हुए और अपने भक्तों पर ममतामयी कृपा बरसाते हुए चित्रित करते हैं। यह गीत केवल एक संगीत रचना नहीं है, बल्कि यह भोजपुरी अंचल की लोक चेतना, मातृ-शक्ति के प्रति असीम आदर और ग्रामीण जीवन की सादगीपूर्ण भक्ति का एक जीवंत और पावन दस्तावेज है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ निमिया के डाढ़ मईया ॥

निमिया के डाढ़ मईया लावेली झुलनवा,
की झूली झूली ना...
की झूली झूली ना, मईया मोरी गावेली गीतिया,
की झूली झूली ना...
निमिया के डाढ़ मईया लावेली झुलनवा,
की झूली झूली ना...

झूलत झूलत मईया के लागेली पियासवा,
की लागेली पियासवा...
कवने गैया के दूधवा मईया मोरी पियली,
की तृप्त भईली ना...
कवने गैया के दूधवा मईया मोरी पियली,
की तृप्त भईली ना...
निमिया के डाढ़ मईया लावेली झुलनवा,
की झूली झूली ना...

झूलत झूलत मईया के लागेली भूखिया,
की लागेली भूखिया...
कवने थाली में भोजनवा मईया मोरी कइली,
की तृप्त भईली ना...
कवने थाली में भोजनवा मईया मोरी कइली,
की तृप्त भईली ना...
निमिया के डाढ़ मईया लावेली झुलनवा,
की झूली झूली ना...

सोने के थाली में भोजनवा परोसावे,
की भोजनवा परोसावे...
हलवा पूड़ी के भोगवा मईया मोरी कइली,
की तृप्त भईली ना...
हलवा पूड़ी के भोगवा मईया मोरी कइली,
की तृप्त भईली ना...
निमिया के डाढ़ मईया लावेली झुलनवा,
की झूली झूली ना...

नारियल चुनरी मईया तोहे चढ़ावे,
की तोहे चढ़ावे...
भक्तन के बिगड़ी बनवेली मईया मोरी,
की दया करेली ना...
भक्तन के बिगड़ी बनवेली मईया मोरी,
की दया करेली ना...
निमिया के डाढ़ मईया लावेली झुलनवा,
की झूली झूली ना...
की झूली झूली ना, मईया मोरी गावेली गीतिया,
की झूली झूली ना...

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस अत्यंत सुंदर भोजपुरी देवी गीत "निमिया के डाढ़ मईया" का भावार्थ अत्यंत सरल, मर्मस्पर्शी और वात्सल्य रस से ओतप्रोत है। इस भजन में भक्त अपनी परम आराध्या माता रानी की बाल-सुलभ और ममतामयी क्रीड़ाओं का वर्णन कर रहा है।

भजन की शुरुआत में भक्त कहता है कि जगदंबा माता ने नीम के पेड़ की डालियों पर अपना झूला डाल रखा है। वे उस झूले पर बैठकर आनंदपूर्वक झूल रही हैं और स्वयं ही मधुर गीत गा रही हैं। यह दृश्य भक्त के मन को असीम शांति और आनंद प्रदान करता है। इसके बाद, झूला झूलते-झूलते माता को प्यास लगती है। भक्त अत्यंत आदर और चिंता के साथ पूछता है कि माता किस गाय का दूध पीकर अपनी प्यास बुझाएंगी और तृप्त होंगी। इसी प्रकार, झूलते हुए जब माता को भूख लगती है, तो भक्त उनके लिए सोने की थाली में स्वादिष्ट हलवा और पूड़ी का भोग अर्पित करता है, जिसे ग्रहण कर माता अत्यंत प्रसन्न और तृप्त होती हैं।

अंतिम पंक्तियों में भक्त माता को नारियल, चुनरी और श्रृंगार की सामग्री अर्पित करता है। वह विश्वास व्यक्त करता है कि जो भी भक्त माता के इस ममतामयी रूप की आराधना करता है, माता उसके जीवन के सभी कष्टों को दूर कर देती हैं और बिगड़े हुए कामों को बना देती हैं। यह भजन ईश्वर और भक्त के बीच के उस सहज, निश्छल और पारिवारिक संबंध को दर्शाता है जहां भगवान केवल एक अमूर्त शक्ति नहीं, बल्कि परिवार के एक प्रिय सदस्य की तरह पूजे जाते हैं।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह देवी गीत भोजपुरी भाषी क्षेत्रों के साथ-साथ पूरे उत्तर भारत में विशेष स्थान रखता है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • प्रकृति और ईश्वर का संबंध: इस भजन में नीम के वृक्ष (निमिया) को माता का निवास स्थान बताया गया है। यह हमारी प्राचीन सनातन परंपरा को दर्शाता है जहां प्रकृति के प्रत्येक अंग में ईश्वर का वास माना गया है।
  • वात्सल्य और सख्य भाव: भजन में भक्त माता को अपनी माता के साथ-साथ एक सखी या बच्ची के रूप में भी देखता है, जिसे भूख और प्यास लगती है और भक्त उसकी सेवा करता है।
  • सांस्कृतिक धरोहर: यह गीत भोजपुरी लोक संगीत की समृद्ध विरासत का प्रतिनिधित्व करता है। इसकी सरल धुन और पारंपरिक वाद्ययंत्रों का प्रयोग इसे हर पीढ़ी के लिए सुलभ बनाता है।
  • मानसिक शांति: इस भजन का सामूहिक गायन या श्रवण करने से मन को असीम शांति मिलती है और घर का वातावरण सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि माता की आराधना किसी भी समय की जा सकती है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष अवसर अत्यंत फलदायी माने गए हैं:

