श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 66

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 36 मिनट का पठन 142 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना | न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ||६६||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
न
नहीं
अस्ति
है
बुद्धिः
बुद्धि
अयुक्तस्य
अयुक्त (असंयत) का
न
नहीं
च
और
अयुक्तस्य
अयुक्त का
भावना
भावना (ध्यान)
न
नहीं
च
और
अभावयतः
ध्यान न करने वाले का
शान्तिः
शान्ति
अशान्तस्य
अशान्त का
कुतः
कहाँ
सुखम्
सुख।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

अयुक्त (असंयत) पुरुष की न तो बुद्धि होती है, न भावना (ध्यान) होती है, और न ध्यान किए बिना शान्ति होती है। अशान्त को सुख कहाँ?

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता हिंदू धर्म का वह अनुपम मुकुटमणि ग्रंथ है जो न केवल आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है, बल्कि मानव जीवन की व्यावहारिक समस्याओं का भी सटीक और वैज्ञानिक समाधान प्रस्तुत करता है। द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) का ६६वां श्लोक—"नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना | न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ||"—मानव मनोविज्ञान, आत्म-साक्षात्कार और मानसिक शांति का एक अद्भुत और शाश्वत सूत्र है। यह श्लोक हमें बताता है कि अशांत मन से कभी भी सच्चे सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती। आज के आधुनिक युग में, जहाँ मनुष्य भौतिक सुख-सुविधाओं के विशाल अंबार के बीच भी मानसिक तनाव, अवसाद, चिंता और आंतरिक अशांति से निरंतर जूझ रहा है, भगवान श्रीकृष्ण का यह दिव्य उपदेश एक संजीवनी बूटी के समान कार्य करता है।

इस श्लोक की ब्रह्मांडीय और सांस्कृतिक प्रासंगिकता इस बात में निहित है कि यह सुख की खोज को बाहरी दुनिया की नश्वर वस्तुओं से हटाकर आंतरिक चेतना की ओर मोड़ देता है। जब तक हमारी इंद्रियां असंयत हैं और हमारा मन परमात्मा या उच्चतर सत्य से जुड़ा नहीं है, तब तक हमारी बुद्धि स्थिर नहीं हो सकती। बुद्धि की अस्थिरता से एकाग्रता (भावना) का लोप होता है, जिससे शांति का मार्ग सदा के लिए अवरुद्ध हो जाता है। और जहाँ शांति नहीं है, वहाँ सुख की कल्पना करना केवल एक मरीचिका के पीछे भागने जैसा है। यह श्लोक हमें आत्म-नियंत्रण, ध्यान और ईश्वर-समर्पण के माध्यम से सच्चे, शाश्वत आनंद को प्राप्त करने की व्यावहारिक विधि सिखाता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

|| श्रीमद्भगवद्गीता - द्वितीय अध्याय (सांख्य योग), श्लोक ६६ ||

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना |
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ||६६||

nāsti buddhirayuktasya na cāyuktasya bhāvanā |
na cābhāvayataḥ śāntiraśāntasya kutaḥ sukham ||66||

सरल हिंदी अनुवाद:

"जिस मनुष्य की इंद्रियां और मन वश में नहीं हैं (जो अयुक्त है), उसके पास निश्चयात्मक बुद्धि नहीं होती। ऐसे अयुक्त पुरुष के अंतःकरण में कोई उच्च भावना या ध्यान नहीं होता। और जिस मनुष्य के मन में ध्यान या उच्च भावना नहीं है, उसे कभी शांति नहीं मिल सकती। फिर, उस अशांत मनुष्य को सुख कैसे प्राप्त हो सकता है?"

