Krishna Bhajan मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

आज आओ मोहन मुझपे उपकार करो भजन इन हिंदी लिरिक्स

आज आओ मोहन मुझपे उपकार करो भजन के संपूर्ण लिरिक्स और हिंदी भावार्थ पढ़ें। श्री कृष्ण की भक्ति में लीन करने वाली यह रचना मन को शांति प्रदान करती है।

"आज आओ मोहन मुझपे उपकार करो" एक अत्यंत भावपूर्ण और हृदयस्पर्शी कृष्ण भजन है, जो जीवात्मा की परमात्मा के प्रति अनन्य शरणागति और विरह वेदना को दर्शाता है। इस भजन में भक्त अपने आराध्य भगवान श्री कृष्ण (मोहन) से करुण पुकार कर रहा है कि वे उसके जीवन रूपी नैया को संसार रूपी भवसागर से पार लगाएं। सनातन धर्म की समृद्ध संकीर्तन परंपरा में इस भजन का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। यह भजन मुख्य रूप से 'विनय' और 'करुणा' रस से ओतप्रोत है, जिसे गाते समय भक्त का हृदय द्रवित हो उठता है और उसकी आंखों से प्रेमाश्रुओं की धारा बहने लगती है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम इस पावन भजन के संपूर्ण लिरिक्स, पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ, दार्शनिक महत्व और इससे मिलने वाली आध्यात्मिक सीख का गहराई से अध्ययन करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

आज आओ मोहन मुझपे उपकार करो

मूंखड़ा:
आज आओ मोहन मुझपे उपकार करो,
मेरी नैया फंसी मझधार, इसे पार करो।
आज आओ मोहन मुझपे उपकार करो...

अंतरा 1:
तुम बिन मेरा कोई नहीं है इस जग में,
हार गया हूँ मैं तो जीवन के इस रण में।
मेरी सूनी डगरिया में प्रकाश करो,
आज आओ मोहन मुझपे उपकार करो...

अंतरा 2:
मैंने सुना है तुम दीनबंधु कहलाते हो,
भक्तों की पुकार सुन दौड़े आते हो।
मेरे नैन तरसते हैं, दर्शन दान करो,
आज आओ मोहन मुझपे उपकार करो...

अंतरा 3:
भवसागर की लहरें डरा रही हैं मुझे,
शरण में आया हूँ, अब बचा लो मुझे।
मेरे जीवन की बगिया को गुलजार करो,
आज आओ मोहन मुझपे उपकार करो...

अंतरा 4:
तुम ही तो हो मेरे जीवन के खेवैया,
अब सौंप दी है मैंने तुमको अपनी नैया।
मेरी इस टूटी फूटी नाव का उद्धार करो,
आज आओ मोहन मुझपे उपकार करो...

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस पावन भजन का मूल भाव पूर्ण आत्मसमर्पण (प्रपत्ति) है। जब मनुष्य संसार के समस्त भौतिक साधनों और अपने अहंकार को त्यागकर भगवान की शरण में जाता है, तब उसे इस बात का आभास होता है कि ईश्वर के अतिरिक्त उसका कोई सच्चा रक्षक नहीं है।

भजन की शुरुआत में भक्त भगवान कृष्ण को 'मोहन' कहकर पुकारता है। 'मोहन' का अर्थ है जो मन को मोह ले। भक्त कहता है कि हे प्रभु! अब विलंब मत करो, मुझ पर दया करो और मेरी जीवन रूपी नैया जो इस संसार रूपी मझधार में फंसी हुई है, उसे पार लगाओ। यहाँ 'मझधार' का अर्थ जीवन के संकटों, दुखों और मोह-माया के बंधनों से है, जहाँ मनुष्य स्वयं को असहाय पाता है।

