श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 64

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 47 मिनट का पठन 159 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् | आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ||६४||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

9 पद
रागद्वेषवियुक्तैः
राग-द्वेष से रहित
तु
तो
विषयान्
विषयों को
इन्द्रियैः
इन्द्रियों द्वारा
चरन्
चलता हुआ (भोगता हुआ)
आत्मवश्यैः
अपने वश में किए हुए
विधेयात्मा
वश में किए हुए अन्तःकरण वाला
प्रसादम्
प्रसाद (शान्ति)
अधिगच्छति
प्राप्त होता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

परन्तु जो पुरुष राग-द्वेष से रहित, अपने वश में की हुई इन्द्रियों द्वारा विषयों को भोगता हुआ (व्यवहार करता हुआ) वश में किए हुए अन्तःकरण वाला होता है, वह प्रसाद (शान्ति) को प्राप्त होता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) का ६४वां श्लोक मानव चेतना को परम शांति, मानसिक स्वतंत्रता और आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाने वाला एक दिव्य प्रकाश-स्तंभ है। यह श्लोक व्यावहारिक अध्यात्म का वह अनुपम और कालजयी सूत्र है, जो हमें यह सिखाता है कि इस कोलाहलपूर्ण संसार में रहते हुए, अपने समस्त सांसारिक और पारिवारिक कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए भी हम किस प्रकार आंतरिक रूप से पूर्णतः मुक्त, निर्द्वंद्व और प्रशांत रह सकते हैं। सामान्यतः मनुष्य का संपूर्ण जीवन दो ही ध्रुवों के बीच निरंतर डोलता रहता है—'राग' (अत्यधिक आसक्ति, मोह या अनुकूलता के प्रति खिंचाव) और 'द्वेष' (घृणा, विकर्षण या प्रतिकूलता के प्रति क्रोध)। जब हम किसी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति से राग करते हैं, तो उसके न मिलने पर हमारे भीतर दुःख, ईर्ष्या और क्रोध का जन्म होता है; और जब हम किसी से द्वेष करते हैं, तो उसकी उपस्थिति मात्र से हमारा अंतःकरण अशांत और उद्वेलित हो जाता है। भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में अर्जुन को और उनके माध्यम से संपूर्ण मानवता को एक ऐसा 'मध्यम मार्ग' प्रदान कर रहे हैं, जहाँ इंद्रियों का बलपूर्वक दमन नहीं किया जाता, बल्कि उनका उदात्तीकरण (Sublimation), नियमन और आत्मिक नियंत्रण किया जाता है।

इस श्लोक का ब्रह्मांडीय और सांस्कृतिक महत्व इस बात में निहित है कि यह पलायनवाद (Escapism) का पूरी तरह से खंडन करता है। यह हमें जंगलों में भागने, कंदराओं में छिपने या संसार से विमुख होकर निष्क्रिय होने का उपदेश नहीं देता, बल्कि कर्मक्षेत्र की भीषण चुनौतियों के बीच डटे रहकर, अपनी इंद्रियों को अपने वश में रखकर, अनासक्त भाव से जीवन जीने की महान कला सिखाता है। जब साधक राग और द्वेष के द्वंद्व से ऊपर उठकर अपनी इंद्रियों को अपनी बुद्धि और आत्मा के अधीन कर लेता है, तब उसे 'प्रसाद' की प्राप्ति होती है। यहाँ 'प्रसाद' का अर्थ केवल किसी खाद्य सामग्री या मंदिर के नैवेद्य से नहीं है, बल्कि अंतःकरण की उस परम निर्मलता, स्थिरता, प्रसन्नता और आनंदमय स्थिति से है, जिसे पाकर मनुष्य संसार के बड़े से बड़े थपेड़ों और दुखों के बीच भी अडिग रहता है। यह श्लोक सनातन संस्कृति के उस शाश्वत सत्य को उद्घाटित करता है, जहाँ मुक्ति का मार्ग संसार के भौतिक त्याग में नहीं, बल्कि संसार के प्रति हमारे आंतरिक दृष्टिकोण के आमूलचूल परिवर्तन में निहित है।

