श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 (सांख्य योग (Sankhya Yoga))

अध्याय 2 · श्लोक 63

सांख्य योग (Sankhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 72 38 मिनट का पठन 132 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः | स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ||६३||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

9 पद
क्रोधात्
क्रोध से
भवति
होता है
सम्मोहः
मोह
सम्मोहात्
मोह से
स्मृतिविभ्रमः
स्मृति का भ्रम
स्मृतिभ्रंशात्
स्मृति के भ्रंश (नाश) से
बुद्धिनाशः
बुद्धि का नाश
बुद्धिनाशात्
बुद्धि नाश से
प्रणश्यति
नष्ट हो जाता है (पतित हो जाता है)।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

क्रोध से मोह उत्पन्न होता है, मोह से स्मृति-भ्रम होता है, स्मृति-भ्रम से बुद्धि का नाश होता है, और बुद्धि-नाश से मनुष्य नष्ट (पतित) हो जाता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) का ६३वां श्लोक मानव मनोविज्ञान, आध्यात्मिक पतन और मानसिक स्वास्थ्य का एक ऐसा शाश्वत सिद्धांत प्रस्तुत करता है, जो आज के आधुनिक युग में भी उतना ही प्रासंगिक है जितना पांच हजार वर्ष पूर्व कुरुक्षेत्र की रणभूमि में था। यह श्लोक केवल एक धार्मिक उपदेश नहीं है, बल्कि यह मानव मस्तिष्क के भीतर उठने वाले संवेगों, विशेषकर 'क्रोध' के क्रमिक विकास और उसके विनाशकारी परिणामों का एक अत्यंत सूक्ष्म वैज्ञानिक विश्लेषण है। जब मनुष्य अपनी इंद्रियों के विषयों में आसक्त होता है, तो उसकी बुद्धि धीरे-धीरे धूमिल होने लगती है। भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन को और उनके माध्यम से संपूर्ण मानवता को सचेत करते हैं कि कैसे एक छोटा सा नकारात्मक विचार या क्षणिक क्रोध अंततः व्यक्ति के संपूर्ण अस्तित्व, उसके विवेक और उसके जीवन को नष्ट कर सकता है। इस श्लोक का सांस्कृतिक महत्व इस बात में निहित है कि यह हमें आत्म-नियंत्रण, सजगता और ध्यान की शक्ति से परिचित कराता है। ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण से देखें तो यह श्लोक दर्शाता है कि जब हमारी चेतना बाह्य जगत के विकारों से प्रभावित होकर अपनी आंतरिक शांति खो देती है, तो हम समष्टि (Cosmic Order) से कट जाते हैं और हमारा पतन सुनिश्चित हो जाता है। आइए, इस पावन श्लोक के गहरे आध्यात्मिक सागर में गोता लगाएं और इसके प्रत्येक सूत्र को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।

स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥ ६३ ॥

श्रीमद्भगवद्गीता - द्वितीय अध्याय, श्लोक ६३
श्लोक का संदर्भ और पूर्वपीठिका (Verse 62 & 63 Connection):

इस श्लोक को पूर्णतः समझने के लिए इससे ठीक पहले वाले श्लोक (अध्याय २, श्लोक ६२) को समझना अत्यंत आवश्यक है। भगवान श्रीकृष्ण ने ६२वें श्लोक में पतन की यात्रा की शुरुआत बताई है:
"ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते। संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥" अर्थात्, विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से कामना (इच्छा) उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न आने से क्रोध उत्पन्न होता है। इसके बाद की श्रृंखला श्लोक ६३ में पूरी होती है, जहाँ क्रोध से लेकर सर्वनाश तक की यात्रा का वर्णन है।

पाठ करने की प्रामाणिक विधि:
  • समय: ब्रह्ममुहूर्त (प्रातः ४ से ६ बजे) या संध्याकाल में इस श्लोक का पाठ और चिंतन अत्यंत फलदायी होता है।
  • आसन: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें।
  • प्राणायाम: पाठ से पूर्व ३ बार गहरे प्राणायाम करें ताकि मन शांत और एकाग्र हो सके।
  • संकल्प: अपने भीतर के क्रोध, ईर्ष्या और मोह के शमन के लिए भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में प्रार्थना करें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

