सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 64

श्लोक ६४ में बताया गया है कि राग-द्वेष रहित, इन्द्रियों को वश में करके विषय भोगने वाला शान्ति पाता है।

संस्कृत श्लोक

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् | आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ||६४||

rāga-dveṣa-viyuktais tu viṣayān indriyaiś caran | ātma-vaśyair vidheyātmā prasādam adhigacchati ||64||

पदच्छेद / शब्दार्थ

रागद्वेषवियुक्तैः: राग-द्वेष से रहित; तु: तो; विषयान्: विषयों को; इन्द्रियैः: इन्द्रियों द्वारा; चरन्: चलता हुआ (भोगता हुआ); आत्मवश्यैः: अपने वश में किए हुए; विधेयात्मा: वश में किए हुए अन्तःकरण वाला; प्रसादम्: प्रसाद (शान्ति); अधिगच्छति: प्राप्त होता है।

हिंदी अनुवाद

परन्तु जो पुरुष राग-द्वेष से रहित, अपने वश में की हुई इन्द्रियों द्वारा विषयों को भोगता हुआ (व्यवहार करता हुआ) वश में किए हुए अन्तःकरण वाला होता है, वह प्रसाद (शान्ति) को प्राप्त होता है।

English Translation

But a person who, being free from attraction and repulsion, controls his senses through the self and governs his senses, attains peace.

टीका / Commentary

राग-द्वेष से मुक्त होकर, वश में की हुई इन्द्रियों से विषयों का सेवन करने वाला व्यक्ति शान्ति पाता है।