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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 64

अध्याय 2 · श्लोक 64

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् | आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ||६४||

rāga-dveṣa-viyuktais tu viṣayān indriyaiś caran | ātma-vaśyair vidheyātmā prasādam adhigacchati ||64||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

रागद्वेषवियुक्तैः: राग-द्वेष से रहित; तु: तो; विषयान्: विषयों को; इन्द्रियैः: इन्द्रियों द्वारा; चरन्: चलता हुआ (भोगता हुआ); आत्मवश्यैः: अपने वश में किए हुए; विधेयात्मा: वश में किए हुए अन्तःकरण वाला; प्रसादम्: प्रसाद (शान्ति); अधिगच्छति: प्राप्त होता है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

परन्तु जो पुरुष राग-द्वेष से रहित, अपने वश में की हुई इन्द्रियों द्वारा विषयों को भोगता हुआ (व्यवहार करता हुआ) वश में किए हुए अन्तःकरण वाला होता है, वह प्रसाद (शान्ति) को प्राप्त होता है।

English Translation

But a person who, being free from attraction and repulsion, controls his senses through the self and governs his senses, attains peace.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

राग-द्वेष से मुक्त होकर, वश में की हुई इन्द्रियों से विषयों का सेवन करने वाला व्यक्ति शान्ति पाता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।