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भजन - शिव शंकर को जिसने पूजा लिरिक्स इन हिंदी - भक्ति लोक

पढ़ें भजन - शिव शंकर को जिसने पूजा लिरिक्स इन हिंदी - भक्ति लोक का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक महत्व भक्तिलोक पर।

भगवान शिव की आराधना को समर्पित अत्यंत लोकप्रिय और हृदयस्पर्शी भजन "शिव शंकर को जिसने पूजा" सनातन धर्म के भक्तों के बीच एक विशेष स्थान रखता है। यह भजन देवादिदेव महादेव के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण, श्रद्धा और भक्ति रस से सराबोर है। शिव का अर्थ ही कल्याण है, और यह भजन इस सत्य को प्रमाणित करता है कि जो भी साधक निष्काम भाव से भगवान आशुतोष की शरण में जाता है, उसका कल्याण निश्चित है। इस भजन में शांत, करुण और शांत रस का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है, जो मन को असीम शांति प्रदान करता है। सावन के पवित्र महीने, महाशिवरात्रि, प्रदोष व्रत और प्रत्येक सोमवार को इस भजन का गायन व श्रवण करने से साधक के अंतःकरण में शिवत्व का उदय होता है। इस विस्तृत लेख में हम इस पावन भजन के लिरिक्स, उसका गूढ़ आध्यात्मिक भावार्थ, पंक्ति-दर-पंक्ति व्याख्या, कठिन शब्दों के अर्थ और इससे जुड़े पौराणिक प्रसंगों का सांगोपांग विवेचन करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ शिव शंकर को जिसने पूजा ॥

(कोरस / मुखड़ा)
शिव शंकर को जिसने पूजा उसका ही उद्धार हुआ |
अंत काल को भवसागर में उसका बेड़ा पार हुआ ||
हर हर महादेव शिव शम्भू... हर हर महादेव शिव शम्भू...

(अंतरा - १)
भोले शंकर की पूजा करो, ध्यान चरणों में इनके धरो |
सुख-दुःख में जो शिव को ध्याए, वो जीवन में कभी न घबराए |
शिव की भक्ति का पावन रस जिसने भी एक बार पिया,
उसका ही उद्धार हुआ...
अंत काल को भवसागर में उसका बेड़ा पार हुआ ||

(अंतरा - २)
डमरू वाले की महिमा है न्यारी, तीनों लोकों के वो हैं त्रिपुरारी |
गले में सर्पों की माला साजे, मस्तक पर चंदा चमके विराजे |
गंगा की धारा बहती जटा से, जिसने भी शिव का ध्यान किया,
उसका ही उद्धार हुआ...
अंत काल को भवसागर में उसका बेड़ा पार हुआ ||

(अंतरा - ३)
भस्म रमैय्या हैं औघड़ दानी, उनकी दया की कोई सीमा न जानी |
विष पीकर जो नीलकंठ कहलाए, भक्तों के संकट पल में मिटाए |
ऐसे कृपालु दयालु प्रभु को जिसने भी अपना मान लिया,
उसका ही उद्धार हुआ...
अंत काल को भवसागर में उसका बेड़ा पार हुआ ||

(समापन)
शिव शंकर को जिसने पूजा उसका ही उद्धार हुआ |
अंत काल को भवसागर में उसका बेड़ा पार हुआ ||
हर हर महादेव शिव शम्भू... हर हर महादेव शिव शम्भू...

का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस भजन का मूल भाव भगवान शिव की अमोघ कृपा और उनकी शरणागति की महिमा का गान करना है। भजनकार कहते हैं कि जिस भी मनुष्य ने अपने जीवन में भगवान शिव की सच्चे मन से आराधना की है, उसका निश्चित रूप से कल्याण हुआ है। इस संसार को एक विशाल और दुर्गम 'भवसागर' माना गया है, जिसमें जीव जन्म और मृत्यु के चक्र में फंसा रहता है। भगवान शिव की भक्ति वह नौका है जो जीव को इस संसार रूपी सागर से पार उतारकर मोक्ष प्रदान करती है।