आधुनिक मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह श्लोक 'इमोशनल इंटेलिजेंस' (Emotional Intelligence) और 'माइंडफुलनेस' (Mindfulness) का चरमोत्कर्ष है। आज का मनुष्य अवसाद, तनाव और एंग्जायटी से ग्रसित है क्योंकि उसकी इंद्रियां बाह्य विषयों की ओर अनियंत्रित होकर भाग रही हैं। श्रीकृष्ण का यह उपदेश हमें अपनी ऊर्जा को बिखरने से रोकने और उसे रचनात्मक व आध्यात्मिक उत्थान में लगाने की व्यावहारिक पद्धति प्रदान करता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

"रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् |
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ||६४||"

|| श्रीमद्भगवद्गीता - द्वितीय अध्याय, सांख्य योग, श्लोक ६४ ||

शुद्ध उच्चारण, सस्वर पाठ एवं साधना विधि:

इस श्लोक का पाठ संस्कृत व्याकरण के 'अनुष्टुप छंद' के नियमों के अनुसार किया जाता है। इसके शुद्ध और प्रभावशाली उच्चारण के लिए साधक को निम्नलिखित बिंदुओं का विशेष ध्यान रखना चाहिए:

  • संधि विच्छेद और उच्चारण बिंदु: राग-द्वेष-वियुक्तैः - तु - विषयान् - इन्द्रियैः - चरन् । आत्म-वश्यैः - विधेयात्मा - प्रसादम् - अधिगच्छति ॥ यहाँ 'वियुक्तैस्तु' में विसर्ग का 'स'कार हुआ है, अतः इसका उच्चारण प्रवाह में होना चाहिए।
  • स्वर और लय: प्रथम चरण "रागद्वेषवियुक्तैस्तु" के अंत में सूक्ष्म विराम लें, फिर "विषयानिन्द्रियैश्चरन्" का उच्चारण करें। इसी प्रकार द्वितीय पंक्ति में "आत्मवश्यैर्विधेयात्मा" के बाद एक क्षण का मौन रखकर "प्रसादमधिगच्छति" पर मंत्र को पूर्ण करें।
  • साधना काल और दिशा: इस श्लोक का जप प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व) में पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है। सुखासन, सिद्धासन या पद्मासन में बैठकर, रीढ़ की हड्डी को सीधा रखकर शांत चित्त से कम से कम ११, २१ या १०८ बार इसका मानसिक या वाचिक जप करने से मन की चंचलता का शमन होता है।
  • ध्यान की मुद्रा: जप के समय ज्ञान मुद्रा या चिन्मय मुद्रा धारण करने से मस्तिष्क की तंत्रिकाएं शांत होती हैं और श्लोक के स्पंदन सीधे हृदय चक्र को प्रभावित करते हैं।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
राग-द्वेष-वियुक्तैः आसक्ति (राग) और घृणा (द्वेष) से सर्वथा रहित होकर साधक की वह उच्च मानसिक अवस्था जहाँ वह न तो किसी अनुकूल वस्तु के प्रति अत्यधिक खिंचाव महसूस करता है और न ही किसी प्रतिकूल परिस्थिति से द्वेष या घृणा करता है। यह द्वंद्वातीत अवस्था है जो आत्मा को समता में स्थापित करती है।
तु परंतु / विशेष रूप से यह अव्यय शब्द पूर्ववर्ती श्लोकों (६२वें और ६३वें) में वर्णित उस अज्ञानी व्यक्ति से साधक की भिन्नता को रेखांकित करता है जो विषयों के चिंतन में फंसकर नष्ट हो जाता है। यह एक महत्वपूर्ण मोड़ को दर्शाता है।
विषयान् इंद्रियों के भोग्य पदार्थों को (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) संसार के वे समस्त भौतिक विषय जो हमारी ज्ञानेंद्रियों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इनमें रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्श शामिल हैं जो प्रकृति के अंग हैं।
इन्द्रियैः अपनी इंद्रियों के द्वारा नेत्र, कान, जिह्वा, नासिका और त्वचा जैसी ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से बाह्य जगत से संपर्क स्थापित करना। इंद्रियां यहाँ केवल उपकरण मात्र हैं, कर्ता नहीं।
चरन् विचरण करता हुआ / उपभोग करता हुआ संसार में रहते हुए सामान्य रूप से कर्म करना और आवश्यक विषयों को ग्रहण करना। इसका अर्थ है कि साधक संसार से भागता नहीं, बल्कि उसमें अनासक्त भाव से सक्रिय रहता है।
आत्म-वश्यैः अपने वश में की हुई (इंद्रियों द्वारा) वे इंद्रियां जो अब स्वतंत्र रूप से विषयों की ओर नहीं भागतीं, बल्कि बुद्धि और आत्मा के नियंत्रण में एक अनुशासित सेवक की भांति कार्य करती हैं। यह इंद्रियों का दमन नहीं, बल्कि उनका सुशिक्षित होना है।
विधेयात्मा वश में किए हुए मन और बुद्धि वाला साधक ऐसा व्यक्ति जिसका अंतःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) पूर्णतः उसके अपने नियंत्रण में है। जो अपनी ही आत्मा का स्वामी बन चुका है और जिसका मन अब उसका शत्रु नहीं बल्कि परम मित्र है।
प्रसादम् परम प्रसन्नता, निर्मलता और मानसिक शांति को यह केवल क्षणिक सुख नहीं, बल्कि अंतःकरण की वह दिव्य स्वच्छता और स्थिरता है जहाँ विक्षेप समाप्त हो जाते हैं और ईश्वर की कृपा का साक्षात अनुभव होने लगता है। इसे 'चित्तप्रसाद' भी कहते हैं।
अधिगच्छति प्राप्त करता है / अनुभव करता है वह साधक इस जीवन में ही, इसी क्षण उस परम शांति और आनंदमयी स्थिति को साक्षात प्राप्त कर लेता है। यह कोई भविष्य का वादा नहीं, बल्कि वर्तमान की अनुभूति है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के मैदान से जुड़ी है, जो मानव मन के भीतर चलने वाले शाश्वत संघर्ष का प्रतीक है। अर्जुन जब अपने ही सगे-संबंधियों, गुरुओं और पिताओं को सामने युद्ध के लिए खड़े देखता है, तो वह मोह और विषाद से ग्रस्त हो जाता है। उसका गांडीव धनुष हाथ से सरक जाता है, शरीर कांपने लगता है और वह रथ के पिछले हिस्से में बैठ जाता है। अर्जुन का यह विषाद वास्तव में 'राग' और 'द्वेष' का ही परिणाम था। उसे अपने परिवार के प्रति 'राग' (आसक्ति) था और युद्ध के दुष्परिणामों तथा शत्रुओं के प्रति 'द्वेष' व भय था। इस मानसिक द्वंद्व के कारण उसकी बुद्धि भ्रमित हो गई थी और वह अपने क्षत्रिय धर्म से विमुख होने लगा था।

