Krishna Bhajan मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

सतसंगी भजनों का आनंद लें तू ही दाता तू ही विधाता भजन इन हिंदी लिरिक्स

पढ़ें सतसंगी भजनों का आनंद लें तू ही दाता तू ही विधाता भजन इन हिंदी लिरिक्स का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक महत्व भक्

संपूर्ण मार्गदर्शिका

सनातन धर्म की समृद्ध आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में संकीर्तन और प्रभु नाम स्मरण का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। "सतसंगी भजनों का आनंद लें तू ही दाता तू ही विधाता भजन इन हिंदी लिरिक्स" केवल शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह जीवात्मा और परमात्मा के बीच के अगाध प्रेम, अनन्य भक्ति और पूर्ण शरणागति का जीवंत प्रतीक है। सनातन परंपरा के अनुसार, कलियुग में भगवान के नाम का संकीर्तन ही भवसागर से पार उतरने का सबसे सुगम और शक्तिशाली साधन माना गया है। इस पवित्र भजन के माध्यम से साधक अपने अंतर्मन की चंचलता को शांत कर परम सत्ता के चरणों में ध्यानमग्न होता है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम इस पावन भजन के संपूर्ण बोल, इसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ, भावार्थ, गायन की विधि, और जीवन में इसके महत्व का विस्तार से अध्ययन करेंगे। यदि आप भगवान श्री कृष्ण और सनातन संस्कृति के अन्य पावन भजनों से जुड़ना चाहते हैं, तो हमारे श्री कृष्ण भजन लिरिक्स संग्रह का अन्वेषण कर सकते हैं, जो आपके भक्ति मार्ग को और अधिक प्रशस्त करेगा।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

मुखड़ा:

तू ही दाता तू ही विधाता, हे प्रभु तेरा नाम अपारा,
इस जीवन की नैया का तू ही है खेवनहारा।
तू ही दाता तू ही विधाता...

अंतरा 1:

कौन जाने तेरी माया, कौन जाने तेरी लीला,
रंग में तेरे रंगी दुनिया, जैसे रूप रंगीली छबीला।
जो शरण तुम्हारी आता, उसका दुःख टल जाता,
तू ही दाता तू ही विधाता, हे प्रभु तेरा नाम अपारा।

अंतरा 2:

सुख में सुमिरन सब कोई करे, दुःख में करे न कोय,
जो दुःख में सुमिरन करे, उसका अमंगल कभी न होय।
तेरी कृपा से प्रभु जी, हर संकट मिट जाता,
तू ही दाता तू ही विधाता, हे प्रभु तेरा नाम अपारा।

अंतरा 3:

घाट-घाट के वासी तू ही, अंतर्यामी भगवान,
तेरे चरणों की धूलि से पावन हो संसार महान।
भक्त जनों के हितकारी, तू ही भाग्य विधाता,
तू ही दाता तू ही विधाता, हे प्रभु तेरा नाम अपारा।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह पावन भजन साधक की भगवान के प्रति अनन्य भावना और उनके सर्वशक्तिमान स्वरूप को समर्पित है। भजन की पहली पंक्ति "तू ही दाता तू ही विधाता" इस सत्य को उजागर करती है कि इस ब्रह्मांड में देने वाले (दाता) और संपूर्ण सृष्टि का विधान रचने वाले (विधाता) केवल परमेश्वर ही हैं। संसार में मनुष्य कई प्रकार के कर्म करता है और भौतिक सुख-सुविधाओं के पीछे भागता है, परंतु जब वह संकट में घिरता है, तब उसे इस बात का अहसास होता है कि उसकी नैया को पार लगाने वाला एकमात्र वही परमात्मा है।

भजन के अंतरा भागों में इस बात पर विशेष बल दिया गया है कि भगवान की लीला और माया को समझ पाना साधारण मनुष्य के लिए असंभव है। जो भी प्राणी सच्चे मन से प्रभु की शरण में आता है, उसके सभी कष्ट स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं। इसके साथ ही, यह भजन हमें सुख और दुःख दोनों ही परिस्थितियों में ईश्वर का स्मरण करने की प्रेरणा देता है। जैसा कि श्रीमद्भगवद्गीता के संदेश में भी स्पष्ट किया गया है कि निरंतर ईश्वर में मन लगाने वाले भक्तों के योगक्षेम का भार स्वयं भगवान उठाते हैं। यह भजन हमारे भीतर की स्वार्थ की भावना को समाप्त कर परम प्रेम और भक्ति का संचार करता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन का मुख्य उद्देश्य साधक के मन को सांसारिक मोह-माया से हटाकर दिव्यता की ओर आकर्षित करना है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • पूर्ण शरणागति (Surrender): भजन जीव को यह सिखाता है कि वह अपने अहंकार का त्याग कर पूरी तरह ईश्वर पर भरोसा करे।
  • नाम स्मरण की महिमा: कलियुग में केवल प्रभु का नाम जपने मात्र से मनुष्य को आंतरिक शांति और मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है।
  • मानसिक शांति: इस प्रकार के सतसंगी भजनों का श्रवण करने से तनाव, चिंता और मानसिक अशांति दूर होती है।
  • भक्ति रस का संचार: यह भजन श्रोता और गायक दोनों के हृदय में भगवान के प्रति प्रेम और करुणा के भाव जागृत करता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

