श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 68

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 38 मिनट का पठन 131 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः | इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||६८||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
तस्मात्
इसलिए
यस्य
जिसके
महाबाहो
हे महाबाहो
निगृहीतानि
रोके गए
सर्वशः
सब प्रकार से
इन्द्रियाणि
इन्द्रियाँ
इन्द्रियार्थेभ्यः
इन्द्रियों के विषयों से
तस्य
उसकी
प्रज्ञा
प्रज्ञा
प्रतिष्ठिता
स्थिर है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

इसलिए हे महाबाहो! जिस पुरुष की इन्द्रियाँ इन्द्रिय-विषयों से सब प्रकार से रोक ली गई हैं, उसकी प्रज्ञा स्थिर है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) का यह ६८वां श्लोक मानव चेतना के परम उत्कर्ष और मानसिक स्थिरता का एक अनुपम व्यावहारिक सूत्र है। इस श्लोक में जगद्गुरु भगवान श्री कृष्ण अपने प्रिय सखा और शिष्य अर्जुन को संबोधित करते हुए 'स्थितप्रज्ञ' यानी स्थिर बुद्धि वाले पुरुष के अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण लक्षण को स्पष्ट कर रहे हैं। भारतीय सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में मन की चंचलता को समस्त दुखों का कारण माना गया है। जब तक मनुष्य की इन्द्रियाँ बाहरी भौतिक विषयों की ओर अनियंत्रित होकर भागती रहेंगी, तब तक आंतरिक शांति और आत्मज्ञान की प्राप्ति असंभव है। इस श्लोक का ब्रह्मांडीय और आध्यात्मिक महत्व इस बात में निहित है कि यह हमें केवल दार्शनिक सिद्धांत नहीं सिखाता, बल्कि जीवन जीने की एक अत्यंत व्यावहारिक कला प्रदान करता है। आधुनिक युग में, जहाँ ध्यान भटकाने वाले अनगिनत साधन उपलब्ध हैं, यह श्लोक मानसिक एकाग्रता, आत्म-नियंत्रण और अवसाद से मुक्ति का एक अचूक मार्गदर्शक बनकर उभरता है। यहाँ 'महाबाहो' शब्द का प्रयोग अर्जुन की शारीरिक और मानसिक शक्ति को रेखांकित करने के लिए किया गया है, जो यह दर्शाता है कि इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करना किसी महान योद्धा के पराक्रम से कम नहीं है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

"तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः |"

"इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||६८||"


tasmād yasya mahā-bāho nigṛhītāni sarvaśaḥ |
indriyāṇīndriyārthebhyas tasya prajñā pratiṣṭhitā ||

श्लोक साधना एवं जप की प्रामाणिक विधि:

इस अत्यंत प्रभावशाली श्लोक का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए साधक को एक निश्चित विधि का पालन करना चाहिए। इस विधि से किया गया जप मन को तुरंत शांत करता है और बुद्धि को तीक्ष्ण बनाता है:

  • शुभ मुहूर्त: प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व सुबह ४:०० से ६:०० बजे) में इस श्लोक का पाठ करना सर्वोत्तम माना गया है।
  • आसन और दिशा: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर सुखासन या पद्मासन में बैठें।
  • प्राणायाम: जप प्रारंभ करने से पूर्व ३ से ५ बार गहरी सांस लें और छोड़ें (अनुलोम-विलोम प्राणायाम करें) ताकि नाड़ियाँ शुद्ध हो सकें।
  • ध्यान का केंद्र: अपने दोनों भौंहों के मध्य (आज्ञा चक्र) पर ध्यान केंद्रित करते हुए इस श्लोक का कम से कम २१ या १०८ बार स्पष्ट उच्चारण के साथ मानसिक या वाचिक जप करें।
  • समर्पण भाव: जप के अंत में भगवान श्री कृष्ण के चरणों में अपनी समस्त इन्द्रियों और बुद्धि को समर्पित करने की प्रार्थना करें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में गहन दार्शनिक रहस्य छिपे हुए हैं। नीचे दी गई तालिका के माध्यम से प्रत्येक पद के शाब्दिक और आध्यात्मिक अर्थ को विस्तार से समझा जा सकता है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
तस्मात् (tasmāt) इस कारण से / अतः यह शब्द पिछले श्लोकों के निष्कर्ष को दर्शाता है, जहाँ भगवान ने बताया था कि अनियंत्रित इन्द्रियाँ मनुष्य के विवेक को हर लेती हैं।
यस्य (yasya) जिस पुरुष की / जिसके द्वारा यह उस साधक या योगी की ओर संकेत करता है जिसने आत्म-साक्षात्कार के मार्ग पर चलने का दृढ़ संकल्प लिया है।
महाबाहो (mahā-bāho) हे विशाल भुजाओं वाले (अर्जुन) शारीरिक बल के साथ-साथ यहाँ मानसिक और आत्मिक बल की ओर संकेत है। इन्द्रियों को जीतना केवल एक वीर पुरुष के ही वश में है।
निगृहीतानि (nigṛhītāni) भली-भांति वश में की हुई इसका अर्थ इन्द्रियों का बलपूर्वक दमन नहीं, बल्कि विवेकपूर्वक उन्हें सही दिशा में मोड़ना और नियंत्रित करना है।
सर्वशः (sarvaśaḥ) सब प्रकार से / पूर्ण रूप से नियंत्रण आंशिक नहीं होना चाहिए। यदि एक भी इन्द्रिय अनियंत्रित रह जाए, तो वह बुद्धि को विचलित कर सकती है। अतः पूर्ण नियंत्रण आवश्यक है।
इन्द्रियाणि (indriyāṇi) समस्त ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) और पाँच कर्मेन्द्रियाँ जो बाहरी जगत से संपर्क स्थापित करती हैं।
इन्द्रियार्थेभ्यः (indriya-arthebhyaḥ) इन्द्रियों के विषयों से रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्श जैसे भौतिक विषय जो मन को अपनी ओर आकर्षित करते हैं और वासना उत्पन्न करते हैं।
तस्य (tasya) उस पुरुष की उस विशेष साधक की जिसने इस कठिन साधना को सिद्ध कर लिया है।
प्रज्ञा (prajñā) बुद्धि / दिव्य विवेक चेतना साधारण बुद्धि नहीं, बल्कि वह उच्च विवेक जो सत्य और असत्य, नित्य और अनित्य में भेद करने में सक्षम है।
प्रतिष्ठिता (pratiṣṭhitā) स्थिर है / सुदृढ़ रूप से स्थापित है ऐसी बुद्धि जो किसी भी परिस्थिति (सुख-दुख, लाभ-हानि) में विचलित नहीं होती और परमात्मा में लीन रहती है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के भीषण कुरुक्षेत्र युद्ध से जुड़ी हुई है। जब धर्म और अधर्म के बीच युद्ध की घोषणा हो चुकी थी, तब अर्जुन अपने ही सगे-संबंधियों को शत्रु पक्ष में देखकर मोहग्रस्त और विषादग्रस्त हो गए थे। उन्होंने अपने धनुष 'गांडीव' को रख दिया और युद्ध करने से मना कर दिया। अर्जुन की इस मानसिक स्थिति को दूर करने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें गीता का अमर उपदेश दिया।

द्वितीय अध्याय के इस भाग में, अर्जुन भगवान से पूछते हैं कि 'स्थितप्रज्ञ' (स्थिर बुद्धि वाले व्यक्ति) के क्या लक्षण होते हैं? वह कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है? ("स्थितप्रज्ञस्य का भाषा...")। भगवान श्री कृष्ण इन प्रश्नों का उत्तर देते हुए बताते हैं कि एक सामान्य मनुष्य और एक सिद्ध योगी में क्या अंतर है।

