Krishna Bhajan बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

मनमोहन मुरलीवाला नंदाचा अलबेला लिरिक्स (Manmohan Murali Wala Nandacha Albela Lyrics in Hindi) - Marathi Krishna Bhajan

मराठी कृष्ण भजन 'मनमोहन मुरलीवाला नंदाचा अलबेला' के लिरिक्स हिंदी में पढ़ें। भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति से पूर्ण इस भजन का भावार्थ और महत्व यहाँ उपलब्ध है।

मनमोहन मुरलीवाला नंदाचा अलबेला लिरिक्स - परिचय एवं आध्यात्मिक महत्व

"मनमोहन मुरलीवाला नंदाचा अलबेला" यह अत्यंत पावन, मधुर और भक्ति रस से परिपूर्ण मराठी कृष्ण भजन है, जो सनातन धर्म के वारकरी संप्रदाय और भक्तिकालीन महान परंपरा की सुगंध से ओतप्रोत है। भगवान श्रीकृष्ण के बालरूप, उनकी मोहक मुरली, और भक्तों के प्रति उनकी अकारण करुणा का इस भजन में सजीव चित्रण किया गया है। संत परंपरा के महान संतों ने भगवान श्री कृष्ण के नंदनंदन रूप को अपनी रचनाओं का केंद्रबिंदु बनाया है, जहाँ भगवान केवल ब्रह्मांड के नायक ही नहीं, बल्कि अपने भक्तों के सखा, पालक और रक्षक के रूप में प्रकट होते हैं। इस भजन के माध्यम से भक्त अपनी सम्पूर्ण निष्ठा और शरणागति भगवान के चरणों में अर्पित करता है। संगीत और साधना के इस अद्भुत संगम को गाते और सुनते समय मन में एक अलौकिक शांति और परमानंद की अनुभूति होती है। विशेषकर एकादशी, जन्माष्टमी, गोकुलाष्टमी, कान्हा के जन्मोत्सव, और साप्ताहिक सत्संग के दौरान इस भजन का संकीर्तन भक्तों को मंत्रमुग्ध कर देता है। यह भजन न केवल मराठी भाषी क्षेत्रों में अपितु सम्पूर्ण भारत में कृष्ण प्रेमियों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है, जो जीव और ब्रह्म के अद्वितीय मिलन का मार्ग प्रशस्त करता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन - शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें


मनमोहन मुरलीवाला ।
नंदाचा अलबेला ॥१॥

भक्तासाठीं तो जगजेठी ।
कुब्जेसी रत जाला ॥२॥

विदुरा घरच्या भक्षुनि कण्या ।
परमानंदें धाला ॥३॥

भक्तिसुखें सुखावला ।
एका जनार्दनीं निमाला ॥४॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन भगवान श्रीकृष्ण के अगाध प्रेम, सरलता और उनकी भक्त-वत्सलता का अत्यंत सुंदर वर्णन करता है। भजन की हर एक पंक्ति में भगवान की उन लीलाओं और गुणों का स्मरण कराया गया है जहाँ वे ऊंच-नीच, अमीर-गरीब का भेद मिटाकर केवल और केवल अपने भक्त के शुद्ध भाव को देखते हैं।

प्रथम पंक्ति में भगवान को 'मनमोहन मुरलीवाला' और 'नंदाचा अलबेला' कहा गया है। इसका अर्थ है कि नंद बाबा के वे लाडले, जो अपनी बांसुरी की तान से संपूर्ण ब्रजमंडल और चराचर जगत का मन मोह लेते हैं, वे अद्वितीय और सबसे निराले हैं। उनकी सुंदरता और लीलाएं भक्तों के हृदय को हर लेती हैं।