भजन के माध्यम से भक्तों को यह संदेश दिया गया है कि जीवन में सुख और दुःख दोनों ही क्षणभंगुर हैं। जो व्यक्ति इन दोनों परिस्थितियों में समभाव रहकर भगवान शिव का स्मरण करता है, उसे कभी भी जीवन की कठिनाइयों से भय नहीं लगता। शिव की भक्ति का रस चखने के बाद सांसारिक विषय-वासनाएं स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं। भगवान शिव का स्वरूप अत्यंत विलक्षण है; वे एक ओर जहां श्मशान वासी और भस्म रमाने वाले वैरागी हैं, वहीं दूसरी ओर वे भक्तों के लिए परम दयालु और औघड़दानी हैं। उनकी शरण में जाने मात्र से ही मनुष्य के संचित पापों का नाश हो जाता है और उसे परम पद की प्राप्ति होती है।

की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन केवल एक संगीतमय रचना नहीं है, बल्कि यह शिव तत्व को समझने का एक सरल माध्यम है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • शरणागति का संदेश: यह भजन पूर्ण रूप से भगवान शिव के प्रति समर्पण की भावना पर आधारित है। यह सिखाता है कि अहंकार को त्यागकर शिव के चरणों में समर्पित होना ही मुक्ति का मार्ग है।
  • द्वंद्वों से मुक्ति: सुख और दुःख में विचलित न होने की सीख देकर यह भजन श्रीमद्भगवद्गीता के 'समत्वं योग उच्यते' के सिद्धांत को प्रतिपादित करता है।
  • शिव के दिव्य स्वरूप का वर्णन: भजन में शिव के विभिन्न प्रतीकों जैसे डमरू, त्रिशूल, सर्पमाला, मस्तक पर चंद्रमा और जटा से बहती गंगा का सुंदर चित्रण किया गया है, जो साधक को ध्यान लगाने में सहायता करते हैं।
  • सरलता और सुगमता: इस भजन की भाषा अत्यंत सरल और सुबोध है, जिससे कोई भी साधारण भक्त इसे आसानी से गा और समझ सकता है।

गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि भगवान शिव की आराधना किसी भी समय की जा सकती है, क्योंकि वे काल के भी काल महाकाल हैं, फिर भी कुछ विशेष अवसरों पर इस भजन का गायन अत्यंत फलदायी माना गया है:

  • शुभ समय: ब्रह्ममुहूर्त में या संध्या आरती के समय इस भजन का गायन अथवा श्रवण मन को एकाग्र करने में अत्यंत सहायक होता है।
  • विशेष अवसर: महाशिवरात्रि, सावन के सोमवार, प्रदोष व्रत और शिव पुराण की कथा के दौरान इस भजन को सामूहिक रूप से गाने से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
  • गायन विधि: शांत चित्त होकर, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। भगवान शिव की मूर्ति या शिवलिंग के समक्ष घी का दीपक जलाएं और पूरे भाव के साथ डमरू या मंजीरे की थाप पर इस भजन का संकीर्तन करें।

से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन सर्वेश्वर, देवादिदेव महादेव भगवान शिव को समर्पित है। शिव पुराण के अनुसार, शिव ही सृष्टि के आदि, मध्य और अंत हैं। वे ही ब्रह्मा रूप में सृष्टि का सृजन करते हैं, विष्णु रूप में पालन करते हैं और रुद्र रूप में संहार करते हैं। इस भजन में शिव के 'आशुतोष' (शीघ्र प्रसन्न होने वाले) और 'भोलेनाथ' स्वरूप की वंदना की गई है। भारतीय संगीत और भक्ति परंपरा में अनेक अज्ञात संतों और कवियों ने लोकभाषा में ऐसे भजनों की रचना की है ताकि जनमानस आसानी से ईश्वर से जुड़ सके। यह भजन भी उसी समृद्ध लोक-भक्ति परंपरा का हिस्सा है।

की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

यह भजन पारंपरिक रूप से भारतीय समाज में दशकों से गाया जा रहा है। आधुनिक समय में इसे महान गायकों जैसे महेंद्र कपूर, हरिहरन और गुलशन कुमार के भजनों की श्रृंखला में विशेष प्रसिद्धि मिली। इस भजन की पृष्ठभूमि शिव पुराण के उन प्रसंगों से प्रेरित है जहां भगवान शिव ने अपने भक्तों की रक्षा के लिए हलाहल विष का पान किया था और त्रिपुर राक्षस का वध कर देवताओं को भयमुक्त किया था। यह भजन इस विश्वास को सुदृढ़ करता है कि शिव ही एकमात्र ऐसे देव हैं जो अत्यंत अल्प सेवा से भी संतुष्ट हो जाते हैं।

