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अष्टभुजी मां जग कल्याणी (Ashtabhujee Ma Jag Kalyani) - Mata Song Mata Ke Bhajan Maiya Ke Bhajan

अष्टभुजी मां जग कल्याणी माता का लोकप्रिय भजन। माँ दुर्गा के अष्टभुज स्वरूप के इस पावन गीत के बोल, अर्थ और महिमा पढ़ें | Bhaktilok पर।

सनातन धर्म की महान परंपरा में आदिशक्ति माँ जगदम्बा की आराधना का अत्यंत विशिष्ट और पावन स्थान है। 'अष्टभुजी मां जग कल्याणी' (Ashtabhujee Ma Jag Kalyani) केवल एक पारंपरिक माता का भजन या मईया का गीत मात्र नहीं है, बल्कि यह चराचर जगत की संचालिका, करुणा की मूर्ति और दुष्टों का संहार करने वाली माँ दुर्गा के अष्टभुज रूप के प्रति अनन्य प्रेम, अटूट विश्वास और पूर्ण शरणागति (Surrender) का जीवंत और दिव्य प्रतीक है। माँ दुर्गा के आठ हाथ—जो शक्ति, आयुध और अभय मुद्राओं से सुसज्जित हैं—इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि माता अपने भक्तों की रक्षा हर दिशा से और हर परिस्थिति में करने के लिए सदैव तत्पर रहती हैं। कलयुग के इस भौतिक और संतापयुक्त संसार में जहाँ मनुष्य अनेक प्रकार की मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक विडम्बनाओं से घिरा रहता है, ऐसे में माँ भगवती के संकीर्तन, माता के भजन और मईया के भजनों का गान व श्रवण साधक के अंतर्मन को झंकृत कर उसमें असीम शांति, सकारात्मक ऊर्जा और भक्ति रूपी अमृत का संचार करता है। यह पावन भजन हमें यह सिखाता है कि किस प्रकार एक भक्त अपनी समस्त चिंताओं और अहंकारों को माँ के चरणों में समर्पित कर भवसागर को सहज ही पार कर सकता है। इस विस्तृत एवं शोधपरक आलेख में हम 'अष्टभुजी मां जग कल्याणी' भजन के संपूर्ण लिरिक्स, उसके आन्तरिक अर्थ, भावार्थ, आध्यात्मिक महत्व, गायन के अवसर तथा माता की आराधना से जुड़ी सभी आवश्यक जानकारियों का संपूर्ण रसास्वादन करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

स्थायी (मखड़ा):

अष्टभुजी मां जग कल्याणी, तेरी महिमा गावे संसारा,
मैया तेरी चरणों की छाया, पावे जग ये सारा रे!अष्टभुजी मां...

अंतरा 1:

हाथों में खड्ग त्रिशूल विराजे, सिंह सवारी मैया साजे,
रूप अष्टभुजा अति मनभावे, संकट सारे जग के भागे।
जो कोई आया तेरे द्वारे, भरती झोली खाली रे!
मैया तेरी चरणों की छाया, पावे जग ये सारा रे!

अंतरा 2:

अंधकार में दीप जलाए, भक्तन के मन को हर्षाए,
ममता की मूरत है मैया, जग की पालनहारी है भैया।
तेरी कृपा बिना इस जग में, कौन करे रखवाली रे!
मैया तेरी चरणों की छाया, पावे जग ये सारा रे!

अंतरा 3:

नवरात्रि में ज्योति जगावें, ढोल मंजीरा मिलकर गावें,
'भक्तलोक' में गूँजे धारा, मैया तेरा जयकारा।
तेरी महिमा अपरम्पार, मईया हर ले व्यथा हमारी रे!
मैया तेरी चरणों की छाया, पावे जग ये सारा रे!

