श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 67

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 41 मिनट का पठन 135 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते | तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ||६७||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
इन्द्रियाणाम्
इन्द्रियों का
हि
निश्चय ही
चरताम्
विचरते हुए
यत्
जो
मनः
मन
अनुविधीयते
अनुगमन करता है
तत्
वह
अस्य
इसकी
हरति
हर लेती है
प्रज्ञाम्
प्रज्ञा को
वायुः
हवा
नावम्
नाव को
इव
जैसे
अम्भसि
जल में।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जैसे जल में नाव को प्रबल वायु उड़ा ले जाती है, वैसे ही विचरती हुई इन्द्रियों में से जिस एक का मन अनुगमन करता है, वह उसकी प्रज्ञा को हर लेती है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) का ६७वाँ श्लोक मानव चेतना, मन की चंचलता और इंद्रियों के अनियंत्रित प्रवाह पर एक अत्यंत गंभीर और वैज्ञानिक प्रकाश डालता है। यह श्लोक केवल एक आध्यात्मिक उपदेश नहीं है, बल्कि यह मानव मनोविज्ञान का एक ऐसा शाश्वत सत्य है जो हमारे दैनिक जीवन, निर्णय क्षमता और आत्मिक उन्नति को सीधे प्रभावित करता है। इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को माध्यम बनाकर संपूर्ण मानवता को सचेत करते हैं कि किस प्रकार हमारी इंद्रियां, जब वे बाह्य विषयों में अनियंत्रित होकर विचरती हैं, हमारे मन को अपने साथ बहा ले जाती हैं। जब मन इंद्रियों के पीछे चलने लगता है, तो वह मनुष्य की विवेकशीलता यानी 'प्रज्ञा' को उसी प्रकार हर लेता है, जैसे समुद्र के अशांत जल में तीव्र प्रतिकूल हवा एक सुदृढ़ नाव को भी दिशाहीन कर डुबो देती है।

सांस्कृतिक और ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण से, यह श्लोक जीव और माया के अंतर्संबंध को स्पष्ट करता है। ब्रह्मांड में व्याप्त पंचमहाभूत और उनसे जनित विषय (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) निरंतर हमारी ज्ञानेंद्रियों को आकर्षित करते हैं। यदि हमारी बुद्धि (प्रज्ञा) इस आकर्षण के प्रति सजग नहीं है, तो हमारा अंतःकरण बिखर जाता है। इस श्लोक का अनुशीलन करने से साधक को यह बोध होता है कि आत्म-साक्षात्कार या जीवन में किसी भी उच्च लक्ष्य की प्राप्ति के लिए केवल शारीरिक रूप से इंद्रियों को रोकना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मन का आंतरिक रूप से अनुशासित होना अनिवार्य है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जीवन रूपी महासागर को पार करने के लिए विवेक रूपी पतवार और संयम रूपी लंगर की कितनी महत्ता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

॥ मूल श्लोक ॥

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥ ६७ ॥

संस्कृत उच्चारण एवं संधि-विच्छेद:

संधि-विच्छेद: इन्द्रियाणाम् । हि । चरताम् । यत् । मनः । अनुविधीयते । तत् । अस्य । हरति । प्रज्ञाम् । वायुः । नावम् । इव । अम्भसि ॥

उच्चारण निर्देश: इस श्लोक का पाठ अनुष्टुप छंद में किया जाता है। प्रत्येक चरण में आठ अक्षर होते हैं। प्रथम चरण "इन्द्रियाणां हि चरतां" और द्वितीय चरण "यन्मनोऽनुविधीयते" का लयबद्ध उच्चारण मन को एकाग्र करने में सहायक होता है।

सरल हिंदी अनुवाद:

"क्योंकि विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है (या जिसके पीछे चलता है), वह एक ही इन्द्रिय इस अयुक्त पुरुष की बुद्धि को उसी प्रकार हर लेती है, जैसे जल में नाव को वायु हर लेती है (अर्थात् उसे मार्ग से भटकाकर डुबो देती है)।"

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning)

