सभी अध्याय अध्याय 2 | 72 श्लोक

सांख्य योग (Sankhya Yoga)

दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन के मोह का निवारण करते हुए सांख्य योग (ज्ञानयोग) और कर्मयोग का उपदेश देते हैं। यह अध्याय गीता का सार माना जाता है।

परिचय / Introduction

अध्याय १ में अर्जुन के विषाद के बाद, अब वह युद्ध न करने का निर्णय ले चुके हैं और श्रीकृष्ण से मार्गदर्शन माँगते हैं। यह अध्याय गीता के उपदेश का वास्तविक आरम्भ है।

मुख्य विषय / Key Themes

  • आत्मा की अमरता (Immortality of the Soul): कृष्ण समझाते हैं कि आत्मा न जन्मती है, न मरती है – यह शाश्वत है।
  • स्वधर्म और कर्तव्य (Duty and Right Action): क्षत्रिय होने के नाते अर्जुन का धर्म युद्ध करना है, चाहे वह कितना भी कठिन क्यों न लगे।
  • कर्मयोग (Path of Selfless Action): फल की आसक्ति छोड़कर कर्तव्य-बुद्धि से कर्म करना ही श्रेयस्कर है।
  • स्थितप्रज्ञ (The Man of Steady Wisdom): जिसकी बुद्धि स्थिर है, वह सुख-दुःख, लाभ-हानि में समान रहता है – ऐसे व्यक्ति के लक्षण बताए गए हैं।

यह अध्याय हमें सिखाता है कि जीवन में संकट के समय हमें अपने कर्तव्यों से भागना नहीं चाहिए, बल्कि समता भाव से उनका पालन करना चाहिए। This chapter teaches us to face our responsibilities with equanimity, without being attached to the results.

अध्याय के सभी श्लोक

श्लोक 61

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तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः | वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||६१||

“उन सब इन्द्रियों को वश में करके योगी मुझ परमात्मा में परायण होकर बैठे (स्थित हो)। क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं, उसकी प्रज्ञा स्थिर है।”

English: Having controlled all the senses, one should remain steadfast in yoga, devoted to Me. For one whose senses are under control, his wisdom is steady.

श्लोक 62

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ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते | सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ||६२||

“विषयों का चिन्तन करते हुए पुरुष की उनमें आसक्ति उत्पन्न होती है। आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है, कामना से क्रोध उत्पन्न होता है।”

English: When a person dwells on sense objects, attachment to them arises. From attachment, desire is born. From desire, anger arises.

श्लोक 63

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क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः | स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ||६३||

“क्रोध से मोह उत्पन्न होता है, मोह से स्मृति-भ्रम होता है, स्मृति-भ्रम से बुद्धि का नाश होता है, और बुद्धि-नाश से मनुष्य नष्ट (पतित) हो जाता है।”

English: From anger comes delusion; from delusion, loss of memory; from loss of memory, destruction of discrimination; from destruction of discrimination, he perishes.

श्लोक 64

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रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् | आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ||६४||

“परन्तु जो पुरुष राग-द्वेष से रहित, अपने वश में की हुई इन्द्रियों द्वारा विषयों को भोगता हुआ (व्यवहार करता हुआ) वश में किए हुए अन्तःकरण वाला होता है, वह प्रसाद (शान्ति) को प्राप्त होता है।”

English: But a person who, being free from attraction and repulsion, controls his senses through the self and governs his senses, attains peace.

श्लोक 65

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प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते | प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ||६५||

“उस प्रसाद (शान्ति) के प्राप्त होने पर इसके (साधक के) सब दुःखों का नाश हो जाता है, क्योंकि प्रसन्न चित्त वाले की बुद्धि शीघ्र ही स्थिर हो जाती है।”

English: In that peace, all sorrows are destroyed. For the intellect of one who is peaceful and content soon becomes steady.

श्लोक 66

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नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना | न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ||६६||

“अयुक्त (असंयत) पुरुष की न तो बुद्धि होती है, न भावना (ध्यान) होती है, और न ध्यान किए बिना शान्ति होती है। अशान्त को सुख कहाँ?”

English: One who is not connected with the Supreme (through yoga) has neither steady intellect nor meditation. Without meditation, there is no peace. Without peace, how can there be happiness?

श्लोक 67

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इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते | तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ||६७||

“जैसे जल में नाव को प्रबल वायु उड़ा ले जाती है, वैसे ही विचरती हुई इन्द्रियों में से जिस एक का मन अनुगमन करता है, वह उसकी प्रज्ञा को हर लेती है।”

English: Just as a boat on the water is swept away by a strong wind, the mind that follows the wandering senses carries away one's discrimination.

श्लोक 68

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तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः | इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||६८||

“इसलिए हे महाबाहो! जिस पुरुष की इन्द्रियाँ इन्द्रिय-विषयों से सब प्रकार से रोक ली गई हैं, उसकी प्रज्ञा स्थिर है।”

English: Therefore, O mighty-armed, one whose senses are completely restrained from their objects – his wisdom is steady.

श्लोक 69

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या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी | यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ||६९||

“समस्त प्राणियों के लिए जो रात्रि (अज्ञान) है, उसमें संयमी पुरुष जागता है। जिस (विषय-भोग) में सब प्राणी जागते हैं, वह आत्मदर्शी मुनि के लिए रात्रि (अज्ञान) है।”

English: That which is night to all beings, in that the self-controlled man keeps awake. That in which all beings are awake, that is night to the sage who sees.

श्लोक 70

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आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् | तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ||७०||

“जैसे नदियाँ भरते हुए भी अचल समुद्र में प्रवेश करती हैं, वैसे ही जिस (स्थितप्रज्ञ) में सब कामनाएँ प्रवेश करती हैं, वह शान्ति को प्राप्त होता है, न कि कामनाओं का चाहने वाला (कामी)।”

English: He attains peace into whom all desires flow like rivers into the ocean, which, though ever being filled, remains unmoved – not he who desires objects.

श्लोक 71

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विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः | निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ||७१||

“जो पुरुष सब कामनाओं को त्यागकर निःस्पृह (इच्छारहित), निर्मम (ममतारहित) और निरहङ्कार (अहंकाररहित) होकर आचरण करता है, वह शान्ति को प्राप्त होता है।”

English: That person who abandons all desires and acts free from craving, without any sense of mineness or egoism, attains peace.

श्लोक 72

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एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति | स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ||७२||

“हे पार्थ! यह ब्राह्मी स्थिति (ब्रह्म में स्थिति) है। इसे प्राप्त करके मनुष्य मोहित नहीं होता। इस स्थिति में स्थित होकर अन्तकाल में भी वह ब्रह्म-निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त हो जाता है।”

English: O Partha, this is the state of being established in Brahman. One does not become deluded after attaining this. Being established in this state even at the end of life, one attains oneness with Brahman.