आगे भक्त अपनी विवशता को स्वीकार करते हुए कहता है कि इस विशाल संसार में आपके अतिरिक्त मेरा कोई रक्षक या हितैषी नहीं है। जीवन के संघर्षों (रण) से मैं थक चुका हूँ और हार मान चुका हूँ। मेरी जीवन रूपी राह सूनी और अंधकारमय हो गई है, कृपया अपनी कृपा का प्रकाश फैलाकर मेरा मार्ग आलोकित करें। यह भाव श्रीमद्भगवद्गीता के शरणागति योग से मेल खाता है, जहाँ अर्जुन भी स्वयं को असमर्थ पाकर भगवान कृष्ण की शरण में जाता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन केवल एक गीत नहीं है, बल्कि एक साधक की अंतःपुकार है। इसके निम्नलिखित आध्यात्मिक महत्व हैं:

  • दीनता और विनम्रता का विकास: यह भजन साधक के भीतर से 'मैं' और 'मेरा' के अहंकार को समाप्त कर उसे विनम्र बनाता है।
  • अनन्य भक्ति का संदेश: इसमें भक्त भगवान के अतिरिक्त किसी अन्य देवी-देवता या सांसारिक शक्ति की ओर नहीं देखता। यह अनन्य भक्ति का चरमोत्कर्ष है।
  • मानसिक शांति की प्राप्ति: जब कोई साधक इस भजन को तन्मयता से गाता है, तो उसका मन सांसारिक चिंताओं से मुक्त होकर शांत हो जाता है।
  • कलयुग में नाम संकीर्तन की महिमा: शास्त्रों के अनुसार कलयुग में केवल हरि नाम और संकीर्तन ही मोक्ष का सबसे सुलभ साधन है। यह भजन उसी परंपरा को सुदृढ़ करता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि भगवान के स्मरण के लिए कोई भी समय अनुचित नहीं है, परंतु इस भजन को गाने और सुनने की एक विशेष विधि और समय है जो इसके प्रभाव को कई गुना बढ़ा देता है:

  • सर्वोत्तम समय: इस भजन को संध्या काल की आरती के समय या रात्रि के समय सोने से पहले गाना अत्यंत फलदायी माना जाता है। इस समय मन शांत होता है और दिनभर की भागदौड़ के बाद भगवान के चरणों में विश्राम पाने की लालसा तीव्र होती है।
  • गायन की विधि: इसे गाते समय आँखों को बंद करके भगवान श्री कृष्ण के मनमोहक रूप का ध्यान करना चाहिए। हाथों में करताल या मंजीरा लेकर अत्यंत धीमी और मधुर लय में इसका गायन करना चाहिए।
  • भाव की प्रधानता: इस भजन में सुर और ताल से अधिक 'भाव' का महत्व है। भक्त के हृदय में जितनी अधिक व्याकुलता होगी, भजन उतना ही अधिक प्रभावशाली होगा।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन भगवान श्री कृष्ण के 'मोहन' और 'दीनबंधु' स्वरूप को समर्पित है। भगवान कृष्ण का यह रूप अत्यंत दयालु और कृपालु है, जो अपने भक्तों के दुखों को हरने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं।

भक्ति काल के महान संतों जैसे सूरदास, मीराबाई और रसखान ने भी इसी भाव के अनेक पदों की रचना की है। मीराबाई ने भी अपनी नैया को पार लगाने के लिए गिरधर गोपाल से प्रार्थना की थी। यह भजन उसी महान संत परंपरा की आधुनिक अभिव्यक्ति है, जो आज भी लाखों भक्तों के दिलों को स्पंदित कर रही है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन के मूल रचयिता के विषय में कोई स्पष्ट ऐतिहासिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं है, परंतु यह पारंपरिक रूप से ब्रज और उत्तर भारत के संकीर्तन मंडलों में पीढ़ियों से गाया जाता रहा है। इसकी पृष्ठभूमि पूरी तरह से वैष्णव भक्ति आंदोलन से प्रेरित है। जब भारत में मुगलों और अन्य बाहरी आक्रमणकारियों के समय हिंदू समाज में निराशा का माहौल था, तब ऐसे भजनों ने समाज को एक नई आध्यात्मिक ऊर्जा और संबल प्रदान किया था।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें ब्रजभाषा के शब्दों का सुंदर पुट देखने को मिलता है। इसकी काव्य शैली 'गीति काव्य' है, जिसे आसानी से गाया जा सकता है।