श्लोक के प्रत्येक शब्द में गहन दार्शनिक रहस्य छिपे हुए हैं। नीचे दी गई तालिका में प्रत्येक पद का व्याकरण सम्मत अर्थ और उसका आध्यात्मिक महत्व विस्तार से समझाया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
इन्द्रियाणाम् (indriyāṇām) इंद्रियों का / ज्ञानेंद्रियों का हमारी पाँच ज्ञानेंद्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) जो बाहरी जगत से निरंतर सूचनाएं और संवेदनाएं ग्रहण करती हैं।
हि (hi) क्योंकि / निश्चित रूप से यह शब्द इस बात पर बल देता है कि यह नियम अटल और सार्वभौमिक है; इसमें कोई संशय नहीं है।
चरताम् (caratām) विषयों में विचरती हुई इंद्रियों का स्वभाव ही है अपने-अपने विषयों (रूप, शब्द, गंध, रस, स्पर्श) की ओर दौड़ना। वे कभी शांत नहीं बैठतीं।
यत् (yat) जिस (इंद्रिय के) यह दर्शाता है कि सभी इंद्रियों का एक साथ सक्रिय होना आवश्यक नहीं है, केवल एक ही अनियंत्रित इंद्रिय पतन के लिए पर्याप्त है।
मनः (manaḥ) मन / संकल्प-विकल्पात्मक अंतःकरण मन वह शक्ति है जो इंद्रियों के पीछे खड़ी होती है। यदि मन इंद्रिय के साथ जुड़ जाता है, तो इंद्रिय अत्यंत शक्तिशाली हो जाती है।
अनुविधीयते (anuvidhīyate) पीछे-पीछे चलता है / समर्पित हो जाता है जब मन अपनी विवेकशीलता खोकर इंद्रिय की इच्छा के अधीन हो जाता है और उसी के अनुसार कार्य करने लगता है।
तत् (tat) वह (मन या वह इंद्रिय) वह विशिष्ट इंद्रिय और मन का वह संयुक्त प्रवाह जो वासना या आसक्ति से युक्त हो चुका है।
अस्य (asya) इस (मनुष्य की / साधक की) उस व्यक्ति की जो आत्म-संयम का प्रयास तो कर रहा है परंतु अभी पूर्णतः सिद्ध नहीं हुआ है।
हरति (harati) हर लेता है / नष्ट कर देता है बलपूर्वक खींच ले जाना। जैसे कोई चोर बहुमूल्य संपत्ति चुरा ले जाता है, वैसे ही यह स्थिति विवेक को चुरा लेती है।
प्रज्ञाम् (prajñām) बुद्धि को / विवेक को / स्थिर ज्ञान को सत्य और असत्य, नित्य और अनित्य के बीच अंतर करने की वह दिव्य क्षमता जो मनुष्य को पशु से अलग करती है।
वायुः (vāyuḥ) वायु / प्रचंड आंधी बाहरी प्रलोभन या वासना का वह तीव्र वेग जो अचानक और अप्रत्याशित रूप से आता है।
नावम् (nāvam) नाव को / नौका को संसार रूपी सागर में तैरते हुए मनुष्य के जीवन, उसके शरीर और उसकी साधना रूपी नौका का प्रतीक।
इव (iva) की भाँति / जैसे उपमा अलंकार का प्रयोग, जो अमूर्त मानसिक प्रक्रिया को एक मूर्त भौतिक उदाहरण से स्पष्ट करता है।
अम्भसि (ambhasi) जल में / समुद्र में यह विशाल संसार रूपी भवसागर, जो अनिश्चितताओं और विकारों से भरा हुआ है।

दार्शनिक निष्कर्ष: इस पद-दर-पद विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि मनुष्य का पतन अचानक नहीं होता। जब हमारी कोई एक भी इंद्रिय किसी विषय के प्रति आसक्त होती है और हमारा मन उसके पीछे हो लेता है, तो हमारी पूरी बौद्धिक क्षमता (प्रज्ञा) पंगु हो जाती है। बुद्धि के नष्ट होते ही मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर विनाश की ओर अग्रसर हो जाता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के मैदान से जुड़ी है। अर्जुन जब मोहग्रस्त होकर अपने ही बंधु-बांधवों पर शस्त्र उठाने से मना कर देते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें जीवन के परम सत्य का उपदेश देते हैं। द्वितीय अध्याय के इस भाग में श्रीकृष्ण 'स्थितप्रज्ञ' (वह व्यक्ति जिसकी बुद्धि स्थिर हो चुकी है) के लक्षणों का वर्णन कर रहे हैं। अर्जुन ने प्रश्न किया था कि स्थितप्रज्ञ पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है? इसके उत्तर में भगवान ने इंद्रिय-निग्रह की अनिवार्यता पर बल दिया।

