Kabir Das Ke Dohe मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

सुपरहिट संत कबीर दोहा- जहाँ दया तहा धर्म है, जहाँ लोभ वहां पाप (Sant Kabir Ke Dohe)

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जहाँ दया तहा धर्म है, जहाँ लोभ वहां पाप | Rakesh Kala | Sant Kabir Ke Dohe

संत कबीरदास जी का यह परम पावन और प्रसिद्ध दोहा—"जहाँ दया तहा धर्म है, जहाँ लोभ वहां पाप"—मानव जीवन की नैतिकता, सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों और आत्मिक शुद्धि का सबसे बड़ा दार्शनिक आधार है। कबीर साहेब की वाणी केवल शब्द नहीं, बल्कि जीवमात्र को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाली वह ज्ञान ज्योति है, जो युगों-युगों से मानवता का मार्गदर्शन करती आ रही है। प्रसिद्ध गायक राकेश कला जी की मधुर वाणी में इस दोहे और कबीर अमृतवाणी के गायन ने इसे आधुनिक संगीत प्रेमियों और भक्ति जगत में पुनः अमर कर दिया है। संत कबीर की साखियाँ और दोहे बिना किसी आडंबर के सीधे हृदय को छूते हैं और मनुष्य को उसके कर्तव्यों का बोध कराते हैं। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम कबीर साहेब के इस महान दोhe के दार्शनिक मर्म, नैतिक शिक्षाओं, भजन गायन के महत्व और इसके जीवनोपयोगी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे, जिससे साधक अपने जीवन को सत्कर्म और करुणा के मार्ग पर अग्रसर कर सके।

मूल पाठ एवं संपूर्ण भजन लिरिक्स

गायक: राकेश कला | रचनाकार: संत कबीरदास


जहाँ दया तहा धर्म है, जहाँ लोभ वहां पाप,
जहाँ क्रोध तहा काम है, जहाँ क्षमा तहाँ आप।

अरे मन भजन कर ले कबीर का,
छोड़ दे जग के फंदे, भजन बिन कोई न साथी तेरा,
अंत पड़े सब धंधे...

जहाँ दया तहा धर्म है, जहाँ लोभ वहां पाप,
दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान,
तुलसी दया न छांडिये, जब लग घट में प्रान।

माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर,
आशा तृष्णा ना मिरी, कह गए संत कबीर।

झूठा सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद,
जग चबैना काल का, कुछ मुख में कुछ गोद।

साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Meaning & Bhavarth

कबीर साहेब का यह दोहा मानवीय स्वभाव के दो विपरीत छोरों—सकारात्मक दैवी वृत्तियों (दया, धर्म, क्षमा) और नकारात्मक आसुरी प्रवृत्तियों (लोभ, पाप, क्रोध, अहंकार)—का बहुत ही स्पष्ट और वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इस दोहे की एक-एक पंक्ति में गहरे आध्यात्मिक रहस्य छिपे हैं:

  • "जहाँ दया तहा धर्म है...": इसका अर्थ है कि वास्तविक धर्म किसी कर्मकांड या पाखंड में नहीं, बल्कि जीवमात्र के प्रति करुणा और दया भाव में निहित है। जहाँ हृदय में दूसरों के प्रति प्रेम और परोपकार की भावना (दया) है, वहीं पर सच्चा धर्म निवास करता है।
  • "...जहाँ लोभ वहां पाप": इसके विपरीत, जहाँ मन में लालच, संग्रहवृत्ति और स्वार्थ (लोभ) आ जाता है, वहाँ अनैतिकता, भ्रष्टाचार और पाप का जन्म स्वतः हो जाता है। लोभ मनुष्य की बुद्धि को भ्रष्ट कर देता है।
  • "जहाँ क्रोध तहा काम है, जहाँ क्षमा तहाँ आप": क्रोध और वासना (काम) मनुष्य के मानसिक संतुलन को नष्ट करते हैं, जबकि क्षमाशीलता के गुण में स्वयं परमात्मा (आप) का वास होता है। क्षमा वीरस्य भूषणम् के साथ-साथ divine grace का प्रतीक है।

राकेश कला जी द्वारा गाए गए इस भजन में इन दार्शनिक सत्यों को बहुत ही सरल लोक-धुन में पिरोया गया है, जिससे श्रवण मात्र से अंतःकरण शुद्ध हो जाता है और मन विकारों से मुक्त होकर भगवद्भक्ति की ओर उन्मुख होता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

संत कबीर की वाणी का सनातन संस्कृति और भक्ति आंदोलन में अद्वितीय स्थान है। इस भजन और दोहे का मुख्य महत्व निम्नलिखित बिंदुओं में निहित है:

