मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् | आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ||६४||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
9 पदरागद्वेषवियुक्तैः
राग-द्वेष से रहित
तु
तो
विषयान्
विषयों को
इन्द्रियैः
इन्द्रियों द्वारा
चरन्
चलता हुआ (भोगता हुआ)
आत्मवश्यैः
अपने वश में किए हुए
विधेयात्मा
वश में किए हुए अन्तःकरण वाला
प्रसादम्
प्रसाद (शान्ति)
अधिगच्छति
प्राप्त होता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
परन्तु जो पुरुष राग-द्वेष से रहित, अपने वश में की हुई इन्द्रियों द्वारा विषयों को भोगता हुआ (व्यवहार करता हुआ) वश में किए हुए अन्तःकरण वाला होता है, वह प्रसाद (शान्ति) को प्राप्त होता है।
श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) का ६४वां श्लोक मानव चेतना को परम शांति, मानसिक स्वतंत्रता और आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाने वाला एक दिव्य प्रकाश-स्तंभ है। यह श्लोक व्यावहारिक अध्यात्म का वह अनुपम और कालजयी सूत्र है, जो हमें यह सिखाता है कि इस कोलाहलपूर्ण संसार में रहते हुए, अपने समस्त सांसारिक और पारिवारिक कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए भी हम किस प्रकार आंतरिक रूप से पूर्णतः मुक्त, निर्द्वंद्व और प्रशांत रह सकते हैं। सामान्यतः मनुष्य का संपूर्ण जीवन दो ही ध्रुवों के बीच निरंतर डोलता रहता है—'राग' (अत्यधिक आसक्ति, मोह या अनुकूलता के प्रति खिंचाव) और 'द्वेष' (घृणा, विकर्षण या प्रतिकूलता के प्रति क्रोध)। जब हम किसी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति से राग करते हैं, तो उसके न मिलने पर हमारे भीतर दुःख, ईर्ष्या और क्रोध का जन्म होता है; और जब हम किसी से द्वेष करते हैं, तो उसकी उपस्थिति मात्र से हमारा अंतःकरण अशांत और उद्वेलित हो जाता है। भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में अर्जुन को और उनके माध्यम से संपूर्ण मानवता को एक ऐसा 'मध्यम मार्ग' प्रदान कर रहे हैं, जहाँ इंद्रियों का बलपूर्वक दमन नहीं किया जाता, बल्कि उनका उदात्तीकरण (Sublimation), नियमन और आत्मिक नियंत्रण किया जाता है।
इस श्लोक का ब्रह्मांडीय और सांस्कृतिक महत्व इस बात में निहित है कि यह पलायनवाद (Escapism) का पूरी तरह से खंडन करता है। यह हमें जंगलों में भागने, कंदराओं में छिपने या संसार से विमुख होकर निष्क्रिय होने का उपदेश नहीं देता, बल्कि कर्मक्षेत्र की भीषण चुनौतियों के बीच डटे रहकर, अपनी इंद्रियों को अपने वश में रखकर, अनासक्त भाव से जीवन जीने की महान कला सिखाता है। जब साधक राग और द्वेष के द्वंद्व से ऊपर उठकर अपनी इंद्रियों को अपनी बुद्धि और आत्मा के अधीन कर लेता है, तब उसे 'प्रसाद' की प्राप्ति होती है। यहाँ 'प्रसाद' का अर्थ केवल किसी खाद्य सामग्री या मंदिर के नैवेद्य से नहीं है, बल्कि अंतःकरण की उस परम निर्मलता, स्थिरता, प्रसन्नता और आनंदमय स्थिति से है, जिसे पाकर मनुष्य संसार के बड़े से बड़े थपेड़ों और दुखों के बीच भी अडिग रहता है। यह श्लोक सनातन संस्कृति के उस शाश्वत सत्य को उद्घाटित करता है, जहाँ मुक्ति का मार्ग संसार के भौतिक त्याग में नहीं, बल्कि संसार के प्रति हमारे आंतरिक दृष्टिकोण के आमूलचूल परिवर्तन में निहित है।
आधुनिक मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह श्लोक 'इमोशनल इंटेलिजेंस' (Emotional Intelligence) और 'माइंडफुलनेस' (Mindfulness) का चरमोत्कर्ष है। आज का मनुष्य अवसाद, तनाव और एंग्जायटी से ग्रसित है क्योंकि उसकी इंद्रियां बाह्य विषयों की ओर अनियंत्रित होकर भाग रही हैं। श्रीकृष्ण का यह उपदेश हमें अपनी ऊर्जा को बिखरने से रोकने और उसे रचनात्मक व आध्यात्मिक उत्थान में लगाने की व्यावहारिक पद्धति प्रदान करता है।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि
"रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् |
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ||६४||"
|| श्रीमद्भगवद्गीता - द्वितीय अध्याय, सांख्य योग, श्लोक ६४ ||
शुद्ध उच्चारण, सस्वर पाठ एवं साधना विधि:
इस श्लोक का पाठ संस्कृत व्याकरण के 'अनुष्टुप छंद' के नियमों के अनुसार किया जाता है। इसके शुद्ध और प्रभावशाली उच्चारण के लिए साधक को निम्नलिखित बिंदुओं का विशेष ध्यान रखना चाहिए:
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)
इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के मैदान से जुड़ी है, जो मानव मन के भीतर चलने वाले शाश्वत संघर्ष का प्रतीक है। अर्जुन जब अपने ही सगे-संबंधियों, गुरुओं और पिताओं को सामने युद्ध के लिए खड़े देखता है, तो वह मोह और विषाद से ग्रस्त हो जाता है। उसका गांडीव धनुष हाथ से सरक जाता है, शरीर कांपने लगता है और वह रथ के पिछले हिस्से में बैठ जाता है। अर्जुन का यह विषाद वास्तव में 'राग' और 'द्वेष' का ही परिणाम था। उसे अपने परिवार के प्रति 'राग' (आसक्ति) था और युद्ध के दुष्परिणामों तथा शत्रुओं के प्रति 'द्वेष' व भय था। इस मानसिक द्वंद्व के कारण उसकी बुद्धि भ्रमित हो गई थी और वह अपने क्षत्रिय धर्म से विमुख होने लगा था।
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि संसार से भागना समस्या का समाधान नहीं है। यदि अर्जुन वन में भी चला जाए, तो भी उसका मन कुरुक्षेत्र की स्मृतियों, राग और द्वेष से अशांत रहेगा। इसलिए, भगवान उसे 'कर्मयोग' और 'बुद्धियोग' का उपदेश देते हैं। इस श्लोक से ठीक पहले के श्लोकों (६२वें और ६३वें) में श्रीकृष्ण ने पतन की उस सीढ़ी का वर्णन किया है जिसे 'विनाश का सोपान' कहा जाता है—विषयों का चिंतन करने से आसक्ति पैदा होती है, आसक्ति से कामना, कामना से क्रोध, क्रोध से सम्मोह (अज्ञान), सम्मोह से स्मृति-भ्रंश और अंततः बुद्धि का नाश हो जाता है। इस विनाशकारी श्रृंखला (Downward Spiral) से बचने का एकमात्र सकारात्मक और व्यावहारिक उपाय इस ६४वें श्लोक में बताया गया है।
कठोपनिषद् का रथ रूपक: इस श्लोक का दार्शनिक आधार कठोपनिषद् के उस प्रसिद्ध रूपक में मिलता है, जहाँ शरीर को एक रथ, आत्मा को रथी (स्वामी), बुद्धि को सारथी, मन को लगाम और इंद्रियों को घोड़े कहा गया है। यदि घोड़े अनियंत्रित हों और लगाम ढीली हो, तो रथ खाई में गिर जाएगा। परंतु यदि सारथी (बुद्धि) चतुर हो और लगाम (मन) मजबूत हो, तो घोड़े (इंद्रियां) रथ को सही गंतव्य तक पहुँचाते हैं। यही बात श्रीकृष्ण यहाँ कह रहे हैं—इंद्रियों को नष्ट नहीं करना है, बल्कि उन्हें 'आत्मवश्यैः' यानी अपने वश में करना है।
पौराणिक इतिहास में राजर्षि जनक का चरित्र इस श्लोक का सबसे जीवंत उदाहरण है। राजा जनक मिथिला के सम्राट थे, वे ऐश्वर्य के बीच रहते थे, राजसी भोगों का उपभोग करते थे, परंतु वे 'विधेयात्मा' थे। वे राग और द्वेष से मुक्त होकर अपने कर्तव्यों का पालन करते थे, जिसके कारण उन्हें 'जीवनमुक्त' कहा गया। जब मिथिला में आग लगी, तब भी राजा जनक विचलित नहीं हुए क्योंकि उनका अंतःकरण 'प्रसाद' (परम शांति) में स्थित था। वे संसार में वैसे ही रहते थे जैसे कीचड़ में कमल का फूल रहता है।
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ
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संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: यह विवेचन श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक भाष्यों जैसे आदि शंकराचार्य कृत 'शारीरिक भाष्य', स्वामी रामसुखदास जी महाराज की 'साधक संजीवनी', स्वामी चिन्मयानंद जी के गीता प्रवचनों और महर्षि अरविंद के दिव्य दर्शन के गहन अध्ययन और तुलनात्मक विश्लेषण के आधार पर तैयार किया गया है। सनातन धर्म के ग्रंथों में इस श्लोक को 'स्थितप्रज्ञ' अवस्था की व्यावहारिक कुंजी माना गया है। हमारी संपादकीय टीम ने यह सुनिश्चित किया है कि इस व्याख्या में प्रयुक्त संस्कृत शब्दों के अर्थ और दार्शनिक संदर्भ पूरी तरह से शास्त्रों के अनुकूल हों, ताकि पाठकों को न केवल बौद्धिक संतुष्टि मिले, बल्कि उनके आध्यात्मिक अभ्यास को भी एक सही और प्रामाणिक दिशा मिल सके।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
परन्तु जो पुरुष राग-द्वेष से रहित, अपने वश में की हुई इन्द्रियों द्वारा विषयों को भोगता है और जिसका अन्तःकरण वश में है, वह शान्ति को प्राप्त होता है। But a person who, being free from attraction and repulsion, controls his senses and governs his mind, attains peace.
सम्यक् व्यवहार / Right Conduct
संसार में रहते हुए भी राग-द्वेष से मुक्त रहकर कर्म करना ही शान्ति का मार्ग है।
गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)
श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
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