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि संसार से भागना समस्या का समाधान नहीं है। यदि अर्जुन वन में भी चला जाए, तो भी उसका मन कुरुक्षेत्र की स्मृतियों, राग और द्वेष से अशांत रहेगा। इसलिए, भगवान उसे 'कर्मयोग' और 'बुद्धियोग' का उपदेश देते हैं। इस श्लोक से ठीक पहले के श्लोकों (६२वें और ६३वें) में श्रीकृष्ण ने पतन की उस सीढ़ी का वर्णन किया है जिसे 'विनाश का सोपान' कहा जाता है—विषयों का चिंतन करने से आसक्ति पैदा होती है, आसक्ति से कामना, कामना से क्रोध, क्रोध से सम्मोह (अज्ञान), सम्मोह से स्मृति-भ्रंश और अंततः बुद्धि का नाश हो जाता है। इस विनाशकारी श्रृंखला (Downward Spiral) से बचने का एकमात्र सकारात्मक और व्यावहारिक उपाय इस ६४वें श्लोक में बताया गया है।

कठोपनिषद् का रथ रूपक: इस श्लोक का दार्शनिक आधार कठोपनिषद् के उस प्रसिद्ध रूपक में मिलता है, जहाँ शरीर को एक रथ, आत्मा को रथी (स्वामी), बुद्धि को सारथी, मन को लगाम और इंद्रियों को घोड़े कहा गया है। यदि घोड़े अनियंत्रित हों और लगाम ढीली हो, तो रथ खाई में गिर जाएगा। परंतु यदि सारथी (बुद्धि) चतुर हो और लगाम (मन) मजबूत हो, तो घोड़े (इंद्रियां) रथ को सही गंतव्य तक पहुँचाते हैं। यही बात श्रीकृष्ण यहाँ कह रहे हैं—इंद्रियों को नष्ट नहीं करना है, बल्कि उन्हें 'आत्मवश्यैः' यानी अपने वश में करना है।