  • नवरात्रि महोत्सव: चैत्र और शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों के दौरान इस भजन को सुबह या शाम की पूजा के समय गाना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • देवी जागरण व चौकी: माता के जागरण, कीर्तन या माता की चौकी के दौरान इस भजन को गाने से पूरा पंडाल भक्तिमय हो जाता है।
  • पूजा विधि: इस भजन को गाने से पूर्व माता की प्रतिमा या चित्र के समक्ष घी का दीपक जलाएं, उन्हें लाल फूल, नारियल और चुनरी अर्पित करें। इसके बाद पूर्ण श्रद्धा और ताली बजाते हुए इस भजन का गायन करें।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से आदिशक्ति माता दुर्गा और विशेष रूप से शीतला माता को समर्पित है। लोक मान्यताओं के अनुसार, शीतला माता का निवास नीम के वृक्ष में माना जाता है। नीम के ठंडे और आरोग्यकारी गुणों के कारण शीतला माता को इस वृक्ष से जोड़ा गया है। इस गीत के माध्यम से भक्त माता शीतला और माता दुर्गा के सौम्य, करुणामयी और वरदायिनी रूप की वंदना करते हैं। सुरुचि सिंह जैसी आधुनिक लोक गायिकाओं ने अपनी सुरीली आवाज से इस पारंपरिक गीत को नए युग के श्रोताओं तक पहुंचाया है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

"निमिया के डाढ़ मईया" एक पारंपरिक भोजपुरी लोक गीत (देवी गीत) है। इसकी रचना किसी एक व्यक्ति विशेष द्वारा नहीं की गई है, बल्कि यह सदियों से मौखिक परंपरा के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित होता आया है। बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) के ग्रामीण अंचलों में महिलाएं नवरात्रि के समय सामूहिक रूप से इस गीत को गाती हैं। सुरुचि सिंह ने इस पारंपरिक गीत को आधुनिक संगीत और वाद्ययंत्रों के संयोजन के साथ प्रस्तुत किया है, जिससे इसकी लोकप्रियता और अधिक बढ़ गई है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा शुद्ध भोजपुरी है, जो अत्यंत मीठी, सरल और सुबोध है। इसकी काव्य शैली में लोकगीतों की पारंपरिक विधा 'झूमर' और 'सोहर' का प्रभाव दिखाई देता है। गीत में अनुप्रास अलंकार और पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है (जैसे "झूली झूली", "झूलत झूलत")। यह पुनरावृत्ति गीत को एक लयबद्ध प्रवाह प्रदान करती है, जिससे इसे आसानी से याद किया जा सकता है और सामूहिक रूप से गाया जा सकता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह पावन देवी गीत हमें कई महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और व्यावहारिक सीख देता है:

  1. प्रकृति का संरक्षण: नीम के वृक्ष को पूजनीय बताकर यह गीत हमें पर्यावरण और पेड़ों के संरक्षण का संदेश देता है।
  2. निस्वार्थ सेवा भाव: माता को भोजन और जल अर्पित करने का भाव हमें अतिथियों और जरूरतमंदों की सेवा करने की प्रेरणा देता है।
  3. सरलता और सहजता: ईश्वर को पाने के लिए किसी कठिन कर्मकांड की आवश्यकता नहीं है; केवल सरल और निश्छल प्रेम से भी उन्हें प्रसन्न किया जा सकता है।
  4. सकारात्मकता: माता पर अटूट विश्वास रखने से जीवन की बड़ी से बड़ी कठिनाइयां भी दूर हो जाती हैं।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ संदर्भगत महत्व
निमिया नीम का वृक्ष माता शीतला का पवित्र निवास स्थान
डाढ़ शाखा या डाली वह स्थान जहां माता का झूला पड़ा है
झुलनवा झूला माता की दिव्य और आनंदमयी क्रीड़ा का साधन
गीतिया गीत या भजन माता द्वारा स्वयं गाया जाने वाला दिव्य संगीत
पियासवा / भूखिया प्यास और भूख माता का मानवीय और ममतामयी रूप
तृप्त संतुष्ट होना भक्त की सेवा से माता का प्रसन्न होना

