श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 71

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 43 मिनट का पठन 123 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः | निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ||७१||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
विहाय
त्यागकर
कामान्
कामनाओं को
यः
जो
सर्वान्
सब
पुमान्
पुरुष
चरति
आचरण करता है
निःस्पृहः
निःस्पृह (इच्छारहित)
निर्ममः
ममतारहित
निरहङ्कारः
अहंकाररहित
सः
वह
शान्तिम्
शान्ति
अधिगच्छति
प्राप्त होता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो पुरुष सब कामनाओं को त्यागकर निःस्पृह (इच्छारहित), निर्मम (ममतारहित) और निरहङ्कार (अहंकाररहित) होकर आचरण करता है, वह शान्ति को प्राप्त होता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय 'सांख्य योग' का यह 71वाँ श्लोक केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि मानव मनोविज्ञान और आध्यात्मिक मुक्ति का संपूर्ण घोषणापत्र है। जब हम संसार की आपाधापी, तनाव और मानसिक अशांति के कारणों की खोज करते हैं, तो भगवान श्रीकृष्ण का यह उपदेश एक प्रकाश स्तंभ की भांति हमारा मार्गदर्शन करता है। इस श्लोक में 'शांति' (Peace) की प्राप्ति के लिए उन चार स्तंभों का वर्णन किया गया है, जो किसी भी साधक के जीवन को आमूल-चूल परिवर्तित कर सकते हैं: कामनाओं का त्याग, स्पृहा-रहित आचरण, ममता का विसर्जन और अहंकार का पूर्ण अभाव।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से यह श्लोक 'स्थितप्रज्ञ' (Steady Wisdom) के लक्षणों का उपसंहार है। अर्जुन ने भगवान से पूछा था कि एक स्थिर बुद्धि वाला व्यक्ति कैसे चलता है, कैसे बोलता है और कैसे बैठता है? उसी जिज्ञासा के उत्तर में श्रीकृष्ण यहाँ जीवन जीने की उस कला का वर्णन कर रहे हैं, जहाँ व्यक्ति संसार में रहते हुए भी संसार के विकारों से अछूता रहता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि शांति बाहर की वस्तुओं में नहीं, बल्कि भीतर के 'त्याग' में निहित है। जब तक हृदय में 'मैं' और 'मेरा' का कोलाहल है, तब तक परम शांति का अनुभव असंभव है।

आज के आधुनिक युग में, जहाँ उपभोगवाद (Consumerism) चरम पर है, यह श्लोक और भी प्रासंगिक हो जाता है। यह हमें बताता है कि इच्छाओं की पूर्ति शांति का मार्ग नहीं है, बल्कि इच्छाओं का नियमन और उनका आत्म-स्वरूप में विलीनीकरण ही वास्तविक आनंद का स्रोत है। इस व्यापक मार्गदर्शिका में, हम इस श्लोक के एक-एक शब्द की गहराई में उतरेंगे और यह समझेंगे कि कैसे एक साधारण मनुष्य भी इन दिव्य गुणों को आत्मसात कर परम शांति (The Supreme Peace) को प्राप्त कर सकता है। यह यात्रा केवल शब्दों की नहीं, बल्कि स्वयं से स्वयं के साक्षात्कार की है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।

निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ॥ ७१ ॥


vihāya kāmān yaḥ sarvān pumāṁś carati niḥspṛhaḥ |
nirmamo nirahaṅkāraḥ sa śāntim adhigacchati || 71 ||

सरल हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य संपूर्ण कामनाओं को त्यागकर, ममता रहित, अहंकार रहित और स्पृहा (लालसा) रहित होकर विचरण करता है, वही परम शांति को प्राप्त होता है।