भजन में रूपक अलंकार का प्रचुर प्रयोग किया गया है। उदाहरण के लिए, 'जीवन को रण' (युद्धक्षेत्र) और 'संसार को भवसागर' तथा 'शरीर/जीवन को नैया' के रूप में चित्रित किया गया है। यह प्रतीकात्मकता भजन को साहित्यिक दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध बनाती है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें जीवन जीने की कई महत्वपूर्ण सीख देता है:

  1. अहंकार का त्याग: जब तक मनुष्य यह सोचता है कि वह अपने बल पर सब कुछ कर सकता है, तब तक उसे ईश्वर की सहायता नहीं मिलती। जैसे ही वह अपनी असमर्थता स्वीकार करता है, ईश्वर का हाथ उसे थाम लेता है।
  2. धैर्य और विश्वास: जीवन के कठिन समय में जब चारों ओर अंधकार दिखाई दे, तब भी ईश्वर पर विश्वास बनाए रखना चाहिए।
  3. संसार की नश्वरता: यह संसार एक भवसागर है जहाँ सुख और दुख की लहरें उठती रहती हैं। यहाँ कोई भी सांसारिक संबंध शाश्वत नहीं है, केवल ईश्वर ही सच्चे सखा हैं।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

कठिन शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
मोहन मन को मोहने वाले (श्री कृष्ण) परमात्मा का वह रूप जो जीव को अपनी ओर आकर्षित करता है।
मझधार नदी या धारा के बीच का हिस्सा जीवन के संकट और मोह-माया के बंधन जहाँ से निकलना कठिन हो।
दीनबंधु गरीबों और असहायों के भाई/मित्र भगवान का वह गुण जिसके कारण वे दीन-दुखियों पर विशेष कृपा करते हैं।
भवसागर संसार रूपी समुद्र जन्म और मृत्यु का चक्र जिससे मुक्त होना ही मोक्ष है।
खेवैया नाव चलाने वाला (नाविक) भगवान जो हमारे जीवन रूपी रथ या नाव के सारथी हैं।
गुलजार फूलों से भरा हुआ उपवन आनंद, शांति और भक्ति से परिपूर्ण जीवन।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

पंक्ति: "आज आओ मोहन मुझपे उपकार करो, मेरी नैया फंसी मझधार, इसे पार करो।"
भावार्थ: हे मनमोहन! आज आप मुझ पर अपनी अहैतुकी कृपा करें। मेरा यह जीवन रूपी जहाज इस संसार के दुखों और वासनाओं के बीच फंस गया है। आपके बिना इसे पार लगाने वाला कोई नहीं है।

पंक्ति: "तुम बिन मेरा कोई नहीं है इस जग में, हार गया हूँ मैं तो जीवन के इस रण में।"
भावार्थ: हे प्रभु! इस मतलबी दुनिया में आपके सिवा मेरा कोई अपना नहीं है। मैं इस जीवन के संघर्षों से पूरी तरह थक चुका हूँ और अपनी हार स्वीकार करता हूँ। अब आप ही मेरी अंतिम आशा हैं।

पंक्ति: "मैंने सुना है तुम दीनबंधु कहलाते हो, भक्तों की पुकार सुन दौड़े आते हो।"
भावार्थ: हे कृष्ण! शास्त्रों और संतों से मैंने सुना है कि आप दीन-दुखियों के रक्षक हैं। जब भी कोई भक्त आपको सच्चे मन से पुकारता है, आप नंगे पैर दौड़े चले आते हैं। आज मेरी भी पुकार सुन लीजिए।

पंक्ति: "भवसागर की लहरें डरा रही हैं मुझे, शरण में आया हूँ, अब बचा लो मुझे।"
भावार्थ: इस संसार रूपी सागर की भयानक लहरें (काम, क्रोध, लोभ, मोह) मुझे भयभीत कर रही हैं। मैं सब कुछ छोड़कर आपकी शरण में आ गया हूँ, अब मेरी रक्षा करना आपका दायित्व है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के शरणागति के भाव को पुष्ट करने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता का यह सुप्रसिद्ध श्लोक अत्यंत प्रासंगिक है:

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामी मा शुचः॥

अर्थ: (भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं) सभी धर्मों (कर्तव्यों और आश्रयों) को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो।