भजन और संकीर्तन के लिए मन और वातावरण दोनों का पवित्र होना आवश्यक है। इस भजन को गाने और सुनने के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन किया जा सकता है:

  • उत्तम समय: प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में या संध्याकाल के समय जब पूजा-आरती का समय होता है, तब इस भजन का गान अत्यंत फलदायी माना गया है।
  • स्थान: घर के पूजा गृह में, मंदिर में या किसी भी सत्संग और धार्मिक अनुष्ठान के दौरान इसे सामूहिक या व्यक्तिगत रूप से गाया जा सकता है।
  • विधि: स्नान आदि से निवृत्त होकर, आसन पर बैठकर, दीप प्रज्वलित कर एकाग्रचित्त होकर इस भजन का पाठ या गान करना चाहिए।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्री कृष्ण, विष्णु जी और संपूर्ण ब्रह्मांड के पालनहार परमेश्वर को समर्पित है। सनातन परंपरा में संत कबीर, सूरदास, तुलसीदास और मीराबाई जैसे महान संतों ने भी इसी प्रकार के भजनों के माध्यम से समाज को भक्ति का मार्ग दिखाया है। भगवान श्री कृष्ण के जीवन चरित्र और उनकी गीता के उपदेशों में भी दाता और विधाता के रूप में परमेश्वर की सर्वव्यापकता को स्वीकारा गया है। भगवान के विभिन्न स्वरूपों और उनकी लीलाओं के बारे में अधिक जानने के लिए आप हमारे श्री कृष्ण पावन लीला प्रसंग लेख को पढ़ सकते हैं।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

संत-साहित्य और पारंपरिक लोक भजनों की श्रृंखला में इस प्रकार के गीत सदियों से गाए जाते रहे हैं। इनकी रचना का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों के सामान्य जनमानस तक वेदों और उपनिषदों के गूढ़ सत्यों को सरल हिंदी और संगीत के माध्यम से पहुँचाना था। मौखिक परंपरा (Oral Tradition) के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचते हुए इन भजनों ने सनातन संस्कृति को जीवित रखने में अभूतपूर्व योगदान दिया है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा बहुत ही सरल, सहज और मधुर हिंदी है, जिसे आसानी से समझा और गाया जा सकता है। इसमें ब्रज और अवधी भाषा के शब्दों का सुंदर मिश्रण भी देखने को मिलता है। काव्य शैली की दृष्टि से इसमें तुकबंदी (Rhyme Scheme) का बहुत सुंदर प्रयोग किया गया है, जो संगीत की ताल के साथ बहुत आसानी से बैठ जाता है। रूपक और अनुप्रास अलंकारों का सहज प्रयोग इस भजन की साहित्यिक सुंदरता को और अधिक बढ़ाता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें जीवन जीने की एक नई कला सिखाता है:

  • अहंकार का त्याग: मनुष्य को अपने बल और बुद्धि पर घमंड न करके ईश्वर की कृपा को सर्वोपरि मानना चाहिए।
  • धैर्य और सहनशीलता: जीवन में आने वाले दुखों का सामना ईश्वर पर अटूट विश्वास रखकर करना चाहिए।
  • परस्पर प्रेम और सेवा: घाट-घाट में उसी एक परमात्मा का वास मानकर सभी जीवों के प्रति दया भाव रखना चाहिए।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
दाता देने वाला, पोषण करने वाला ईश्वर जो सभी जीवों को अन्न, जल और जीवन प्रदान करता है।
विधाता भाग्य विधाता, विधा रचने वाला वह शक्ति जो संपूर्ण ब्रह्मांड के कर्म और भाग्य का विधान तय करती है।
खेवनहारा नाव पार लगाने वाला संसार रूपी भवसागर से पार उतारने वाला सद्गुरु या परमात्मा।
अंतर्यामी सबके मन की बात जानने वाला वह परम सत्ता जो हमारे हर गुप्त विचार और भावना से अवगत है।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"तू ही दाता तू ही विधाता, हे प्रभु तेरा नाम अपारा"
इस पंक्ति का भाव यह है कि हे ईश्वर! इस संसार में जितने भी भौतिक और आध्यात्मिक पदार्थ हैं, उन सबके प्रदाता आप ही हैं। आपके नाम की महिमा अपरंपार है, जिसका कोई अंत नहीं है।

