bholenath bhajan lyrics मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

चेतावनी भजन

पढ़ें संगत करो नी निर्मल संत री म्हारी हेली | चेतावनी भजन का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक महत्व भक्तिलोक पर।

चेतावनी भजन एवं संत वाणी

संगत करो नी निर्मल संत री म्हारी हेली | चेतावनी भजन लिरिक्स

प्रकाशित तिथि: 2026 | लेखक: पारंपरिक राजस्थानी संत वाणी | श्रेणी: भक्ति भजन एवं आध्यात्मिक चेतना

सनातन संस्कृति और राजस्थानी लोक-संत परंपरा में 'चेतावनी भजन' जीवात्मा को संसार की नश्वरता से जगाने और परम सत्य का बोध कराने का सर्वोच्च माध्यम रहे हैं। यह अत्यंत पावन और अंतर्मन को झकझोर देने वाला भजन "संगत करो नी निर्मल संत री म्हारी हेली" साधक के भीतर छिपी सुप्त चेतना को जागृत करता है। 'हेली' शब्द का तात्पर्य यहाँ जीवात्मा या मन से है, जिसे संबोधित करते हुए संतजन संसार के माया-मोह जाल से निकलकर सच्चे संतों की संगति करने का उपदेश देते हैं। इस भजन के प्रत्येक शब्द में वैराग्य, भक्ति, आत्म-विश्लेषण और गुरु-महिमा का अनूठा संगम देखने को मिलता है। कलयुग के इस भवसागर में जहाँ हर तरफ प्रपंच और भ्रम का साम्राज्य है, वहाँ निर्मल संतों का सान्निध्य ही मनुष्य को भवबंधन से मुक्त करा सकता है। यह भजन केवल एक गीत नहीं, बल्कि मोक्ष का मार्ग दिखाने वाला आध्यात्मिक दस्तावेज है, जिसे लोक कलाकारों जैसे छोटू सिंह रावणा और अन्य पारंपरिक गायकों द्वारा अत्यंत भावपूर्ण ढंग से गाया गया है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

स्थायी (मुखड़ा):

संगत करो नी निर्मल संत री म्हारी हेली,
तर जाओगे भवजल पार री म्हारी हेली...
माया मोह में मत भूलो प्राणी,
झूठी है ये संसार री म्हारी हेली...
संगत करो नी निर्मल संत री म्हारी हेली।

पहला अंतरा:

उड़ जाएगा काग कागला, तन पिंजरे का पंछी,
कोई न तेरा मीत पियारा, सब मतलब के बंधी...
कच्ची काया माटी मिल जाएगी, मट्टी का पुतला,
क्यों अभिमान करे रे मूरख, दो दिन का है मेला...
भज ले राम नाम मन मीठा, बिसार दे सारे झमेला री म्हारी हेली।

दूसरा अंतरा:

संतों की वाणी अमृत प्याला, पी ले जो कोई प्राणी,
जन्म-मरण के बंधन छूटे, मिट जाए आनी-जानी...
गुरु मिल जाए तो ज्ञान मिले रे, खुले कपाट अज्ञाना,
हरि सुमिरन कर ले निशिदिन, यही है जीवन का पाना...
उतर पड़ेगी नौका तेरी, पकड़ ले चरण अकेला री म्हारी हेली।

तीसरा अंतरा (अन्तिम पद):

कहे कबीर सुनो भाई साधो, चेत सको तो चेतो,
सांस-सांस का लेखा भाई, खाली हाथ न मेटो...
धन-धान्य और महल खजाने, यहीं धरे रह जाएंगे,
कर्मों का फल साथ चलेगा, कर्म ही काम आएंगे...
तर जाओगे भवजल पार री म्हारी हेली, संगत करो नी निर्मल संत री म्हारी हेली।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह चेतावनी भजन मनुष्य को उसकी वास्तविक पहचान और जीवन के परम उद्देश्य की याद दिलाता है। भजन के मुखड़े में 'हेली' शब्द के माध्यम से कवि अपने मन या जीवात्मा को संबोधित कर रहा है। वह कहता है कि हे मन! यदि इस भवसागर (संसार रूपी समुद्र) से तरना है, तो तुम्हें किसी साधारण मनुष्य की नहीं, बल्कि 'निर्मल संत' (जिन्होंने अपने मन और कर्म को शुद्ध कर लिया है) की संगति करनी चाहिए। संसार की माया और भौतिक सुख-सुविधाएं क्षणिक और झूठी हैं, जो अंततः दुःख का कारण बनती हैं।

पहले अंतरे में शरीर की नश्वरता का सुंदर रूपक प्रस्तुत किया गया है। मनुष्य का शरीर एक पिंजरे के समान है और प्राण उसमें बसा हुआ पंछी है। जिस प्रकार पिंजरे का दरवाजा खुलते ही पक्षी उड़ जाता है, उसी प्रकार आयु पूरी होते ही यह प्राण-पखेरू इस नश्वर काया को छोड़कर अनंत यात्रा पर निकल जाता है। इस संसार में कोई किसी का सच्चा साथी नहीं है; सभी स्वार्थ के रिश्ते हैं। यह मिट्टी का पुतला शरीर अंततः मिट्टी में ही मिल जाना है, फिर इस पर इतना घमंड किस बात का? इसलिए मनुष्य को व्यर्थ के सांसारिक झमेलों को छोड़कर भगवान का भजन करना चाहिए।

