श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 65

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 39 मिनट का पठन 132 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते | प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ||६५||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
प्रसादे
प्रसाद (शान्ति) प्राप्त होने पर
सर्वदुःखानाम्
सब दुःखों की
हानिः
हानि
अस्य
इसकी
उपजायते
हो जाती है
प्रसन्नचेतसः
प्रसन्न चित्त वाले की
हि
निश्चय ही
आशु
शीघ्र
बुद्धिः
बुद्धि
पर्यवतिष्ठते
सम्यक् प्रकार से स्थित हो जाती है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

उस प्रसाद (शान्ति) के प्राप्त होने पर इसके (साधक के) सब दुःखों का नाश हो जाता है, क्योंकि प्रसन्न चित्त वाले की बुद्धि शीघ्र ही स्थिर हो जाती है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) का ६५वां श्लोक मानव चेतना को परम शांति और मानसिक स्थिरता प्रदान करने वाला एक दिव्य महामंत्र है। यह श्लोक केवल एक धार्मिक उपदेश नहीं है, बल्कि यह आधुनिक युग के तनाव, अवसाद और मानसिक अशांति से जूझ रहे मनुष्य के लिए एक व्यावहारिक मनोवैज्ञानिक समाधान भी है। जब अर्जुन कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में विषादग्रस्त होकर अपने कर्तव्य से विमुख हो रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें निष्काम कर्मयोग और इंद्रिय निग्रह का मार्ग दिखाया। इस श्लोक में 'प्रसाद' अर्थात मन की उस निर्मल, शांत और प्रसन्न अवस्था का वर्णन किया गया है, जिसे प्राप्त करने के बाद संसार के समस्त दुखों का स्वतः ही अंत हो जाता है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से इस श्लोक का महत्व अत्यंत व्यापक है। यह हमें सिखाता है कि बाहरी सुख-सुविधाएं या भौतिक साधन हमें क्षणिक आनंद दे सकते हैं, परंतु वास्तविक और स्थायी सुख केवल अंतःकरण की शुद्धि और मन की प्रसन्नता से ही संभव है। जब मनुष्य राग-द्वेष से मुक्त होकर अपनी इंद्रियों को अपने वश में कर लेता है, तब उसके भीतर एक अलौकिक शांति का उदय होता है। इस शांति को ही शास्त्रों में 'प्रसाद' कहा गया है। इस दिव्य अवस्था में प्रवेश करते ही साधक की बुद्धि परमात्मा में स्थिर हो जाती है, जिससे वह जीवन के हर द्वंद्व, सुख-दुख, और जय-पराजय में समभाव से रहने की कला सीख जाता है। यह श्लोक ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ हमारे व्यक्तिगत अस्तित्व के तादात्म्य को स्थापित करने का एक अनुपम सूत्र है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

॥ मूल श्लोक ॥

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥ ६५ ॥

"prasāde sarvaduḥkhānāṁ hānirasayōpajāyatē |
prasannacētasō hyāśu buddhiḥ paryavatiṣṭhatē ||"

पठन एवं जप की प्रामाणिक विधि:

इस श्लोक का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए साधक को एक निश्चित और पवित्र विधि का पालन करना चाहिए:

  • १. शुभ समय: इस श्लोक का जप करने के लिए सर्वोत्तम समय ब्रह्ममुहूर्त (प्रातः ४:०० से ६:०० बजे) माना गया है। इस समय वातावरण में सत्वगुण की प्रधानता होती है।
  • २. आसन और दिशा: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें। रीढ़ की हड्डी को सीधा रखें।
  • ३. प्राणायाम: जप प्रारंभ करने से पहले ३ से ५ बार गहरी सांस लें और छोड़ें (अनुलोम-विलोम करें) ताकि मन शांत हो सके।
  • ४. ध्यान और संकल्प: भगवान श्रीकृष्ण के सारथी रूप का हृदय में ध्यान करें और मन की शांति तथा बुद्धि की स्थिरता के लिए प्रार्थना करें।
  • ५. जप संख्या: इस श्लोक का प्रतिदिन कम से कम २१, ५१ या १०८ बार स्पष्ट उच्चारण के साथ जप करें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्लोक के प्रत्येक शब्द में गहन वेदांत दर्शन छिपा हुआ है। नीचे दी गई तालिका में प्रत्येक पद का सरल अर्थ और उसका आध्यात्मिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
प्रसादे (prasāde) भगवत्कृपा या अंतःकरण की प्रसन्नता होने पर यह केवल भोजन का प्रसाद नहीं है, बल्कि राग-द्वेष से मुक्त मन की वह परम निर्मलता है जो ईश्वर की असीम अनुकंपा से प्राप्त होती है।
सर्वदुःखानाम् (sarva-duḥkhānām) समस्त प्रकार के दुखों का (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) संसार में तीन प्रकार के ताप (दुख) हैं। मन के प्रसन्न होने पर इन तीनों प्रकार के कष्टों का समूल नाश हो जाता है।
हानिः (hāniḥ) नाश, अंत या अभाव दुखों का केवल दमन नहीं होता, बल्कि वे पूरी तरह से विलीन हो जाते हैं, जैसे प्रकाश के आते ही अंधकार नष्ट हो जाता है।
अस्य (asya) इस (साधक या पुरुष) का यह उस व्यक्ति विशेष की ओर संकेत करता है जिसने अपनी इंद्रियों को वश में कर लिया है और जो आत्मसंयम के मार्ग पर अग्रसर है।
उपजायते (upajāyate) उत्पन्न होता है या हो जाता है यह एक स्वाभाविक और अनिवार्य परिणाम है। जब कारण (मन की प्रसन्नता) उपस्थित होता है, तो कार्य (दुखों का नाश) स्वतः घटित होता है।
प्रसन्नचेतसः (prasanna-cetasaḥ) प्रसन्न चित्त वाले मनुष्य की जिसका चित्त बाहरी परिस्थितियों से अप्रभावित रहकर सदैव आंतरिक आनंद और संतोष में मग्न रहता है।
हि (hi) क्योंकि, निश्चित रूप से यह शब्द इस सत्य की अकाट्यता और दृढ़ता को दर्शाता है कि इसमें किसी भी प्रकार का संशय नहीं है।
आशु (āśu) शीघ्र ही, तत्काल बिना किसी विलंब के, जैसे ही चित्त शांत होता है, वैसे ही बुद्धि परमात्मा में लीन हो जाती है। इसमें समय का अंतराल नहीं होता।
बुद्धिः (buddhiḥ) विवेक शक्ति, निश्चय करने वाली बुद्धि वह प्रज्ञा जो सत्य और असत्य, नित्य और अनित्य के बीच भेद करने में सक्षम होती है।
पर्यवतिष्ठते (paryavatiṣṭhate) भली-भांति स्थिर हो जाती है बुद्धि चंचलता को छोड़कर आत्मा में पूरी तरह से प्रतिष्ठित हो जाती है, जिससे साधक को समाधि की अवस्था प्राप्त होती है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आता है। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में जब अर्जुन अपने ही सगे-संबंधियों को शत्रु पक्ष में खड़े देखते हैं, तो वे अत्यंत व्याकुल हो जाते हैं। उनका गांडीव धनुष हाथ से सरकने लगता है, त्वचा जलने लगती है और उनका मन भ्रमित हो जाता है। अर्जुन का यह विषाद वास्तव में हर उस साधारण मनुष्य का प्रतिनिधित्व करता है जो जीवन के कठिन मोड़ों पर आकर कर्तव्यविमूढ़ हो जाता है।