इस संदर्भ में एक सुंदर शास्त्रीय रूपक 'कछुए' (कूर्म) का आता है। जिस प्रकार एक कछुआ किसी भी संकट की आहट पाते ही अपने सभी अंगों को अपने कठोर कवच के भीतर समेट लेता है, उसी प्रकार एक बुद्धिमान व्यक्ति सांसारिक विषयों के संपर्क में आते ही अपनी इन्द्रियों को तुरंत समेट लेता है।

रामायण में भी गोस्वामी तुलसीदास जी ने इन्द्रिय निग्रह के महत्व को प्रतिपादित किया है। जब तक मन रूपी रावण की नाभि में स्थित अमृत (इन्द्रिय संयम) सुरक्षित नहीं होता, तब तक वासनाओं का अंत नहीं हो सकता। उपनिषदों (जैसे कठोपनिषद) में शरीर को एक रथ माना गया है, जिसमें इन्द्रियाँ घोड़े हैं, मन लगाम है, बुद्धि सारथी है और आत्मा रथी है। यदि सारथी (बुद्धि) कमजोर हो और लगाम (मन) ढीली हो, तो घोड़े (इन्द्रियाँ) रथ को विनाश की खाई में गिरा देते हैं। इसलिए, भगवान कृष्ण अर्जुन को 'महाबाहो' कहकर पुकारते हैं, जिसका अर्थ है कि हे महान योद्धा! जैसे तुमने बाहरी शत्रुओं पर विजय प्राप्त की है, वैसे ही अपनी आंतरिक इन्द्रियों रूपी शत्रुओं पर विजय प्राप्त करो, तभी तुम्हारी प्रज्ञा (बुद्धि) प्रतिष्ठित हो पाएगी।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस श्लोक का श्रद्धापूर्वक चिंतन, मनन और जप करने से साधक को निम्नलिखित अद्भुत आध्यात्मिक, मानसिक और व्यावहारिक लाभ प्राप्त होते हैं:

१. मानसिक शांति और स्थिरता

यह श्लोक मन के अनियंत्रित भटकाव को रोकता है, जिससे साधक को गहरी आंतरिक शांति और मानसिक स्थिरता का अनुभव होता है।

२. एकाग्रता और फोकस में अभूतपूर्व वृद्धि

विद्यार्थियों और पेशेवरों के लिए इसका जप अत्यंत लाभकारी है। यह ध्यान को केंद्रित करने और विचलनों को दूर करने में मदद करता है।

३. तनाव, अवसाद और चिंता से मुक्ति

जब इन्द्रियाँ विषयों से हट जाती हैं, तो व्यर्थ की इच्छाएँ समाप्त हो जाती हैं, जिससे आधुनिक जीवन का सबसे बड़ा रोग 'तनाव' स्वतः ही नष्ट हो जाता है।

४. आत्म-नियंत्रण और इच्छाशक्ति का विकास

यह श्लोक साधक के भीतर एक अभूतपूर्व संकल्प शक्ति (Will Power) का संचार करता है, जिससे वह बुरी आदतों पर आसानी से विजय पा लेता है।

५. सकारात्मक ऊर्जा और आभा मंडल (Aura) की शुद्धि

नियमित जप से शरीर के चारों ओर एक सुरक्षात्मक सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण होता है, जो नकारात्मक शक्तियों को दूर रखती है।

६. विवेक और निर्णय क्षमता में सुधार

स्थिर बुद्धि (प्रज्ञा) के जाग्रत होने से व्यक्ति जीवन के कठिन से कठिन मोड़ों पर भी सही और धर्मसम्मत निर्णय लेने में सक्षम होता है।

७. संचित कर्मों की शुद्धि

निष्काम भाव से इस श्लोक का चिंतन करने से साधक के पूर्व जन्मों के बुरे संस्कारों और कर्मों का क्षय होने लगता है।