इस श्लोक के मर्म को समझने के लिए हमें कठोपनिषद के प्रसिद्ध 'रथ रूपक' (Chariot Metaphor) को स्मरण करना होगा। कठोपनिषद (१.३.३-४) में कहा गया है:

"आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्। आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः॥"

अर्थात्, यह शरीर एक रथ है, आत्मा इस रथ का स्वामी है, बुद्धि सारथि है, मन लगाम है और इंद्रियां घोड़े हैं। यदि सारथि (बुद्धि) सो जाए या असावधान हो जाए, और लगाम (मन) ढीली पड़ जाए, तो ये घोड़े (इंद्रियां) रथ को खड्डे में गिरा देंगे। गीता का यह ६७वाँ श्लोक इसी उपनिषदिक ज्ञान का अत्यंत सरल और व्यावहारिक रूप है।

पौराणिक इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जहाँ बड़े-बड़े तपस्वी और ऋषि भी क्षण भर के लिए इंद्रियों के वश में होने के कारण अपनी प्रज्ञा खो बैठे। देवराज इंद्र का अहल्या के प्रति सम्मोहन, ऋषि पराशर का मत्स्यगंधा के प्रति आकर्षण, और महर्षि विश्वामित्र का मेनका के रूप जाल में बंधकर अपनी वर्षों की तपस्या को गँवा देना—ये सभी घटनाएं इसी श्लोक के सत्य को प्रमाणित करती हैं। विश्वामित्र जैसे महान तपस्वी की प्रज्ञा को भी मेनका के रूप सौंदर्य रूपी 'वायु' ने उनकी साधना रूपी 'नाव' को विचलित कर दिया था। अतः भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को सचेत करते हैं कि जब तक मन पूरी तरह वश में न हो, तब तक साधक को कभी भी अति-आत्मविश्वास में नहीं रहना चाहिए।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस श्लोक का नियमित चिंतन, मनन और इसके अर्थ का हृदयंगम करने से साधक को निम्नलिखित अद्भुत आध्यात्मिक, मानसिक और व्यावहारिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक स्थिरता और शांति

इस श्लोक के निरंतर मनन से मन की चंचलता शांत होती है और विचारों में स्थिरता आती है।

2. तीव्र एकाग्रता (Focus)

विद्यार्थियों और पेशेवरों के लिए यह श्लोक ध्यान भटकाने वाले तत्वों (Distractions) से बचने की शक्ति देता है।

3. विवेक शक्ति (Discrimination) का उदय

यह श्लोक बुद्धि को जाग्रत करता है, जिससे मनुष्य सही और गलत के बीच त्वरित और सटीक निर्णय ले पाता है।

4. व्यसनों (Addictions) से मुक्ति

इंद्रियों के पीछे भागने की प्रवृत्ति कम होती है, जिससे किसी भी प्रकार के बुरे व्यसन को छोड़ने में सहायता मिलती है।

5. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

जब मन बाहरी विषयों से हटकर अंतर्मुखी होता है, तो शरीर और मस्तिष्क में ओज और तेज की वृद्धि होती है।

6. तनाव और अवसाद (Depression) से रक्षा

इच्छाओं के पूरा न होने पर होने वाले क्रोध और अवसाद से यह श्लोक हमें मानसिक सुरक्षा कवच प्रदान करता है।

7. आत्म-नियंत्रण (Self-Mastery)

यह श्लोक हमें अपनी इंद्रियों का गुलाम बनने के बजाय उनका स्वामी (जितेन्द्रिय) बनने की प्रेरणा देता है।

8. ईश्वरीय कृपा और आध्यात्मिक प्रगति

इस श्लोक का अर्थ जीवन में उतारने से साधक का हृदय शुद्ध होता है, जिससे भगवद-कृपा का मार्ग सुगम हो जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