की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों (जैसे- उद्धार, भवसागर, त्रिपुरारी, कृपालु) का बहुत ही सुंदर और सहज प्रयोग किया गया है। इसकी काव्य शैली 'गेय' (गाने योग्य) है। इसमें प्रयुक्त छंद और लय अत्यंत मधुर हैं जो सीधे हृदय को स्पर्श करते हैं। भजन में अनुप्रास और रूपक अलंकार का सुंदर समावेश है, जैसे 'भवसागर' में संसार को सागर का रूप दिया गया है और 'बेड़ा पार' में भक्ति को नौका के रूप में दर्शाया गया है।

में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें व्यावहारिक जीवन के लिए कई महत्वपूर्ण संदेश देता है:

  1. समता का भाव: जीवन में आने वाले सुख और दुःख को भगवान का प्रसाद मानकर स्वीकार करना चाहिए। शिव का ध्यान हमें मानसिक स्थिरता प्रदान करता है।
  2. परोपकार की भावना: शिव ने जगत कल्याण के लिए विषपान किया। इससे हमें यह सीख मिलती है कि हमें भी समाज के कल्याण के लिए अपने स्वार्थ का त्याग करना चाहिए।
  3. सादा जीवन, उच्च विचार: ब्रह्मांड के स्वामी होने के बाद भी शिव भस्म रमाते हैं और वैरागी जीवन जीते हैं। यह हमें भौतिकता की अंधी दौड़ से दूर रहने की प्रेरणा देता है।

के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
उद्धार कल्याण या मुक्ति जन्म-मरण के चक्र से जीव की मुक्ति।
भवसागर संसार रूपी समुद्र माया और मोह से भरा यह नश्वर संसार।
बेड़ा पार नाव का किनारे लगना कठिनाइयों से पार पाकर मोक्ष की प्राप्ति।
त्रिपुरारी त्रिपुर राक्षस का वध करने वाले अहंकार, मोह और लोभ रूपी तीन पुरों का नाश करने वाले शिव।
औघड़ दानी बिना सोचे-समझे सब कुछ दान कर देने वाले शिव का वह स्वरूप जो भक्त की थोड़ी सी भक्ति पर भी सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं।
नीलकंठ नीले कंठ वाले विष को गले में धारण करने वाले, जो संकटों को स्वयं पर ले लेते हैं।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"शिव शंकर को जिसने पूजा उसका ही उद्धार हुआ..."
जो भी मनुष्य निष्काम और पवित्र भाव से भगवान शिव की पूजा-अर्चना करता है, उसका इस संसार में कल्याण सुनिश्चित है। अंत समय में जब जीव इस संसार को छोड़ता है, तो शिव की भक्ति ही उसे इस संसार रूपी सागर से पार ले जाती है।

"भोले शंकर की पूजा करो, ध्यान चरणों में इनके धरो..."
हे मानव! तू उन भोलेनाथ की शरण में जा और अपना ध्यान उनके पावन चरणों में लगा। जो व्यक्ति सुख और दुःख दोनों में शिव का स्मरण करता है, वह जीवन के किसी भी झंझावात से विचलित नहीं होता।

"डमरू वाले की महिमा है न्यारी, तीनों लोकों के वो हैं त्रिपुरारी..."
भगवान शिव की महिमा अत्यंत निराली है। वे तीनों लोकों के स्वामी हैं और उन्होंने त्रिपुर नामक असुर का संहार कर धर्म की स्थापना की थी। उनके गले में सर्प सुशोभित हैं, मस्तक पर चंद्रमा विराजमान है और उनकी जटाओं से मां गंगा की पावन धारा प्रवाहित होती है। ऐसे दिव्य स्वरूप का ध्यान करने वाले का बेड़ा पार हो जाता है।

"भस्म रमैय्या हैं औघड़ दानी, उनकी दया की कोई सीमा न जानी..."
वे अपने शरीर पर भस्म लगाते हैं और परम दानी हैं। उनकी दया की कोई सीमा नहीं है। उन्होंने संसार की रक्षा के लिए हलाहल विष का पान किया और नीलकंठ कहलाए। ऐसे कृपालु देव को जिसने भी अपना आराध्य मान लिया, उसका जीवन धन्य हो गया।

