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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 67

अध्याय 2 · श्लोक 67

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते | तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ||६७||

indriyāṇāṃ hi caratāṃ yan mano 'nuvidhīyate | tad asya harati prajñāṃ vāyur nāvam ivāmbhasi ||67||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

इन्द्रियाणाम्: इन्द्रियों का; हि: निश्चय ही; चरताम्: विचरते हुए; यत्: जो; मनः: मन; अनुविधीयते: अनुगमन करता है; तत्: वह; अस्य: इसकी; हरति: हर लेती है; प्रज्ञाम्: प्रज्ञा को; वायुः: हवा; नावम्: नाव को; इव: जैसे; अम्भसि: जल में।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जैसे जल में नाव को प्रबल वायु उड़ा ले जाती है, वैसे ही विचरती हुई इन्द्रियों में से जिस एक का मन अनुगमन करता है, वह उसकी प्रज्ञा को हर लेती है।

English Translation

Just as a boat on the water is swept away by a strong wind, the mind that follows the wandering senses carries away one's discrimination.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

इन्द्रियाँ विषयों में विचरती हैं, और यदि मन उनके पीछे-पीछे चलता है, तो वह प्रज्ञा को नष्ट कर देता है – जैसे हवा नाव को डुबो देती है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।