श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 8 (अक्षर ब्रह्म योग (Aksara Brahma Yoga))

अध्याय 8 · श्लोक 27

अक्षर ब्रह्म योग (Aksara Brahma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 43 मिनट का पठन 118 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन । तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥ २७॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
न
not
एते
these
सृती
two paths
पार्थ
O Partha
जानन्
knowing
योगी
yogi
मुह्यति
is deluded
कश्चन
anyone
तस्मात्
therefore
सर्वेषु कालेषु
at all times
योगयुक्तः
steadfast in yoga
भव
be
अर्जुन
O Arjuna.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे पार्थ! इन दोनों मार्गों को जानने वाला कोई भी योगी मोहित नहीं होता। इसलिए हे अर्जुन! तू सब समय योग में स्थित रह।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के आठवें अध्याय 'अक्षरब्रह्मयोग' का २७वां श्लोक मानव चेतना को भ्रम से मुक्त कर अनंत परमात्मा में लीन होने का मार्ग प्रशस्त करता है। यह श्लोक केवल एक उपदेश नहीं, बल्कि जीवन के परम सत्य को उद्घाटित करने वाली दिव्य संजीवनी है। भगवान श्री कृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन को ब्रह्मांड के दो सनातन मार्गों—शुक्ल मार्ग (देवयान) और कृष्ण मार्ग (पितृयान)—के रहस्य को जानने वाले योगी की स्थिति का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि जो साधक इन दोनों मार्गों के वास्तविक स्वरूप को जान लेता है, वह कभी भी मोह या भ्रम से ग्रस्त नहीं होता।

इस श्लोक का सांस्कृतिक और ब्रह्मांडीय महत्व अत्यंत गहरा है। यह हमें सिखाता है कि मृत्यु के समय जीव की गति क्या होगी, यह इस बात पर निर्भर नहीं करता कि वह किस भौतिक परिस्थिति में शरीर त्यागता है, बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि उसका अंतःकरण कितना जागृत और योगयुक्त है। "तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन" का उद्घोष करके भगवान कृष्ण संपूर्ण मानवता को हर क्षण, हर परिस्थिति में ईश्वर से जुड़े रहने की प्रेरणा देते हैं। यह संदेश हमें सांसारिक कर्तव्यों का पालन करते हुए भी आंतरिक रूप से निर्लिप्त और परमात्मा में स्थित रहने की कला सिखाता है, जिससे जीवन में परम शांति और मोक्ष की प्राप्ति सुगम हो जाती है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन ।

तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥ २७॥


naite sṛtī pārtha jānan yogī muhyati kaścana |
tasmāt sarveṣu kāleṣu yogayukto bhavārjuna || 27 ||

पठन एवं साधना की प्रामाणिक विधि:

इस दिव्य श्लोक का जप और मनन करने के लिए साधक को निम्नलिखित शास्त्रीय विधि का पालन करना चाहिए:

  • समय: ब्रह्ममुहूर्त (प्रातः ४ से ६ बजे) या संध्याकाल इस श्लोक के ध्यान और जप के लिए सर्वोत्तम माना गया है।
  • आसन और दिशा: कुशा या ऊनी आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। रीढ़ की हड्डी को सीधा रखें।
  • प्राणायाम: जप प्रारंभ करने से पूर्व ३ से ५ बार अनुलोम-विलोम या प्राणायाम करें ताकि चित्त शांत और एकाग्र हो सके।
  • संकल्प और ध्यान: हृदय चक्र में भगवान श्री कृष्ण के सारथी रूप का ध्यान करें, जो अर्जुन को गीता का उपदेश दे रहे हैं। मन में यह भाव लाएं कि भगवान स्वयं आपको हर क्षण योगयुक्त रहने का आदेश दे रहे हैं।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में वेदांत का गूढ़ रहस्य छिपा हुआ है। नीचे दी गई तालिका में प्रत्येक पद का सरल हिंदी अर्थ और उसका गहरा आध्यात्मिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
न (na) नहीं यह निषेधात्मक शब्द अज्ञान और भ्रम के पूर्ण अभाव को दर्शाता है। जब ज्ञान का उदय होता है, तो अंधकार टिक नहीं पाता।
एते (ete) इन दोनों (मार्गों को) यहाँ पूर्व श्लोकों में वर्णित 'शुक्ल' (प्रकाशमय, देवयान) और 'कृष्ण' (अंधकारमय, पितृयान) मार्गों की ओर संकेत है।
सृती (sṛtī) मार्गों को / गतियों को संसार से विदा होने के बाद जीवात्मा की दो गतियाँ होती हैं—एक जो पुनरावृत्ति (जन्म-मरण) की ओर ले जाती है और दूसरी जो परमधाम को ले जाती है।
पार्थ (pārtha) हे पृथापुत्र अर्जुन! भगवान कृष्ण अर्जुन को उनकी माता पृथा (कुंती) के संबंध से पुकारते हैं, जो उनके बीच के आत्मीय और स्नेहपूर्ण संबंध को दर्शाता है।
जानन् (jānan) जानते हुए / भली-भांति समझकर यह केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, बल्कि अपरोक्षानुभूति (साक्षात्कार) है। जब साधक इन मार्गों के रहस्य को अनुभव से जान लेता है।
योगी (yogī) समत्व बुद्धि वाला साधक वह व्यक्ति जो परमात्मा से निरंतर जुड़ा हुआ है, जिसकी बुद्धि स्थिर है और जो द्वंद्वों से परे उठ चुका है।
मुह्यति (muhyati) मोहित होता है / भ्रमित होता है संसार के प्रलोभनों, जन्म-मृत्यु के चक्र या कर्मफल की आसक्ति में फँसना। ज्ञानी योगी इस मोह से सर्वथा मुक्त रहता है।
कश्चन (kaścana) कोई भी / कभी भी यह शब्द स्पष्ट करता है कि जो भी साधक इस ज्ञान को आत्मसात कर लेता है, वह किसी भी काल या परिस्थिति में विचलित नहीं होता।
तस्मात् (tasmāt) इस कारण से / इसलिए चूँकि ज्ञान ही भ्रम का नाशक है, इसलिए भगवान अर्जुन को साधना के व्यावहारिक पक्ष पर ध्यान केंद्रित करने का निर्देश देते हैं।
सर्वेषु कालेषु (sarveṣu kāleṣu) सभी समयों में / हर क्षण यह अत्यंत महत्वपूर्ण पद है। इसका अर्थ है कि साधना केवल मंदिर या पूजा गृह तक सीमित न रहे, बल्कि उठते-बैठते, युद्ध करते या कार्य करते समय भी बनी रहे।
योगयुक्तः (yoga-yuktaḥ) योग में स्थित / ईश्वर से जुड़ा हुआ मन, बुद्धि और प्राणों को परमात्मा में एकाग्र करना। कर्म करते हुए भी कर्ताभाव से मुक्त होकर कृष्णार्पण बुद्धि से जीना।
भव (bhava) हो जाओ / बनो भगवान का यह आदेशात्मक वचन है, जो साधक को पुरुषार्थ करने और अपनी चेतना को ऊर्ध्वगामी बनाने के लिए प्रेरित करता है।
अर्जुन (arjuna) हे अर्जुन! निष्पाप और स्वच्छ अंतःकरण वाले साधक का प्रतीक। अर्जुन का अर्थ है जो सरल, ऋजु और सत्य का खोजी हो।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक की पृष्ठभूमि को समझने के लिए हमें महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध की विभीषिका और अर्जुन की मानसिक स्थिति के साथ-साथ उपनिषदों के दार्शनिक चिंतन को भी समझना होगा। गीता का आठवां अध्याय, जिसे 'अक्षरब्रह्मयोग' कहा जाता है, मुख्य रूप से जीवन के अंतिम समय की चेतना और उसके बाद जीवात्मा की गति पर केंद्रित है।

इस अध्याय के प्रारंभ में अर्जुन भगवान कृष्ण से सात प्रश्न पूछते हैं, जिनमें ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ और अंतकाल में भगवान को कैसे जाना जाए, ये विषय शामिल हैं। भगवान कृष्ण इन सभी प्रश्नों का उत्तर देते हुए अंतकाल के स्मरण के महत्व को समझाते हैं। वे बताते हैं कि मनुष्य जीवन भर जिस भाव का चिंतन करता है, अंत समय में भी उसकी वैसी ही मति होती है और उसी के अनुसार उसे अगला जन्म या मोक्ष प्राप्त होता है।

इसके बाद, श्लोक २४ से २६ तक, भगवान दो सनातन मार्गों का वर्णन करते हैं:

  1. उत्तरायण या शुक्ल मार्ग (देवयान): यह प्रकाश, अग्नि, दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायण के छह महीनों का मार्ग है। इस मार्ग से जाने वाले ब्रह्मज्ञानी पुरुष वापस लौटकर संसार में नहीं आते, वे सीधे परमपद (मोक्ष) को प्राप्त होते हैं।
  2. दक्षिणायन या कृष्ण मार्ग (पितृयान): यह धुआं, रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायन के छह महीनों का मार्ग है। इस मार्ग से जाने वाले सकाम कर्म करने वाले मनुष्य स्वर्ग आदि लोकों में जाकर अपने पुण्यों का भोग करते हैं और पुनः इस मृत्युलोक में जन्म लेते हैं।

ये दोनों मार्ग अत्यंत प्राचीन हैं और इनका विस्तृत वर्णन छान्दोग्य उपनिषद तथा बृहदारण्यक उपनिषद में भी मिलता है। प्राचीन काल में ऋषि-मुनि इन मार्गों के समय और नक्षत्रों की गणना को लेकर अत्यंत चिंतित रहते थे। वे उत्तरायण में शरीर त्यागने की प्रतीक्षा करते थे, जैसा कि पितामह भीष्म ने किया था।

परंतु, इस २७वें श्लोक में भगवान कृष्ण एक क्रांतिकारी और परम कल्याणकारी सत्य प्रकट करते हैं। वे अर्जुन से कहते हैं कि हे पार्थ! जो योगी इन दोनों मार्गों के रहस्य को जान लेता है, वह कभी भ्रमित नहीं होता। उसे इस बात की चिंता नहीं होती कि उसकी मृत्यु दिन में होगी या रात में, उत्तरायण में होगी या दक्षिणायन में। क्योंकि वह जानता है कि जो व्यक्ति हर क्षण 'योगयुक्त' है, उसकी चेतना सदैव परमात्मा में ही लीन रहती है। इसलिए, भगवान अर्जुन को किसी विशेष काल या परिस्थिति की प्रतीक्षा करने के बजाय, जीवन के हर क्षण में, यहाँ तक कि युद्ध क्षेत्र में भी, योगयुक्त रहने का आदेश देते हैं। यह उपदेश कर्मयोग और भक्तियोग का अद्भुत समन्वय है, जो गृहस्थों और संन्यासियों दोनों के लिए समान रूप से कल्याणकारी है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस श्लोक का नियमित चिंतन, मनन और जप करने से साधक के जीवन में चमत्कारी और सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। इसके मुख्य आध्यात्मिक और मानसिक लाभ निम्नलिखित हैं:

१. मानसिक शांति और स्थिरता

इस श्लोक के निरंतर जप से मन की चंचलता समाप्त होती है और साधक को आंतरिक शांति का अनुभव होता है। यह तनाव और अवसाद को दूर करने में सहायक है।

२. भ्रम और संशय का निवारण

यह श्लोक बुद्धि को कुशाग्र बनाता है। जीवन के महत्वपूर्ण निर्णयों में जो भ्रम या दुविधा होती है, वह इस श्लोक के चिंतन से दूर हो जाती है और सही मार्ग दिखाई देने लगता है।

३. निरंतर ईश्वरीय चेतना (Mindfulness)

"तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भव" का अभ्यास साधक को वर्तमान क्षण में जीने और हर कार्य को ईश्वर की सेवा मानकर करने की प्रेरणा देता है।

४. मृत्यु के भय से मुक्ति

जब साधक यह जान लेता है कि योगयुक्त रहने से उसकी सद्गति सुनिश्चित है, तो उसके मन से मृत्यु का सबसे बड़ा भय सदा के लिए समाप्त हो जाता है।

५. सकारात्मक ऊर्जा और ओरा (Aura) का विकास

इस श्लोक के नियमित उच्चारण से शरीर के चक्र जागृत होते हैं, जिससे साधक के चारों ओर एक सुरक्षात्मक और सकारात्मक ऊर्जा मंडल का निर्माण होता है।

६. कर्मों का शुद्धिकरण (Karmic Purification)

योगयुक्त होकर किए गए कर्म 'अकर्म' बन जाते हैं, अर्थात उनका कोई नया बंधन नहीं बनता। इससे संचित कर्मों का क्षय होता है और अंतःकरण शुद्ध होता है।

७. एकाग्रता और संकल्प शक्ति में वृद्धि

विद्यार्थियों और कामकाजी लोगों के लिए यह श्लोक एकाग्रता बढ़ाने का अचूक साधन है। यह इच्छाशक्ति को सुदृढ़ कर लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करता है।