यह विश्लेषण संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत प्रस्तुत किया गया है। इसका उद्देश्य श्रीमद्भगवद्गीता के शाश्वत संदेश को आधुनिक संदर्भों में सुलभ और बोधगम्य बनाना है। इस व्याख्या को तैयार करने के लिए प्रस्थानत्रयी (उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और भगवद्गीता) के प्रामाणिक भाष्यों, विशेष रूप से आदि शंकराचार्य के 'गीता भाष्य', स्वामी चिन्मयानंद की व्याख्याओं और गीता प्रेस गोरखपुर के प्रामाणिक संस्करणों का संदर्भ लिया गया है।

अस्वीकरण: आध्यात्मिक प्रगति व्यक्तिगत साधना, समर्पण और गुरु-कृपा पर निर्भर करती है। इस श्लोक का अनुशीलन जीवन को संतुलित करने का एक मार्गदर्शक सूत्र है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

उत्तर: इस रूपक में 'नाव' मनुष्य के जीवन, उसके विवेक और उसकी आध्यात्मिक यात्रा का प्रतीक है। 'वायु' बाहरी विषयों के प्रति आकर्षण, वासना या अनियंत्रित इच्छाओं का प्रतीक है। 'अम्भसि' (जल) इस संसार रूपी सागर को दर्शाता है। जैसे एक अनुकूल हवा नाव को पार लगाती है, वैसे ही प्रतिकूल और प्रचंड हवा नाव को दिशाहीन कर डुबो देती है। इसी प्रकार, यदि मन इंद्रियों के वश में हो जाए, तो वह मनुष्य के विवेक रूपी नाव को नष्ट कर उसे संसार चक्र में डुबो देता है।

उत्तर: हाँ, भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट रूप से कहा है "यन्मनोऽनुविधीयते" अर्थात् मन जिस भी एक इंद्रिय के पीछे चल पड़ता है, वही उसकी बुद्धि को हरने के लिए पर्याप्त है। जैसे किसी बर्तन में यदि एक भी छेद हो, तो सारा पानी धीरे-धीरे बह जाता है; वैसे ही यदि हमारी चार इंद्रियां वश में हों लेकिन केवल एक इंद्रिय (जैसे जिह्वा या आँख) अनियंत्रित हो, तो वह पूरे चरित्र और विवेक को नष्ट कर सकती है।

उत्तर: 'प्रज्ञा' का अर्थ है वह उच्च बौद्धिक चेतना, विवेक और आत्मज्ञान जो हमें सही-गलत का निर्णय लेने में सक्षम बनाता है। जब मन किसी इंद्रिय के विषय में आसक्त हो जाता है, तो वह बुद्धि पर पर्दा डाल देता है। इस स्थिति में मनुष्य तात्कालिक सुख (Preyas) को ही परम कल्याण मान बैठता है और दीर्घकालिक हित (Shreyas) को भूल जाता है। इसी को 'प्रज्ञा का हरण' कहा गया है।

उत्तर: आज के डिजिटल युग में यह श्लोक अत्यधिक प्रासंगिक है। सोशल मीडिया, इंटरनेट, और उपभोक्तावादी संस्कृति हमारी इंद्रियों को निरंतर अपनी ओर खींचती हैं। यदि हमारा मन इन सूचनाओं और प्रलोभनों के पीछे बिना सोचे-समझे भागता रहेगा, तो हमारी मानसिक शांति, एकाग्रता और उत्पादकता नष्ट हो जाएगी। यह श्लोक हमें 'डिजिटल डिटॉक्स' और सचेत जीवन (Mindful Living) जीने का मार्ग दिखाता है।

उत्तर: इसके लिए गीता में दो मुख्य उपाय बताए गए हैं—'अभ्यास' और '

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जैसे जल में नाव को प्रबल वायु उड़ा ले जाती है, वैसे ही विचरती हुई इन्द्रियों में से जिस एक का मन अनुगमन करता है, वह उसकी प्रज्ञा को हर लेती है। Just as a boat on the water is swept away by a strong wind, the mind that follows the wandering senses carries away one's discrimination.

सावधानी / Caution

इन्द्रियों पर नियंत्रण न रखने से प्रज्ञा नष्ट हो जाती है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 67 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 67/72 93% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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