पाठ करने की शास्त्रीय विधि:

इस श्लोक का पाठ करने के लिए प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त या संध्याकाल का समय सर्वोत्तम माना गया है। स्वच्छ वस्त्र धारण कर, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। सर्वप्रथम भगवान श्रीकृष्ण के बालरूप या सारथी रूप का ध्यान करें। इसके पश्चात, शांत चित्त से इस श्लोक का कम से कम ११ या २१ बार स्पष्ट उच्चारण के साथ जप करें। यह अभ्यास आपके मस्तिष्क की तंत्रिकाओं को शांत करता है और एकाग्रता को बढ़ाता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में ज्ञान का एक गहरा सागर छिपा हुआ है। नीचे दी गई तालिका के माध्यम से हम इसके शाब्दिक और दार्शनिक अर्थ को गहराई से समझेंगे:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
नास्ति (न + अस्ति) नहीं होती है यह पूर्ण निषेध को दर्शाता है। बिना आत्म-संयम के आध्यात्मिक ज्ञान का अस्तित्व असंभव है।
बुद्धिः विवेकपूर्ण / निश्चयात्मक बुद्धि वह प्रज्ञा जो सत्य और असत्य, नित्य और अनित्य के बीच भेद करने में सक्षम होती है।
अयुक्तस्य असंयत पुरुष की (जो योगयुक्त नहीं है) वह व्यक्ति जिसका मन, इंद्रियां और विचार उसके नियंत्रण में नहीं हैं, जो वासनाओं के अधीन है।
न और न ही एक अन्य महत्वपूर्ण निषेध जो अगले चरण की असंभवता को प्रकट करता है।
च भी / और कड़ियों को जोड़ने वाला अव्यय, जो दर्शाता है कि एक गुण के बिना दूसरा गुण नहीं मिल सकता।
भावना ध्यान / दिव्य चिंतन / श्रद्धा परमात्मा के प्रति अनन्य अनुराग, उच्चतर आदर्शों का चिंतन और ध्यान की गहन अवस्था।
अभावयतः भावना रहित मनुष्य के लिए जो व्यक्ति ध्यान नहीं करता या जिसके भीतर ईश्वर के प्रति कोई श्रद्धा या उच्च विचार नहीं हैं।
शान्तिः परम शांति / मानसिक स्थिरता विक्षेपों और इच्छाओं से रहित मन की वह प्रशांत अवस्था जहाँ कोई उद्वेग नहीं होता।
अशान्तस्य अशांत मनुष्य को वह व्यक्ति जिसका मन निरंतर इच्छाओं, क्रोध, लोभ और मोह की तरंगों से आंदोलित रहता है।
कुतः कहाँ से / कैसे यह एक यक्ष प्रश्न है, जो यह स्पष्ट करता है कि अशांत मन के लिए सुख की प्राप्ति सर्वथा असंभव है।
सुखम् सच्चा आनंद / आत्मिक सुख यह भौतिक या इंद्रियजन्य क्षणिक सुख नहीं, बल्कि आत्मा का शाश्वत और असीम आनंद है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के मैदान से जुड़ी हुई है। जब पांडव पुत्र अर्जुन अपने ही सगे-संबंधियों, गुरुओं और पिताओं को युद्ध भूमि में अपने सामने शत्रु के रूप में खड़े देखते हैं, तो वे अत्यंत व्याकुल हो जाते हैं। उनका गांडीव धनुष हाथ से सरक जाता है, शरीर कांपने लगता है और वे गहरे विषाद (अवसाद) में डूब जाते हैं। अर्जुन का यह विषाद वास्तव में हर उस साधारण मनुष्य का प्रतिनिधित्व करता है जो जीवन के संघर्षों से घबराकर अपने कर्तव्य पथ से विचलित हो जाता है।

अर्जुन को इस मानसिक संकट से उबारने के लिए भगवान श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश देते हैं। द्वितीय अध्याय के प्रारंभ में श्रीकृष्ण अर्जुन को सांख्य योग का उपदेश देते हैं, जिसमें वे आत्मा की अमरता का वर्णन करते हैं। इसके बाद, वे 'बुद्धि योग' या 'कर्म योग' की चर्चा करते हैं। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि केवल ज्ञान होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस ज्ञान को जीवन में उतारने के लिए बुद्धि का स्थिर होना अत्यंत आवश्यक है।