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के इस मानसिक संकट को दूर करने के लिए उन्हें 'स्थितप्रज्ञ' (वह व्यक्ति जिसकी बुद्धि स्थिर हो चुकी है) के लक्षण बताते हैं। अर्जुन पूछते हैं कि हे केशव! स्थितप्रज्ञ पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है? इसी जिज्ञासा के समाधान में भगवान श्रीकृष्ण इंद्रिय संयम की महिमा गाते हैं। वे समझाते हैं कि जो मनुष्य अपनी इंद्रियों को विषयों में अनियंत्रित छोड़ देता है, उसका पतन निश्चित है। विषयों का चिंतन करने से आसक्ति पैदा होती है, आसक्ति से कामना, कामना से क्रोध, क्रोध से सम्मोह (अज्ञान), सम्मोह से स्मृति का भ्रम और स्मृति भ्रम से बुद्धि का नाश हो जाता है।

इस विनाशकारी चक्र से बचने का एकमात्र उपाय भगवान श्रीकृष्ण इस ६५वें श्लोक में बताते हैं। वे कहते हैं कि जो साधक राग और द्वेष से रहित होकर, अपने वश में की हुई इंद्रियों द्वारा विषयों का उपभोग करता है, वह अंतःकरण की प्रसन्नता (प्रसाद) को प्राप्त करता है। इस पृष्ठभूमि में यह श्लोक एक ऐसे प्रकाश स्तंभ के रूप में उभरता है जो मनुष्य को अशांति के महासागर से निकालकर परम शांति के तट पर ले जाता है। आदि शंकराचार्य ने अपने गीता भाष्य में इस श्लोक की व्याख्या करते हुए लिखा है कि 'प्रसाद' का अर्थ मन की वह स्वच्छता और निर्मलता है जिसमें परमात्मा का प्रतिबिंब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस महामंत्र का श्रद्धापूर्वक चिंतन और जप करने से साधक को निम्नलिखित दिव्य लाभ प्राप्त होते हैं:

  • १
    मानसिक शांति की प्राप्ति: यह श्लोक मस्तिष्क की तरंगों को शांत करता है, जिससे तनाव, चिंता और अवसाद से मुक्ति मिलती है।
  • २
    बुद्धि की प्रखरता और स्थिरता: नियमित जप से निर्णय लेने की क्षमता (Decision Making) में अभूतपूर्व सुधार होता है और भ्रम दूर होता है।
  • ३
    सकारात्मक ऊर्जा का संचार (Aura): इस श्लोक के कंपन से साधक के चारों ओर एक सुरक्षात्मक और सकारात्मक ऊर्जा क्षेत्र का निर्माण होता है।
  • ४
    इंद्रियों पर नियंत्रण: यह श्लोक साधक को अपनी अनियंत्रित इच्छाओं और वासनाओं पर विजय प्राप्त करने की शक्ति देता है।
  • ५
    कर्मों का शुद्धिकरण: निष्काम भाव से किया गया जप संचित पापों का क्षय करता है और अंतःकरण को पवित्र बनाता है।
  • ६
    भगवत्कृपा का अनुभव: 'प्रसाद' की अवस्था प्राप्त होने पर साधक को हर क्षण ईश्वर की उपस्थिति और उनकी असीम कृपा का अनुभव होने लगता है।
  • ७
    भावनात्मक संतुलन: सुख-दुख, मान-अपमान और लाभ-हानि जैसी विपरीत परिस्थितियों में भी मन विचलित नहीं होता।
  • ८
    एकाग्रता में वृद्धि: विद्यार्थियों और ध्यानार्थियों के लिए यह श्लोक एकाग्रता (Focus) बढ़ाने का एक अचूक साधन है।
  • ९
    भय से मुक्ति: मृत्यु, असफलता और भविष्य की चिंताओं से मुक्ति मिलकर मन में अभय (निडरता) का भाव जाग्रत होता है।
  • १०
    आत्म-साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त होना: जब बुद्धि पूरी तरह स्थिर हो जाती है, तब साधक को अपने वास्तविक स्वरूप (आत्मा) का ज्ञान होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

