भोजपुरी लोक संस्कृति में 'देवी पचरा' का स्थान अत्यंत विशिष्ट और पवित्र माना गया है। यह केवल एक लोकगीत नहीं, बल्कि आदिशक्ति मां दुर्गा के प्रति ग्रामीण अंचलों की अगाध श्रद्धा, आत्मीयता और समर्पण की संगीतमय अभिव्यक्ति है। सुप्रसिद्ध लोक गायिका अंजलि भारद्वाज द्वारा गाया गया यह देवी गीत "पांच ही पान के पतईया" (Paanch Hi Paan Ke Pataiya) भोजपुरी भाषी समाज में अत्यंत लोकप्रिय है। इस गीत में भक्त अपनी सामर्थ्य के अनुसार अत्यंत सरल और सुलभ सामग्री—जैसे पांच पान के पत्ते—अर्पित कर जगत जननी मां जगदंबा को प्रसन्न करने की याचना करता है। यह गीत श्रोताओं के हृदय में वात्सल्य, करुणा और अनन्य भक्ति भाव का संचार करता है। विशेषकर शारदीय और चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर इस गीत की गूंज हर मंदिर और घर-आंगन में सुनाई देती है, जो संपूर्ण वातावरण को देवीमय बना देती है।
सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics
मुखड़ा:
पांच ही पान के पतईया, मँगावेली मोरी मईया हो ना।
तनी ताकी ना मोरी ओरिया, हे मईया मोरी! आसन लगा देब ना॥
पांच ही पान के पतईया, मँगावेली मोरी मईया हो ना।
तनी ताकी ना मोरी ओरिया, हे मईया मोरी! आसन लगा देब ना॥
अंतरा 1:
सोने के खड़ऊआ मईया, चांदी के पैजनिया हो ना।
मईया बाजेला झुनुर-झुनुर, हे मईया मोरी! अंचरा बिछा देब ना॥
सोने के खड़ऊआ मईया, चांदी के पैजनिया हो ना।
मईया बाजेला झुनुर-झुनुर, हे मईया मोरी! अंचरा बिछा देब ना॥
अंतरा 2:
गंगा जी के जलवा से, चरण पखारब हो ना।
मईया धोइब तोहार पाँव, हे मईया मोरी! नयन बिछा देब ना॥
गंगा जी के जलवा से, चरण पखारब हो ना।
मईया धोइब तोहार पाँव, हे मईया मोरी! नयन बिछा देब ना॥
अंतरा 3:
निमिया के डढ़िया पे, झुलुआ लगाइब हो ना।
मईया गावेली पचरवा, हे मईया मोरी! चँवर डोला देब ना॥
निमिया के डढ़िया पे, झुलुआ लगाइब हो ना।
मईया गावेली पचरवा, हे मईया मोरी! चँवर डोला देब ना॥
अंतरा 4:
अंजलि भारद्वाज मईया, शरण में आईल बाड़ी ना।
मईया राखिहा लाज-पतरिया, हे मईया मोरी! जीवन धन्य हो जाई ना॥
पांच ही पान के पतईया, मँगावेली मोरी मईया हो ना।
तनी ताकी ना मोरी ओरिया, हे मईया मोरी! आसन लगा देब ना॥
गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth
यह देवी पचरा गीत भोजपुरी लोक संवेदना और मातृ-भक्ति का एक अनुपम उदाहरण है। गीत की प्रत्येक पंक्ति में भक्त की दीनता, सरलता और मां के प्रति अनन्य अनुराग झलकता है।
प्रथम भाग (मुखड़ा) का भावार्थ: गीत की शुरुआत में भक्त कहता है कि मेरी मैया केवल पांच पान के पत्तों की सरल भेंट मांगती हैं। वे किसी बहुमूल्य उपहार या आडंबर की भूखी नहीं हैं। भक्त मां से प्रार्थना करता है कि हे माता! आप एक बार मेरी ओर करुणा दृष्टि से देख लीजिए, मैं आपके बैठने के लिए अपने हृदय का पावन आसन लगा दूंगा। यहाँ 'पांच पान के पत्ते' पंचभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) या पंच-प्राणों के समर्पण का प्रतीक हैं।
द्वितीय भाग (अंतरा) का भावार्थ: भक्त कल्पना करता है कि माता के चरणों में सोने की खड़ाऊं और चांदी की पैजनिया (पायल) सुशोभित हैं। जब माता चलती हैं, तो उनकी पायल से 'झुनुर-झुनुर' की मधुर ध्वनि निकलती है। इस दिव्य रूप को देखकर भक्त भावविह्वल हो जाता है और कहता है कि हे मां! मैं आपके स्वागत में अपना आंचल बिछाने को तैयार हूं। यह भक्त के पूर्ण आत्मसमर्पण को दर्शाता है।
तृतीय भाग का भावार्थ: भक्त मां के चरणों को धोने के लिए पवित्र गंगाजल लेकर आता है। वह कहता है कि हे मां! मैं गंगाजल से आपके श्रीचरणों को पखारूंगा और आपके मार्ग में अपनी पलकें (नयन) बिछा दूंगा। यह भारतीय संस्कृति की 'अतिथि देवो भव' और 'मातृ देवो भव' की पराकाष्ठा है, जहां भक्त अपनी सबसे मूल्यवान इंद्रिय (आंखें) मां के चरणों में समर्पित करने को तत्पर है।