इसी संदर्भ में अर्जुन भगवान से पूछते हैं कि "स्थितप्रज्ञ" (स्थिर बुद्धि वाले व्यक्ति) के क्या लक्षण होते हैं? वह कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है? (स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव...)। इस प्रश्न के उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण इंद्रिय संयम और मन के नियंत्रण की महिमा का विस्तार से वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि जब मनुष्य विषयों (इंद्रिय भोगों) का चिंतन करता है, तो उनमें आसक्ति पैदा होती है। आसक्ति से कामना (इच्छा) जन्म लेती है, कामना में बाधा आने से क्रोध उत्पन्न होता है, क्रोध से सम्मोह (अविवेक) पैदा होता है, सम्मोह से स्मृति भ्रमित होती है, स्मृति के भ्रमित होने से बुद्धि का नाश होता है, और बुद्धि का नाश होने से मनुष्य का सर्वनाश हो जाता है।

इस पतन के चक्र को समझाने के बाद, भगवान श्रीकृष्ण श्लोक ६६ में सकारात्मक मार्ग की स्थापना करते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि जो व्यक्ति "अयुक्त" है—अर्थात जो योग से रहित है, जिसका अपनी इंद्रियों पर कोई नियंत्रण नहीं है—वह कभी भी स्थिर बुद्धि प्राप्त नहीं कर सकता। जब बुद्धि स्थिर नहीं होगी, तो वह ईश्वर या उच्चतर सत्यों का ध्यान (भावना) नहीं कर पाएगा। ध्यान के बिना मन में शांति नहीं आ सकती, और अशांत मन कभी भी सुख का अनुभव नहीं कर सकता। इस प्रकार, यह श्लोक मानव जीवन के सबसे बड़े लक्ष्य—'सुख'—की प्राप्ति के लिए एक अत्यंत वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक मार्गचित्र (Roadmap) प्रस्तुत करता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस दिव्य श्लोक का नियमित रूप से पाठ, मनन और इसके अर्थ का चिंतन करने से साधक को निम्नलिखित अद्भुत लाभ प्राप्त होते हैं:

  • 1
    मानसिक शांति और स्थिरता

    यह श्लोक मन के विक्षेपों को शांत करता है। इसके नियमित जप से मस्तिष्क में अल्फा तरंगें उत्पन्न होती हैं, जो गहरे मानसिक विश्राम और शांति का अनुभव कराती हैं।

  • 2
    विवेक और निर्णय क्षमता का विकास

    श्लोक का चिंतन करने से मनुष्य की 'निश्चयात्मिका बुद्धि' जाग्रत होती है, जिससे वह जीवन के कठिन मोड़ों पर सही और कल्याणकारी निर्णय लेने में सक्षम होता है।

  • 3
    इंद्रिय संयम की शक्ति

    यह श्लोक साधक को अपनी अनियंत्रित इंद्रियों को वश में करने की आंतरिक प्रेरणा और शक्ति प्रदान करता है, जिससे ऊर्जा का अपव्यय रुकता है।

  • 4
    तनाव, चिंता और अवसाद से मुक्ति

    आधुनिक जीवन की भागदौड़ से उत्पन्न होने वाले मानसिक तनाव और अवसाद को दूर करने में यह श्लोक एक अचूक थेरेपी की तरह काम करता है।

  • 5
    ध्यान (Meditation) में गहराई

    जो साधक ध्यान का अभ्यास करते हैं, उनके लिए यह श्लोक एकाग्रता की कुंजी है। यह ध्यान की उच्च अवस्था 'भावना' को सुलभ बनाता है।