यह आलेख भक्तिलोक (Bhaktilok.in) के विद्वान संपादन मंडल द्वारा तैयार किया गया है। यह एक संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसका उद्देश्य श्रीमद्भगवद्गीता के शाश्वत ज्ञान को जन-साधारण तक अत्यंत सरल और व्यावहारिक रूप में पहुंचाना है। इस व्याख्या को तैयार करने के लिए प्रस्थानत्रयी (उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और भगवद्गीता) के प्रामाणिक भाष्यों, विशेष रूप से आदि शंकराचार्य के 'गीता भाष्य', स्वामी चिन्मयानंद की 'गीता व्याख्या' और गीता प्रेस गोरखपुर के प्रामाणिक संस्करणों का गहन अध्ययन और संदर्भ लिया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को बिना किसी अंधविश्वास के, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से समृद्ध ज्ञान प्रदान करना है। हम किसी भी प्रकार के अतिशयोक्तिपूर्ण दावों से बचते हुए केवल शास्त्रों में वर्णित सत्य को ही प्रस्तुत करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

सामान्य भाषा में 'प्रसाद' का अर्थ मंदिर में मिलने वाली खाने की सामग्री से लिया जाता है। परंतु इस श्लोक में 'प्रसाद' का दार्शनिक अर्थ 'अंतःकरण की निर्मलता, प्रसन्नता और शांति' है। जब मन राग, द्वेष, ईर्ष्या और क्रोध से मुक्त होकर पूरी तरह स्वच्छ हो जाता है, तो उस अवस्था को 'प्रसाद' कहा जाता है। यह ईश्वर की कृपा का मानसिक स्वरूप है।

हमारे अधिकांश दुख हमारी मानसिक प्रतिक्रियाओं के कारण होते हैं, न कि बाहरी परिस्थितियों के कारण। जब हमारा चित्त प्रसन्न और शांत (प्रसन्नचेतसः) होता है, तो बाहरी प्रतिकूल परिस्थितियां भी हमें विचलित नहीं कर पातीं। प्रसन्न मन में दुख टिक नहीं सकता, ठीक उसी तरह जैसे जलते हुए दीपक के सामने अंधकार नहीं ठहर सकता। इसलिए मन की प्रसन्नता ही समस्त दुखों का अंतिम अंत है।

'बुद्धिः पर्यवतिष्ठते' का अर्थ है बुद्धि का परमात्मा या आत्म-स्वरूप में पूरी तरह से स्थिर हो जाना। जब मन चंचल होता है, तो बुद्धि भी भटकती रहती है और सही निर्णय नहीं ले पाती। लेकिन जब मन शांत और प्रसन्न होता है, तो बुद्धि बिना किसी विक्षेप के सत्य को ग्रहण करती है और स्थिर हो जाती है। इसे ही 'स्थितप्रज्ञ' की अवस्था कहा जाता है।

हाँ, बिल्कुल। श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में एक गृहस्थ (अर्जुन) को ही दिया गया था। यह श्लोक हमें संसार छोड़ने के लिए नहीं कहता, बल्कि संसार में रहते हुए अनासक्त भाव से कर्म करने की प्रेरणा देता है। अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए मन को ईश्वर में लगाए रखना ही इस श्लोक का व्यावहारिक व्यावहारिक संदेश है।

इस श्लोक का जप प्रतिदिन सुबह या शाम को शांत वातावरण में बैठकर १०८ बार करना सर्वोत्तम माना गया है। यदि समय का अभाव हो, तो कम से कम २१ बार इसका स्पष्ट उच्चारण के साथ जप करें। इसके नियमित अभ्यास से कुछ ही दिनों में मानसिक शांति और स्पष्टता का अनुभव होने लगता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

उस शान्ति के प्राप्त होने पर उसके सब दुःखों का नाश हो जाता है, क्योंकि प्रसन्न चित्त वाले की बुद्धि शीघ्र ही स्थिर हो जाती है। In that peace, all sorrows are destroyed. For the intellect of one who is peaceful and content soon becomes steady.

शान्ति का फल / Fruit of Peace

शान्ति से बुद्धि स्थिर होती है और सभी दुःख मिट जाते हैं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 65 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 65/72 90% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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