इसके साथ ही, भगवान कृष्ण के महामंत्र का जाप भी इस भजन के साथ किया जा सकता है:

"हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे"

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण का क्षेत्र महत्वपूर्ण जानकारी
भजन का नाम आज आओ मोहन मुझपे उपकार करो
मुख्य आराध्य भगवान श्री कृष्ण (मोहन)
भजन का मुख्य भाव शरणागति, करुणा, दीनता, विरह
उपयुक्त अवसर संध्या आरती, जन्माष्टमी, सत्संग, दैनिक प्रार्थना
काव्य भाषा सरल हिंदी (खड़ी बोली)
मुख्य संदेश ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण ही मोक्ष का मार्ग है

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

'आज आओ मोहन मुझपे उपकार करो' भजन का मुख्य संदेश क्या है?

इस भजन का मुख्य संदेश पूर्ण शरणागति (Surrender) है। यह सिखाता है कि जब मनुष्य अपने अहंकार को छोड़कर भगवान की शरण में जाता है, तो भगवान उसकी जीवन रूपी नैया को भवसागर से पार लगा देते हैं।

इस भजन को किस समय गाना सबसे उत्तम माना जाता है?

इस भजन को संध्या काल (शाम की पूजा) के समय या रात्रि को सोने से पहले गाना सबसे उत्तम माना जाता है, क्योंकि इस समय मन शांत और अंतर्मुखी होता है।

'मोहन' शब्द का क्या अर्थ है?

'मोहन' भगवान श्री कृष्ण का एक अत्यंत प्रिय नाम है, जिसका अर्थ है "जो अपने रूप और गुणों से सबके मन को मोह ले"।

भजन में 'नैया' और 'मझधार' किसके प्रतीक हैं?

भजन में 'नैया' मनुष्य के जीवन और शरीर का प्रतीक है, जबकि 'मझधार' संसार के कष्टों, दुखों और मोह-माया के बंधनों का प्रतीक है।

क्या यह भजन शुरुआती साधकों के लिए उपयोगी है?

हाँ, यह भजन शुरुआती साधकों के लिए अत्यंत उपयोगी है क्योंकि इसकी भाषा बहुत सरल है और यह हृदय में भक्ति भाव को बहुत तेजी से जाग्रत करता है।

इस भजन का गायन किस राग या लय में किया जाना चाहिए?

इस भजन का गायन किसी शास्त्रीय राग के बंधन में बंधकर करने की आवश्यकता नहीं है। इसे अत्यंत शांत, करुण और धीमी लय में अपनी सहज आवाज में गाना चाहिए।

भगवान कृष्ण को 'दीनबंधु' क्यों कहा जाता है?

भगवान कृष्ण को 'दीनबंधु' इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे दीन (गरीब, असहाय और पीड़ित) लोगों के सबसे बड़े मित्र और रक्षक हैं। वे सुदामा, द्रौपदी और गजेंद्र जैसे भक्तों की पुकार पर तुरंत दौड़े आए थे।

इस भजन को सुनने से क्या लाभ होते हैं?

इस भजन को सुनने से मानसिक तनाव दूर होता है, मन को असीम शांति मिलती है, और भगवान श्री कृष्ण के प्रति श्रद्धा और प्रेम का विकास होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ और भावार्थ को सनातन धर्म के प्रामाणिक ग्रंथों जैसे श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीमद्भागवत महापुराण के सिद्धांतों के आलोक में तैयार किया गया है। हमारी संपादकीय टीम ने यह सुनिश्चित किया है कि भजन के शब्द और उनका अर्थ पूरी तरह से शुद्ध और त्रुटिहीन हो ताकि पाठकों को सही आध्यात्मिक मार्गदर्शन मिल सके।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भगवद्गीता: अध्याय 18, श्लोक 66 (शरणागति योग)।
  • कल्याण भजन अंक: गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित पारंपरिक भजन संग्रह।
  • श्रीमद्भागवत महापुराण: नवधा भक्ति और भगवान के दीनबंधु स्वरूप का वर्णन।

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यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 11 Oct 2026

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