पद / शब्द (Sanskrit Word) सरल हिंदी अर्थ (Simple Meaning) आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ (Deep Philosophical Meaning)
क्रोधात् (Krodhāt) क्रोध से / गुस्से के कारण जब इच्छाओं की पूर्ति में बाधा आती है, तो अहंकार आहत होता है और तीव्र मानसिक उत्तेजना (क्रोध) का जन्म होता है।
भवति (Bhavati) उत्पन्न होता है / होता है यह एक स्वाभाविक और अनिवार्य मनोवैज्ञानिक परिणाम को दर्शाता है; क्रोध का आना पतन की प्रक्रिया को सक्रिय कर देता है।
सम्मोहः (Sammohaḥ) अविवेक / अत्यंत मूढ़ भाव / सम्मोहन ऐसी मानसिक स्थिति जहाँ सही और गलत का अंतर समाप्त हो जाता है। बुद्धि पर अज्ञान का पर्दा पड़ जाता है।
सम्मोहात् (Sammohāt) अविवेक या मोह के कारण जब व्यक्ति सम्मोहित या भ्रमित हो जाता है, तो उसकी मानसिक शक्तियां शिथिल होने लगती हैं।
स्मृतिविभ्रमः (Smṛti-vibhramaḥ) स्मृति का भ्रमित होना / याददाश्त खोना यहाँ स्मृति खोने का अर्थ अतीत की घटनाओं को भूलना नहीं, बल्कि शास्त्रों के ज्ञान, गुरु के उपदेशों और अपने नैतिक मूल्यों को भूल जाना है।
स्मृतिभ्रंशात् (Smṛti-bhraṁśāt) स्मृति के नष्ट या भ्रमित होने से जब जीवन के मूल्य और सीख विस्मृत हो जाते हैं, तो व्यक्ति दिशाहीन हो जाता है।
बुद्धिनाशः (Buddhi-nāśaḥ) बुद्धि का नाश / विवेक का अंत बुद्धि की वह क्षमता जो सत्य और असत्य का निर्णय करती है (विवेक), वह पूरी तरह से निष्क्रिय हो जाती है।
बुद्धिनाशात् (Buddhi-nāśāt) बुद्धि का नाश होने से जब मनुष्य का सारथी (बुद्धि) ही मृतप्राय हो जाए, तो रथ (जीवन) का अनियंत्रित होना निश्चित है।
प्रणश्यति (Praṇaśyati) वह नष्ट हो जाता है / सर्वनाश होता है मनुष्य अपने आध्यात्मिक, मानसिक और सामाजिक जीवन से पूरी तरह पतित हो जाता है। वह पशुवत जीवन जीने को विवश हो जाता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध की विभीषिका और अर्जुन के विषाद से जुड़ी हुई है। युद्ध के मैदान में अपने ही सगे-संबंधियों को सामने देखकर अर्जुन मोहग्रस्त हो गए थे। उनका यह मोह अंततः उन्हें कर्तव्य से विमुख कर रहा था। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि मोह ही सभी दुखों और पापों की जड़ है। इस श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण ने मानव मन के उस क्रमिक पतन का खाका खींचा है जो किसी भी युग के मनुष्य के लिए सत्य है।

