Krishna Bhajan मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

छोड़ो कलाई नंदलाला भजन इन हिंदी लिरिक्स

पढ़ें छोड़ो कलाई नंदलाला भजन इन हिंदी लिरिक्स का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक महत्व भक्तिलोक पर।

"छोड़ो कलाई नंदलाला" एक अत्यंत लोकप्रिय और भावपूर्ण कृष्ण भजन है, जो ब्रज की पावन भूमि की मधुर लीलाओं और गोपियों के निश्छल प्रेम को जीवंत करता है। यह भजन मुख्य रूप से 'माधुर्य भाव' (Sweet Devotion) पर आधारित है, जहाँ भक्त और भगवान के बीच का संबंध औपचारिकता से परे, अत्यंत आत्मीय और प्रेमपूर्ण है। इस भजन में एक गोपी और नटखट श्री कृष्ण (नंदलाला) के बीच के उस मधुर संवाद का चित्रण है, जहाँ गोपी लोक-लाज और सामाजिक मर्यादाओं का वास्ता देकर अपनी कलाई छुड़ाने की मनुहार करती है, किंतु उसका हृदय पूरी तरह से गोविंद के चरणों में समर्पित है। यह भजन केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि जीवात्मा (गोपी) और परमात्मा (कृष्ण) के बीच के उस शाश्वत आकर्षण का प्रतीक है, जिसे 'रास' और 'लीला' कहा जाता है। विशेष रूप से जन्माष्टमी, राधाष्टमी और फाल्गुन के उत्सवों पर गाया जाने वाला यह भजन श्रोताओं को द्वापर युग की उन गलियों में ले जाता है जहाँ कण-कण में 'राधे-कृष्ण' की गूँज व्याप्त है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

मुखड़ा

छोड़ो कलाई नंदलाला, मुझे घर भी जाना है,
छोड़ो कलाई नंदलाला, मुझे घर भी जाना है।
देर भई मोहे सासु लड़ेगी, ननद करेगी हल्ला,
छोड़ो कलाई नंदलाला, मुझे घर भी जाना है॥

अंतरा - 1

यमुना तट पर तुम आए हो, मुरली मधुर बजाते हो,
रास रचाकर गोपियों संग, मन को क्यों ललचाते हो?
पकड़ के मेरी चुनरिया, क्यों करते हो झमेला,
छोड़ो कलाई नंदलाला, मुझे घर भी जाना है॥

अंतरा - 2

माखन चोर कहाते हो तुम, चोरी करते हो दिन-रात,
ग्वाल-बाल सब ढूँढ रहे हैं, तुम करते हो ये क्या बात?
पनघट पर तुम रोक रहे हो, मेरा रास्ता अकेला,
छोड़ो कलाई नंदलाला, मुझे घर भी जाना है॥

अंतरा - 3

लोक-लाज का डर है मुझको, तुम तो हो नटखट गिरधारी,
सब सखियाँ अब देख रही हैं, हँसती हैं ये दुनिया सारी।
'भक्त' कहे प्रभु विनती सुन लो, कर दो अब तो भला,
छोड़ो कलाई नंदलाला, मुझे घर भी जाना है॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस भजन का भावार्थ अत्यंत गहरा और आध्यात्मिक है। यहाँ 'कलाई पकड़ना' केवल एक शारीरिक क्रिया नहीं है, बल्कि भगवान द्वारा भक्त को अपनी शरण में लेने का प्रतीक है। गोपी कहती है, "हे नंदलाला! मेरी कलाई छोड़ दो, क्योंकि मुझे घर जाना है।" यहाँ 'घर' सांसारिक कर्तव्यों और मोह-माया का प्रतीक है, जबकि 'नंदलाला' परम सत्य हैं।