पाठ विधि और संदर्भ: इस श्लोक का पाठ अत्यंत पवित्र मन से करना चाहिए। गीता के द्वितीय अध्याय के अंत में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को उस अवस्था का बोध करा रहे हैं, जिसे 'ब्राह्मी स्थिति' कहा जाता है। इस श्लोक का निरंतर जप करने से मन की चंचलता शांत होती है और साधक के भीतर वैराग्य का उदय होता है। इसे प्रातः काल ध्यान की मुद्रा में बैठकर 11 या 21 बार जपना मानसिक स्पष्टता के लिए अत्यंत लाभकारी माना गया है। यह श्लोक हमें कर्मयोग और ज्ञानयोग के मिलन बिंदु पर खड़ा करता है, जहाँ कर्म तो हो रहे हैं, लेकिन कर्तापन का भाव समाप्त हो चुका है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
विहाय (Vihāya) पूरी तरह त्यागकर यह केवल बाहरी त्याग नहीं, बल्कि मानसिक स्तर पर वासनाओं का परित्याग है। जैसे सर्प अपनी केंचुली छोड़ देता है, वैसे ही बुद्धि से कामनाओं को पृथक करना।
कामान् (Kāmān) इच्छाओं / कामनाओं को इंद्रिय सुखों की वे समस्त इच्छाएं जो मन को विचलित करती हैं। इसमें शुभ और अशुभ दोनों प्रकार की सांसारिक आसक्तियाँ सम्मिलित हैं।
यः (Yaḥ) जो (व्यक्ति) यहाँ 'यः' उस साधक को संबोधित करता है जिसने आत्म-संयम का मार्ग चुना है। यह किसी जाति या वर्ण के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए है।
सर्वान् (Sarvān) संपूर्ण / सभी को आंशिक त्याग पर्याप्त नहीं है। जब तक एक भी सूक्ष्म कामना शेष है, पूर्ण शांति संभव नहीं। यह पूर्ण समर्पण और पूर्ण वैराग्य का सूचक है।
पुमान् (Pumān) मनुष्य / पुरुष यहाँ 'पुमान' का अर्थ जीव से है जो इस संसार रूपी कर्मक्षेत्र में पुरुषार्थ कर रहा है।
चरति (Carati) विचरण करता है / जीता है इसका अर्थ है संसार में रहते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करना। यह संन्यास का अर्थ 'कर्म छोड़ना' नहीं, बल्कि 'आसक्ति छोड़कर जीना' बताता है।
निःस्पृहः (Niḥspṛhaḥ) लालसा रहित भविष्य की प्राप्ति की इच्छा से मुक्त। जो प्राप्त है उसमें संतोष और जो नहीं है उसके लिए व्याकुलता का न होना ही निःस्पृहता है।
निर्ममः (Nirmamaḥ) ममता रहित 'यह मेरा है' (Mine-ness) के भाव का त्याग। वस्तुओं, व्यक्तियों और शरीर के प्रति आसक्ति का अंत ही निर्मम होना है।
निरहङ्कारः (Nirahaṅkāraḥ) अहंकार रहित 'मैं कर्ता हूँ' इस मिथ्या बोध का विनाश। स्वयं को ईश्वर का यंत्र समझना और अहंकार के सूक्ष्म रूपों से मुक्त होना।
शान्तिम् (Śāntim) परम शांति को यह वह शांति नहीं है जो शोर के अभाव में होती है, बल्कि वह आंतरिक स्थिरता है जो विपरीत परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होती।
अधिगच्छति (Adhigacchati) प्राप्त करता है यह एक निश्चित परिणाम है। जो इन गुणों को धारण करता है, वह अनिवार्य रूप से उस परम पद को प्राप्त करता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक महाभारत के 'भीष्म पर्व' के अंतर्गत आता है। इसकी पृष्ठभूमि कुरुक्षेत्र का वह भीषण युद्धक्षेत्र है, जहाँ एक ओर धर्म की स्थापना का संकल्प था और दूसरी ओर अपनों के प्रति मोह। अर्जुन, जो एक महान योद्धा थे, विषाद से घिर गए थे। उनका मोह (ममता) और उनका अहंकार (कि 'मैं' वध करूँगा) उन्हें उनके कर्तव्य से विमुख कर रहा था। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के इसी मानसिक द्वंद्व को समाप्त करने के लिए सांख्य योग का उपदेश दिया।

