Chhath Puja Geet मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

छठ करब आरा के घाटे (#khesari Lal Yadav)

खेसारी लाल यादव का प्रसिद्ध छठ गीत 'छठ करब आरा के घाटे' के सम्पूर्ण बोल और भावार्थ। जानिए इस पावन लोकगीत का सांस्कृतिक व भक्तिमय महत्व।

बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के सबसे पावन और महापर्व छठ पूजा का सांस्कृतिक ताना-बाना लोक गीतों के बिना अधूरा है। वर्ष 2021 में रिलीज हुआ भोजपुरी के प्रसिद्ध लोक गायक खेसारी लाल यादव (Khesari Lal Yadav) और चांदनी सिंह का सुपरहिट छठ गीत "छठ करब आरा के घाटे" (Chhath Karab Ara Ke Ghate) इसी समृद्ध परंपरा का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह गीत न केवल छठ माई के प्रति अटूट श्रद्धा और भक्ति को प्रदर्शित करता है, बल्कि यह बिहार के आरा शहर के प्रसिद्ध गंगा और तालाब घाटों की सांस्कृतिक महत्ता को भी रेखांकित करता है। इस लेख में हम इस लोकप्रिय छठ गीत के बोल, इसके गहरे आध्यात्मिक भावार्थ, सांस्कृतिक संदर्भ और महापर्व छठ की पावन परंपराओं का एक अत्यंत विस्तृत और विद्वतापूर्ण विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं। इस पावन गीत के माध्यम से हम जानेंगे कि कैसे एक लोक गीत करोड़ों श्रद्धालुओं के दिलों में भक्ति और मातृभूमि के प्रति प्रेम की अलख जगाता है।

सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics

मुखड़ा:

छठ करब आरा के घाटे, चलीं ना बलम जी।
संगे दौरा उठाईं माथे, चलीं ना बलम जी।
छठ करब आरा के घाटे, चलीं ना बलम जी।
संगे दौरा उठाईं माथे, चलीं ना बलम जी।

अंतरा 1:

कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए।
उ जे पेन्हि ना बलम जी पियरिया, दौरा माथे पर उठाए।
आरा के घाट पर लागल बा मेला, भीड़ भड़क्का भारी बा।
जल्दी से चलीं ना तs छूट जाई बेला, पूजन के तैयारी बा।
छठ करब आरा के घाटे, चलीं ना बलम जी।
संगे दौरा उठाईं माथे, चलीं ना बलम जी।

अंतरा 2:

केरवा के पात पर उगेलन सुरुज देव, झांकेलन सुरुज देव।
अरघ के बेर भईल चलीं ना बलम जी, माई के गोड़ छुईं देव।
खेसारी गावेले गीतिया पुकार के, रवि पंडित बजावेले तान जी।
चांदनी सिंह ठाढ़ बाड़ी घाट पर, करत बाड़ी गुणगान जी।
छठ करब आरा के घाटे, चलीं ना बलम जी।
संगे दौरा उठाईं माथे, चलीं ना बलम जी।

गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth

यह पावन छठ गीत एक नवविवाहिता या व्रती महिला की अपने पति से की जा रही मनुहार और भक्तिमय आग्रह पर आधारित है। गीत के माध्यम से भारतीय समाज में दांपत्य जीवन और धार्मिक कर्तव्यों के सुंदर समन्वय को दर्शाया गया है।

मुखड़े का भावार्थ:

गीत की शुरुआत में व्रती महिला अपने पति (बलम जी) से अत्यंत आदर और प्रेमपूर्वक कहती है कि इस वर्ष वह महापर्व छठ का व्रत आरा के प्रसिद्ध और पावन घाट पर करना चाहती है। वह अपने पति से आग्रह करती है कि वे उसके साथ चलें और अपने सिर पर पूजा की सामग्रियों से भरा पावन पीतल या बांस का दौरा (दउरा) उठाएं। यह दृश्य हिंदू धर्म में पति-पत्नी के साथ मिलकर धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करने की सुंदर परंपरा को दर्शाता है, जहां पति अपनी पत्नी के व्रत में पूर्ण सहयोग करता है।

प्रथम अंतरे का भावार्थ:

प्रथम अंतरे में पारंपरिक छठ गीतों की सुंदर पंक्तियों "कांच ही बांस के बहंगिया" का समावेश किया गया है। महिला कहती है कि कच्चे बांस से बनी बहंगी (दौरा ले जाने का साधन) अत्यधिक भार और श्रद्धा के कारण लचक रही है। वह अपने पति को पीले रंग के पावन वस्त्र (पियरिया) धारण करने और सिर पर दौरा उठाने के लिए कहती है। वह सचेत करती है कि आरा के घाट पर भक्तों का भारी रेला उमड़ा हुआ है और यदि वे शीघ्र नहीं चले, तो सूर्य देव को अर्घ्य देने का शुभ मुहूर्त (बेला) समाप्त हो सकता है। इसलिए वे शीघ्रता से पूजन की तैयारी करें।

द्वितीय अंतरे का भावार्थ:

द्वितीय अंतरे में प्रकृति और सूर्य उपासना का अत्यंत मनोहारी चित्रण है। "केरवा के पात पर उगेलन सुरुज देव" के माध्यम से बताया गया है कि केले के पत्तों के पीछे से भगवान भास्कर (सूर्य देव) अपनी दिव्य रश्मियों के साथ उदित हो रहे हैं। अर्घ्य देने का पावन समय आ गया है। महिला अपने पति से कहती है कि वे घाट पर चलकर सूर्य देव और छठ माई को अर्घ्य दें और उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करें। गीत के अंत में कलाकारों (खेसारी लाल यादव, चांदनी सिंह और रवि पंडित) का उल्लेख करते हुए छठ माई की महिमा का सामूहिक गुणगान किया गया है।

गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message

इस गीत की मुख्य भावना पूर्ण समर्पण, शुचिता और पारिवारिक एकता है। छठ पूजा केवल एक व्यक्तिगत व्रत नहीं है, बल्कि यह पूरे परिवार और समाज को एक सूत्र में पिरोने वाला महापर्व है। इस गीत के माध्यम से निम्नलिखित मुख्य संदेश दिए गए हैं:

  • पारिवारिक सहभागिता: गीत में पत्नी द्वारा पति से दौरा उठाने का आग्रह यह दर्शाता है कि कठिन व्रतों में परिवार के प्रत्येक सदस्य, विशेषकर जीवनसाथी का सहयोग अनिवार्य है।
  • प्रकृति के प्रति कृतज्ञता: बांस की बहंगी, केले के पत्ते और सूर्य देव का वर्णन यह संदेश देता है कि मानव जीवन पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर है और हमें इसके प्रति सदैव कृतज्ञ रहना चाहिए।
  • सांस्कृतिक गौरव: "आरा के घाट" का उल्लेख स्थानीय संस्कृति, मिट्टी की सुगंध और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की भावना को सुदृढ़ करता है।

गीत की जानकारी | Song Information

विवरण क्षेत्र (Field) जानकारी (Information)
गीत का नाम (Song Name) छठ करब आरा के घाटे (Chhath Karab Ara Ke Ghate)
मुख्य गायक (Singer) खेसारी लाल यादव (Khesari Lal Yadav)
सह-कलाकार (Featuring) चांदनी सिंह (Chandni Singh)
निर्देशक (Director) रवि पंडित (Ravi Pandit)
रिलीज वर्ष (Release Year) 2021
भाषा (Language) भोजपुरी (Bhojpuri)
श्रेणी (Category) छठ पूजा लोक गीत (Chhath Puja Devotional Song)
मुख्य विषय (Theme) छठ व्रत, सूर्य उपासना, पारिवारिक सहयोग

गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators

इस गीत की सफलता के पीछे भोजपुरी फिल्म जगत के दिग्गज कलाकारों का सामूहिक प्रयास है:

  • खेसारी लाल यादव: अपनी मखमली और भावुक आवाज के लिए प्रसिद्ध खेसारी लाल यादव ने इस गीत में भक्ति के रसों को अत्यंत खूबसूरती से पिरोया है। उनकी गायकी में मिट्टी की सोंधी महक और छठ पर्व की पारंपरिक तड़प साफ महसूस होती है।
  • चांदनी सिंह: अभिनेत्री चांदनी सिंह ने इस गीत के वीडियो में एक पारंपरिक बिहारी बहू और व्रती महिला का जीवंत अभिनय किया है। उनके हाव-भाव और सादगी ने दर्शकों का दिल जीत लिया।
  • रवि पंडित: प्रसिद्ध निर्देशक रवि पंडित ने इस गीत के दृश्यों को अत्यंत भव्य और पारंपरिक तरीके से फिल्माया है, जिससे दर्शक सीधे तौर पर छठ घाट के पावन वातावरण से जुड़ जाते हैं।

कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings

कठिन शब्द (Word) सरल हिंदी अर्थ (Meaning) सांस्कृतिक संदर्भ (Context)
दौरा / दउरा बांस की बड़ी टोकरी इसमें छठ पूजा का प्रसाद (ठेकुआ, फल आदि) रखकर घाट पर ले जाया जाता है।
बहंगिया / बहंगी बांस का बना हुआ कांवड़ दौरे को दोनों तरफ लटकाकर कंधे पर ढोने के लिए प्रयुक्त होने वाला साधन।
पियरिया पीले रंग का पावन वस्त्र छठ पूजा के दौरान पुरुषों और महिलाओं द्वारा पहने जाने वाला शुभ वस्त्र।
बेला समय या मुहूर्त सूर्य देव को अर्घ्य देने का अत्यंत पवित्र और निश्चित समय।
अरघ / अर्घ्य जल या दूध की अंजलि देना अस्ताचलगामी और उदीयमान सूर्य को श्रद्धापूर्वक जल अर्पित करने की क्रिया।
बलम जी पतिदेव / स्वामी दांपत्य जीवन में आदरसूचक और प्रेमपूर्ण संबोधन।

गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance

महापर्व छठ केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि एक कठिन साधना है। इस साधना में लोक गीतों का महत्व सर्वोपरि है। "छठ करब आरा के घाटे" जैसे आधुनिक लोक गीत पारंपरिक मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक सशक्त माध्यम हैं।

हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, सूर्य प्रत्यक्ष देवता हैं जो संपूर्ण जगत को ऊर्जा और जीवन प्रदान करते हैं। छठ पूजा के दौरान सूर्य देव और उनकी शक्ति 'षष्ठी देवी' (छठ माई) की पूजा की जाती है। इस गीत में प्रयुक्त शब्द जैसे "सुरुज देव" और "छठ माई" सीधे तौर पर ऋग्वैदिक काल की सूर्य उपासना पद्धति से जुड़े हैं। जब कोई भक्त इस गीत को सुनता है, तो उसके भीतर छठ पूजा व्रत कथा के प्रति श्रद्धा और गहरी हो जाती है।

गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons

यह गीत केवल मनोरंजन या भक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमें कई महत्वपूर्ण जीवन मूल्य भी सिखाता है:

  1. सहयोग की भावना: जीवन के हर कठिन मार्ग पर यदि जीवनसाथी और परिवार का साथ हो, तो बड़ी से बड़ी साधना भी सरल हो जाती है।
  2. सादगी और पवित्रता: बांस, मिट्टी के दीये, केले के पत्ते और घर के बने प्रसाद (ठेकुआ) का उपयोग यह सिखाता है कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए आडंबर की नहीं, बल्कि शुद्ध अंतःकरण और सादगी की आवश्यकता होती है।
  3. समय का प्रबंधन: "जल्दी से चलीं ना तs छूट जाई बेला" यह सिखाता है कि जीवन में हर महत्वपूर्ण कार्य को सही समय पर करना कितना आवश्यक है।

गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing

यद्यपि छठ के गीत कार्तिक मास के प्रारंभ होते ही हर घर में गूंजने लगते हैं, लेकिन इस गीत को सुनने और गाने के विशेष अवसर निम्नलिखित हैं:

  • नहाय-खाय (प्रथम दिन): इस दिन व्रती महिलाएं और परिवार के सदस्य घर की सफाई कर पवित्र भोजन ग्रहण करते हैं और भक्तिमय गीतों की शुरुआत करते हैं।
  • खरना (द्वितीय दिन): इस दिन शाम को प्रसाद ग्रहण करने के बाद से ही घरों में ऐसे मधुर गीत बजने लगते हैं।
  • संध्या अर्घ्य (तृतीय दिन): जब पूरा परिवार दौरा उठाकर घाट की ओर प्रस्थान करता है, तब यह गीत अत्यंत प्रासंगिक और उत्साहवर्धक प्रतीत होता है।
  • उषा अर्घ्य (चतुर्थ दिन): सुबह के समय उगते सूर्य को अर्घ्य देते समय घाटों पर इस गीत की गूंज एक अद्भुत आध्यात्मिक वातावरण का निर्माण करती है। आप इस पावन अवसर पर सूर्य देव की आरती का भी श्रवण कर सकते हैं।