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह अत्यंत ही पावन भक्ति रस से परिपूर्ण भजन 'अष्टभुजी मां जग कल्याणी' माँ दुर्गा के प्रति भक्त के अगाध प्रेम और उनकी कृपा प्राप्ति का सुंदर वर्णन करता है। भजन के मुखड़े में माँ को 'जग कल्याणी' कहकर संबोधित किया गया है, जिसका अर्थ है कि संपूर्ण ब्रह्मांड का कल्याण करना ही जिनका एकमात्र स्वभाव है। कवि कहता है कि हे मैया! तेरी महिमा का गान पूरा संसार करता है और तेरी शरण में आने वाले प्रत्येक प्राणी को परम शांति और आश्रय प्राप्त होता है।

प्रथम अंतरे में माँ के दिव्य स्वरूप का चित्रण है। माता सिंह पर सवार होकर अपने हाथों में खड्ग (तलवार), त्रिशूल और अन्य अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए भक्तों के संकटों का नाश करती हैं। माँ का यह अष्टभुजा रूप साधकों को यह विश्वास दिलाता है कि वह अपने भक्तों की रक्षा के लिए दसों दिशाओं में मुस्तैद हैं। उनके द्वार से कोई भी निराश नहीं लौटता; जिनकी झोली खाली होती है, माँ उसे अपनी असीम करुणा से भर देती हैं।

दूसरे और तीसरे अंतरे में माँ के वात्सल्य और करुणामयी स्वभाव पर प्रकाश डाला गया है। जिस प्रकार एक माता अपने बालक के जीवन से अंधकार दूर कर उसे प्रकाश की ओर ले जाती है, वैसे ही माँ जगदम्बा अपने भक्तों के अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करती हैं। नवरात्रि के पावन पर्व पर जब भक्त ढोल, मंजीरे और सोहर के साथ मैया का गुणगान करते हैं, तो संपूर्ण वातावरण भक्तिमय हो जाता है। यह भजन साधक को अहंकार त्याग कर भगवती के चरणों में पूर्ण समर्पण करने का दिव्य संदेश देता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सरलता, मधुरता और गहराई है। इसमें कठिन संस्कृत शब्दों के स्थान पर सहज हिंदी और लोकभाषा के उन शब्दों का प्रयोग किया गया है जो सीधे हृदय को स्पर्श करते हैं। माता के अष्टभुजा स्वरूप का स्मरण करने मात्र से मनुष्य के भीतर छुपे हुए भय, क्रोध और लोभ जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों का शमन होने लगता है। सनातन परंपरा में दुर्गा सप्तशती पाठ और माता के भजनों का गान मानसिक शक्ति, आत्मबल और तेजस्विता की वृद्धि के लिए अचूक उपाय माना गया है। यह भजन पारिवारिक सत्संग, जागरण और मंदिर के प्रांगण में गाने के लिए अत्यंत उपयुक्त है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

माता के भजनों के गायन और श्रवण के लिए प्रातःकाल ब्रह्म बेला (सूर्योदय से पूर्व) और संध्याकाल (प्रदोष काल) को अत्यंत पवित्र माना गया है। विशेष रूप से:

  • नवरात्रि के नौ दिन: शारदीय और चैत्र नवरात्रि के दौरान सुबह और शाम के समय इस भजन का सामूहिक गान विशेष फलदायी होता है।
  • शुक्रवार और मंगलवार: माता को समर्पित इन दोनों वारों पर विशेष पूजा के समय इस भजन को दीप प्रज्वलित करके गाना चाहिए।
  • माता का जागरण या चौकी: किसी भी मांगलिक उत्सव, घर में सुख-शांति या मन्नत पूरी होने पर होने वाले जागरण की शुरुआत में इस भजन से माँ का आह्वान किया जाता है।
  • मानसिक शांति के समय: जब भी मन अशांत हो, एकांत में बैठकर इस भजन का मानसिक पाठ या श्रवण करने से चित्त को असीम स्थिरता मिलती है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन की आराध्य देवी आदि शक्ति महामाया, माँ दुर्गा, माँ भवानी और माँ चंडी हैं। हिंदू पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, माँ दुर्गा आदिशक्ति का वह स्वरूप हैं जो सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार तीनों कार्यों का संचालन करती हैं। मार्कण्डेय पुराण और देवी महात्म्य के अनुसार, देवताओं के संकट को दूर करने के लिए माँ ने विभिन्न रूपों में अवतार लिया। अष्टभुजा देवी का रूप शक्ति, साहस और विजय का प्रतीक है। इस प्रकार के लोक-भजन सदियों से मौखिक परंपरा और लोक-संस्कृति के माध्यम से संतों, कवियों और गृहस्थ भक्तों द्वारा गाए जाते रहे हैं, जिनका उद्देश्य जन-मानस में धर्म और भक्ति का अलख जगाना है.

