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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 70

अध्याय 2 · श्लोक 70

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् | तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ||७०||

āpūryamāṇam acala-pratiṣṭhaṃ samudram āpaḥ praviśanti yadvat | tadvat kāmā yaṃ praviśanti sarve sa śāntim āpnoti na kāma-kāmī ||70||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

आपूर्यमाणम्: भरते हुए भी; अचलप्रतिष्ठम्: अचल प्रतिष्ठा वाले; समुद्रम्: समुद्र में; आपः: जल; प्रविशन्ति: प्रवेश करते हैं; यद्वत्: जैसे; तद्वत्: वैसे ही; कामाः: कामनाएँ; यम्: जिसमें; प्रविशन्ति: प्रवेश करती हैं; सर्वे: सब; सः: वह; शान्तिम्: शान्ति; आप्नोति: प्राप्त होता है; न: नहीं; कामकामी: कामनाओं को चाहने वाला।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जैसे नदियाँ भरते हुए भी अचल समुद्र में प्रवेश करती हैं, वैसे ही जिस (स्थितप्रज्ञ) में सब कामनाएँ प्रवेश करती हैं, वह शान्ति को प्राप्त होता है, न कि कामनाओं का चाहने वाला (कामी)।

English Translation

He attains peace into whom all desires flow like rivers into the ocean, which, though ever being filled, remains unmoved – not he who desires objects.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

समुद्र का दृष्टान्त – नदियाँ आकर समुद्र में मिलती हैं, पर समुद्र अचल रहता है। वैसे ही स्थितप्रज्ञ में कामनाएँ आती हैं, पर वह अविचलित रहता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।