प्रस्तुत भजन "बांके बिहारी कृष्ण मुरारी मेरे बारी कहाँ छुपे" वैष्णव भक्ति परंपरा का एक अत्यंत मर्मस्पर्शी और भावपूर्ण भजन है। इस भजन में भक्त की व्याकुलता, अनन्य शरणागति और भगवान श्री कृष्ण के प्रति अगाध प्रेम का चित्रण किया गया है। जब जीवात्मा संसार के थपेड़ों से थककर परमात्मा की शरण में जाती है, तब वह अपने आराध्य को पुकारती है। इस भजन का मुख्य भाव 'विनय' और 'करुणा' है, जहाँ भक्त भगवान को उनके पूर्व के चमत्कारों और भक्तों पर की गई कृपा की याद दिलाता है। चाहे वह द्रौपदी की लाज बचाना हो, गजराज को ग्राह से मुक्त करना हो, या शबरी के जूठे बेर खाना हो—भगवान ने सदैव अपने भक्तों की पुकार पर तुरंत प्रतिक्रिया दी है। भक्त अत्यंत आर्त भाव से पूछता है कि हे बांके बिहारी, जब मेरी बारी आई है, तो आप कहाँ छुप गए हैं? यह भजन सत्संगों, संध्या आरती और विशेषकर वृंदावन के श्री बांके बिहारी मंदिर के उत्सवों में अत्यंत श्रद्धा के साथ गाया जाता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
॥ भजन: बांके बिहारी कृष्ण मुरारी मेरे बारी कहाँ छुपे ॥
(मुखड़ा)
बांके बिहारी कृष्ण मुरारी, मेरी बारी कहाँ छुपे।
मेरी बारी कहाँ छुपे, गिरधारी कहाँ छुपे॥
बांके बिहारी कृष्ण मुरारी, मेरी बारी कहाँ छुपे...
(अंतरा - १)
द्रौपदी ने जब तुमको पुकारा, सभा बीच में चीर बढ़ाया।
चीर बढ़ाया बनके सहारा, मेरी बारी कहाँ छुपे।
मेरी बारी कहाँ छुपे, बनवारी कहाँ छुपे॥
बांके बिहारी कृष्ण मुरारी, मेरी बारी कहाँ छुपे...
(अंतरा - २)
गज और ग्राह लड़े जल भीतर, गज ने तुमको ध्यान लगाया।
तुमने उबारा चक्र चलाकर, मेरी बारी कहाँ छुपे।
मेरी बारी कहाँ छुपे, चक्रधारी कहाँ छुपे॥
बांके बिहारी कृष्ण मुरारी, मेरी बारी कहाँ छुपे...
(अंतरा - ३)
शबरी के तुम मीठे फल खाए, केवट को भवपार लगाया।
दीन सुदामा गले से लगाए, मेरी बारी कहाँ छुपे।
मेरी बारी कहाँ छुपे, धनुषधारी कहाँ छुपे॥
बांके बिहारी कृष्ण मुरारी, मेरी बारी कहाँ छुपे...
(अंतरा - ४)
मीरा के तुम गिरधर नागर, जहर का प्याला अमृत बनाया।
भक्ति के तुम गहरे सागर, मेरी बारी कहाँ छुपे।
मेरी बारी कहाँ छुपे, मुरलीधारी कहाँ छुपे॥
बांके बिहारी कृष्ण मुरारी, मेरी बारी कहाँ छुपे...
का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस भजन का भावार्थ अत्यंत गहरा और दार्शनिक है। यह भक्त और भगवान के बीच के मधुर, उलाहने भरे संबंध को दर्शाता है। यहाँ भक्त अपने आराध्य श्री बांके बिहारी से प्रश्न कर रहा है कि हे प्रभु! आपने इतिहास में अनेक भक्तों का उद्धार किया है, लेकिन जब मेरी बारी आई, जब मुझे आपकी सबसे अधिक आवश्यकता है, तब आप कहाँ छुप गए हैं? यह छुपना वास्तव में भगवान की उपेक्षा नहीं, बल्कि भक्त की परीक्षा और उसके प्रेम को और अधिक प्रगाढ़ करने की लीला है।
भजन के प्रथम भाग में द्रौपदी के चीरहरण का प्रसंग है। जब कुरुसभा में द्रौपदी का अपमान हो रहा था और उसने अपने पतियों व भीष्म पितामह जैसे वीरों से आशा छोड़ दी, तब उसने दोनों हाथ उठाकर द्वारकाधीश को पुकारा। भगवान ने तुरंत अनंत वस्त्र बनकर उसकी लाज बचाई। भक्त कहता है कि हे प्रभु, आपने द्रौपदी की पुकार पर इतनी शीघ्रता दिखाई, तो मेरी पुकार पर आप मौन क्यों हैं?
