🙏 आत्मा ने परमात्मा को लिया देख – शिवोहम शिवोहम

(Aatma Ne Parmatma Ko Liya Dekh – Shivoham Shivoham) – शिव भजन / अद्वैत गीत

🕉️ एक ओंकार निरंजन निरंकार – आत्मा का परमात्मा में लीन होना, शिवोहम का अनुभव

📝 भजन विवरण

🏷️ श्रेणी: शिव भजन / अद्वैत वेदांत / ध्यान गीत
🎶 भाव: आत्मबोध, समर्पण, शिवत्व का अनुभव
📍 विशेषता: “शिवोहम” (मैं शिव हूँ) का बोध – अद्वैत दर्शन का सरल गीत
📀 प्रचलन: शिव भक्तों और आध्यात्मिक साधकों में प्रिय, ध्यान और आत्मचिंतन के लिए उपयुक्त

📜 भजन लिरिक्स (हिन्दी में)

आत्मा ने परमात्मा को
लिया देख ध्यान की दृष्टि से।
प्रकाश हुआ हृदय-हृदय,
बेड़ा पार हुआ इस सृष्टि से।
है एक ओंकार निरंजन निरंकार,
है अजर अमर आकार विश्वधार मन भजे।
शिवोहम शिवोहम शिवोहम..
शिवोहम शिवोहम शिवोहम..

भूख में तपसी तप रहा,
भोजन बीच पठाय।
विलाप में साधु हंस रहा,
अपना ही उपजा खाय।
शेष अशेष विशेष में समर्पण के भाव में।
शिवोहम शिवोहम शिवोहम..
शिवोहम शिवोहम शिवोहम..

ठहर शांत एकांत में,
साधके मूलाधार।
सर्जन स्वाधिष्ठान से,
सूर्य मणि चमकार।
विशुद्धि आज्ञा सहस्रार तक गूंजे अनाहत।
शिवोहम शिवोहम शिवोहम..
शिवोहम शिवोहम शिवोहम..

खाली को तो भर दिया,
भरे में भरा न जाए।
पानी में प्यासा रहा,
तट पे बैठ लखाय।
प्रश्न व्यसन में उलझ-उलझ हां व्यर्थ गया जन्म।
शिवोहम शिवोहम शिवोहम..
शिवोहम शिवोहम शिवोहम..

🎵 रचनाकार : लोक परम्परा / अद्वैत भक्ति काव्य

🙏 भजन का अर्थ और संदेश

यह अद्वैत भावना से ओतप्रोत शिव भजन है। “आत्मा ने परमात्मा को लिया देख ध्यान की दृष्टि से” – जब साधक गहरे ध्यान में होता है, तो उसकी आत्मा परमात्मा का साक्षात्कार करती है। तब हृदय में प्रकाश होता है, और इस सृष्टि के बंधनों से मुक्ति (बेड़ा पार) मिलती है।

“है एक ओंकार निरंजन निरंकार, है अजर अमर आकार विश्वधार” – परम सत्ता एक है – ओंकार, जो निरंजन (माया से परे), निरंकार (बिना रूप का) और अजर-अमर (अविनाशी) है। वही विश्व को धारण करता है।

पहले अंतरे में – “भूख में तपसी तप रहा, भोजन बीच पठाय” – यह दिखाता है कि जब साधक तप करता है, तो परमात्मा उसके लिए भोजन की व्यवस्था करता है। “विलाप में साधु हंस रहा, अपना ही उपजा खाय” – अर्थात जो कुछ हमें मिलता है, वह अपना ही उपजा है – यह अद्वैत का भाव है कि सब एक है।

दूसरे अंतरे में – मूलाधार, स्वाधिष्ठान, विशुद्धि, आज्ञा, सहस्रार, अनाहत – ये सभी सप्त चक्रों के नाम हैं। साधक ध्यान में इन चक्रों से गुजरते हुए शिवत्व (शिवोहम) की अनुभूति करता है।

तीसरे अंतरे में – “खाली को तो भर दिया, भरे में भरा न जाए” – जो विनम्र है, उसे ईश्वर भर देता है, लेकिन जो स्वयं को भरा हुआ मानता है, उसमें कुछ नहीं भरा जा सकता। “पानी में प्यासा रहा, तट पे बैठ लखाय” – यह उन लोगों के लिए चेतावनी है जो सत्य के करीब होते हुए भी उसे नहीं पहचानते, प्यासे रह जाते हैं।

भजन का मूल मंत्र है “शिवोहम” – मैं शिव हूँ। यह अहं ब्रह्मास्मि (मैं ब्रह्म हूँ) की उपनिषदों की घोषणा है।

🔍 भजन का विशेष महत्त्व

शिवोहम का उच्चारण: “शिवोहम” (शिवः + अहम्) का अर्थ है “मैं शिव हूँ”। यह अद्वैत वेदांत के “तत्वमसि” (तू वह है) जैसा महावाक्य है। इस भजन का बार-बार “शिवोहम” का जप साधक को आत्मबोध कराता है।

ध्यान और चक्रों का वर्णन: दूसरा अंतरा योग साधना का सुंदर चित्रण करता है – मूलाधार से सहस्रार तक ऊर्जा का जागरण और अनाहत (हृदय चक्र) में ध्वनि का गूंजना।

अद्वैत दर्शन का सरल प्रस्तुतिकरण: “अपना ही उपजा खाय”, “खाली को भरना” आदि पंक्तियाँ गहरे दार्शनिक सत्य को सहज भाषा में व्यक्त करती हैं।

💖 शिवत्व का अनुभव

🎯 संदेश

तुम शिव हो, तुम्हीं ब्रह्म हो। यह शरीर, मन, बुद्धि – सब माया है। सच्चा ध्यान और समर्पण ही आत्मा को परमात्मा से मिला सकता है। “शिवोहम” का जप करते हुए अपने सच्चे स्वरूप को पहचानो।

✨ आस्था का प्रतीक

यह भजन उन साधकों के लिए प्रेरणादायक है जो आत्म-साक्षात्कार की यात्रा पर हैं। “शिवोहम” के जप से मन शांत होता है और एकात्मता का अनुभव होता है।

🕉️ ॐ नमः शिवाय ।। शिवोहम शिवोहम ।। हर हर महादेव ।।

॥ इति शिव अद्वैत भजनम् ॥
॥ आत्मा ने परमात्मा को लिया देख ध्यान की दृष्टि से – शिवोहम शिवोहम ॥