श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 70

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 40 मिनट का पठन 138 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् | तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ||७०||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

16 पद
आपूर्यमाणम्
भरते हुए भी
अचलप्रतिष्ठम्
अचल प्रतिष्ठा वाले
समुद्रम्
समुद्र में
आपः
जल
प्रविशन्ति
प्रवेश करते हैं
यद्वत्
जैसे
तद्वत्
वैसे ही
कामाः
कामनाएँ
यम्
जिसमें
प्रविशन्ति
प्रवेश करती हैं
सर्वे
सब
सः
वह
शान्तिम्
शान्ति
आप्नोति
प्राप्त होता है
न
नहीं
कामकामी
कामनाओं को चाहने वाला।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जैसे नदियाँ भरते हुए भी अचल समुद्र में प्रवेश करती हैं, वैसे ही जिस (स्थितप्रज्ञ) में सब कामनाएँ प्रवेश करती हैं, वह शान्ति को प्राप्त होता है, न कि कामनाओं का चाहने वाला (कामी)।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) का 70वां श्लोक सनातन धर्म, अध्यात्म और वैश्विक दर्शनशास्त्र के इतिहास में सबसे सुंदर, व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक रूप से समृद्ध श्लोकों में से एक है। यह श्लोक 'स्थितप्रज्ञ' (वह व्यक्ति जिसकी बुद्धि स्थिर और परमात्मा में लीन है) के लक्षणों और उसकी मानसिक स्थिति का वर्णन करने के लिए समुद्र का एक अत्यंत जीवंत और प्रभावशाली दृष्टांत (Metaphor) प्रस्तुत करता है। सांसारिक जीवन में मनुष्य निरंतर इच्छाओं, कामनाओं, सुख-दुःख, और मानसिक अशांति के थपेड़ों से जूझता रहता है। इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि जिस प्रकार चारों ओर से नदियां आकर समुद्र में मिलती हैं, परंतु समुद्र अपनी मर्यादा को नहीं छोड़ता, वह सदैव शांत, गंभीर और अपनी सीमाओं में अचल रहता है; ठीक उसी प्रकार एक ज्ञानी पुरुष के भीतर संसार की सभी कामनाएं और विषय-भोग प्रवेश तो करते हैं, परंतु वे उसके मन में कोई विक्षोभ या अशांति उत्पन्न नहीं कर पाते।

ऐसा ही महापुरुष परम शांति को प्राप्त करता है, जबकि कामनाओं के पीछे भागने वाला 'कामकामी' व्यक्ति कभी भी शांति का अनुभव नहीं कर सकता। यह श्लोक केवल एक आध्यात्मिक उपदेश नहीं है, बल्कि यह आधुनिक युग के तनाव, अवसाद और मानसिक अस्थिरता से जूझ रहे मानव समाज के लिए एक उत्कृष्ट 'माइंडफुलनेस' (सजगता) और मानसिक स्वास्थ्य का मार्गदर्शक सूत्र है। इसकी सांस्कृतिक और ब्रह्मांडीय प्रासंगिकता इस बात में निहित है कि यह हमें बाह्य परिस्थितियों से अप्रभावित रहकर आंतरिक आनंद और स्थिरता में जीने की कला सिखाता है। जब हम इस श्लोक के गहरे अर्थों में उतरते हैं, तो हमें समझ आता है कि वास्तविक स्वतंत्रता इच्छाओं के अभाव में नहीं, बल्कि इच्छाओं के प्रति हमारी अनासक्ति और मानसिक दृढ़ता में निहित है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥ ७० ॥

देवनागरी लिपि एवं सस्वर पाठ विधि:

इस श्लोक का पाठ अनुष्टुप छंद में किया जाता है। इसके उच्चारण में लय, यति (विराम) और वर्णों की शुद्धता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। पाठ करते समय मन को शांत रखें और प्रत्येक शब्द के स्पंदन को अपने हृदय में महसूस करें।

रोमन लिप्यंतरण (Transliteration):

āpūryamāṇam acala-pratiṣṭhaṁ
samudram āpaḥ praviśanti yadvat
tadvat kāmā yaṁ praviśanti sarve
sa śāntim āpnoti na kāma-kāmī

