लोक-आस्था के महापर्व छठ पूजा की पावन परंपरा में भोजपुरी लोकगीतों और छठ गीतों का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। पवन सिंह द्वारा प्रस्तुत लोकप्रिय छठ गीत "छठ घाटे चलीं / उगी हे सूरज देव" भगवान भास्कर (सूर्य देव) और छठी मैया की भक्ति, पवित्रता तथा अनन्य समर्पण का प्रतीक है। छठ पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति, स्वच्छता, पारिवारिक आत्मीयता और लोक-संस्कृति का अद्वितीय उत्सव है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में मनाए जाने वाले इस चार दिवसीय महापर्व के दौरान नदियों और तालाबों के छठ घाटों पर गूंजते ये भक्तिमय गीत साधकों और व्रतियों के अंतर्मन को भक्ति और श्रद्धा से सराबोर कर देते हैं। इस लेख में हम पवन सिंह के इस प्रसिद्ध छठ गीत के सम्पूर्ण बोल, विस्तृत भावार्थ, सांस्कृतिक व आध्यात्मिक महत्व और इससे जुड़ी लोक-परंपराओं का विशद अध्ययन करेंगे।
सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics
मुखड़ा:
केरवा के पात पर उगेलन सुरुज देव झांकेलन झुकेलन।
कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाय॥
हाली-हाली उगी हे सुरुज देव, अरघ के बेरिया।
छठ घाटे चलीं सब परिवार, छठी माई के दुअरिया॥
अंतरा 1:
नहाय-खाय से सुरु भइल पावन बरतिया,
खरना के दिन मन निर्मल भइल अतिशया।
सज गइल दउरा, सूप और फलवा जोड़े-जोड़े,
दीया जराके हाथ जोड़िले छठी माई के गोड़े॥
हाली-हाली उगी हे सुरुज देव, अरघ के बेरिया।
छठ घाटे चलीं सब परिवार, छठी माई के दुअरिया॥
अंतरा 2:
गोद के बलकवा के दीहीं छठ माई आशीष हो,
घर-परिवार पर रखिहा सदा आपन हाथ हो।
गंगा जी के निर्मल जल में खड़े बानीं व्रती,
अस्तचल और उदयचल सूर्य के पूजा करत सती॥
हाली-हाली उगी हे सुरुज देव, अरघ के बेरिया।
छठ घाटे चलीं सब परिवार, छठी माई के दुअरिया॥
अंतरा 3:
ठेकुआ, भुसवा और नारियल सजल बा सूप में,
परम शक्ति प्रकटी हैं छठ माई के रूप में।
पवन गावे महिमा तोहार सुरुज देव गोसइयां,
पार करीं सबकर डूबत जीवन के नइयां॥
हाली-हाली उगी हे सुरुज देव, अरघ के बेरिया।
छठ घाटे चलीं सब परिवार, छठी माई के दुअरिया॥
गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth
पवन सिंह द्वारा प्रस्तुत इस पावन छठ गीत का प्रत्येक छंद लोक-आस्था और सनातन परंपरा के गहरे बोध को अभिव्यक्त करता है। गीत में छठ पूजा की पूरी यात्रा, तैयारी और भक्ति भाव का अत्यंत सजीव वर्णन किया गया है:
मुखड़ा का भावार्थ: गीत का प्रारंभ केले के पत्तों पर सूर्य देव के उदित होने की मनमोहक झांकी से होता है। व्रती और श्रद्धालु कांच के बांस से बनी बहंगी पर पूजन सामग्री लेकर छठ घाट की ओर बढ़ते हैं। बहंगी का लचीलापन और दउरा लेकर जाने का दृश्य अत्यंत कारुणिक और भक्तिमय है। भक्त सूर्य देव से प्रार्थना करते हैं कि 'हे सूर्य देव! शीघ्र उदित होइए, अब संध्या और प्रातःकालीन अर्घ्य का समय हो गया है। पूरा परिवार मिलकर छठी मैया के द्वार और पवित्र छठ घाट पर चल रहा है।'
प्रथम अंतरा का भावार्थ: इस अंतरे में छठ पर्व के अनुष्ठानिक चरणों का वर्णन है। कार्तिक शुक्ल चतुर्थी के 'नहाय-खाय' से इस कठिन व्रत का संकल्प प्रारंभ होता है। पंचमी को 'खरना' का निर्जला उपवास और सात्विक खीर-रोटी का प्रसाद ग्रहण कर मन अति निर्मल हो जाता है। षष्ठी तिथि को बांस के सूप और दउरे में जोड़े-जोड़े फल (नारियल, सेब, केला, नींबू, गागल) सजाए जाते हैं। मिट्टी के दीपक जलाकर छठी मैया के चरणों में नतमस्तक होकर वंदना की जाती है।
द्वितीय अंतरा का भावार्थ: इस अंतरे में संतान सुख, परिवार की सुख-समृद्धि और आरोग्य की मंगल कामना की गई है। छठ व्रती गंगा या पवित्र नदियों/तालाबों के जल में खड़े होकर अस्ताचलगामी (डूबते) और उदीयमान (उगते) सूर्य को अर्घ्य समर्पित करते हैं। दुनिया में केवल छठ ही ऐसा पर्व है जहाँ सबसे पहले ढलते हुए सूर्य को नमन कर अर्घ्य दिया जाता है और फिर अगले दिन प्रातः उगते सूर्य का स्वागत किया जाता है, जो जीवन के उतार-चढ़ाव में संतुलन का महान आध्यात्मिक संदेश देता है।
तृतीय अंतरा का भावार्थ: इस अंतिम भाग में छठ के विशेष महाप्रसाद 'ठेकुआ', 'खजूर' और 'भुसवा' का उल्लेख है, जो शुद्ध गेहूं के आटे, गुड़ और घी से तैयार किए जाते हैं। गायक भगवान सूर्य और छठी मैया (देवसेना) से प्रार्थना करता है कि 'हे प्रभु! आपकी महिमा अपरंपार है। आप ही संसार के प्रत्यक्ष देव हैं, हमारे जीवन की नौका को समस्त दुखों से पार लगाएं।'
गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message
छठ पर्व और इसके गीतों की मूल चेतना चार स्तंभों पर आधारित है:
- निर्मल भक्ति एवं आत्म-शुद्धि: छठ पर्व में स्वच्छता और मानसिक पवित्रता सर्वोपरि है। बिना स्पर्श दोष के पूरी निष्ठा से प्रसाद तैयार किया जाता है।
- प्रकृति एवं सूर्य उपासना: सूर्य ऊर्जा के प्रत्यक्ष स्रोत हैं। यह गीत मनुष्य और प्रकृति के आत्मीय संबंध को पुनर्स्थापित करता है।
- समानता एवं सामाजिक समरसता: छठ घाट पर जाति, वर्ग या अमीर-गरीब का भेद समाप्त हो जाता है। सभी एक साथ नदी तट पर खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करते हैं।
- कृतज्ञता का भाव: अन्न, जल, वायु और जीवन देने वाली प्रकृति एवं भगवान
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