द्वितीय भाग में गजेंद्र मोक्ष की कथा का संदर्भ है। जब गजराज का पैर ग्राह (मगरमच्छ) ने पकड़ लिया और वह जल में डूबने लगा, तब उसने कमल का फूल उठाकर भगवान विष्णु को अर्पित किया। भगवान ने गरुड़ पर सवार होकर आकर चक्र सुदर्शन से ग्राह का वध किया और गजराज को जीवनदान दिया। भक्त इसी प्रकार अपने जीवन के संकटों से मुक्ति के लिए भगवान को पुकार रहा है।
की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
यह भजन केवल एक गीत नहीं है, बल्कि यह श्रीमद्भागवत महापुराण और अन्य वैष्णव ग्रंथों के सार को समेटे हुए है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- शरणागति का संदेश: यह भजन सिखाता है कि जब मनुष्य अपने अहंकार को त्यागकर पूर्ण रूप से भगवान की शरण में जाता है, तभी भगवान का अनुग्रह प्राप्त होता है।
- ऐतिहासिक संदर्भ: इसमें सनातन धर्म के प्रमुख पौराणिक प्रसंगों (द्रौपदी, गजेंद्र, शबरी, सुदामा, मीराबाई) का उल्लेख है, जो भगवान की भक्तवत्सलता को प्रमाणित करते हैं।
- आर्त भाव की प्रधानता: भक्ति मार्ग में चार प्रकार के भक्त बताए गए हैं—आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी। यह भजन 'आर्त' भक्त की श्रेणी में आता है, जो संकट के समय केवल भगवान को ही अपना रक्षक मानता है।
- मधुर रस की अभिव्यक्ति: भगवान को उलाहना देना (मीठी शिकायत करना) वैष्णव भक्ति की एक अनूठी विशेषता है, जो इस भजन में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस भजन को गाने और सुनने के लिए किसी विशेष कठिन नियम की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि भगवान भाव के भूखे हैं। फिर भी, इसे निम्नलिखित विधियों से और अधिक फलदायी बनाया जा सकता है:
सर्वोत्तम समय: इस भजन का गायन संध्या काल की आरती के समय या ब्रह्ममुहूर्त में करना अत्यंत शांतिदायक होता है। विशेषकर एकादशी, जन्माष्टमी, और राधाष्टमी के पावन अवसरों पर इसका सामूहिक संकीर्तन किया जाता है।
गायन की विधि: शांत चित्त होकर, भगवान श्री बांके बिहारी की छवि के सम्मुख बैठकर, हाथ में करताल या मंजीरा लेकर अत्यंत करुण और प्रेमपूर्ण स्वर में इसका गायन करना चाहिए। गाते समय प्रत्येक प्रसंग के चरित्रों (जैसे द्रौपदी या सुदामा) के भाव को अपने भीतर महसूस करना चाहिए।
से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्री कृष्ण के 'बांके बिहारी' स्वरूप को समर्पित है। वृंदावन के श्री बांके बिहारी जी महाराज का विग्रह अत्यंत चमत्कारी और त्रिभंग मुद्रा में है। इस भजन में भगवान के विभिन्न अवतारों और उनके अनन्य भक्तों का सुंदर समन्वय है:
- भगवान श्री कृष्ण (बांके बिहारी): जो भक्तों के दुखों का हरण करने वाले और मुरली बजाकर संपूर्ण सृष्टि को आनंदित करने वाले हैं।
- भक्त शिरोमणि मीराबाई: जिन्होंने जहर के प्याले को भी कृष्ण नाम के प्रभाव से अमृत में बदल दिया।
- माता शबरी व भक्त सुदामा: जो दर्शाते हैं कि भगवान जाति, वर्ग या धन नहीं, बल्कि केवल शुद्ध प्रेम और भक्ति देखते हैं।
इस भजन के माध्यम से भक्त हरि भजन की महिमा का गान करते हैं, जो कलयुग में भवसागर से पार उतरने का सबसे सरल माध्यम है।
की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
यद्यपि इस भजन के मूल रचयिता के विषय में विभिन्न मत हैं, परंतु यह पारंपरिक लोक-भक्ति काव्य की श्रेणी में आता है। इसे अनेक महान गायकों ने अपने स्वरों से सजाया है, जिनमें श्री हरिहरन जी का नाम प्रमुख है। उनके द्वारा गाए गए HARIHARAN Bhajan संस्करण ने इस भजन को देश-विदेश में अत्यधिक लोकप्रिय बना दिया। इसकी पृष्ठभूमि वृंदावन की कुंज गलियों और वहां की अनन्य भक्ति परंपरा से जुड़ी हुई है, जहाँ भक्त अपने आराध्य से सीधा और आत्मीय संबंध स्थापित करते हैं।
की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और प्रवाहमयी खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें ब्रजभाषा के शब्दों का सुंदर पुट है। इसकी काव्य शैली 'पद' शैली है, जिसमें गेयता (गाए जाने की योग्यता) का गुण कूट-कूट कर भरा है। अनुप्रास और रूपक अलंकारों का सहज प्रयोग हुआ है। "मेरी बारी कहाँ छुपे" की बार-बार आवृत्ति (refrain) पाठक और श्रोता के मन में एक तड़प और व्याकुलता उत्पन्न करती है, जो कि उत्कृष्ट भक्ति काव्य की पहचान है।
