परिचय एवं महिमा
"छठी माई के उचे उचे घटीया" यह अत्यंत ही पावन, मधुर और लोक-संस्कृति में रसास्वाद कराने वाला पारंपरिक छठ परब गीत है जो बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और देश-विदेश में बसे सनातन प्रवासियों के बीच अनन्य भक्ति और उल्लास के साथ गाया जाता है। सूर्य उपासना और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने वाले महापर्व छठ के अवसर पर यह पारंपरिक गीत हर घर, घाट और गली को भक्तिमय बना देता है। छठी मैया (माता षष्ठी) और भगवान सूर्य नारायण की आराधना का यह पर्व केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि लोकजीवन की जीवंत अभिव्यक्ति है। इस गीत के माध्यम से साधक अपनी आराध्य छठी माई के स्वागत के लिए ऊंचे-ऊंचे घाटों के निर्माण, साफ-सफाई, और अगाध श्रद्धा का सजीव चित्रण प्रस्तुत करता है। लोक भाषा की मिठास और ठेठ आँचलिकता से परिपूर्ण यह गीत सुनने वाले के मन में मातृभाव और असीम शांति का संचार करता है। यह गीत केवल शब्दों की माला नहीं है, बल्कि यह सूर्योपासना के चार दिनों तक चलने वाले कठिन व्रतों के दौरान व्रतियों के अंतर्मन के उत्साह, पवित्रता और अटूट विश्वास का प्रतीक है।
सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Song Lyrics
स्थाई (मुखड़ा):
छठी माई के उचे उचे घटीया, घाट प सजे ला बजार हो!
दर्शन दऽ तनी छठी माई, धइले बानी बरतिया तोहार हो!
उचे उचे घटीया पारंपारिक छठ परब गीत गूंजे चारो ओर,
आइल रउरा बरतिया माई, जागे मनवा के मोर!
अंतरा 1:
कोसु पर चले ला बरतिया, सूपवा में सजले हरियर सुथनिया,
कच्चा दूध पियइहैं सुरुज देव, भरिहें गोदिया मढ़ईया!
केकरा मड़वा में बरते माई, केकरा घरे होइहें उजियार?
दर्शन दऽ तनी छठी माई, धइले बानी बरतिया तोहार हो!
अंतरा 2:
अरे कनवा के बाली ना सुहाए, नाक के नथिया मोहे मनवा,
तोहरे भरोसे बानी बइठल, छठी माई सुधिरऽ हे जनवा!
केहू ना सुनी पुकार मोरी, रउरे ततारिया आधारा,
पार कराव ए छठी माई, भवरवा से लागल नइहर के धारा!
अंतरा 3:
घाटवा पर उमड़ल बा भीड़ भारी, सब केहू करत बा अरघ के तैयारी,
पहिरले बानी पियरकी साड़िया, हाथे सोहे कनक कटोरिया!
सुरुज भगवान के अरघ देहब, मैया के मनइब संजोत हो,
जनम-जनम के पाप मिटाईब, पावन परब के होत हो!
गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth
इस पारंपरिक छठ गीत का भावार्थ अत्यंत गहरा और आत्मिक है। गीत की शुरुआत 'छठी माई के उचे उचे घटीया' से होती है, जिसका अर्थ है कि छठी मैया की पूजा के लिए नदी और तालाब के तटों पर ऊंचे-ऊंचे और सुंदर घाटों का निर्माण किया जाता है, जिन पर मेलों जैसा भव्य बाजार सज उठता है। व्रती महिलाएं और उनके परिवारजन पूर्ण निष्ठा के साथ घाट की सजावट करते हैं।
गीत के अगले चरण में व्रती माता छठी से आर्त पुकार करते हुए कहती हैं—"दर्शन दऽ तनी छठी माई, धइले बानी बरतिया तोहार हो!" यानी हे छठी मैया! हमने आपका यह अत्यंत कठिन और पवित्र व्रत धारण किया है, अतः हमें अपने दिव्य दर्शन से कृतार्थ करें। सूप और दउरा में रखे गए ठेकुआ, फलों, ईख (गन्ना) और पूजा सामग्री की पवित्रता का वर्णन करते हुए भक्त भगवान सूर्य और छठी मैया से अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की प्रार्थना करता है।
अंतिम चरणों में यह दर्शाया गया है कि कैसे पीली साड़ियां पहने, हाथों में कनक (सोने) या पीतल की कटोरियों और सूप को उठाए हुए व्रती महिलाएं डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देती हैं। यह गीत मनुष्य के भीतर के अहंकार को मिटाकर प्रकृति, जल, अग्नि और सूर्य के प्रति कृतज्ञता का भाव जागृत करता है।
गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message
यह पारंपरिक लोकगीत मुख्य रूप से समर्पण, मातृत्व प्रेम, अनुशासन, और प्रकृति पूजा की भावना पर आधारित है। छठ पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह स्वच्छता, अनुशासन और पर्यावरण संरक्षण का सबसे बड़ा संदेश देता है। इस गीत के माध्यम से यह संदेश मिलता है कि जब मनुष्य अपनी सम्पूर्ण निष्ठा और अहंकार को त्यागकर प्रकृति की गोद (नदी और सूर्य) में शरण लेता है, तो उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। मातृशक्ति की दृढ़ इच्छाशक्ति और परिवार की मंगलकामना इस गीत का केंद्रीय भाव है।
गीत की जानकारी | Song Information