  • नैतिकता और आध्यात्मिकता का समन्वय: यह भजन केवल धार्मिक कर्मकांड की बात नहीं करता, बल्कि उच्च नैतिक मूल्यों को जीवन का आधार बनाने की प्रेरणा देता है।
  • लोकप्रिय संगीत शैली: राकेश कला जी की सधी हुई लोक शैली और स्पष्ट उच्चारण के कारण यह भजन ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में समान रूप से लोकप्रिय है।
  • संत परंपरा का संदेश: यह रचना नाथपंथ, सूफीवाद और भक्ति मार्ग के समन्वय को दर्शाती है, जहाँ निर्गुण ब्रह्म की उपासना के साथ-साथ सगुण लोक-कल्याण की बात की गई है।
  • मानसिक शांति का साधन: इस भजन के नियमित श्रवण से तनाव, ईर्ष्या और नकारात्मकता दूर होती है तथा मन में संतोष और शांति की प्राप्ति होती है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

भक्ति संगीत और संतों की वाणी को आत्मसात करने का एक निश्चित विधान और भाव होता है। इस भजन को निम्नलिखित अवसरों पर सुना या गाया जा सकता है:

  • दैनिक पूजा और ध्यान के समय: प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में या संध्या बेला में ध्यान या पूजा के पूर्व इसे सुनने से मन एकाग्र होता है।
  • सत्संग और धार्मिक आयोजन: संत कबीर जयंती, व्यास पूर्णिमा, या किसी भी सत्संग समारोह में इस प्रकार के भजनों का सामूहिक गायन अत्यंत फलदायी होता है।
  • पारिवारिक सभाएं: परिवार के साथ बैठकर इस तरह के नैतिक और दार्शनिक भजनों को सुनने से नई पीढ़ी में संस्कार और उच्च विचारों का बीजारोपण होता है।

श्रवण करते समय रीढ़ की हड्डी सीधी रखकर शांत चित्त से बैठना चाहिए और प्रत्येक शब्द के अर्थ पर मनन करना चाहिए। आप हमारी वेबसाइट पर अन्य पावन कृतियों जैसे श्री हनुमान चालीसा और शिव तांडव स्तोत्र के बारे में भी पढ़ सकते हैं।

भजन से जुड़े संत कबीर दास का परिचय | Associated Saint

संत कबीरदास जी 15वीं सदी के एक महान संत, कवि और समाज सुधारक थे। उनका पूरा जीवन सत्य, समानता और निर्गुण भक्ति को समर्पित था। उन्होंने समाज में फैली कुप्रथाओं, पाखंडों, जातिगत भेदभाव और बाह्य आडंबरों पर प्रहार किया और एक सहज, सरल मार्ग दिखाया जिसे 'सहज साधना' कहा जाता है। कबीर साहेब के दोहे आज भी संपूर्ण विश्व में जीवन-दर्शन के सबसे बड़े स्रोतों में गिने जाते हैं। उनके उपदेश किसी एक संप्रदाय विशेष के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए हैं।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

संत कबीर की भाषा को 'सधुक्कड़ी' या 'पंचमेल खिचड़ी' कहा जाता है, जिसमें राजस्थानी, हरियाणवी, पंजाबी, अवधी और ब्रज भाषा के शब्द सहज रूप से घुल-मिल्ल जाते हैं। राकेश कला जी ने इस भजन में इसी ग्रामीण और लोक-संस्कृति से जुड़ी भाषा की मिठास को जीवंत किया है। दोहे की छंद रचना बहुत ही लयबद्ध है, जो श्रोता के मन पर सीधा प्रभाव डालती है। रूपक और दृष्टांत अलंकारों का सुंदर प्रयोग इस रचना को साहित्यिक दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध बनाता है.

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन साधक को जीवन के कई महत्वपूर्ण संदेश देता है:

  • परोपकार और दया: जीवन में सबसे बड़ा धर्म जीवों पर दया करना और परोपकार करना है।
  • लोभ का त्याग: लालच मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है, जो पतन का मार्ग प्रशस्त करता है।
  • क्षमा का महत्व: क्षमा करने से अहंकार समाप्त होता है और हृदय में ईश्वरीय ऊर्जा का संचार होता है।
  • नश्वरता का बोध: यह शरीर और संसार नश्वर है, अतः माया के बंधनों में न फंसकर सत्कर्म और ईश्वर स्मरण करना ही मनुष्य का परम कर्तव्य है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / पदावली सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
दया करुणा, परोपकार, जीवमात्र प्रेम धर्म का मूल आधार
लोभ लालच, तृष्णा, संग्रह की भावना पाप और अनैतिकता का द्वार
क्षमा माफ करना, सहनशीलता दैवी गुण और आत्मीय शांति
तृष्णा कभी न समाप्त होने वाली इच्छा माया का बंधन
सूप सुभाय अनाज फटकने वाला सूप (जो कचरा उड़ा दे और सार रख ले) विवेकी संत का स्वभाव (अच्छाई ग्रहण करना, बुराई त्यागना)