में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन हमें दैनिक जीवन के लिए कई महत्वपूर्ण आध्यात्मिक सीख देता है:
- धैर्य और विश्वास: जीवन में जब भी कठिन समय आए, हमें घबराना नहीं चाहिए। जैसे भगवान ने पूर्व में अपने भक्तों की रक्षा की, वैसे ही वे हमारी भी रक्षा करेंगे।
- अहंकार का त्याग: जब तक द्रौपदी को अपनी शक्ति या पतियों पर भरोसा था, भगवान नहीं आए। जैसे ही उसने पूर्ण आत्मसमर्पण किया, भगवान तुरंत प्रकट हो गए। अतः पूर्ण शरणागति ही ईश्वर प्राप्ति का मार्ग है।
- समता का भाव: भगवान के दरबार में कोई अमीर-गरीब या ऊंच-नीच नहीं है। वे सुदामा के फटे वस्त्र और शबरी के जूठे बेर भी उतने ही प्रेम से स्वीकार करते हैं जितने कि राजाओं के छप्पन भोग।
के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| बांके बिहारी | टेढ़े-मेढ़े खड़े होने वाले सुंदर कृष्ण | वृंदावन के आराध्य देव, जो त्रिभंग ललित मुद्रा में हैं। |
| गिरधारी | गिरि (गोवर्धन पर्वत) को धारण करने वाले | इंद्र के मान-मर्दन और ब्रजवासियों की रक्षा के लिए पर्वत उठाने वाले। |
| चीर | वस्त्र / साड़ी | द्रौपदी के चीरहरण के समय भगवान द्वारा अनंत वस्त्र प्रदान करना। |
| ग्राह | मगरमच्छ | संसार रूपी माया का प्रतीक जो जीवात्मा को जकड़े रहता है। |
| भवपार | संसार रूपी सागर से मुक्ति | मोक्ष या भगवद्धाम की प्राप्ति कराना। |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"बांके बिहारी कृष्ण मुरारी, मेरी बारी कहाँ छुपे।"
हे सुंदर बांके बिहारी! हे कृष्ण! हे मुरारी! जब संपूर्ण जगत पर कृपा करने के बाद अब मेरी बारी आई है, तो आप कहाँ छुप गए हैं? कृपया प्रकट होइए।
"द्रौपदी ने जब तुमको पुकारा, सभा बीच में चीर बढ़ाया।"
जब भरी सभा में दुशासन द्रौपदी का चीरहरण कर रहा था और उसने आपको पुकारा, तब आपने वस्त्र का रूप धारण कर उसकी लाज बचाई।
"गज और ग्राह लड़े जल भीतर, तुमने उबारा चक्र चलाकर।"
जब गजराज और मगरमच्छ के बीच भीषण युद्ध हुआ और गजराज हारने लगा, तब आपने सुदर्शन चक्र चलाकर गजराज के प्राणों की रक्षा की।
"शबरी के तुम मीठे फल खाए, केवट को भवपार लगाया।"
आपने जाति-पाति का भेद मिटाकर भीलनी शबरी के जूठे बेर खाए और केवट की नाव पर बैठकर उसे इस संसार रूपी सागर से पार उतार दिया। इस प्रसंग का सुंदर वर्णन हमें गोस्वामी तुलसीदास जी रचित रामचरितमानस में भी मिलता है।
से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के भाव को और अधिक सुदृढ़ करने के लिए श्रीमद्भागवत गीता का यह श्लोक अत्यंत प्रासंगिक है, जहाँ भगवान अर्जुन को अपनी शरण में आने का संदेश देते हैं:
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामी मा शुचः॥
अर्थ: सभी धर्मों (कर्तव्यों) को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूंगा, शोक मत करो।
इसके साथ ही, भगवान विष्णु की स्तुति के लिए श्री हरि स्तोत्रम का पाठ करना भी अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| भजन का नाम | बांके बिहारी कृष्ण मुरारी मेरे बारी कहाँ छुपे |
| मुख्य आराध्य देव | भगवान श्री कृष्ण (श्री बांके बिहारी जी) |
| भक्ति रस / भाव | विनय रस, करुणा भाव, आर्त शरणागति |
| प्रसिद्ध गायक | श्री हरिहरन एवं अन्य पारंपरिक भजन गायक |
| भाषा | सरल हिंदी (ब्रजभाषा के प्रभाव सहित) |
| उपयुक्त अवसर | दैनिक संध्या आरती, सत्संग, एकादशी, जन्माष्टमी |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न १: "बांके बिहारी कृष्ण मुरारी मेरे बारी कहाँ छुपे" भजन का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: इस भजन का मुख्य संदेश पूर्ण शरणागति और ईश्वर पर अटूट विश्वास है। यह सिखाता है कि जब मनुष्य अपने सारे सहारे छोड़कर भगवान को पुकारता है, तो भगवान अवश्य उसकी रक्षा करते हैं।
प्रश्न २: इस भजन में किन-किन पौराणिक प्रसंगों का उल्लेख है?