महर्षि दुर्वासा और राजा अम्बरीष की कथा: श्रीमद्भागवत महापुराण में क्रोध के दुष्परिणामों को दर्शाने वाली एक अत्यंत प्रसिद्ध कथा आती है। परम तपस्वी महर्षि दुर्वासा अपने तीव्र क्रोध के लिए विख्यात थे। एक बार वे परम वैष्णव राजा अम्बरीष के महल पहुंचे। राजा अम्बरीष एकादशी व्रत के पारण की तैयारी कर रहे थे। दुर्वासा ऋषि नदी पर स्नान करने गए और उन्हें आने में विलंब हो गया। पारण का समय निकला जा रहा था, इसलिए राजा अम्बरीष ने केवल चरणामृत पीकर व्रत का पारण कर लिया। जब दुर्वासा ऋषि वापस आए और उन्हें इस बात का पता चला, तो वे क्रोध से आगबबूला हो गए। क्रोध के वशीभूत होकर उनका विवेक नष्ट हो गया (बुद्धिनाश)। उन्होंने अपनी जटा से एक भयंकर कृत्या (राक्षसी) उत्पन्न की ताकि वह अम्बरीष को मार सके। यहाँ क्रोध ने महर्षि दुर्वासा के वर्षों के तप और ज्ञान की स्मृति को नष्ट कर दिया था। परिणाम स्वरूप, भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र ने राजा अम्बरीष की रक्षा की और दुर्वासा ऋषि को अपनी जान बचाने के लिए तीनों लोकों में भागना पड़ा। अंततः उन्हें राजा अम्बरीष के चरणों में ही शरण लेनी पड़ी। यह कथा सिद्ध करती है कि क्रोध कैसे बड़े से बड़े ज्ञानी की बुद्धि का भी नाश कर देता है।

रामायण का संदर्भ: लंकापति रावण का पतन भी इसी श्लोक का जीवंत उदाहरण है। शूर्पणखा के अपमान के बाद रावण के भीतर क्रोध और प्रतिशोध की भावना जागी। इस क्रोध ने उसके भीतर सीता हरण की कामना को जन्म दिया। विभीषण और मंदोदरी जैसे नीतिवानों ने उसे बार-बार समझाया, लेकिन क्रोध के कारण उसका 'सम्मोह' (अविवेक) इतना बढ़ चुका था कि उसकी 'स्मृति' (कि राम साक्षात नारायण हैं) लुप्त हो गई। अंततः उसकी 'बुद्धि' का नाश हुआ और उसका संपूर्ण कुल सहित विनाश (प्रणश्यति) हो गया।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

१. क्रोध पर नियंत्रण और मानसिक शांति

इस श्लोक के नियमित चिंतन से साधक को क्रोध के भयानक परिणामों का निरंतर स्मरण रहता है, जिससे वह विकट परिस्थितियों में भी शांत रहना सीख जाता है।

२. विवेक शक्ति (Decision Making) का विकास

जब मन शांत होता है, तो बुद्धि भ्रमित नहीं होती। यह श्लोक हमें सही और गलत के बीच अंतर करने की अद्भुत क्षमता प्रदान करता है।

३. सकारात्मक ऊर्जा और आभा मंडल (Aura) की शुद्धि

क्रोध शरीर में नकारात्मक रसायनों को स्रावित करता है। इस श्लोक के जप से शरीर में सकारात्मक स्पंदन उत्पन्न होते हैं, जिससे आभा मंडल शुद्ध होता है।

४. स्मृति और एकाग्रता में वृद्धि

विद्यार्थियों और बौद्धिक कार्य करने वाले लोगों के लिए यह श्लोक वरदान है। यह मानसिक भटकाव को रोककर स्मृति को तीव्र करता है।

५. संबंधों में मधुरता

अधिकांश पारिवारिक और सामाजिक रिश्ते क्रोध के कारण ही टूटते हैं। इस श्लोक का अभ्यास वाणी में संयम लाता है और रिश्तों को बचाता है।

६. रक्तचाप और हृदय स्वास्थ्य में सुधार

चिकित्सीय दृष्टि से भी, क्रोध से बचने पर हृदय रोग और उच्च रक्तचाप (High BP) का खतरा काफी कम हो जाता है।

७. संचित कर्मों का शोधन

गीता के श्लोकों का पाठ करने से साधक के अंतःकरण की शुद्धि होती है और पूर्व जन्मों के पाप कर्मों का प्रभाव कम होता है।