पौराणिक संदर्भों में, इस श्लोक की जड़ें उपनिषदों के 'त्यागेन एकेन अमृतत्वमानशुः' (केवल त्याग से ही अमरता प्राप्त होती है) के सिद्धांत में निहित हैं। भगवान श्रीकृष्ण यहाँ स्पष्ट करते हैं कि दुःख का मूल कारण वस्तुओं का अभाव नहीं, बल्कि उन वस्तुओं के प्रति हमारी 'पकड़' है। जब हम 'निर्मम' (ममता रहित) होने की बात करते हैं, तो हमें राजा जनक का स्मरण आता है। राजा जनक को 'विदेह' कहा जाता था क्योंकि वे संपूर्ण राज्य के स्वामी होते हुए भी मानसिक रूप से उससे पूर्णतः अनासक्त थे।

इस श्लोक का ऐतिहासिक महत्व यह भी है कि यह बुद्ध के 'निर्वाण' और जैन धर्म के 'अपरिग्रह' के सिद्धांतों के अत्यंत निकट है। वैदिक ऋषियों ने सदा से यह माना है कि मनुष्य की आत्मा स्वभाव से ही शांत और आनंदमय है, लेकिन कामनाओं के बादलों ने उस सूर्य को ढँक रखा है। श्रीकृष्ण अर्जुन को माध्यम बनाकर पूरी मानवता को यह समझा रहे हैं कि युद्ध केवल बाहर नहीं है, असली युद्ध भीतर है—कामनाओं और अहंकार के विरुद्ध।

ऋषि व्यास ने इस श्लोक की रचना इस प्रकार की है कि यह 'स्थितप्रज्ञ' के प्रकरण का उपसंहार करता है। इससे ठीक पहले के श्लोकों में बताया गया कि कैसे इंद्रियों के विषयों में विचरण करने से बुद्धि का नाश होता है। अतः, 71वाँ श्लोक उस समाधान को प्रस्तुत करता है जो मनुष्य को 'स्थितप्रज्ञ' की अंतिम अवस्था तक ले जाता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि शांति कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे बाहर से खरीदा जा सके, यह तो वह अवस्था है जो तब प्रकट होती है जब हम अपने भीतर के कूड़े (अहंकार और वासना) को साफ कर देते हैं।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक शांति की प्राप्ति: इस श्लोक का मनन करने से मस्तिष्क में चल रहे व्यर्थ के विचारों का शमन होता है और गहरी शांति का अनुभव होता है।
  • तनाव और चिंता से मुक्ति: 'निःस्पृह' होने का भाव भविष्य की चिंताओं को समाप्त कर देता है, जिससे आधुनिक युग की व्याधियाँ जैसे डिप्रेशन और एंग्जायटी कम होती हैं।
  • अहंकार का विसर्जन: 'निरहंकार' होने से व्यक्ति के सामाजिक संबंध सुधरते हैं। जब 'मैं' का भाव मिटता है, तो क्रोध और ईर्ष्या स्वतः समाप्त हो जाते हैं।
  • निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि: जब बुद्धि कामनाओं से मुक्त होती है, तो वह अधिक स्पष्ट और सटीक निर्णय लेने में सक्षम हो जाती है।
  • सकारात्मक ऊर्जा का संचार: 'निर्मम' भाव से जीने वाले व्यक्ति के चारों ओर एक सुरक्षात्मक और सकारात्मक आभामंडल (Aura) निर्मित होता है।
  • कर्मों की शुद्धि: फल की इच्छा छोड़कर कर्म करने से संचित कर्मों का क्षय होता है और नए कर्म बंधन नहीं बनते।
  • आत्म-साक्षात्कार का मार्ग: यह श्लोक साधक को अंतर्मुखी बनाता है, जिससे उसे अपने वास्तविक स्वरूप (आत्मा) का बोध होने लगता है।
  • दैवीय कृपा का अनुभव: जो अहंकार छोड़कर भगवान के शरणागत होता है, उस पर ईश्वर की विशेष अनुकंपा सदैव बनी रहती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के शांकर भाष्य, रामानुज भाष्य और आधुनिक संतों की व्याख्याओं के गहन अध्ययन के पश्चात संकलित किया गया है। यहाँ प्रस्तुत विचार पूर्णतः शास्त्रीय सिद्धांतों पर आधारित हैं। गीता का यह श्लोक (2.71) आध्यात्मिक जीवन की पराकाष्ठा को दर्शाता है। पाठकों को परामर्श दिया जाता है कि इन सूत्रों को केवल बौद्धिक स्तर पर न समझें, बल्कि इन्हें अपने दैनिक आचरण में उतारने का प्रयास करें। यह सामग्री आध्यात्मिक जिज्ञासा की शांति और स्वाध्याय (Self-study) के उद्देश्य से तैयार की गई है, जो सनातन धर्म के मूल मूल्यों को प्रतिबिंबित करती है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

