श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 69

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 40 मिनट का पठन 142 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी | यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ||६९||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
या
जो
निशा
रात्रि
सर्वभूतानाम्
समस्त प्राणियों की
तस्याम्
उसमें
जागर्ति
जागता है
संयमी
संयमी
यस्याम्
जिसमें
जाग्रति
जागते हैं
भूतानि
प्राणी
सा
वह
निशा
रात्रि
पश्यतः
देखने वाले
मुनेः
मुनि की।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

समस्त प्राणियों के लिए जो रात्रि (अज्ञान) है, उसमें संयमी पुरुष जागता है। जिस (विषय-भोग) में सब प्राणी जागते हैं, वह आत्मदर्शी मुनि के लिए रात्रि (अज्ञान) है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) का ६९वां श्लोक मानव चेतना, आध्यात्मिक जागृति और सांसारिक दृष्टिकोण के बीच के मूलभूत अंतर को दर्शाने वाला एक अत्यंत दिव्य और रहस्यमयी सूत्र है। यह श्लोक केवल एक धार्मिक उपदेश नहीं है, बल्कि यह मानव मन के मनोविज्ञान और ब्रह्मांडीय सत्य का एक ऐसा वैज्ञानिक विश्लेषण है जो हमें अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के परम प्रकाश की ओर ले जाता है। इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को 'स्थितप्रज्ञ' (स्थिर बुद्धि वाले पुरुष) के लक्षणों को समझाते हुए एक अत्यंत सुंदर रूपक (Metaphor) का उपयोग किया है। यहाँ 'रात्रि' और 'दिवस' का उपयोग भौतिक समय के संदर्भ में नहीं, बल्कि चेतना के स्तरों के संदर्भ में किया गया है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से, यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि जिसे साधारण मनुष्य जीवन की वास्तविकता, सुख और प्रगति मानता है, वह वास्तव में आत्मा के स्तर पर एक गहरी नींद या अज्ञान की रात्रि है। इसके विपरीत, जिसे सांसारिक लोग नीरस, कठिन या शून्य मानते हैं—जैसे आत्म-संयम, ध्यान, और ईश्वर-चिन्तन—वही वास्तव में परम सत्य की जागृति है। इस श्लोक का निरंतर मनन करने से साधक के भीतर विवेक (सही और गलत के बीच अंतर करने की क्षमता) का उदय होता है, जिससे वह सांसारिक मोह-माया के बंधनों से मुक्त होकर शाश्वत आनंद की प्राप्ति की ओर अग्रसर होता है। यह श्लोक जीवन जीने की कला का वह सर्वोच्च शिखर है जो हमें अशांति के बीच भी परम शांति का अनुभव कराता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

॥ मूल श्लोक ॥

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।

यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥ ६९ ॥

श्रीमद्भगवद्गीता - द्वितीय अध्याय (सांख्ययोग), श्लोक ६९

पठन एवं ध्यान की प्रामाणिक विधि:

इस श्लोक का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए साधक को एक निश्चित विधि का पालन करना चाहिए। यह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं है, बल्कि एक गहन ध्यान प्रक्रिया है:

  • समय: ब्रह्ममुहूर्त (प्रातः ४:०० से ६:०० बजे) या संध्याकाल में इस श्लोक का पाठ और चिंतन सर्वोत्तम माना गया है।
  • आसन: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके सुखासन, सिद्धासन या पद्मासन में बैठें। रीढ़ की हड्डी को सीधा रखें।
  • प्राणायाम: श्लोक के उच्चारण से पूर्व ३ से ५ बार गहरे अनुलोम-विलोम प्राणायाम का अभ्यास करें ताकि मन शांत हो सके।
  • उच्चारण: श्लोक का उच्चारण अत्यंत स्पष्ट, धीमा और लयबद्ध होना चाहिए। प्रत्येक शब्द के कंपन को अपने हृदय में महसूस करें।
  • मनन (चिंतन): उच्चारण के पश्चात कम से कम ५ मिनट तक शांत बैठकर इसके अर्थ पर विचार करें कि कैसे आप अपने दैनिक जीवन में इंद्रिय-संयम को अपना सकते हैं।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में ज्ञान का एक महासागर छिपा हुआ है। नीचे दी गई तालिका के माध्यम से हम इसके शाब्दिक और आध्यात्मिक अर्थों को गहराई से समझेंगे:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
या (Yā) जो / जिस यह उस अवस्था या परिस्थिति की ओर संकेत करता है जो अज्ञान और ज्ञान के बीच विभाजन रेखा खींचती है।
निशा (Niśā) रात्रि / अंधकार सांसारिक मनुष्यों के लिए जो आत्मज्ञान की अवस्था है, वह अंधकारमय रात्रि के समान अदृश्य और अज्ञात है।
सर्वभूतानाम् (Sarvabhūtānām) समस्त प्राणियों के लिए इसमें वे सभी जीव शामिल हैं जो केवल अपनी इंद्रियों के स्तर पर जीते हैं और भौतिक संसार को ही अंतिम सत्य मानते हैं।
तस्याम् (Tasyām) उसमें (उस रात्रि में) अर्थात उस आत्मज्ञान और परमात्मा के चिंतन की अवस्था में, जो आम लोगों के लिए सुप्त है।
जागर्ति (Jāgarti) जागता है / सचेत रहता है संयमी पुरुष उस आध्यात्मिक सत्य के प्रति पूर्णतः जागरूक, सचेत और क्रियाशील रहता है।
संयमी (Saṁyamī) जितेंद्रिय / आत्म-नियंत्रित योगी वह साधक जिसने अपनी इंद्रियों और मन को वश में कर लिया है और जो वासनाओं के अधीन नहीं है।
यस्याम् (Yasyām) जिसमें (जिस अवस्था में) अर्थात भौतिक सुखों, भोग-विलास और सांसारिक प्रपंचों की अवस्था में।
जाग्रति (Jāgrati) जागते हैं / लिप्त रहते हैं सांसारिक लोग रात-दिन भौतिक धन, मान-सम्मान और इंद्रिय तृप्ति के लिए संघर्ष करते और जागते रहते हैं।
भूतानि (Bhūtāni) साधारण जीव / अज्ञानी जन वे लोग जो केवल शरीर और मन के स्तर पर जीते हैं, आत्मा के अस्तित्व से अनभिज्ञ हैं।
सा (Sā) वह (सांसारिक जागृति) भौतिक जगत की वह चमक-दमक और भागदौड़ जिसे दुनिया 'जीवन' कहती है।
निशा (Niśā) रात्रि (अज्ञान की नींद) तत्वदर्शी मुनि के लिए यह सांसारिक प्रपंच केवल एक स्वप्न या अज्ञान की अंधकारमयी रात्रि के समान व्यर्थ है।
पश्यतः मुनेः (Paśyataḥ Muneḥ) सत्य को देखने वाले ज्ञानी के लिए वह मुनि या योगी जो सत्य का साक्षात दर्शन करता है, उसके लिए यह भौतिक संसार अपनी वास्तविकता खो देता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के मैदान से जुड़ी है। अर्जुन जब अपने ही सगे-संबंधियों को युद्ध भूमि में सामने खड़ा देखता है, तो वह अत्यंत व्याकुल, भ्रमित और विषादग्रस्त हो जाता है। वह अपने धनुष 'गांडीव' को रख देता है और युद्ध करने से मना कर देता है। अर्जुन का यह विषाद वास्तव में हर उस साधारण मनुष्य का प्रतिनिधित्व करता है जो मोह, ममता और अज्ञान के वश में होकर अपने जीवन के वास्तविक कर्तव्य (धर्म) को भूल जाता है।

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के इस अज्ञान को दूर करने के लिए उसे सांख्य योग का उपदेश देते हैं। वे समझाते हैं कि शरीर नश्वर है और आत्मा अमर है। इसी क्रम में अर्जुन भगवान से पूछते हैं कि हे केशव! जो व्यक्ति इस परम ज्ञान को प्राप्त कर लेता है, उस 'स्थितप्रज्ञ' पुरुष के क्या लक्षण होते हैं? वह कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है? ("स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव...")।

