Mahadev Bhajan मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

holi khele masane mein

पद्म श्री मालिनी अवस्थी द्वारा गाये गए प्रसिद्ध शिव भजन Holi Khele Masane Mein का संपूर्ण गीत, भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व पढ़ें।

Mahadev Song | Malini Awasthi - संपूर्ण गीत, भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व

अपडेटेड वर्ष: 2026 प्रस्तुति: पद्म श्री मालिनी अवस्थी श्रेणी: महादेव भजन एवं लोक संगीत

सनातन संस्कृति में भगवान शिव और माता पार्वती के प्रसंग केवल पौराणिक कथाएं नहीं हैं, बल्कि वे ब्रह्मांडीय ऊर्जा, वैराग्य और आनंद के जीवंत प्रतीक हैं। पद्म श्री मालिनी अवस्थी द्वारा गाया गया अत्यंत लोकप्रिय एवं ऊर्जावान भजन "Holi Khele Masane Mein" (होली खेले मसान में) भगवान शिव की अलौकिक, अघोर और रहस्यमयी लीला का अत्यंत सजीव चित्रण प्रस्तुत करता है। यह गीत काशी (वाराणसी) के मणिकर्णिका घाट और महाश्मशान की उस पावन परंपरा से जुड़ा है, जहां देवों के देव महादेव अपने गणों—भूत, प्रेत, पिशाच, योगिनियों और अघोरियों के साथ चिता भस्म से होली खेलते हैं। यह दृश्य भौतिक संसार के मायावी बंधनों से परे, जीवन और मृत्यु के सत्य को स्वीकार करने और हर परिस्थिति में आनंदमयी रहने का संदेश देता है। भजनों की इस अनूठी श्रृंखला में, महादेव भजन की यह प्रस्तुति शिव भक्तों के बीच अत्यंत आदर और उत्साह के साथ गाई जाती है।

सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Song Lyrics

// मुखड़ा //

खेले मसाने में होली दिगंबर, खेले मसाने में होली..
भूत पिशाच बटोरी दिगंबर, खेले मसाने में होली..

// अंतरा 1 //

कोन हाथ पिचकारी सोहे, कोन हाथ झोली?
कोन हाथ में डमरू विराजे, कोन हाथ में डोली?
डम डम डमरू बजावत शिवजी, खेले मसाने में होली..

// अंतरा 2 //

चिता भस्म मलता भुजियन में, राख लगावे तन पे,
नाचत गावत मगन भए शिव, मसान के इस पावन मन पे..
काशी के कोतवाल भवानी, खेले मसाने में होली..

// अंतरा 3 //

जहाँ न कोई राजा रंक विराजे, सब एक समान यहाँ,
मृत्युंजय की इस क्रीड़ा में, जागे सकल जहान यहाँ..
मालिनी गावे महिमा जिनकी, खेले मसाने में होली..

गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth

"Holi Khele Masane Mein" गीत का प्रत्येक शब्द अद्वैत वेदांत और शिव तत्व के गहरे रहस्यों को उजागर करता है। सामान्यतः होली रंगों, उमंग, फूलों और उल्लास का त्योहार है, जो समाज के दायरे में खेला जाता है। किंतु अघोरेश्वर महादेव की होली सांसारिक प्रपंचों से मुक्त होकर श्मशान की भूमि पर खेली जाती है।

मसान की होली का दार्शनिक भाव

श्मशान वह स्थान है जहाँ पहुँचकर राजा और रंक, अमीर और गरीब, सुंदर और साधारण—सभी का भेद समाप्त हो जाता है। शरीर की नश्वरता का यह सबसे बड़ा सत्य है। महादेव मसान में होली खेलकर यह संदेश देते हैं कि जो व्यक्ति मृत्यु के भय से मुक्त हो चुका है और जिसने अपने अहंकार की चिता जला दी है, वही वास्तविक आनंद (शिव) को प्राप्त कर सकता है। पद्म श्री मालिनी अवस्थी ने अपनी लोक-संस्कृति में रची-बसी स्वर लहरियों से इस कठिन दार्शनिक प्रसंग को अत्यंत सुगम और आल्हादकारी बना दिया है।

गीत की जानकारी | Song Information

गीत का नाम Holi Khele Masane Mein (होली खेले मसान में)
प्रमुख कलाकार / गायिका पद्म श्री मालिनी अवस्थी (Malini Awasthi)
विधा पारंपरिक शिव भजन / लोकगीत / कजरी एवं फाग शैली
आराध्य देव भगवान शिव (महाकाल, आशुतोष, दिगंबर)
भाषा अवधी / हिंदी लोकभाषा
मुख्य प्रसंग काशी की मसान होली, रंगभरी एकादशी एवं महाशिवरात्रि उत्सव

कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings

शब्द / पद सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
मसान श्मशान (मृत्यु स्थल) अहंकार के नाश और वैराग्य का प्रतीक
दिगंबर दिशाएं ही जिनके वस्त्र हैं (भगवान शिव) पूर्ण रूप से अनासक्त और मुक्त
चिता भस्म जली हुई देह की राख संसार की नश्वरता और अंतिम सत्य
मृत्युंजय मृत्यु को जीतने वाले काल के भी महाकाल भगवान शिव

गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance

काशी (वाराणसी) को बाबा विश्वनाथ की नगरी कहा जाता है। यहाँ की मसान होली दुनिया भर में प्रसिद्ध है। रंगभरी एकादशी के ठीक दूसरे दिन श्मशान घाट पर भस्म की होली खेली जाती है, जिसमें मान्यता है कि शिव स्वयं अपने गणों के साथ उत्सव मनाते हैं। मालिनी अवस्थी ने इस लोक-परंपरा को अपनी सुरीली आवाज के माध्यम से घर-घर तक पहुँचाया है। यह गीत सुनने वाले को भौतिक मोह-माया से ऊपर उठकर आत्मिक शांति की ओर ले जाता है। शिवभक्ति के इस अनूठे रूप को समझने के लिए आप अन्य प्रमुख महादेव गीत भी सुन सकते हैं जो हमारी संस्कृति की थाती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस प्रसिद्ध लोकगीत की लोकप्रिय गायिका पद्म श्री मालिनी अवस्थी हैं, जिन्होंने अपनी पारंपरिक गायन शैली से इसे अमर बना दिया है।

मसान की होली मुख्य रूप से काशी (वाराणसी) के मणिकर्णिका घाट पर रंगभरी एकादशी के अगले दिन खेली जाती है। यह जीवन और मृत्यु के भेद को मिटाकर शिवमय होने का प्रतीक है।

यह भजन सिखाता है कि भगवान शिव की शरण में जाने पर सारे सांसारिक भेद-भाव समाप्त हो जाते हैं और मनुष्य मृत्यु के भय से मुक्त होकर परमानंद प्राप्त करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख सनातन संस्कृति, लोक परंपराओं और शिव भक्ति के आदिकालीन स्वरूप को ध्यान में रखते हुए संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इसका उद्देश्य पाठकों को भारतीय लोक संगीत और आध्यात्मिक दर्शन से जोड़ना है।


स्रोत एवं संदर्भ

  • काशी की प्राचीन लोक परंपराएं एवं सांस्कृतिक उत्सव
  • पद्म श्री मालिनी अवस्थी के लोकगीत संग्रह एवं साक्षात्कार
  • शिव महापुराण एवं अघोर दर्शन के आधारभूत ग्रंथ

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यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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