८. भक्ति और ज्ञान का उदय

यह श्लोक साधक के भीतर भगवान के प्रति अनन्य प्रेम (भक्ति) और सृष्टि के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान दोनों को एक साथ जाग्रत करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह आलेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत आता है, जिसे सनातन धर्म के प्रामाणिक ग्रंथों जैसे कि श्रीमद्भगवद्गीता (शांकरभाष्य, रामानुजभाष्य), छान्दोग्य उपनिषद और महाभारत के भीष्म पर्व के आधार पर संकलित और विश्लेषित किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक बिना किसी मिलावट के, अत्यंत सरल और सुबोध भाषा में शुद्ध दार्शनिक और आध्यात्मिक ज्ञान पहुँचाना है। इस श्लोक का संदेश आधुनिक जीवन की भागदौड़ और मानसिक अशांति के बीच एक मार्गदर्शक प्रकाश की तरह है, जो हमें कर्म करते हुए भी शांत रहने की कला सिखाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

इस श्लोक में 'दो मार्गों' से तात्पर्य शुक्ल मार्ग (देवयान) और कृष्ण मार्ग (पितृयान) से है। शुक्ल मार्ग प्रकाश और ज्ञान का प्रतीक है, जो जीवात्मा को जन्म-मरण के चक्र से मुक्त कर मोक्ष की ओर ले जाता है। वहीं, कृष्ण मार्ग अज्ञान और सकाम कर्मों का प्रतीक है, जिसके द्वारा जीव स्वर्ग आदि लोकों का सुख भोगकर पुनः पृथ्वी पर जन्म लेता है। योगी इन दोनों की अनित्यता और नित्यता को भली-भांति जानता है।

'योगयुक्त' होने का अर्थ है अपनी चेतना को सदैव परमात्मा से जोड़े रखना। दैनिक जीवन में इसे अपनाने के लिए हमें अपने सभी कर्तव्यों का पालन बिना किसी फल की आसक्ति के करना चाहिए। जब हम अपने कर्मों को भगवान को समर्पित कर देते हैं और सुख-दुख, लाभ-हानि में समभाव रखते हैं, तो हम स्वतः ही योगयुक्त हो जाते हैं। इसके लिए निरंतर नाम जप या श्वासों पर ध्यान देना एक उत्तम अभ्यास है।

यह श्लोक गृहस्थों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है। भगवान कृष्ण ने यह उपदेश वन में बैठे किसी संन्यासी को नहीं, बल्कि युद्ध के मैदान में खड़े एक गृहस्थ योद्धा (अर्जुन) को दिया था। यह इस बात का प्रमाण है कि अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों को निभाते हुए भी मनुष्य मन से भगवान में लीन रह सकता है। यही वास्तविक कर्मयोग है।

मृत्यु का समय अनिश्चित है; कोई नहीं जानता कि अंतिम क्षण कब आएगा। चूँकि अंतकाल का चिंतन ही अगले जन्म की गति निर्धारित करता है, इसलिए यदि हम केवल कुछ समय के लिए साधना करेंगे, तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि अंत समय में भगवान का स्मरण रहेगा। अतः, भगवान 'सर्वेषु कालेषु' (हर समय) योगयुक्त रहने को कहते हैं, ताकि जीवन का अंत जब भी और जैसे भी हो, हमारी चेतना परमात्मा में ही विलीन हो।

मानसिक तनाव का मुख्य कारण भविष्य की चिंता और अतीत का पछतावा है। यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि सब कुछ परमात्मा के नियंत्रण में है और हमारा मुख्य कर्तव्य केवल वर्तमान क्षण में उनसे जुड़े रहना है। जब हम इस सत्य को स्वीकार कर लेते हैं, तो हमारे भीतर का कर्ताभाव समाप्त हो जाता है, जिससे मानसिक बोझ हल्का होता है और अद्भुत शांति मिलती है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

कृष्ण कहते हैं: हे पार्थ! इन दोनों मार्गों को जानने वाला कोई भी योगी मोहित नहीं होता। इसलिए हे अर्जुन! तू सब समय योग में स्थित रह। Krishna says: O Partha, knowing these two paths, no yogi is deluded. Therefore, O Arjuna, be steadfast in yoga at all times.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

यह श्लोक योग के निरंतर अभ्यास का आग्रह करता है। मार्गों का ज्ञान होने पर भी योगाभ्यास आवश्यक है ताकि सही गति सुनिश्चित हो। This verse urges continuous practice of yoga. Even with knowledge of the paths, yogic practice is necessary to ensure the right destination.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 8: अक्षर ब्रह्म योग (Aksara Brahma Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 27 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 27/28 96% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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