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के इसी प्रश्न का उत्तर देते हुए इस ६९वें श्लोक को कहते हैं। वे समझाते हैं कि एक साधारण मनुष्य और एक आत्मज्ञानी मुनि के दृष्टिकोण में जमीन-आसमान का अंतर होता है। पौराणिक ग्रंथों और उपनिषदों में भी इस विचार की पुष्टि मिलती है। उदाहरण के लिए, कठोपनिषद में 'श्रेय' (जो कल्याणकारी है) और 'प्रेय' (जो केवल प्रिय लगता है) का वर्णन आता है। साधारण मनुष्य 'प्रेय' यानी क्षणिक भौतिक सुखों के पीछे भागता है, जो वास्तव में अज्ञान की रात्रि है। जबकि धीर पुरुष 'श्रेय' यानी शाश्वत आध्यात्मिक मार्ग को चुनता है।

इस श्लोक का ऐतिहासिक और दार्शनिक महत्व आदि शंकराचार्य, संत ज्ञानेश्वर और स्वामी विवेकानंद जैसे महान युगपुरुषों के व्याख्यानों में भी झलकता है। आदि शंकराचार्य ने अपने 'गीता भाष्य' में स्पष्ट किया है कि जब तक मनुष्य संसार में जाग रहा है, तब तक वह अपनी वास्तविक आत्म-स्वरूप में सो रहा है। जैसे ही वह आत्म-स्वरूप में जागता है, संसार उसके लिए एक स्वप्न की भांति शांत और अर्थहीन हो जाता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि आध्यात्मिक उन्नति का अर्थ संसार को छोड़ना नहीं, बल्कि संसार के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदलना है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस दिव्य श्लोक का नियमित रूप से पाठ, मनन और चिंतन करने से साधक को निम्नलिखित अद्भुत मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

१. मानसिक शांति और तनाव से मुक्ति

यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि सांसारिक उतार-चढ़ाव क्षणिक हैं। इस समझ से मन में गहरी शांति का उदय होता है और मानसिक तनाव पूरी तरह समाप्त हो जाता है।

२. इंद्रिय संयम और आत्म-नियंत्रण

नियमित चिंतन से साधक की काम, क्रोध, लोभ और मोह जैसी विकृतियों पर विजय प्राप्त करने की आंतरिक शक्ति मजबूत होती है।

३. विवेक और निर्णय क्षमता का विकास

यह श्लोक बुद्धि को कुशाग्र बनाता है, जिससे व्यक्ति जीवन के कठिन मोड़ों पर सही और गलत का त्वरित व सटीक निर्णय लेने में सक्षम होता है।

४. सकारात्मक ऊर्जा और दिव्य आभा (Aura)

इस श्लोक के पवित्र स्पंदन साधक के चारों ओर एक सुरक्षात्मक और सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण करते हैं, जिससे नकारात्मक शक्तियां दूर रहती हैं।

५. आसक्ति और मोह का क्षय

यह श्लोक हमें यह समझने में मदद करता है कि भौतिक वस्तुएं स्थायी नहीं हैं। इससे अनावश्यक मोह-माया और रिश्तों के प्रति अति-आसक्ति कम होती है।

६. ध्यान (Meditation) में गहराई

जो साधक ध्यान का अभ्यास करते हैं, उनके लिए यह श्लोक एक उत्प्रेरक का कार्य करता है। यह मन को अंतर्मुखी बनाकर ध्यान की उच्च अवस्थाओं में ले जाता है।

७. संचित कर्मों का शुद्धिकरण

निष्काम भाव से इस श्लोक के अर्थ को जीवन में उतारने से साधक के पूर्व संचित बुरे कर्मों का प्रभाव धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।

८. भगवद-कृपा की प्रत्यक्ष अनुभूति

श्रीकृष्ण के वचनों पर अटूट विश्वास रखने से साधक के जीवन में ईश्वरीय संरक्षण और मार्गदर्शन की प्रत्यक्ष अनुभूति होने लगती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