गोपी अपनी सामाजिक स्थिति का वर्णन करते हुए कहती है कि यदि उसे देर हुई तो उसकी सास उसे डांटेगी और ननद शोर मचाएगी। यह भक्त के जीवन में आने वाली उन बाधाओं को दर्शाता है जो उसे भक्ति मार्ग से विचलित करने का प्रयास करती हैं। यमुना तट और मुरली की ध्वनि उस दिव्य वातावरण का सृजन करती है जहाँ आत्मा परमात्मा से मिलने के लिए व्याकुल होती है। जब गोपी कहती है कि "तुम माखन चोर हो", तो इसका अर्थ है कि श्री कृष्ण भक्तों के हृदय (माखन) को चुरा लेते हैं। अंत में, गोपी लोक-लाज की बात करती है, जो इस बात का संकेत है कि पूर्ण समर्पण के मार्ग में 'अहंकार' और 'समाज का भय' सबसे बड़ी बाधा है। यह भजन सिखाता है कि भले ही हम संसार में रहें, लेकिन हमारा मन सदैव उस नंदलाला की पकड़ में होना चाहिए।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

  • माधुर्य भक्ति: यह भजन भगवान के प्रति प्रेम और मधुरता के भाव को प्रकट करता है।
  • ब्रज संस्कृति का दर्शन: इसमें यमुना तट, पनघट, माखन चोरी और लोक-लाज जैसे शब्दों के माध्यम से ब्रज की संस्कृति को दर्शाया गया है।
  • जीवात्मा और परमात्मा का संवाद: गोपी जीवात्मा का प्रतीक है और कृष्ण परमात्मा का। यह भजन उनके बीच के शाश्वत प्रेम को दर्शाता है।
  • समर्पण का भाव: यद्यपि गोपी कलाई छोड़ने को कहती है, परंतु उसके शब्दों में एक अनूठा आकर्षण और समर्पण छिपा है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन को गाने और सुनने के लिए कोई कठोर नियम नहीं हैं, क्योंकि भक्ति हृदय का विषय है। फिर भी, निम्नलिखित समय और विधियाँ इसे और अधिक प्रभावशाली बनाती हैं:

  • संध्या काल: शाम के समय मंदिर या घर में दीपक जलाकर इस भजन का गायन मन को शांति प्रदान करता है।
  • सत्संग और कीर्तन: सामूहिक रूप से ढोलक और मंजीरे के साथ इसे गाने से वातावरण भक्तिमय हो जाता है।
  • विशेष अवसर: जन्माष्टमी, होली और राधाष्टमी के पावन पर्वों पर यह भजन विशेष रूप से गाया जाता है।
  • भावपूर्ण गायन: इसे गाते समय मन में श्री कृष्ण की बाल लीलाओं या रास लीला का ध्यान करना चाहिए।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन पूर्णतः भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है। श्री कृष्ण, जिन्हें 'नंदलाला', 'गिरधारी' और 'माखन चोर' जैसे नामों से पुकारा गया है, इस भजन के केंद्र में हैं। ब्रज के संतों, जैसे सूरदास, रसखान और मीराबाई की परंपरा में ऐसे पदों की रचना प्रचुर मात्रा में मिलती है। यद्यपि इस विशिष्ट भजन के आधुनिक संस्करण कई लोक गायकों द्वारा गाए गए हैं, लेकिन इसकी आत्मा प्राचीन 'अष्टछाप' कवियों की रचनाओं से मेल खाती है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल 'ब्रज मिश्रित हिंदी' है, जो जनमानस के लिए अत्यंत सुलभ है। इसमें 'नंदलाला', 'पनघट', 'चुनरिया' और 'झमेला' जैसे शब्दों का प्रयोग इसे ग्रामीण और पारंपरिक स्पर्श देता है। काव्य शैली की दृष्टि से यह एक 'पद' है, जिसमें लय और ताल का सुंदर समन्वय है। इसमें अनुप्रास और रूपक अलंकार का सहज प्रयोग देखने को मिलता है, जो इसके माधुर्य को बढ़ाता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द/वाक्यांश सरल अर्थ संदर्भ/महत्व
नंदलाला नंद बाबा के पुत्र (कृष्ण) वात्सल्य और प्रेम का संबोधन।
कलाई पकड़ना हाथ थामना भगवान द्वारा भक्त को सहारा देना या अपनी ओर खींचना।
पनघट पानी भरने का स्थान यमुना किनारे की वह जगह जहाँ कृष्ण लीलाएँ करते थे।
लोक-लाज सामाजिक मर्यादा/शर्म भक्ति मार्ग में आने वाली सामाजिक बाधाएँ।
चुनरिया ओढ़नी भक्त के मान-सम्मान या अहंकार का प्रतीक।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"छोड़ो कलाई नंदलाला, मुझे घर भी जाना है" - यहाँ भक्त कहता है कि हे प्रभु, अब मुझे संसार की ओर लौटने दो, क्योंकि मेरी जिम्मेदारियाँ मुझे बुला रही हैं।