पौराणिक इतिहास में राजर्षि जनक का चरित्र इस श्लोक का सबसे जीवंत उदाहरण है। राजा जनक मिथिला के सम्राट थे, वे ऐश्वर्य के बीच रहते थे, राजसी भोगों का उपभोग करते थे, परंतु वे 'विधेयात्मा' थे। वे राग और द्वेष से मुक्त होकर अपने कर्तव्यों का पालन करते थे, जिसके कारण उन्हें 'जीवनमुक्त' कहा गया। जब मिथिला में आग लगी, तब भी राजा जनक विचलित नहीं हुए क्योंकि उनका अंतःकरण 'प्रसाद' (परम शांति) में स्थित था। वे संसार में वैसे ही रहते थे जैसे कीचड़ में कमल का फूल रहता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

मानसिक एवं मनोवैज्ञानिक लाभ
  • १. तनाव और चिंता से पूर्ण मुक्ति: यह श्लोक मन को वर्तमान क्षण में जीना सिखाता है, जिससे भविष्य की चिंता और अतीत का पछतावा दूर होता है।
  • २. भावनात्मक स्थिरता (Emotional Balance): राग-द्वेष से मुक्ति मिलने पर व्यक्ति सुख-दुःख, जय-पराजय, मान-अपमान में समभाव रखना सीख जाता है।
  • ३. एकाग्रता और फोकस में वृद्धि: जब इंद्रियां वश में होती हैं, तो मानसिक ऊर्जा का अपव्यय रुकता है और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कई गुना बढ़ जाती है।
  • ४. व्यसनों और बुरी आदतों से मुक्ति: यह श्लोक साधक को वह आंतरिक शक्ति देता है जिससे वह किसी भी प्रकार के हानिकारक व्यसन को आसानी से छोड़ सकता है।
  • ५. निर्णय क्षमता का विकास: राग और द्वेष के हटने से बुद्धि निष्पक्ष हो जाती है, जिससे व्यक्ति जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय बिना किसी पूर्वाग्रह के ले पाता है।
आध्यात्मिक एवं सूक्ष्म लाभ
  • ६. अंतःकरण की शुद्धि (Chitta Shuddhi): इस श्लोक के निरंतर मनन और जप से संचित कर्मों के नकारात्मक संस्कार क्षीण होते हैं और चित्त निर्मल होता है।
  • ७. दिव्य ऊर्जा (Aura) का विस्तार: नियमित अभ्यास से साधक के चारों ओर एक सकारात्मक ऊर्जा चक्र का निर्माण होता है जो नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करता है।
  • ८. ईश्वर कृपा और 'प्रसाद' की अनुभूति: 'प्रसाद' की प्राप्ति का अर्थ ही यह है कि साधक हर समय परमात्मा की उपस्थिति और उनकी असीम कृपा का अनुभव करता है।
  • ९. विवेक और प्रज्ञा की जागृति: सत्य और असत्य, नित्य और अनित्य के बीच अंतर करने वाली विवेक बुद्धि (Discernment) जागृत होती है।
  • १०. कुंडलिनी शक्ति का ऊर्ध्वगमन: जब इंद्रियां अंतर्मुखी होती हैं, तो मूलाधार में स्थित प्राण ऊर्जा का प्रवाह ऊपर की ओर (सहस्रार चक्र की ओर) होने लगता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: यह विवेचन श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक भाष्यों जैसे आदि शंकराचार्य कृत 'शारीरिक भाष्य', स्वामी रामसुखदास जी महाराज की 'साधक संजीवनी', स्वामी चिन्मयानंद जी के गीता प्रवचनों और महर्षि अरविंद के दिव्य दर्शन के गहन अध्ययन और तुलनात्मक विश्लेषण के आधार पर तैयार किया गया है। सनातन धर्म के ग्रंथों में इस श्लोक को 'स्थितप्रज्ञ' अवस्था की व्यावहारिक कुंजी माना गया है। हमारी संपादकीय टीम ने यह सुनिश्चित किया है कि इस व्याख्या में प्रयुक्त संस्कृत शब्दों के अर्थ और दार्शनिक संदर्भ पूरी तरह से शास्त्रों के अनुकूल हों, ताकि पाठकों को न केवल बौद्धिक संतुष्टि मिले, बल्कि उनके आध्यात्मिक अभ्यास को भी एक सही और प्रामाणिक दिशा मिल सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