८. ईश्वरीय कृपा और शरणागति

जब हम अपनी कमजोरियों (जैसे क्रोध) को स्वीकार कर भगवान की शरण में जाते हैं, तो हमें उनकी दिव्य सुरक्षा और मार्गदर्शन प्राप्त होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह आलेख 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' के अंतर्गत आता है, जिसे सनातन धर्म के प्रामाणिक ग्रंथों जैसे श्रीमद्भगवद्गीता (शांकरभाष्य), श्रीमद्भागवत महापुराण, और आधुनिक मनोवैज्ञानिक शोधों के समन्वय से तैयार किया गया है। भक्तिलोक के विद्वान संपादन मंडल ने इस बात का विशेष ध्यान रखा है कि श्लोक के व्याकरण, अर्थ और आध्यात्मिक संदेश में किसी भी प्रकार का विचलन न हो। हमारा उद्देश्य पाठकों तक केवल सूचना पहुंचाना नहीं, बल्कि उनके जीवन में सकारात्मक और व्यावहारिक परिवर्तन लाना है। इस श्लोक का निरंतर मनन आपको मानसिक तनाव से मुक्ति दिलाकर आत्म-साक्षात्कार के मार्ग पर अग्रसर करेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

गीता के अनुसार, क्रोध का मूल कारण 'आसक्ति' और 'अधूरी कामनाएं' हैं। जब भी क्रोध आए, तो सबसे पहले उस स्थान से हट जाएं, लंबी सांसें लें और स्वयं से प्रश्न करें कि क्या यह परिस्थिति आपके मानसिक संतुलन से अधिक महत्वपूर्ण है? भगवान कृष्ण इंद्रिय-निग्रह और साक्षी भाव (Detachment) की सलाह देते हैं।

नहीं, यहाँ 'स्मृतिभ्रंश' का अर्थ चिकित्सा विज्ञान वाली याददाश्त खोना नहीं है। इसका अर्थ है अपने जीवन-मूल्यों, नैतिक कर्तव्यों, गुरु के उपदेशों और अच्छे-बुरे के ज्ञान को भूल जाना। क्रोध के क्षण में व्यक्ति यह भूल जाता है कि वह किससे बात कर रहा है (जैसे माता-पिता या गुरु) और उसके क्या कर्तव्य हैं।

शास्त्रों में दो प्रकार के क्रोध का वर्णन है - 'तामसिक क्रोध' (जो व्यक्तिगत अहंकार और स्वार्थ से पैदा होता है) और 'सात्विक क्रोध' या 'धर्म-क्रोध' (जो अन्याय के विरोध में और लोक-कल्याण के लिए होता है, जैसे शिशुपाल की गलतियों पर कृष्ण का क्रोध)। सात्विक क्रोध में विवेक नष्ट नहीं होता, बल्कि वह मर्यादा की स्थापना के लिए एक साधन मात्र होता है।

दैनिक जीवन में इसका अभ्यास करने के लिए सुबह उठकर इस श्लोक का ३ बार पाठ करें। दिनभर में जब भी आपको गुस्सा आने लगे, मन ही मन "क्रोधाद्भवति सम्मोहः..." दोहराएं। यह मंत्र आपके मस्तिष्क को सचेत करेगा कि आप पतन के मार्ग पर बढ़ रहे हैं, और आप तुरंत शांत हो जाएंगे।

हाँ, बिल्कुल संभव है। गीता आशावादी शास्त्र है। यदि कोई व्यक्ति अपने पतन को स्वीकार कर लेता है और सच्चे मन से प्रायश्चित कर भगवान की शरण में जाता है, तो साधना, सत्संग और निष्काम कर्म योग के माध्यम से वह अपनी खोई हुई बुद्धि और विवेक को पुनः प्राप्त कर सकता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

क्रोध से मोह उत्पन्न होता है, मोह से स्मृति-भ्रम, स्मृति-भ्रम से बुद्धि-नाश, और बुद्धि-नाश से मनुष्य नष्ट हो जाता है। From anger comes delusion; from delusion, loss of memory; from loss of memory, destruction of discrimination; from destruction of discrimination, he perishes.

चेतावनी / Warning

इसलिए क्रोध और कामनाओं पर नियंत्रण रखना अत्यन्त आवश्यक है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 2: सांख्य योग (Sankhya Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 63 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 63/72 88% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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