एक नजर में गीत की जानकारी | Song at a Glance

मुख्य बिंदु (Key Point) संक्षिप्त विवरण (Quick Details)
गीत का शीर्षक छठ करब आरा के घाटे
मुख्य स्वर खेसारी लाल यादव
अभिनय चांदनी सिंह
मुख्य वाद्य यंत्र ढोलक, मंजीरा, सिंथेसाइज़र, बांसुरी
मुख्य रस भक्ति रस, वात्सल्य रस
प्रासंगिकता कार्तिक मास, छठ महापर्व
संबंधित पूजा सामग्री दौरा, सूप, नारियल, ठेकुआ, फल (विस्तृत सूची के लिए देखें: छठ पूजा सामग्री सूची)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस अत्यंत लोकप्रिय छठ गीत के मुख्य गायक भोजपुरी जगत के प्रसिद्ध लोक कलाकार और अभिनेता खेसारी लाल यादव हैं।

बिहार का आरा शहर ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से अत्यंत समृद्ध है। यहां के गंगा घाट और प्राचीन तालाबों पर होने वाली छठ पूजा अत्यंत भव्य होती है। यह गीत उसी स्थानीय श्रद्धा और गौरव को प्रदर्शित करता है।

छठ पूजा में दौरा (बांस की टोकरी) में पूजा की सभी पवित्र सामग्रियां जैसे ठेकुआ, फल, ईख आदि रखी जाती हैं। परिवार का पुरुष सदस्य या स्वयं व्रती इसे अपने सिर पर उठाकर श्रद्धापूर्वक घाट तक ले जाता है। इसे अत्यंत शुभ और सेवा का कार्य माना जाता है।

यह पंक्ति पारंपरिक छठ गीतों की आत्मा है। इसका अर्थ है कि कच्चे और लचीले बांस से बनी बहंगी (कांवड़) इतनी पवित्र और भारी है कि वह श्रद्धा के भार से लचक रही है। यह प्रकृति और मनुष्य के सीधे संबंध को दर्शाती है।

सनातन धर्म में पीला रंग ज्ञान, पवित्रता, ऊर्जा और सूर्य देव का प्रतीक माना जाता है। इसलिए छठ पूजा के दौरान व्रती और उनके सहयोगी पीले रंग के सूती वस्त्र धारण करते हैं ताकि शुचिता बनी रहे।

नहीं, यह गीत पूरे भारत और विदेशों में रहने वाले प्रवासी भोजपुरी समाज (जैसे मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, नेपाल आदि) के बीच भी अत्यंत चाव से सुना जाता है। यह गीत उन्हें अपनी मातृभूमि की याद दिलाता है।

इस गीत के आधिकारिक वीडियो में प्रसिद्ध भोजपुरी अभिनेत्री चांदनी सिंह ने मुख्य भूमिका निभाई है, जिन्होंने एक आदर्श व्रती महिला का सुंदर अभिनय किया है।

छठ पूजा के तीसरे दिन संध्याकाल में अस्ताचलगामी (डूबते) सूर्य को और चौथे दिन प्रातःकाल में उदीयमान (उगते) सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इसके लिए आप छठ पूजा शुभ मुहूर्त की जानकारी देख सकते हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस गीत के बोल और इसके सांस्कृतिक संदर्भों को लोक परंपराओं, प्रामाणिक भोजपुरी गीतों के संकलन और बिहार की स्थानीय छठ पूजा पद्धतियों के गहन अध्ययन के बाद तैयार किया गया है। गीत के माध्यम से आधुनिक पीढ़ी को अपनी लोक संस्कृति और पावन पर्वों के प्रति जागरूक करने का एक विनम्र प्रयास किया गया है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • बिहार की लोक संस्कृति और पारंपरिक छठ गीत संग्रह।
  • श्रीमद्भागवत पुराण एवं भविष्य पुराण (सूर्य उपासना खंड)।
  • भोजपुरी लोक संगीत अकादमी और क्षेत्रीय सांस्कृतिक अध्ययन।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 10 Oct 2026

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