अंतिम चरणों में संतों की वाणी को अमृत के समान बताया गया है। जो साधक गुरु के सान्निध्य में ज्ञान प्राप्त करता है, उसके जन्म-मरण के फेरे सदा के लिए समाप्त हो जाते हैं। महान संतों जैसे कबीर दास और मीराबाई की परंपरा का अनुसरण करते हुए यह भजन स्पष्ट करता है कि अंत समय में धन-सम्पत्ति या महल-खजाने साथ नहीं जाते, केवल भगवान का नाम और सत्कर्म ही जीवात्मा की सच्ची पूंजी बनते हैं।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

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    वैराग्य प्रधान रचना: यह भजन साधक के मन में वैराग्य और आत्म-मंथन की भावना पैदा करता है, जिससे वह असावधानी छोड़कर भक्ति मार्ग पर अग्रसर होता है।
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    संत महिमा: सनातन धर्म में गुरु और संत को भगवान से भी बढ़कर माना गया है। यह भजन निर्मल संतों की संगति को जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि बताता है।
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    लोक संगीत शैली: राजस्थानी लोक धुनों और देसी संकीर्तन शैली में रचित होने के कारण यह श्रोताओं के सीधे हृदय में उतर जाता है।
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    सार्वभौमिक संदेश: इसका संदेश किसी एक संप्रदाय तक सीमित न होकर संपूर्ण मानवता के लिए कल्याणकारी है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

चेतावनी भजनों और संत वाणी को सुनने का कोई निश्चित समय नहीं होता, क्योंकि चेतावनी किसी भी क्षण मनुष्य को जगा सकती है। फिर भी, आध्यात्मिक साधना की दृष्टि से ब्रह्म मुहूर्त (प्रातःकाल 4:00 से 6:00 बजे तक) या संध्याकाल का समय इसके श्रवण के लिए अत्यंत उत्तम माना गया है।

रात्रि कालीन सत्संग, जागरण, भागवत कथा, या किसी भी धार्मिक अनुष्ठान के आरंभ में इस प्रकार के भजन गाने से वातावरण पवित्र और सकारात्मक हो जाता है। इसे शांत चित्त से एकाग्र होकर सुनना चाहिए ताकि शब्दों का गहरा अर्थ मन-मस्तिष्क पर प्रभाव डाल सके। भगवान शिवजी के भजन और संकीर्तन के समान ही यह भजन भी साधक को भीतर से शुद्ध करता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / पद सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
हेली सखी, मित्र या मन आत्मा या अंतःकरण को संबोधित करने का लोक शब्द
निर्मल संत कपड़-रहित, शुद्ध चित्त महापुरुष जिनका मन भगवान में लीन हो चुका है
भवजल पार संसार रूपी समुद्र से तर जाना जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति पाना (मोक्ष)
तन पिंजरा शरीर रूपी पिंजरा जिसमें जीवात्मा रूपी पक्षी कैद है
आनी-जानी आना और जाना बार-बार जन्म लेने और मरने का चक्र

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

संत वाणी और चेतावनी भजनों के सार को समझने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता और वेदों के इन श्लोकों का स्मरण करना अत्यंत लाभदायक है:

श्लोक:

"जातस्य हि ध्रुवो मृत्युध्रुवं जन्म मृतस्य च। तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥"

अर्थात्: जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का पुनर्जन्म निश्चित है। अतः इस अपरिहार्य विषय के लिए तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।

स्मरण मंत्र:

"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" अथवा महामृत्युंजय मंत्र का निरंतर जप जीवन नश्वरता से उबारता है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम संगत करो नी निर्मल संत री म्हारी हेली
विधा चेतावनी भजन / संत वाणी / राजस्थानी लोक भजन
भाषा राजस्थानी मिश्रित हिंदी (साधु भाषा)
मुख्य भाव वैराग्य, सत्संग महिमा, चेतना और आत्म-बोध
प्रमुख कलाकार छोटू सिंह रावणा एवं अन्य लोक गायक
उपयुक्त अवसर सत्संग, जागरण, सुबह का ध्यान, एकांत साधना

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

राजस्थानी संत वाणी और भजनों में 'हेली' शब्द का प्रयोग जीवात्मा, अंतःकरण या मन को संबोधित करने के लिए किया जाता है। संत अपने मन को सखी या मित्र मानकर उसे चेतावनी देते हैं।

चेतावनी भजन मनुष्य के अहंकार और मोह को तोड़ते हैं। इन्हें सुनने से मन में वैराग्य जागृत होता है, सांसारिक दुखों से मुक्ति का मार्ग दिखता है और भगवान के चरणों में सच्ची भक्ति उत्पन्न होती है।

निर्मल संत वे महापुरुष होते हैं जिनका चित्त सांसारिक विकारों से मुक्त हो चुका होता है। उनकी संगति करने से मनुष्य के अज्ञान रूपी अंधकार का नाश होता है और सही जीवन-दर्शन प्राप्त होता है।

इस पारंपरिक भजन को छोटू सिंह रावणा सहित कई प्रसिद्ध राजस्थानी लोक कलाकारों और संकीर्तन गायकों ने अपनी मधुर आवाज में गाकर जन-जन तक पहुँचाया है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह पृष्ठ भक्तिकुल (Bhaktilok.in) के संपादकीय मंडल द्वारा सनातन संत परंपरा और लोक-साहित्य के संरक्षण व प्रसार के उद्देश्य से तैयार किया गया है। भजन के बोलों की शुद्धता और उसके दार्शनिक अर्थ को प्रामाणिक संतों के वचनों के आधार पर सरल हिंदी में प्रस्तुत किया गया है।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री।

स्रोत एवं संदर्भ

  • 1. राजस्थानी लोक-संत वाणी एवं चेतावनी भजन संग्रह।
  • 2. श्रीमद्भगवद्गीता - यथार्थ गीता एवं दार्शनिक व्याख्या।
  • 3. पारंपरिक मौखिक संकीर्तन एवं लोक कला परंपरा।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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