से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के साथ भगवान शिव के इस परम कल्याणकारी महामृत्युंजय मंत्र का जप करना अत्यंत फलदायी माना जाता है:

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥

इसके अतिरिक्त, भगवान शिव के पंचाक्षर स्तोत्र का यह श्लोक भी इस भजन के भाव को पूर्ण करता है:

नमः शिवायै च नमः शिवाय, नमः शिवायै च नमः शिवाय।
नमः शिवायै च नमः शिवाय, नमः शिवायै च नमः शिवाय॥

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण महत्वपूर्ण जानकारी
भजन का नाम शिव शंकर को जिसने पूजा उसका ही उद्धार हुआ
आराध्य देव भगवान शिव (महादेव)
मुख्य विषय शिव भक्ति, शरणागति, मोक्ष और वैराग्य
काव्य रस भक्ति रस, शांत रस
भाषा सरल हिंदी (तत्सम युक्त)
उपयुक्त अवसर महाशिवरात्रि, सावन सोमवार, दैनिक संध्या आरती, प्रदोष व्रत
मुख्य संदेश सुख-दुःख में समभाव रखना और शिव चरणों में समर्पण

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन का मुख्य संदेश यह है कि भगवान शिव की अनन्य भक्ति और उनके चरणों में पूर्ण समर्पण ही मनुष्य को संसार के दुखों और जन्म-मृत्यु के चक्र (भवसागर) से मुक्ति दिला सकता है।

इस भजन को सुबह के समय पूजा के दौरान या शाम की आरती के समय गाना या सुनना सबसे उत्तम माना जाता है। विशेषकर सोमवार, प्रदोष व्रत और महाशिवरात्रि पर इसका विशेष महत्व है।

"औघड़ दानी" का अर्थ है वह जो बिना किसी जटिल नियम-कानून के, अपने भक्त की साधारण सी पुकार और जल-बेलपत्र अर्पण करने मात्र से प्रसन्न होकर उसे मनचाहा वरदान दे दे। भगवान शिव अत्यंत भोले हैं, इसलिए उन्हें औघड़ दानी कहा जाता है।

इसका अर्थ है कि यह संसार दुखों, कष्टों और मोह-माया का एक विशाल सागर है। शिव की भक्ति रूपी नाव के सहारे मनुष्य इन सभी सांसारिक बंधनों को पार करके मोक्ष (परम शांति) को प्राप्त कर लेता है।

हाँ, इस भजन की मधुर लय और इसके गहरे आध्यात्मिक शब्द मन के तनाव को दूर करते हैं और साधक के भीतर सकारात्मक ऊर्जा एवं असीम मानसिक शांति का संचार करते हैं।

समुद्र मंथन के समय जब हलाहल नामक भयंकर विष निकला, जिससे पूरी सृष्टि नष्ट हो सकती थी, तब भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए उस विष को पी लिया और अपने कंठ में ही रोक लिया। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया, जिसके कारण वे "नीलकंठ" कहलाए।

इस भजन के गायन के पश्चात "ॐ नमः शिवाय" पंचाक्षरी मंत्र या "महामृत्युंजय मंत्र" का जप करना अत्यंत कल्याणकारी और शुभ फल देने वाला माना जाता है।

हाँ, इस भजन की भाषा अत्यंत सरल और इसकी धुन बहुत ही कर्णप्रिय है। बच्चे इसे बहुत ही कम समय में और आसानी से सीखकर गा सकते हैं, जिससे उनमें बचपन से ही अच्छे संस्कार और भक्ति भाव का विकास होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ और उसकी व्याख्या को विभिन्न प्रामाणिक शिव स्तोत्रों, शिव पुराण के प्रसंगों और सनातन भक्ति परंपरा के ग्रंथों के आलोक में तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध, त्रुटिहीन और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध सामग्री पहुंचाना है ताकि उनकी श्रद्धा और ज्ञान दोनों में वृद्धि हो सके।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • शिव पुराण: कोटिरुद्रसंहिता एवं विद्येश्वरसंहिता (शिव महिमा और लिंगोत्पत्ति प्रसंग)।
  • श्रीमद्भगवद्गीता: समत्व योग और शरणागति के सिद्धांत।
  • पारंपरिक भजन संग्रह: सनातन धर्म की मौखिक और लिखित संकीर्तन परंपरा।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 12 Oct 2026

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