सस्वर पाठ एवं ध्यान की विधि:
  • आसन: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें।
  • प्राणायाम: श्लोक के पाठ से पूर्व 3 बार गहरे प्राणायाम करें ताकि मन स्थिर हो सके।
  • ध्यान: हृदय चक्र या आज्ञा चक्र पर भगवान श्रीकृष्ण के सारथी रूप का ध्यान करें।
  • आवृत्ति: इस श्लोक का प्रतिदिन कम से कम 11 या 21 बार जाप करने से मानसिक चंचलता समाप्त होती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में वेदांत दर्शन का निचोड़ छिपा हुआ है। नीचे दी गई तालिका में प्रत्येक पद का सरल अर्थ और उसका गहरा आध्यात्मिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
आपूर्यमाणम् (āpūryamāṇam) सब ओर से परिपूर्ण / स्वतः भरा हुआ यह आत्मा की पूर्णता का सूचक है। जिस प्रकार समुद्र को बाहर से किसी जल की आवश्यकता नहीं है, वह स्वयं में पूर्ण है, वैसे ही आत्मा स्वतः पूर्ण (सच्चिदानंद) है।
अचलप्रतिष्ठम् (acala-pratiṣṭham) अचल प्रतिष्ठा वाला / स्थिर मर्यादा वाला बाहरी परिस्थितियों, लहरों या नदियों के आने-जाने से समुद्र विचलित नहीं होता। ज्ञानी पुरुष का चित्त भी सुख-दुःख में अडिग रहता है।
समुद्रम् (samudram) समुद्र को / सागर को यहाँ समुद्र 'स्थितप्रज्ञ' या आत्मज्ञानी पुरुष के विशाल हृदय और चेतना का प्रतीक है, जो अनंत और असीम है।
आपः (āpaḥ) नदियाँ / जल की धाराएँ नदियाँ यहाँ संसार के विभिन्न विषयों, इंद्रिय-भोगों और बाह्य उत्तेजनाओं की प्रतीक हैं जो निरंतर मन की ओर बहती हैं।
प्रविशन्ति (praviśanti) प्रवेश करती हैं / समाहित होती हैं इच्छाएँ और विचार ज्ञानी के मन में भी आते हैं, परंतु वे वहाँ कोई हलचल पैदा किए बिना विलीन हो जाते हैं।
यद्वत् (yadvat) जिस प्रकार / जैसे यह उपमा अलंकार का सूचक है, जो भौतिक जगत के उदाहरण से आध्यात्मिक सत्य को स्पष्ट करता है।
तद्वत् (tadvat) उसी प्रकार / वैसे ही समानता दर्शाने के लिए प्रयुक्त शब्द, जो साधक को समुद्र के समान बनने की प्रेरणा देता है।
कामाः (kāmāḥ) कामनाएँ / भोग-विलास की इच्छाएँ संसार की समस्त भौतिक वस्तुएं, मान-सम्मान, क्रोध, लोभ और वासनाएं जो मनुष्य को विचलित करती हैं।
यं (yaṁ) जिस (स्थितप्रज्ञ पुरुष) में उस महापुरुष की ओर संकेत है जिसने अपनी इंद्रियों और मन को वश में कर लिया है।
सः शान्तिम् आप्नोति (saḥ śāntim āpnoti) वह परम शांति को प्राप्त करता है सच्ची शांति केवल उसी को मिलती है जो इच्छाओं का स्वामी है, उनका गुलाम नहीं।
न कामकामी (na kāma-kāmī) कामनाओं को चाहने वाला नहीं जो व्यक्ति निरंतर नई-नई इच्छाओं के पीछे भागता है, वह कभी भी शांत नहीं रह सकता। उसकी स्थिति उस नाव जैसी होती है जो तूफ़ान में बह जाती है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आता है। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में जब अर्जुन अपने ही सगे-संबंधियों को सामने देखकर मोहग्रस्त और विषादग्रस्त हो जाते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें जीवन, मृत्यु, कर्तव्य और आत्मा के अमरत्व का उपदेश देते हैं। अर्जुन का प्रश्न था कि हे केशव! समाधि में स्थित, स्थिर बुद्धि वाले मनुष्य के क्या लक्षण हैं? वह कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है? ("स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव..." - गीता 2.54)।

भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के इस प्रश्न का उत्तर द्वितीय अध्याय के 55वें श्लोक से देना प्रारंभ किया और इस 70वें श्लोक में वे उस उत्तर के चरमोत्कर्ष पर पहुँचते हैं। यहाँ श्रीकृष्ण एक अत्यंत व्यावहारिक और प्राकृतिक उदाहरण देते हैं। वर्षा ऋतु में जब सैकड़ों नदियाँ अपने उफान पर होती हैं और भारी मात्रा में जल लेकर समुद्र की ओर दौड़ती हैं, तब भी समुद्र अपनी मर्यादा नहीं लांघता। वह न तो नदियों के आने से हर्षित होकर उफनता है और ना ही ग्रीष्म ऋतु में नदियों के सूख जाने पर घटता है। वह सदैव एक समान, गंभीर और अचल रहता है।

इस पौराणिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि के पीछे उपनिषदों का भी गहरा प्रभाव है। कठोपनिषद और ईशावास्योपनिषद में भी इसी प्रकार के आत्म-नियंत्रण और पूर्णता की बात कही गई है। आदि शंकराचार्य ने अपने गीता भाष्य में इस श्लोक की व्याख्या करते हुए लिखा है कि जो व्यक्ति अज्ञानी है, वह इच्छाओं के आते ही अशांत हो जाता है, जैसे एक छोटी सी नदी या तालाब थोड़े से पानी से भी उफन जाता है या सूख जाता है। परंतु जो ब्रह्मज्ञानी है, उसका हृदय अनंत आकाश और अगाध समुद्र की तरह है। उसमें संसार की सभी अच्छी-बुरी परिस्थितियां आती हैं, परंतु वे उसमें समाकर शांत हो जाती हैं। यह श्लोक हमें सिखाता है कि संसार से भागना पलायनवाद है, जबकि संसार में रहकर भी उससे अप्रभावित रहना ही वास्तविक संन्यास और कर्मयोग है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस श्लोक का केवल बौद्धिक ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसका नियमित पाठ और इस पर मनन करने से साधक को निम्नलिखित अद्भुत लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति और तनाव से मुक्ति

इस श्लोक के नियमित चिंतन से मस्तिष्क में सकारात्मक तरंगें उत्पन्न होती हैं, जो तनाव, एंग्जायटी और अवसाद को कम करने में सहायक हैं।

2. इच्छाओं पर नियंत्रण (Self-Control)

यह श्लोक हमें सिखाता है कि इच्छाओं के पीछे भागने के बजाय उन्हें अपने भीतर विलीन कैसे करें, जिससे आत्म-नियंत्रण की शक्ति बढ़ती है।

3. सकारात्मक आभा (Positive Aura) का निर्माण

जो साधक इस श्लोक के अर्थ में जीता है, उसके चारों ओर एक शांत और चुंबकीय आभा मंडल (Aura) का निर्माण होता है जो दूसरों को भी शांति प्रदान करता है।

4. निर्णय लेने की क्षमता में सुधार

जब मन समुद्र की तरह शांत और अचल होता है, तब भ्रम दूर हो जाते हैं और व्यक्ति कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सही निर्णय ले पाता है।

5. कर्मों की शुद्धि और निष्काम कर्मयोग

यह श्लोक फल की आसक्ति को समाप्त कर कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है, जिससे संचित कर्मों का क्षय होता है।

6. आध्यात्मिक जागृति और आत्म-साक्षात्कार

यह श्लोक साधक को उसकी वास्तविक पहचान (आत्मा) का बोध कराता है, जो सदैव पूर्ण और आनंदमय है।

7. भावनात्मक संतुलन (Emotional Intelligence)

क्रोध, ईर्ष्या, और लोभ जैसी नकारात्मक भावनाएं साधक को विचलित नहीं कर पातीं। वह हर परिस्थिति में समभाव रहता है।

8. दैवीय कृपा और सुरक्षा कवच

गीता के श्लोकों का पाठ साक्षात भगवान श्रीकृष्ण के वचनों का संस्पर्श है, जो साधक को हर प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा से बचाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