यह विश्लेषण Bhaktilok.in के विद्वान मंडल द्वारा तैयार की गई संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इस व्याख्या को तैयार करने के लिए प्रस्थानत्रयी (उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और श्रीमद्भगवद्गीता) के प्रामाणिक भाष्यों, विशेष रूप से आदि शंकराचार्य के 'गीता भाष्य', स्वामी चिन्मयानंद की 'गीता व्याख्या' और गीता प्रेस गोरखपुर के प्रामाणिक संस्करणों का गहन अध्ययन किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक बिना किसी मिलावट के, शुद्ध और सरल भाषा में सनातन धर्म के गूढ़ रहस्यों को पहुँचाना है। यह सामग्री पाठकों के आध्यात्मिक उत्थान और मानसिक कल्याण के लिए पूरी तरह से शोध-आधारित और प्रामाणिक स्रोतों पर आधारित है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

नहीं, यहाँ 'रात्रि' का अर्थ भौतिक रात से नहीं है। यह एक रूपक (Metaphor) है। यहाँ 'रात्रि' का अर्थ 'अज्ञान' और 'अविवेक' से है। जिस प्रकार रात में कुछ दिखाई नहीं देता, उसी प्रकार सांसारिक मनुष्यों के लिए आत्मज्ञान, ईश्वर-चिन्तन और परमार्थ की बातें अदृश्य (अंधकारमय) रहती हैं। वे इसमें सोए रहते हैं। इसके विपरीत, संयमी पुरुष के लिए यही अज्ञान की रात्रि ज्ञान के प्रकाश में बदल जाती है।

'संयमी' वह व्यक्ति है जिसने अपनी पांचों ज्ञानेंद्रियों (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) और मन को वश में कर लिया है। संयमी पुरुष आत्मज्ञान, सत्य, धर्म और परमात्मा के प्रेम में जागता है। जहाँ आम लोग भौतिक सुखों के पीछे भागते हैं, वहीं संयमी पुरुष शांत रहकर अपने भीतर के आनंद (आत्मानंद) का अनुभव करता है।

बिल्कुल नहीं। श्रीमद्भगवद्गीता कर्मयोग का संदेश देती है। यह श्लोक कर्म छोड़ने के लिए नहीं, बल्कि कर्म के पीछे की 'आसक्ति' (Attachment) को छोड़ने के लिए कहता है। आप संसार में रहें, अपने सभी कर्तव्यों का पालन करें, लेकिन मानसिक रूप से उनसे इस तरह न जुड़ें कि उनके खोने पर आप दुखी हो जाएं। यही संयम की पराकाष्ठा है।

एक गृहस्थ इसे बहुत आसानी से लागू कर सकता है। जब भी आपके जीवन में सुख-दुख, लाभ-हानि या मान-अपमान की स्थिति आए, तो विचलित न हों। यह समझें कि ये सब सांसारिक प्रपंच क्षणिक हैं (जैसे स्वप्न)। अपने मन को शांत रखें, प्रतिदिन कुछ समय ध्यान और स्वाध्याय (अच्छी पुस्तकों के पठन) को दें, और अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना सीखें। यही गृहस्थ के लिए इस श्लोक का व्यावहारिक रूप है।

'पश्यतः' का अर्थ है 'देखने वाला' और 'मुनेः' का अर्थ है 'मननशील ज्ञानी'। इसका संयुक्त अर्थ है—वह ज्ञानी पुरुष जो सत्य को प्रत्यक्ष देखता है। उसके लिए यह भौतिक जगत केवल एक भ्रम या माया है। वह जानता है कि वास्तविक सुख बाहर की वस्तुओं में नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर आत्मा में है। इसलिए वह संसार के प्रपंचों को एक दर्शक की भांति देखता है, उनमें लिप्त नहीं होता।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

समस्त प्राणियों के लिए जो रात्रि (अज्ञान) है, उसमें संयमी पुरुष जागता है। जिस (विषय-भोग) में सब प्राणी जागते हैं, वह आत्मदर्शी मुनि के लिए रात्रि है। That which is night to all beings, in that the self-controlled man keeps awake. That in which all beings are awake, that is night to the sage who sees.

विपरीत ध्रुवता / Opposite Polarity

ज्ञानी और अज्ञानी के जीवन-मूल्य एक-दूसरे के विपरीत होते हैं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 69 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 69/72 96% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!