'राग' का अर्थ है किसी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति के प्रति अत्यधिक आसक्ति या मोह। जब हम किसी से राग करते हैं, तो हम उसके बिना रहने की कल्पना भी नहीं कर पाते, जिससे भय और असुरक्षा की भावना पैदा होती है। वहीं 'द्वेष' का अर्थ है किसी के प्रति घृणा, ईर्ष्या या शत्रुता का भाव। द्वेष हमारे भीतर क्रोध और प्रतिशोध की अग्नि को भड़काता है। ये दोनों ही स्थितियां हमारे मन की शांति को नष्ट कर देती हैं। इनसे बचने के लिए हमें साक्षी भाव (Witness Consciousness) का अभ्यास करना चाहिए, जहाँ हम अपने विचारों को बिना किसी निर्णय के केवल देखते हैं।

नहीं, यह श्लोक भौतिक वस्तुओं के जबरन त्याग या दमन की बात नहीं करता। श्रीकृष्ण कहते हैं कि "विषयानिन्द्रियैश्चरन्" यानी इंद्रियों के द्वारा विषयों का उपभोग करते हुए भी व्यक्ति मुक्त रह सकता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि उपभोग के समय मन में न तो अत्यधिक आसक्ति (राग) होनी चाहिए और न ही उससे बचने की छटपटाहट (द्वेष)। जब इंद्रियां आपके नियंत्रण में होती हैं, तो आप वस्तुओं का आनंद तो लेते हैं, लेकिन उनके गुलाम नहीं बनते। यह दमन के स्थान पर नियमन का मार्ग है।

आध्यात्मिक संदर्भ में 'प्रसाद' का अर्थ है अंतःकरण की परम प्रसन्नता, निर्मलता, स्थिरता और शांति। यह वह अवस्था है जहाँ मन के सभी विक्षेप, अशांति और द्वंद्व शांत हो जाते हैं। जैसे शांत जल में चंद्रमा का स्पष्ट प्रतिबिंब दिखाई देता है, वैसे ही 'प्रसाद' से युक्त निर्मल अंतःकरण में परमात्मा के वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार होता है। यह ईश्वर की वह असीम अनुकंपा है जो साधक को भीतर से पूर्ण तृप्त कर देती है और उसे बाहरी सुखों पर निर्भर नहीं रहने देती।

'विधेयात्मा' बनने के लिए सबसे पहले अपनी दिनचर्या और आदतों पर ध्यान देना चाहिए। इसके लिए तीन मुख्य कदम उठाए जा सकते हैं: १. सजगता (Mindfulness): जब भी आप किसी वस्तु के प्रति अत्यधिक आकर्षित या क्रोधित हों, तो तुरंत रुकें और अपने विचारों का निरीक्षण करें। २. इंद्रिय संयम: भोजन, मनोरंजन और सोशल मीडिया के उपयोग में एक सीमा तय करें। ३. निष्काम कर्म: अपने कर्तव्यों को बिना फल की अत्यधिक चिंता किए, ईश्वर को समर्पित करके करें। धीरे-धीरे आपका मन आपकी बुद्धि के नियंत्रण में आने लगेगा और आप विधेयात्मा बन जाएंगे।

तनाव और अवसाद का मुख्य कारण यह होता है कि बाहरी परिस्थितियां हमारी इच्छा के अनुरूप नहीं होतीं, जिससे हम दुःखी हो जाते हैं। यह श्लोक हमें सिखाता है कि बाहरी परिस्थितियों को बदलना हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता, लेकिन उनके प्रति अपनी आंतरिक प्रतिक्रिया को नियंत्रित करना पूरी तरह हमारे हाथ में है। जब हम इस सत्य को स्वीकार कर लेते हैं और राग-द्वेष से ऊपर उठने का प्रयास करते हैं, तो मन की अनावश्यक दौड़ बंद हो जाती है, जिससे मानसिक शांति मिलती है और अवसाद के लक्षणों में भारी कमी आती है। यह हमें मानसिक रूप से आत्मनिर्भर बनाता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

परन्तु जो पुरुष राग-द्वेष से रहित, अपने वश में की हुई इन्द्रियों द्वारा विषयों को भोगता है और जिसका अन्तःकरण वश में है, वह शान्ति को प्राप्त होता है। But a person who, being free from attraction and repulsion, controls his senses and governs his mind, attains peace.

सम्यक् व्यवहार / Right Conduct

संसार में रहते हुए भी राग-द्वेष से मुक्त रहकर कर्म करना ही शान्ति का मार्ग है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
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श्लोक 64/72 89% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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