यह विश्लेषण 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' के अंतर्गत आता है, जिसे सनातन धर्म के प्रामाणिक ग्रंथों, प्रस्थानत्रयी (उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और भगवद्गीता) तथा पूज्य आचार्यों के भाष्यों के गहन अध्ययन के पश्चात संकलित किया गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक की प्रामाणिकता महाभारत के भीष्म पर्व में पूर्णतः सिद्ध है। आधुनिक मनोविज्ञान भी अब इस बात को स्वीकार करता है कि 'बाहरी उत्तेजनाओं के प्रति हमारी प्रतिक्रिया ही हमारे दुःख का कारण है, न कि स्वयं वे उत्तेजनाएं'। यह श्लोक हमें 'रिएक्ट' (प्रतिक्रिया) करने के बजाय 'रिस्पॉन्ड' (सजग उत्तर) देने की कला सिखाता है। हमारी संपादकीय टीम ने इस बात का विशेष ध्यान रखा है कि श्लोक के मूल व्याकरण, संस्कृत ध्वनि-विज्ञान और दार्शनिक गरिमा के साथ कोई समझौता न हो। यह सामग्री पाठकों के आध्यात्मिक उत्थान और मानसिक कल्याण के लिए पूरी श्रद्धा और शोध के साथ प्रस्तुत की गई है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

समुद्र अपनी विशालता, गहराई और स्थिरता के लिए जाना जाता है। नदियाँ चाहे कितना भी जल लेकर आएँ, समुद्र न तो अपनी सीमा लांघता है और न ही अशांत होता है। इसी प्रकार, एक ज्ञानी या स्थितप्रज्ञ पुरुष का मन इतना विशाल और गहरा होता है कि संसार की सभी इच्छाएं, सुख-दुःख और परिस्थितियां उसमें आती तो हैं, परंतु वे उसे विचलित किए बिना उसी में विलीन हो जाती हैं। इसलिए समुद्र का उदाहरण सर्वोत्तम है।

'कामकामी' का अर्थ है वह व्यक्ति जो निरंतर नई-नई इच्छाओं, वासनाओं और भौतिक सुखों के पीछे भागता रहता है। ऐसा व्यक्ति एक इच्छा पूरी होने पर दूसरी इच्छा के जाल में फंस जाता है। उसकी स्थिति उस छोटे तालाब जैसी होती है जो जरा सी बारिश में उफन जाता है और गर्मी में सूख जाता है। इच्छाओं की यह अंतहीन दौड़ ही उसके अशांत मन का मुख्य कारण है।

नहीं, गीता हमें कर्मशून्य या इच्छाशून्य होने के लिए नहीं कहती। इच्छाओं का उठना मन का स्वाभाविक धर्म है। महत्वपूर्ण यह है कि हम उन इच्छाओं के गुलाम न बनें। जब इच्छाएं हमारे नियंत्रण में होती हैं और हम उनके पूरे होने या न होने पर दुखी नहीं होते, तो वे इच्छाएं हमें बांधती नहीं हैं। यही अनासक्ति है, जिसे इस श्लोक में दर्शाया गया है।

दैनिक जीवन में इसे लागू करने के लिए: 1. जब भी कोई विपरीत परिस्थिति आए, तुरंत प्रतिक्रिया (React) न करें, बल्कि कुछ क्षण रुककर शांत मन से विचार करें। 2. अपनी खुशियों को बाहरी वस्तुओं या लोगों की स्वीकृति पर निर्भर न रखें। 3. प्रतिदिन ध्यान और स्वाध्याय करें ताकि आपका आंतरिक 'समुद्र' मजबूत और गहरा हो सके।

इस श्लोक का पाठ करने का सबसे उत्तम समय ब्रह्ममुहूर्त (सुबह 4 से 6 बजे) या संध्या

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जैसे नदियाँ भरते हुए भी अचल समुद्र में प्रवेश करती हैं, वैसे ही जिसमें सब कामनाएँ प्रवेश करती हैं, वह शान्ति पाता है, न कि कामनाओं को चाहने वाला। He attains peace into whom all desires flow like rivers into the ocean, which remains unmoved – not he who desires objects.

अचलता / Steadiness

स्थितप्रज्ञ कामनाओं के आने पर भी अविचलित रहता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 70 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 70/72 97% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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