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

'अष्टभुजी मां जग कल्याणी' भजन लोक-भक्ति परंपरा की एक अनमोल निधि है। भारतीय संस्कृति में गाँवों और शहरों में माता के दरबारों, मेलों और संकीर्तनों में इस प्रकार के भजनों की रचना समकालीन लोक कवियों और भक्तों द्वारा की जाती रही है। इसका मुख्य उद्देश्य आम जनमानस को माँ के सरल और करुणामयी स्वरूप से जोड़ना है ताकि वे जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी कभी निराश न हों और भगवती का स्मरण करते हुए आगे बढ़ें।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा बहुत ही सहज, प्रवाहमयी और बोधगम्य हिंदी (खड़ी बोली मिश्रित ब्रज-अवधि प्रभाव) है। इसमें अनुप्रास और यमक अलंकारों की स्वाभाविक छटा देखने को मिलती है जैसे - "मैया तेरी चरणों की छाया, पावे जग ये सारा रे!"। काव्य शैली आत्मकथनात्मक और स्तुतिपरक है, जिसमें भक्त सीधे माँ से संवाद स्थापित करता है और अपनी दीनता एवं माता की महानता का बखान करता है। यह शैली श्रोता के मन में तुरंत भक्ति भाव जगाने में सक्षम है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें निम्नलिखित महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और जीवनोपयोगी शिक्षाएं प्रदान करता है:

  • पूर्ण शरणागति: मनुष्य को अपनी बुद्धि और बल के अहंकार को त्यागकर ईश्वर के चरणों में पूर्ण रूप से समर्पित हो जाना चाहिए।
  • निडरता का विकास: माँ के अष्टभुजा रूप का स्मरण करने से व्यक्ति के भीतर किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता और वह हर परिस्थिति का डटकर सामना करता है।
  • परोपकार और करुणा: जिस प्रकार माँ जगदम्बा बिना किसी भेदभाव के पूरे संसार का पालन करती हैं, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने आसपास के जीवों के प्रति करुणा का भाव रखना चाहिए।
  • नियमित साधना का महत्व: जीवन की आपाधापी के बीच नियमित रूप से ईश्वर का स्मरण और संकीर्तन मानसिक शांति की कुंजी है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / पदावली सरल हिंदी अर्थ सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक संदर्भ
अष्टभुजी आठ भुजाओं वाली माँ दुर्गा का वह शक्तिशाली रूप जो दसों दिशाओं से भक्तों की रक्षा करता है।
जग कल्याणी संसार का कल्याण करने वाली माता का वह करुणामयी स्वभाव जो जीवों के कष्टों का हरण करता है।
खड्ग त्रिशूल तलवार और त्रिशूल अधर्म और बुराइयों का नाश करने वाले माता के दिव्य अस्त्र।
संकट मोचनी दुखों को दूर करने वाली भक्तों के जीवन की बाधाओं को पलभर में समाप्त करने वाली शक्ति।
अपरम्पार जिसकी कोई सीमा न हो ईश्वर की महिमा और शक्ति असीम और अनंत है।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"अष्टभुजी मां जग कल्याणी, तेरी महिमा गावे संसारा..."
भावार्थ: हे माँ! तू आठ भुजाओं को धारण करने वाली और इस संपूर्ण ब्रह्मांड का कल्याण करने वाली है। तेरी अनंत महिमा का गान केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि संपूर्ण चराचर जगत करता है।

