सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 67
श्लोक ६७ में नाव के दृष्टान्त से समझाया गया है कि इन्द्रियों के वश में हुआ मन प्रज्ञा को नष्ट कर देता है।
संस्कृत श्लोक
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते | तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ||६७||
indriyāṇāṃ hi caratāṃ yan mano 'nuvidhīyate | tad asya harati prajñāṃ vāyur nāvam ivāmbhasi ||67||
पदच्छेद / शब्दार्थ
इन्द्रियाणाम्: इन्द्रियों का; हि: निश्चय ही; चरताम्: विचरते हुए; यत्: जो; मनः: मन; अनुविधीयते: अनुगमन करता है; तत्: वह; अस्य: इसकी; हरति: हर लेती है; प्रज्ञाम्: प्रज्ञा को; वायुः: हवा; नावम्: नाव को; इव: जैसे; अम्भसि: जल में।
हिंदी अनुवाद
जैसे जल में नाव को प्रबल वायु उड़ा ले जाती है, वैसे ही विचरती हुई इन्द्रियों में से जिस एक का मन अनुगमन करता है, वह उसकी प्रज्ञा को हर लेती है।
English Translation
Just as a boat on the water is swept away by a strong wind, the mind that follows the wandering senses carries away one's discrimination.
टीका / Commentary
इन्द्रियाँ विषयों में विचरती हैं, और यदि मन उनके पीछे-पीछे चलता है, तो वह प्रज्ञा को नष्ट कर देता है – जैसे हवा नाव को डुबो देती है।