| गीत विवरण (Details) | विवरण (Description) |
|---|---|
| गीत का नाम | छठी माई के उचे उचे घटीया पारंपारिक छठ परब गीत |
| गायक / कलाकार | पारंपरिक लोक गायिकाएं एवं सोनम यादव (संदर्भित वीडियो एलबम) |
| भाषा / बोली | भोजपुरी / आँचलिक हिंदी |
| मुख्य विषय | सूर्य उपासना, छठी मईया की महिमा, छठ व्रत |
| अवसर / पर्व | छठ महापर्व (कार्तिक शुक्ल षष्ठी) |
| संगीत शैली | पारंपरिक लोक गीत / सोहर-भजन शैली |
गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators
छठ पर्व के अधिकांश गीत सदियों से मौखिक परंपरा (Oral Tradition) के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित होते रहे हैं। इन गीतों के मूल रचनाकार अज्ञात हैं, क्योंकि ये लोक-संस्कृति की छांव में जन-मानस द्वारा रचे गए हैं। समय के साथ आधुनिक लोक कलाकारों और संगीतकारों ने इन पारंपरिक गीतों को नए संगीत संयोजन के साथ रिकॉर्ड किया है, जिससे यह वैश्विक मंच पर अपनी पहुंच बना चुके हैं। लोक गायिका सोनम यादव जैसे कलाकारों ने इन पारंपरिक धुनों को सहेजने और प्रसारित करने में सराहनीय योगदान दिया है।
कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings
| शब्द (Word) | सरल अर्थ (Meaning) | संदर्भ (Context) |
|---|---|---|
| घटीया | घाट (River/Pond Bank) | पूजा के लिए नदी या तालाब के किनारे बनाए जाने वाले स्थान |
| बरतिया | व्रत (Vrat / Fast) | छठ माता का कठिन 36 घंटे निर्जला व्रत |
| सूपवा | बांस का सूप (Bamboo Basket) | पूजा की सामग्री रखने का पारंपरिक पात्र |
| अरघ | अर्घ्य (Arghya) | सूर्य देव को जल और दूध अर्पित करने की क्रिया |
| कनक | स्वर्ण / सोना (Gold / Precious) | पूजा पात्र या आभूषणों के संदर्भ में |
| संजोत | संध्या अर्घ्य / सांझ | कार्तिक शुक्ल षष्ठी की संध्या का मुख्य पूजन |
गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance
छठ महापर्व भारतीय सनातन संस्कृति में एकमात्र ऐसा पर्व है जिसमें डूबते हुए सूर्य (अस्ताचलगामी सूर्य) और उगते हुए सूर्य (उदयगामी सूर्य) दोनों की पूजा की जाती है। यह जीवन के चक्र—उत्पत्ति और विलय—के प्रति हमारी स्वीकृति को दर्शाता है। "छठी माई के उचे उचे घटीया" जैसे पारंपरिक गीत व्रतियों को कठिन उपवास के दौरान मानसिक ऊर्जा और संबल प्रदान करते हैं। लोक संस्कृति में छठी मैया को प्रकृति की अधिष्ठात्री देवी और भगवान सूर्य की बहन माना गया है, जो संतान की लंबी आयु, आरोग्य और परिवार की सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं।
गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons
यह गीत और छठ पर्व हमें जीवन में अनुशासन, शुचिता (पवित्रता), धैर्य और समर्पण का पाठ पढ़ाते हैं। छठ व्रत का हर एक नियम यह सिखाता है कि महान लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कठोर साधना और संयम की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, यह पर्व समाज के ऊंच-नीच के भेदों को मिटाकर सभी को एक ही घाट पर समान रूप से खड़े होने की प्रेरणा देता है, जो सामाजिक समरसता (Social Harmony) का सबसे बड़ा उदाहरण है।
गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing
यह पारंपरिक गीत मुख्य रूप से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तिथि तक चलने वाले चार दिवसीय छठ महापर्व के दौरान गाया जाता है। विशेषकर खरना के दिन, संध्या अर्घ्य (सांझ का अर्घ्य) के समय जब व्रती और उनके परिवारजन नदी घाट की ओर प्रस्थान करते हैं, तब यह गीत महिलाओं द्वारा समवेत स्वर में गाया जाता है। इसके अलावा धार्मिक अनुष्ठानों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी इसका विशेष स्थान है।
एक नजर में गीत की जानकारी | Song at a Glance
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| शीर्षक | छठी माई के उचे उचे घटीया |
| श्रेणी | पारंपरिक छठ परब गीत / लोक भजन |
| संबंधित देवी-देवता | छठी मैया एवं सूर्य देव |
| मुख्य भाव | भक्ति, मातृप्रेम, प्रकृति वंदना |
| क्षेत्र | बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश |
| प्रसार माध्यम | लोक परंपरा, ऑडियो-वीडियो एलबम |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: छठी माई के उचे उचे घटीया गीत किस अवसर पर गाया जाता है?