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

संत कबीर के इस प्रसिद्ध दोहे और भजन के प्रत्येक चरण का सूक्ष्म विश्लेषण निम्नलिखित है:

चरण 1: "जहाँ दया तहा धर्म है, जहाँ लोभ वहां पाप..."
यहाँ कबीर साहेब स्पष्ट करते हैं कि धर्म का कोई दूसरा पर्यायवाची नहीं है। जहां करुणा है, वहां परमात्मा की उपस्थिति है। इसके विपरीत, लालच और स्वार्थ से ही सारे पाप और अपराध जन्म लेते हैं।

चरण 2: "जहाँ क्रोध तहा काम है, जहाँ क्षमा तहाँ आप।"
क्रोध और वासना मनुष्य की बुद्धि को आच्छादित कर लेते हैं। इसके विपरीत, जो व्यक्ति क्षमावान बनता है, उसके हृदय में स्वयं परमात्मा (आप) का वास हो जाता है।

चरण 3: "माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर..."
कबीर साहेब संसार की नश्वरता और मनुष्य की अनंत तृष्णा पर कटाक्ष करते हुए कहते हैं कि शरीर तो नष्ट हो जाते हैं, परंतु मनुष्य की इच्छाएं और मोह कभी समाप्त नहीं होते।

भजन से जुड़े संबंधित मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

संत कबीर की इस वाणी का समर्थन वैदिक और पुराण ग्रंथों में भी मिलता है। सनातन धर्म में करुणा और अहिंसा को ही परम धर्म माना गया है:

सम्पूर्ण मूल भजन लिरिक्स (हिंदी पाठ)

"अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च।"
महाभारत (अनुशासन पर्व)

तथा श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने भी आसुरी प्रवृत्तियों (लोभ, क्रोध, काम) को नरक का द्वार बताया है:

सम्पूर्ण मूल भजन लिरिक्स (हिंदी पाठ)

"त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्।।"
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 16, श्लोक 21)

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन / दोहा नाम जहाँ दया तहा धर्म है, जहाँ लोभ वहां पाप
गायक कलाकार राकेश कला (Rakesh Kala)
रचनाकार / संत संत कबीरदास जी
संगीत विधा कबीर अमृतवाणी / लोक भजन
भाषा सधुक्कड़ी / हिंदी
मुख्य भाव दया, धर्म, नैतिकता, लोभ त्याग और वैराग्य
उपयुक्त अवसर दैनिक सत्संग, ध्यान, संत कबीर जयंती, मॉर्निंग प्रेयर

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस प्रसिद्ध दोहे के रचयिता महान संत और समाज सुधारक संत कबीरदास जी हैं।

इस भजन का मुख्य संदेश मानव जीवन में दया, धर्म, क्षमा को अपनाना और लोभ, क्रोध व अहंकार का त्याग करना है।

संत कबीर के दोहे मुख्यतः 'सधुक्कड़ी' या पंचमेल खिचड़ी भाषा में हैं, जिसमें अवधी, ब्रज, राजस्थानी और हरियाणवी शब्दों का मिश्रण होता है।

सनातन संस्कृति और संतों के अनुसार, जीवमात्र के प्रति करुणा और प्रेम ही समस्त धर्मों का सार है। दया के बिना कोई भी धार्मिक आचरण सार्थक नहीं होता।

लोभ मनुष्य की संतुष्टि को समाप्त कर देता है, जिससे वह अनैतिक मार्ग अपनाने लगता है और अंततः पाप व दुखों का भागी बनता है।

हाँ, इस भजन को दैनिक ध्यान, योग या संध्या वंदन के समय सुनने से मन शांत होता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

कबीर के दोहे हमें घमंड, क्रोध और लालच से दूर रहकर सादगीपूर्ण, सत्यनिष्ठ और परोपकारी जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं।

राकेश कला जी अपनी पारंपरिक लोक शैली, मधुर स्वर और स्पष्ट उच्चारण के लिए जाने जाते हैं, जो भजनों को श्रोताओं के हृदय तक सीधे पहुँचाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह मार्गदर्शिका संत कबीरदास जी के मूल वचनों, पारंपरिक संकीर्तन परंपरा और दार्शनिक विश्लेषण के आधार पर संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इसका उद्देश्य पाठकों को कबीर वाणी के वास्तविक अर्थ से अवगत कराना और नैतिक मूल्यों के प्रति जागरूक करना है। सभी तथ्य पारंपरिक एवं प्रामाणिक स्रोतों पर आधारित हैं।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • कबीर ग्रन्थवली - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
  • कबीर बीजक - सदगुरु साहब कबीर
  • श्रीमद्भगवद्गीता - गीताप्रेस गोरखपुर
  • भारतीय संत साहित्य और लोक संगीत परंपरा

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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