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

पंक्ति: "निमिया के डाढ़ मईया लावेली झुलनवा, की झूली झूली ना..."
भावार्थ: माता रानी ने नीम के पेड़ की सुंदर और मजबूत डाली पर अपना झूला डाला है और वे उस पर बैठकर आनंदपूर्वक झूल रही हैं।

पंक्ति: "झूलत झूलत मईया के लागेली पियासवा... कवने गैया के दूधवा मईया मोरी पियली..."
भावार्थ: झूला झूलते हुए माता को प्यास लगती है। भक्त सोचता है कि वह माता को किस उत्तम गाय का पवित्र दूध अर्पित करे जिससे माता की प्यास बुझ सके।

पंक्ति: "सोने के थाली में भोजनवा परोसावे... हलवा पूड़ी के भोगवा मईया मोरी कइली..."
भावार्थ: माता की भूख शांत करने के लिए भक्त सोने की थाली में अत्यंत श्रद्धापूर्वक गरमा-गरम हलवा और पूड़ी का भोग लगाता है, जिसे पाकर माता तृप्त हो जाती हैं।

पंक्ति: "नारियल चुनरी मईया तोहे चढ़ावे... भक्तन के बिगड़ी बनवेली मईया मोरी..."
भावार्थ: भक्त माता को लाल चुनरी और नारियल भेंट करता है। ऐसी कृपालु माता अपने सभी भक्तों के बिगड़े हुए काम संवार देती हैं और उन पर अपनी दया दृष्टि रखती हैं।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के गायन के पश्चात या पूर्व माता दुर्गा के इस सिद्ध मंत्र का जाप करना अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है:

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

अर्थ: हे नारायणी! आप सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगलमयी हैं। आप कल्याणकारिणी, सब पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली, शरणागतवत्सला, तीन नेत्रों वाली और गौरी हैं। आपको नमस्कार है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम निमिया के डाढ़ मईया (Nimiya Ke Dadh Maiya)
मुख्य देवी-देवता माता दुर्गा, शीतला माता, आदिशक्ति
गायिका सुरुचि सिंह (Suruchi Singh)
भाषा भोजपुरी (Bhojpuri)
भजन की श्रेणी देवी गीत / पारंपरिक भजन (Devi Geet)
मुख्य रस / भाव वात्सल्य रस, भक्ति और समर्पण भाव
उपयुक्त अवसर नवरात्रि, देवी जागरण, माता की चौकी, दैनिक पूजा

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन मुख्य रूप से आदिशक्ति माता दुर्गा और शीतला माता को समर्पित है। लोक मान्यताओं के अनुसार, शीतला माता का वास नीम के वृक्ष में होता है।

सनातन धर्म और आयुर्वेद में नीम को अत्यंत पवित्र और रोगनाशक माना गया है। इस भजन में नीम की डालियों को माता का झूला और उनका निवास स्थान मानकर प्रकृति की पूजा का संदेश दिया गया है।

यह देवी गीत शुद्ध भोजपुरी भाषा में है, जो उत्तर भारत, विशेषकर बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में अत्यंत लोकप्रिय है।

इसे चैत्र और शारदीय नवरात्रि के दौरान, माता के जागरण, कीर्तन, और घर में आयोजित होने वाले मांगलिक कार्यों के समय गाना और सुनना अत्यंत शुभ माना जाता है।

हाँ, यह भजन लोक-आराधना की उस परंपरा से जुड़ा है जो पुराणों में वर्णित देवी के ममतामयी और प्रकृति-रक्षक रूपों की पुष्टि करती है।

भजन के अनुसार, माता को सोने की थाली में स्वादिष्ट हलवा और पूड़ी का भोग लगाया जाता है और पीने के लिए गाय का पवित्र दूध अर्पित किया जाता है।

इस भजन के श्रवण से मानसिक तनाव दूर होता है, मन में सकारात्मक विचारों का प्रवाह होता है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।

हाँ, इसकी सरल लय और सामूहिक टेक (रिफ्रेन) के कारण इसे महिलाओं द्वारा कीर्तन और मंगल गीतों के रूप में सामूहिक रूप से गाया जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" श्रेणी के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ, भावार्थ और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का संपादन वैदिक विद्वानों और लोक संस्कृति के विशेषज्ञों की देखरेख में किया गया है ताकि पाठकों को शुद्ध और प्रामाणिक जानकारी प्राप्त हो सके।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्देवीभागवत महापुराण - देवी की महिमा और उनके विभिन्न रूपों का वर्णन।
  • भोजपुरी लोक साहित्य और पारंपरिक देवी गीत संग्रह।
  • सनातन धर्म में वृक्ष पूजा और प्रकृति संरक्षण की परंपराएं।

संबंधित भजन एवं लेख

माता रानी की कृपा प्राप्त करने के लिए आप हमारी वेबसाइट पर निम्नलिखित पावन पाठ और भजन भी पढ़ सकते हैं:

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 12 Oct 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!