बिल्कुल नहीं। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहीं भी कर्म छोड़ने की बात नहीं कही है। 'विहाय कामान्' का अर्थ है कर्म के फल के प्रति आसक्ति और स्वार्थपूर्ण इच्छाओं का त्याग। जब आप फल की चिंता छोड़कर केवल कर्तव्य भाव से कर्म करते हैं, तो वह कर्म आपको बंधन में नहीं डालता। एक डॉक्टर यदि धन की लालसा छोड़कर केवल रोगी की सेवा के भाव से उपचार करता है, तो वह इसी श्लोक के मार्ग पर चल रहा है।

ममता और प्रेम में सूक्ष्म अंतर है। प्रेम निस्वार्थ होता है, जबकि ममता में 'स्वामित्व' (Possessiveness) का भाव होता है। 'निर्मम' होने का अर्थ है यह समझना कि इस संसार में कुछ भी स्थायी रूप से 'मेरा' नहीं है—यहाँ तक कि यह शरीर भी नहीं। जब हम परिवार की सेवा 'ईश्वर के रूप' में करते हैं, तो वह प्रेम है। लेकिन जब हम उन्हें अपनी संपत्ति समझकर उन पर नियंत्रण करना चाहते हैं, तो वह ममता है जो दुःख का कारण बनती है।

अहंकार को मिटाने का सबसे प्रभावी तरीका है 'कर्तापन' के भाव को ईश्वर को समर्पित कर देना। यह सोचना कि "मैं नहीं कर रहा हूँ, बल्कि प्रकृति के गुण या ईश्वर की शक्ति मुझसे कार्य करा रही है।" जब हम स्वयं को एक निमित्त (Instrument) मात्र मानते हैं, तो सफलता का गर्व और असफलता का शोक दोनों ही समाप्त हो जाते हैं। निरंतर सत्संग और सेवा से भी अहंकार धीरे-धीरे गलने लगता है।

हाँ, निश्चित रूप से। गीता का उपदेश किसी गुफा में रहने वाले संन्यासी के लिए नहीं, बल्कि युद्ध के मैदान में खड़े एक गृहस्थ (अर्जुन) के लिए था। गृहस्थ जीवन में रहते हुए अपनी जिम्मेदारियों को निभाना और मानसिक रूप से उनसे अनासक्त रहना ही वास्तविक योग है। यदि आप अपने घर को ही मंदिर समझें और अपने कार्यों को पूजा, तो आप गृहस्थ रहते हुए भी परम शांति प्राप्त कर सकते हैं।

नहीं, निःस्पृहता का अर्थ आलस्य या लक्ष्यहीनता नहीं है। एक निःस्पृह व्यक्ति अधिक कुशलता से कार्य करता है क्योंकि उसका मन भविष्य के परिणामों के डर या लालच से विचलित नहीं होता। वह वर्तमान क्षण में पूर्णतः उपस्थित रहता है। आध्यात्मिक दृष्टि से, निःस्पृह होने का अर्थ है कि आपकी खुशी बाहरी उपलब्धियों पर निर्भर नहीं है; आप भीतर से ही पूर्ण (Self-contented) हैं।

"शांति का मार्ग त्याग से होकर गुजरता है, संग्रह से नहीं।"

जय श्री कृष्ण - भक्तिलोक परिवार

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो पुरुष सब कामनाओं को त्यागकर निःस्पृह, निर्मम और निरहङ्कार होकर आचरण करता है, वह शान्ति को प्राप्त होता है। That person who abandons all desires and acts free from craving, without mineness or egoism, attains peace.

शान्ति की शर्त / Condition for Peace

शान्ति के लिए कामना, ममता और अहंकार का त्याग आवश्यक है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 71 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 71/72 99% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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पंचांग
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