"इस जीवन की नैया का तू ही है खेवनहारा"
मानव जीवन एक नदी की तरह है, और यह शरीर एक नाव है। इस जीवन रूपी नौका को संसार के विकारों और तूफानों से बचाकर सुरक्षित किनारे यानी मोक्ष तक पहुँचाने वाले केवल आप ही हैं।

"सुख में सुमिरन सब कोई करे, दुःख में करे न कोय"
संसार की यह विडंबना है कि मनुष्य जबसुखी होता है, तब वह अपनी मस्ती में मस्त रहता है और भगवान को भूल जाता है। परंतु जो व्यक्ति विपत्ति के समय भी प्रभु का स्मरण करता है, वह कभी दुखी नहीं होता।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के प्रसंग में निम्नलिखित पावन श्लोक का स्मरण करना अत्यंत लाभप्रद है:

सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्।।

(श्री श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 15, श्लोक 15)

अर्थ: मैं ही सब जीवों के हृदय में स्थित हूँ, मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और इनका विस्मरण होता है। सभी वेदों द्वारा जानने योग्य, वेदों का रचयिता और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूँ।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम तू ही दाता तू ही विधाता (Tu Hi Data Tu Hi Vidhata)
समर्पित देवता भगवान श्री कृष्ण / परमेश्वर
भाषा सरल हिंदी / ब्रज प्राकृत प्रभाव
मुख्य विषय भक्ति, शरणागति और नाम स्मरण
भाव (Bhava) समर्पण, विनय और अगाध प्रेम
उपयुक्त अवसर सत्संग, प्रातःकालीन वंदना, दैनिक पूजा

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्ना 1: "तू ही दाता तू ही विधाता" भजन मुख्य रूप से किस भावना पर आधारित है?
उत्तर: यह भजन ईश्वर के प्रति पूर्ण शरणागति, उनके सर्वशक्तिमान स्वरूप और नाम स्मरण की महिमा पर आधारित है।

प्रश्ना 2: इस भजन को किस समय गाना सबसे उत्तम माना जाता है?
उत्तर: इस भजन को प्रातःकाल की पूजा के समय या संध्याकालीन आरती के पश्चात शांत चित्त से गाना सबसे उत्तम माना जाता है।

प्रश्ना 3: क्या यह भजन घर पर होने वाले सत्संग में गाया जा सकता है?
उत्तर: हाँ, यह भजन अत्यंत मधुर और सरल है, इसलिए इसे घर के सत्संग, भजन संध्या और धार्मिक आयोजनों में आसानी से गाया जा सकता है।

प्रश्ना 4: इस भजन के गायन से मानसिक शांति कैसे मिलती है?
उत्तर: जब हम भगवान के गुणों और उनकी विशालता का गुणगान करते हैं, तो हमारे मन की चिंताएं और तनाव कम होने लगते हैं, जिससे आंतरिक शांति प्राप्त होती है।

प्रश्ना 5: क्या इस भजन को बच्चे भी आसानी से याद कर सकते हैं?
उत्तर: हाँ, इसकी शब्दावली बहुत ही सरल और लयबद्ध है, जिसे बच्चे बहुत कम समय में याद कर सकते हैं।

प्रश्ना 6: सनातन धर्म में 'दाता' और 'विधाता' शब्द किसके लिए प्रयोग किए जाते हैं?
उत्तर: सनातन धर्म में ये शब्द पालनहार भगवान विष्णु, श्री कृष्ण और संपूर्ण ब्रह्मांड के रचयिता परमेश्वर के लिए प्रयोग किए जाते हैं।

प्रश्ना 7: संकीर्तन करने से जीवन में क्या लाभ होता है?
उत्तर: संकीर्तन करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, पापों का नाश होता है और भगवान के चरणों में चित्त स्थिर होता है।

प्रश्ना 8: क्या इस भजन से संबंधित कोई विशेष नियम है?
उत्तर: इसके लिए कोई कठोर नियम नहीं है, परंतु इसे शुद्ध उच्चारण और पवित्र भाव के साथ गाना चाहिए।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख हमारे विद्वान आचार्यों और भक्ति साहित्य के जानकारों द्वारा सनातन परंपरा, लोक भजनों के संकलन और आध्यात्मिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। सामग्री की सटीकता और प्रामाणिकता बनाए रखने के लिए धार्मिक ग्रंथों और पारंपरिक स्रोतों का सहारा लिया गया है। यह सामग्री पूरी तरह से संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसका उद्देश्य पाठकों को शुद्ध भक्ति रस से जोड़ना है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भगवद्गीता - गीताप्रेस गोरखपुर
  • सनातन भक्ति साहित्य एवं पारंपरिक लोक भजन संग्रह
  • वैदिक संकीर्तन और नाम महिमा ग्रंथ

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 10 Oct 2026

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