उत्तर: यह गीत मुख्य रूप से कार्तिक मास में मनाए जाने वाले लोक आस्था के महापर्व 'छठ पूजा' के दौरान घाट पर जाते समय और पूजा के अनुष्ठानों में गाया जाता है।
प्रश्न 2: छठ पर्व में किन देवी-देवताओं की पूजा की जाती है?
उत्तर: छठ पर्व में मुख्य रूप से भगवान सूर्य नारायण और प्रकृति की देवी षष्ठी माता (छठी मैया) की पूजा की जाती है।
प्रश्न 3: यह गीत किस भाषा में रचित है?
उत्तर: यह गीत मुख्य रूप से भोजपुरी और आंचलिका हिंदी की लोक-बोली में रचित है, जो अपनी मिठास के लिए प्रसिद्ध है।
प्रश्न 4: छठ व्रत कितने दिनों का होता है?
उत्तर: छठ का व्रत कुल चार दिनों का होता है, जिसकी शुरुआत नहाय-खाय से होती है और उदगी सूर्य को अर्घ्य देने के साथ इसका समापन होता है।
प्रश्न 5: क्या यह गीत पारंपरिक है या किसी आधुनिक फिल्म का है?
उत्तर: यह एक पारंपरिक लोकगीत (Traditional Folk Song) है जिसे पीढ़ियों से लोक-गायिकाओं द्वारा गाया जाता रहा है, हालांकि आधुनिक समय में इसे कई कलाकारों ने अपने एलबम में भी गाया है।
प्रश्न 6: छठी मैया कौन हैं?
उत्तर: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार षष्ठी माता (छठी मैया) ब्रह्मा जी की मानस पुत्री और बच्चों की रक्षा करने तथा उन्हें दीर्घायु प्रदान करने वाली देवी हैं।
प्रश्न 7: छठ पूजा में घाट का क्या महत्व है?
उत्तर: नदी या तालाब का घाट शुद्धता, जल तत्व के प्रति सम्मान और सामूहिक रूप से सूर्य उपासना का केंद्र होता है।
प्रश्न 8: इस गीत को सुनकर भक्तों को क्या अनुभव होता है?
उत्तर: इस गीत के सुर और शब्द भक्तों के मन में अपार शांति, भक्ति भाव और अपनी संस्कृति के प्रति गर्व का अनुभव कराते हैं।
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
भक्तित्सलोक (Bhaktilok.in) पर प्रकाशित यह आलेख पारंपरिक लोक साहित्य, सांस्कृतिक शोध और धार्मिक मान्यताओं के आधार पर तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य सनातन लोक संस्कृति और पर्वों के मूल स्वरूप को पाठकों तक प्रामाणिक रूप से पहुंचाना है। यह सामग्री संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत पूर्ण शुद्धता और सांस्कृतिक गरिमा को ध्यान में रखकर प्रस्तुत की गई है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- भारतीय लोक संस्कृति और व्रत कथाएं (पारंपरिक ग्रंथ संदर्भ)
- बिहार और उत्तर प्रदेश की लोक-गायकी परंपरा एवं शोध आलेख
- सूर्य उपासना और षष्ठी व्रत विधान (वैदिक एवं पौराणिक परंपरा)
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