"देर भई मोहे सासु लड़ेगी, ननद करेगी हल्ला" - सांसारिक संबंध और समाज के लोग भक्ति में बाधा बनते हैं और आलोचना करते हैं, गोपी उसी का वर्णन कर रही है।

"यमुना तट पर तुम आए हो, मुरली मधुर बजाते हो" - भगवान की कृपा और उनकी दिव्य वाणी (मुरली) भक्त को अपनी ओर आकर्षित करती है।

"माखन चोर कहाते हो तुम, चोरी करते हो दिन-रात" - कृष्ण केवल माखन नहीं, बल्कि अपने भक्तों के पाप और उनके चित्त को भी चुरा लेते हैं।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के भाव को पुष्ट करने के लिए निम्नलिखित मंत्रों का जाप किया जा सकता है:

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

श्री कृष्णः शरणं मम

श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक भी इस समर्पण को दर्शाता है:

"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामी मा शुचः॥"

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम छोड़ो कलाई नंदलाला
मुख्य देवता भगवान श्री कृष्ण
विषय/थीम कृष्ण लीला, गोपी संवाद
भक्ति भाव माधुर्य भाव (प्रेम और मनुहार)
उपयुक्त अवसर जन्माष्टमी, सत्संग, दैनिक पूजा
भाषा हिंदी/ब्रजभाषा

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इसका मुख्य संदेश जीवात्मा का परमात्मा के प्रति अनन्य प्रेम और समर्पण है, जहाँ भक्त सांसारिक बाधाओं के बावजूद ईश्वर की ओर खिंचा चला जाता है।

आध्यात्मिक रूप से, इसका अर्थ है भगवान द्वारा भक्त का हाथ थामना और उसे संसार रूपी सागर से उबारने के लिए अपनी शरण में लेना।

हाँ, यह जन्माष्टमी के उत्सव के लिए सबसे उपयुक्त भजनों में से एक है क्योंकि यह श्री कृष्ण की बाल और किशोर लीलाओं का स्मरण कराता है।

यह भजन सरल हिंदी में है, जिसमें ब्रजभाषा के शब्दों का पुट है, जो इसे अधिक मधुर और पारंपरिक बनाता है।

'नंद' का अर्थ है नंद बाबा और 'लाला' का अर्थ है पुत्र। अर्थात नंद बाबा के प्रिय पुत्र श्री कृष्ण।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह सामग्री भक्तिलोक के विद्वानों द्वारा आध्यात्मिक ग्रंथों और ब्रज की मौखिक परंपराओं के आधार पर तैयार की गई है। इस भजन की व्याख्या में 'श्रीमद्भागवत पुराण' के रास पंचाध्यायी के भावों को सम्मिलित किया गया है।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री। अपडेट तिथि: अक्टूबर 2023।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भागवत महापुराण (दशम स्कंध)
  • ब्रज भक्ति परंपरा और लोक साहित्य
  • अष्टछाप कवियों की पदावली

संबंधित भजन एवं लेख

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 09 Oct 2026

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