८. भगवद-कृपा और आत्मज्ञान की प्राप्ति

यह श्लोक सीधे मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है। इसके निरंतर अभ्यास से साधक भगवान श्री कृष्ण की अनन्य भक्ति और सामीप्य प्राप्त करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह विश्लेषण 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' के अंतर्गत प्रस्तुत किया गया है। इस व्याख्या को तैयार करने के लिए प्रस्थानत्रयी के प्रमुख ग्रंथों, विशेषकर श्रीमद्भगवद्गीता के शांकरभाष्य (आदि शंकराचार्य कृत), रामानुजभाष्य और आधुनिक युग के महान संतों के प्रवचनों का गहन अध्ययन किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक बिना किसी मिलावट के, शुद्ध और सरल भाषा में वैदिक ज्ञान को पहुँचाना है। यह सामग्री न केवल आध्यात्मिक जिज्ञासुओं के लिए बल्कि अकादमिक शोधकर्ताओं के लिए भी एक प्रामाणिक संदर्भ के रूप में उपयोगी है। यहाँ दी गई साधना विधियाँ और दार्शनिक व्याख्याएँ सनातन परंपरा के अनुकूल हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

'महाबाहो' का अर्थ है 'विशाल और शक्तिशाली भुजाओं वाला'। भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को याद दिला रहे हैं कि जिस प्रकार उन्होंने अपनी शारीरिक शक्ति से बड़े-बड़े योद्धाओं को परास्त किया है, उसी प्रकार उन्हें अपनी आंतरिक मानसिक शक्ति का उपयोग करके अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करनी होगी। यह संबोधन अर्जुन के भीतर आत्मविश्वास जगाने के लिए किया गया है।

इसका व्यावहारिक अर्थ यह नहीं है कि हम देखना, सुनना या खाना बंद कर दें। बल्कि इसका अर्थ यह है कि हम जो भी देखें, सुनें या खाएं, उसमें हमारी आसक्ति (attachment) या द्वेष (repulsion) न हो। इन्द्रियाँ हमारे नियंत्रण में होनी चाहिए, न कि हम इन्द्रियों के नियंत्रण में हों। जब हम अपनी इच्छा से इन्द्रियों का उपयोग करते हैं और आवश्यकता न होने पर उन्हें हटा लेते हैं, वही सच्चा इन्द्रिय निग्रह है।

हाँ, बिल्कुल संभव है। श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश किसी जंगल में नहीं, बल्कि कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में दिया गया था। भगवान कृष्ण स्वयं कर्मयोगी बनने की शिक्षा देते हैं। गृहस्थ जीवन में रहते हुए अपने कर्तव्यों का निष्काम भाव से पालन करना, सुख-दुख में सम रहना और ईश्वर के प्रति समर्पित रहना ही गृहस्थ का स्थितप्रज्ञ होना है।

जिस व्यक्ति की बुद्धि स्थिर हो जाती है, वह अनुकूल परिस्थितियों में अत्यधिक हर्षित नहीं होता और प्रतिकूल परिस्थितियों में दुखी या विचलित नहीं होता। वह भय, क्रोध, लोभ और मोह से मुक्त हो जाता है। उसकी चेतना सदैव परमात्मा के चिंतन में लीन रहती है और वह सभी प्राणियों में एक ही ईश्वर का दर्शन करता है।

इन्द्रिय दमन (Suppression) का अर्थ है बलपूर्वक अपनी इच्छाओं को दबाना, जिससे वे मन के भीतर दबी रहती हैं और बाद में उग्र रूप में प्रकट होती हैं। इसके विपरीत, इन्द्रिय संयम (Sublimation/Control) का अर्थ है विवेक और ज्ञान के द्वारा इन्द्रियों को सही दिशा देना। संयम में साधक को यह स्पष्ट समझ होती है

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

इसलिए हे महाबाहो! जिस पुरुष की इन्द्रियाँ इन्द्रिय-विषयों से सब प्रकार से रोक ली गई हैं, उसकी प्रज्ञा स्थिर है। Therefore, O mighty-armed, one whose senses are completely restrained from their objects – his wisdom is steady.

निग्रह का महत्व / Importance of Control

इन्द्रिय-निग्रह ही स्थितप्रज्ञता का रहस्य है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 68 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 68/72 94% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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