"हाथों में खड्ग त्रिशूल विराजे, सिंह सवारी मैया साजे..."
भावार्थ: तेरे हाथों में तलवार और त्रिशूल शोभा पाते हैं और तू सिंह पर सवार होकर अत्यंत दिव्य रूप में सुसज्जित होती है। तेरे इस रूप को देखकर बड़े-बड़े संकट और भय दूर भाग जाते हैं।

"तेरी कृपा बिना इस जग में, कौन करे रखवाली रे!"
भावार्थ: हे मईया! इस विशाल संसार में तेरी अहेतुकी कृपा के बिना कोई भी किसी की रक्षा नहीं कर सकता। तू ही हमारी सच्ची रक्षक और माता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

माता के इस भजन के साथ निम्नलिखित पौराणिक श्लोक का स्मरण करना अत्यंत पुण्यदायी माना गया है:

ॐ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

अर्थ: हे नारायणी! सब प्रकार का मंगल करने वाली मंगलमयी, सभी विकारों को दूर करने वाली कल्याणकारिणी, समस्त पुरुषार्थों को देने वाली, शरणागत की रक्षा करने वाली और तीन नेत्रों वाली गौरी माँ! आपको हमारा बार-बार नमस्कार है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम अष्टभुजी मां जग कल्याणी (Ashtabhujee Ma Jag Kalyani)
आराध्य देवी माँ दुर्गा / आदि शक्ति भवानी
संगीत शैली लोक भजन / माता के भजन
भाषा सरल हिंदी / ब्रज-अवधि मिश्रित
प्रमुख भाव भक्ति, शरणागति, वात्सल्य और सुरक्षा भाव
उपयुक्त अवसर नवरात्रि, जागरण, साप्ताहिक पूजा, मंगलवार/शुक्रवार
प्लेटफॉर्म भक्तिलोक (Bhaktilok.in)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन आदिशक्ति, जगत जननी माँ दुर्गा (माँ भवानी) के अष्टभुजा स्वरूप को समर्पित है, जो अपने भक्तों के सभी संकटों का नाश करती हैं।

इस भजन को प्रातःकाल पूजा के समय, संध्या वंदना के दौरान, नवरात्रि के नौ दिनों में अथवा माता की चौकी व जागरण के अवसर पर गाना सबसे उत्तम माना गया है।

माता के भजनों का गान और श्रवण करने से मन की चंचलता समाप्त होती है, नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और माता की असीम कृपा से जीवन में सुख-शांति व साहस की प्राप्ति होती है।

हाँ, इसकी लय बहुत सरल और तानबद्ध है, जिससे बच्चे और नए गायक भी इसे बहुत आसानी से याद करके गा सकते हैं।

प्रत्येक सप्ताह शुक्रवार और मंगलवार का दिन माँ दुर्गा और महाकाली की आराधना के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना जाता है। इस दिन दीप जलाकर यह भजन अवश्य गाना चाहिए।

अवश्य! जब आप यात्रा कर रहे हों या कार्यस्थल पर हों, तो मन ही मन इस भजन के बोल दोहराने से मानसिक एकाग्रता बढ़ती है और मन शांत रहता है।

कलयुग में भगवान के नाम का संकीर्तन और गुणगान जीवात्मा को परमात्मा से जोड़ने का सबसे सरल, प्रभावी और सुलभ साधन बताया गया है।

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संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री। इस आलेख में प्रस्तुत भजन के बोल, अर्थ, भावार्थ और सांस्कृतिक संदर्भों को सनातन धार्मिक परंपराओं, लोक संस्कृति और भक्तों की आस्था को ध्यान में रखते हुए प्रामाणिक रूप से संकलित किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध भक्ति साहित्य पहुँचाना है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • सनातन लोकगीत एवं पारंपरिक भजन संकलन
  • मार्कण्डेय पुराण एवं देवी महात्म्य (दुर्गा सप्तशती)
  • पारंपरिक माता जागरण एवं संकीर्तन गाइड्स

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यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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