  • 6
    सकारात्मक आभा मंडल (Aura) का निर्माण

    इस श्लोक के पवित्र स्पंदन से साधक के चारों ओर एक सुरक्षात्मक और सकारात्मक ऊर्जा क्षेत्र का निर्माण होता है, जो नकारात्मक शक्तियों को दूर रखता है।

  • 7
    कर्मों का शुद्धिकरण

    जब बुद्धि स्थिर होती है, तो मनुष्य निष्काम भाव से कर्म करने लगता है। इससे उसके संचित कर्मों का शुद्धिकरण होता है और वह बंधनों से मुक्त होता है।

  • 8
    ईश्वरीय शरणागति की प्राप्ति

    यह श्लोक साधक के भीतर अहंकार को मिटाकर ईश्वर के प्रति सच्ची श्रद्धा और अनन्य भक्ति भाव को जाग्रत करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

यह आलेख Bhaktilok.in के मुख्य दार्शनिक विद्वानों और संस्कृत भाषाविदों द्वारा तैयार की गई संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इस व्याख्या का मुख्य आधार आदि गुरु शंकराचार्य जी का गीता भाष्य, स्वामी चिन्मयानंद जी की व्याख्याएं और गीता प्रेस गोरखपुर के प्रामाणिक संस्करण हैं। हमारा उद्देश्य प्राचीन वैदिक ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करना है ताकि आज की युवा पीढ़ी भी इस अमूल्य धरोहर से लाभान्वित हो सके। इस श्लोक का संदेश सार्वभौमिक है, जो किसी जाति, धर्म या संप्रदाय की सीमाओं से परे संपूर्ण मानवता के कल्याण के लिए है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

'अयुक्त' का अर्थ है वह व्यक्ति जो योग से रहित है, अर्थात जिसका अपने मन, बुद्धि और इंद्रियों पर कोई नियंत्रण नहीं है। जो व्यक्ति अपनी वासनाओं, क्रोध और बाहरी आकर्षणों के अधीन होकर जीता है, उसे अयुक्त कहा जाता है। इसका दुष्परिणाम यह होता है कि उसकी बुद्धि कभी स्थिर नहीं रह पाती, वह हमेशा भ्रमित रहता है और जीवन में कभी भी सही निर्णय नहीं ले पाता।

भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार, जब तक मनुष्य की बुद्धि निश्चयात्मक (स्थिर) नहीं होती, तब तक उसके भीतर 'भावना' (अर्थात ईश्वर के प्रति श्रद्धा, ध्यान या उच्चतर जीवन मूल्यों का चिंतन) उत्पन्न नहीं हो सकती। अस्थिर बुद्धि वाला व्यक्ति हमेशा संशयात्मक रहता है। इसलिए, ध्यान और श्रद्धा (भावना) के उदय के लिए बुद्धि का स्थिर और शुद्ध होना अनिवार्य है।

हाँ, यह पूर्णतः सत्य है। भौतिक वस्तुएं (जैसे धन, गाड़ी, बड़ा घर) हमें क्षणिक 'इंद्रियजन्य आमोद-प्रमोद' दे सकती हैं, लेकिन वे सच्चा 'सुख' या 'आनंद' नहीं दे सकतीं। सच्चा सुख मन की एक अवस्था है, जो केवल तभी संभव है जब मन पूरी तरह से शांत और संतुष्ट हो। एक अशांत व्यक्ति चाहे सोने के महल में भी क्यों न सोए, उसे नींद और शांति नहीं मिल सकती। इसलिए, शांति ही सुख की पहली और अनिवार्य शर्त है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अयुक्त (असंयत) पुरुष की न तो बुद्धि होती है, न भावना (ध्यान), और न ध्यान किए बिना शान्ति होती है। अशान्त को सुख कहाँ? One who is not connected (through yoga) has neither steady intellect nor meditation. Without meditation, there is no peace. Without peace, how can there be happiness?

आवश्यकता / Necessity

योग और संयम के बिना सुख असम्भव है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 66 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 66/72 92% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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