उत्तर: इस भजन में द्रौपदी का चीरहरण, गजेंद्र मोक्ष (गज और ग्राह का युद्ध), शबरी के बेर, केवट प्रसंग, सुदामा की दरिद्रता दूर करना और मीराबाई के विष के प्याले को अमृत बनाना जैसे पावन प्रसंगों का उल्लेख है।
प्रश्न ३: श्री बांके बिहारी मंदिर कहाँ स्थित है?
उत्तर: श्री बांके बिहारी जी का विश्व प्रसिद्ध मंदिर उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के पावन धाम वृंदावन में स्थित है।
प्रश्न ४: इस भजन को किस समय गाना सबसे उत्तम माना जाता है?
उत्तर: इस भजन को संध्या काल की पूजा या सुबह के समय शांत मन से गाना सबसे उत्तम माना जाता है।
प्रश्न ५: क्या इस भजन का संबंध रामचरितमानस से भी है?
उत्तर: हाँ, भजन में शबरी और केवट के जिन प्रसंगों का उल्लेख है, उनका विस्तृत और सुंदर वर्णन गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस में मिलता है।
प्रश्न ६: 'बांके बिहारी' शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर: 'बांके' का अर्थ है तीन जगह से टेढ़े (त्रिभंग मुद्रा) और 'बिहारी' का अर्थ है क्रीड़ा या विहार करने वाले। अर्थात जो अपनी त्रिभंग ललित छवि से भक्तों के मन को मोह लेते हैं।
प्रश्न ७: इस भजन को गाते समय किस वाद्य यंत्र का प्रयोग करना चाहिए?
उत्तर: इस भजन को गाते समय हारमोनियम, ढोलक, मंजीरा या करताल का प्रयोग किया जा सकता है। बिना वाद्यों के भी केवल ताली बजाकर भावपूर्वक इसे गाया जा सकता है।
प्रश्न ८: क्या यह भजन मानसिक शांति के लिए उपयोगी है?
उत्तर: हाँ, इस भजन के करुण और समर्पण भरे भाव मन के तनाव को दूर कर गहरी आंतरिक शांति और सुरक्षा का अनुभव कराते हैं।
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ और भावार्थ को तैयार करने में प्रामाणिक वैष्णव ग्रंथों, श्रीमद्भागवत पुराण और पारंपरिक संकीर्तन पद्धतियों का सहारा लिया गया है। इस भजन की प्रत्येक पंक्ति भक्त के हृदय में ईश्वर के प्रति विश्वास को सुदृढ़ करती है। पाठकों से अनुरोध है कि वे इस भजन का श्रवण और पठन पूरी श्रद्धा के साथ करें ताकि उन्हें मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त हो सके।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्भागवत महापुराण - स्कंध १० (श्रीकृष्ण लीला प्रसंग)
- श्री रामचरितमानस - अरण्यकांड (शबरी प्रसंग) एवं अयोध्याकांड (केवट प्रसंग)
- पारंपरिक वैष्णव कीर्तन संग्रह एवं ब्रज साहित्य
- वृंदावन के पूज्य संतों के प्रवचन और व्याख्यान
संबंधित भजन एवं लेख
भक्ति लोक पर अन्य दिव्य भजनों और स्तोत्रों का आनंद लेने के लिए नीचे दिए गए लेखों को अवश्य पढ़ें:
पाठकों के विचार (0)
भक्ति रस चर्चा में भाग लें