चतुर्थ भाग का भावार्थ: भोजपुरी लोक परंपरा में नीम के पेड़ को शीतला माता का निवास स्थान माना जाता है। भक्त कहता है कि वह नीम की डाल पर माता के लिए झूला लगाएगा और भक्ति भाव से 'पचरा' (पारंपरिक देवी गीत) गाएगा। साथ ही, वह माता को शीतलता प्रदान करने के लिए चंवर (पंखे) से हवा करेगा। अंत में, गायिका अंजलि भारद्वाज मां की शरण में आकर अपने जीवन को धन्य बनाने और अपनी लाज (प्रतिष्ठा) की रक्षा करने की गुहार लगाती हैं।
गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message
इस गीत की मुख्य भावना 'शरणागति' (Surrender) और 'वात्सल्य' (Maternal Love) है। सनातन धर्म में ईश्वर को माता के रूप में पूजने की प्राचीन परंपरा रही है। यह गीत हमें सिखाता है कि भगवान को रिझाने के लिए महंगे उपहारों, सोने-चांदी या बड़े अनुष्ठानों की आवश्यकता नहीं होती। मां तो केवल सच्चे भाव और निष्कपट हृदय की भूखी हैं।
गीत का संदेश यह है कि जब हम अपने अहंकार को त्यागकर, पंच तत्वों से बने इस शरीर (पांच पान के पत्ते) को मां के चरणों में सौंप देते हैं, तब मां की असीम अनुकंपा स्वतः ही प्राप्त हो जाती है। यह गीत शहरी कोलाहल से दूर, ग्रामीण भारत की उस शुद्ध और निश्छल भक्ति को पुनर्जीवित करता है जो प्रकृति और परमात्मा के सीधे संबंध पर आधारित है।
गीत की जानकारी | Song Information
| विवरण बिंदु (Parameter) | जानकारी (Information) |
|---|---|
| गीत का नाम (Song Name) | पांच ही पान के पतईया (Paanch Hi Paan Ke Pataiya) |
| गीत का प्रकार (Genre) | भोजपुरी देवी पचरा गीत (Bhojpuri Devi Pachra Geet) |
| मुख्य गायिका (Singer) | अंजलि भारद्वाज (Anjali Bhardwaj) |
| भाषा (Language) | भोजपुरी (Bhojpuri) |
| मुख्य विषय (Theme) | मां दुर्गा की आराधना, सरलता और समर्पण |
| उपयुक्त अवसर (Occasion) | शारदीय नवरात्रि, चैत्र नवरात्रि, देवी पूजन, मुंडन संस्कार |
| श्रेणी (Category) | देवी भजन, भोजपुरी भक्ति गीत |
गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators
इस गीत को अपनी सुमधुर आवाज से जीवंत करने का श्रेय भोजपुरी जगत की सुप्रसिद्ध लोक गायिका अंजलि भारद्वाज को जाता है। अंजलि भारद्वाज ने बहुत कम उम्र से ही शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय संगीत की शिक्षा प्राप्त की और भोजपुरी भक्ति संगीत के क्षेत्र में अपनी एक अमिट पहचान बनाई। उनकी आवाज में जो दर्द, पुकार और तन्मयता है, वह सीधे श्रोताओं के हृदय को छू लेती है। इस पचरा गीत में पारंपरिक वाद्यों जैसे ढोलक, मंजीरा और हारमोनियम का बेहतरीन समन्वय किया गया है, जो इसे और भी अधिक कर्णप्रिय बनाता है।
कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings
| कठिन शब्द (Word) | सरल हिंदी अर्थ (Meaning) | संदर्भ / महत्व (Context) |
|---|---|---|
| पतईया | पत्ता / पत्र | यहाँ पान के पत्तों के लिए प्रयुक्त हुआ है। |
| ओरिया | ओर / तरफ | भक्त मां से अपनी ओर देखने की प्रार्थना करता है। |
| खड़ऊआ | खड़ाऊं / काष्ठ पादुका | प्राचीन काल में संतों और देवताओं द्वारा पहनी जाने वाली चरण पादुका। |
| पैजनिया | पायल / नूपुर | माता के पैरों में बजने वाले घुंघरू। |
| पखारब | धोना / प्रक्षालन करना | गंगाजल से माता के चरणों को धोने की क्रिया। |
| पचरवा | पचरा गीत | देवी मां की महिमा में गाए जाने वाले पारंपरिक लोकगीत। |
| चँवर | चामर / पंखा | देवताओं को हवा करने के लिए प्रयुक्त होने वाला पूजनीय उपकरण। |
गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance
भोजपुरी लोक साहित्य में 'पचरा' का आध्यात्मिक महत्व बहुत गहरा है। पचरा शब्द की उत्पत्ति 'पंच' (पांच) से मानी जाती है, जो पंचदेवों या पंचभूतों की आराधना का संकेत देती है। इस गीत में प्रयुक्त 'पांच पान के पत्ते' हमारे पांच ज्ञानेंद्रियों के प्रतीक हैं। जब हम अपनी पांचों ज्ञानेंद्रियों को मां के चरणों में अर्पित कर देते हैं, तो हमारी चेतना का शुद्धिकरण होता है।
सांस्कृतिक रूप से, यह गीत उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल, बिहार और झारखंड के क्षेत्रों में अत्यंत पूजनीय है। इन क्षेत्रों में नीम के पेड़ को साक्षात शीतला माता का रूप मानकर उसकी पूजा की जाती है। गीत में 'निमिया के डढ़िया' (नीम की डाल) का उल्लेख इसी लोक विश्वास को सुदृढ़ करता है। यह गीत आधुनिकता के इस दौर में भी हमारी लोक परंपराओं, लोक वाद्यों और मातृ-शक्ति के प्रति हमारी आस्था को सुरक्षित रखने का कार्य कर रहा है।
गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons
- सादगी और सरलता: ईश्वर को पाने के लिए किसी आडंबर या अत्यधिक धन की आवश्यकता नहीं है। सच्चे मन से अर्पित की गई एक छोटी सी वस्तु भी भगवान को स्वीकार्य होती है।
- पूर्ण समर्पण: जब हम अपनी चिंताएं और अपना जीवन मां के चरणों में सौंप देते हैं, तो हमारा मन भयमुक्त और शांत हो जाता है।
- प्रकृति से जुड़ाव: गीत में गंगाजल, नीम का पेड़ और पान के पत्तों का उल्लेख हमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होना सिखाता है।
- विनम्रता: अंजलि भारद्वाज द्वारा अंत में 'लाज-पतरिया' रखने की प्रार्थना हमें सिखाती है कि चाहे हम कितने भी बड़े कलाकार या व्यक्ति बन जाएं, ईश्वर के सामने हमेशा विनम्र बने रहना चाहिए।
गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing
यद्यपि इस पावन गीत को कभी भी सुना जा सकता है, परंतु निम्नलिखित अवसरों पर इसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है:
- नवरात्रि (Navratri): चैत्र और शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों के दौरान सुबह और शाम के समय इस गीत को सुनना अत्यंत शुभ माना जाता है। आप इस दौरान श्री दुर्गा चालीसा का पाठ भी कर सकते हैं।
- पारिवारिक मांगलिक कार्य: मुंडन संस्कार, विवाह या गृह प्रवेश के समय कुलदेवी की पूजा में पचरा गीत गाने की प्राचीन परंपरा है।
- साप्ताहिक पूजा: प्रत्येक मंगलवार और शुक्रवार को मां दुर्गा के मंदिरों में इस गीत का गायन किया जाता है। पूजा के अंत में मां दुर्गा की आरती अवश्य करनी चाहिए।
एक नजर में गीत की जानकारी | Song at a Glance
| विषय (Topic) | संक्षिप्त विवरण (Quick Details) |
|---|---|
| गीत का शीर्षक | पांच ही पान के पतईया |
| कलाकार | अंजलि भारद्वाज |
| शैली | भोजपुरी देवी पचरा (Folk Devotional) |
| मुख्य वाद्य यंत्र | ढोलक, मंजीरा, हारमोनियम |
| आध्यात्मिक संदेश | सरल भक्ति और पूर्ण शरणागति |
| संबंधित देवी | मां दुर्गा, शीतला माता, विंध्यवासिनी माता |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री पर आधारित है। इस समीक्षा में पारंपरिक लोकगीतों की शुद्धता, उनके साहित्यिक अर्थ और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का विशेष ध्यान रखा गया है। "पांच ही पान के पतईया" गीत न केवल भोजपुरी संगीत की धरोहर है, बल्कि यह हमारी समृद्ध लोक-संस्कृति का जीवंत दस्तावेज भी है। इस विश्लेषण का उद्देश्य नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ना और लोक विधाओं के प्रति आदर भाव जगाना है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- भोजपुरी लोक साहित्य एवं सांस्कृतिक अध्ययन (विभिन्न शोध पत्र)
- उत्तर भारतीय लोकगीत परंपरा और देवी पचरा का इतिहास
- अंजलि भारद्वाज के आधिकारिक भक्ति एल्बम और साक्षात्कार
- सनातन धर्म में देवी उपासना और पंचोपचार पूजा पद्धति
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