द्वितीय पंक्ति में संत एकानाथ महाराज कहते हैं कि भक्तों के कल्याण और उनकी पुकार सुनने के लिए वह 'जगजेठी' (संपूर्ण जगत के स्वामी) भी भक्तों के प्रेम में बंध जाते हैं। कुब्जा जैसी साधारण दासी के प्रति भी उन्होंने करुणा बरसाई और उसके प्रेम को स्वीकार किया, जो यह दर्शाता है कि ईश्वर के दरबार में बाहरी दिखावा नहीं बल्कि अंतरंग भक्ति का मूल्य है।

तृतीय पंक्ति में भगवान की महामहिम सरलता का प्रमाण मिलता है। जो प्रभु समस्त ब्रह्मांड के भोग-विलासों के स्वामी हैं, उन्होंने हस्तिनापुर में दुर्योधन के महलों के छप्पन भोग ठुकराकर परम ज्ञानी महात्मा विदुरा जी के घर जाकर उनके द्वारा दिए गए साधारण बेर और कण्या (चावल के कण) बड़े प्रेम से खाए और तृप्त हो गए। यह इस बात का प्रतीक है कि भगवान आदर-सत्कार या वैभव के भूखे नहीं हैं, वे केवल प्रेम और समर्पण के भूखे हैं।

अंतिम पंक्ति में संत एकानाथ जी महाराज लिखते हैं कि भगवान अपने भक्तों को मिलने वाले भक्ति सुख से स्वयं आनंदित होते हैं और अंततः संत 'एका जनार्दनी' (संत एकानाथ) भगवान के चरणों में पूर्ण रूप से लीन होकर उन्हीं में समा जाते हैं। यह जीव की पराकाष्ठा और मोक्ष की अवस्था है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस मराठी कृष्ण भजन की विशेषता इसकी दार्शनिक गहराई और भाषा की सरलता में निहित है। यह भजन वारकरी संप्रदाय की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता है, जहाँ भगवान विट्ठल या श्रीकृष्ण को अपने सखा और माता-पिता के रूप में देखा जाता है।

  • भक्त-वत्सलता का दर्शन: भजन स्पष्ट रूप से सिद्ध करता है कि भगवान ऊंचे कुलों या धन-दौलत को नहीं बल्कि भक्त के सच्चे प्रेम को महत्व देते हैं।
  • संत एकानाथ जी की छाप: संत एकानाथ महाराज की रचना होने के कारण इसमें भक्ति के साथ-साथ उच्च कोटि का आत्म-समर्पण और अद्वैत भाव झलकता है।
  • मानसिक शांति और सकारात्मकता: इस भजन का निरंतर गायन या श्रवण करने से मन के विकारों, अहंकार और चिंताओं का नाश होता है तथा चित्त भगवान के चरणों में स्थिर होता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

भक्ति संगीत के आनंद और उसकी ऊर्जा को प्राप्त करने के लिए उचित समय और विधि का होना आवश्यक है।

  • उचित समय: इस भजन को प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में पूजा के समय अथवा संध्याकाल में दीपक प्रज्वलित करने के पश्चात गाना अत्यंत फलदायी होता है।
  • विशेष अवसर: श्री कृष्ण जन्माष्टमी, गोकुलाष्टमी, एकादशी व्रत, संत एकानाथ महाराज जयंती, और किसी भी प्रकार के धार्मिक सत्संग या संकीर्तन समारोह में इसका गान विशेष रूप से किया जाता है।
  • प्रस्तुति विधि: इसे हारमोनियम, मृदंग, ताल और मंजीरों के साथ पारंपरिक वारकरी शैली या मधुर सुगम संगीत शैली में गाया जा सकता है। सामूहिक संकीर्तन में इसके प्रभाव कई गुना बढ़ जाते हैं।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन के आराध्य देव भगवान श्रीकृष्ण हैं, जो जगत के पालनहार विष्णु जी के पूर्ण अवतार माने जाते हैं। उनके बालस्वरूप और नंदनंदन रूप की महिमा इस पद में गाई गई है। इसके रचयिता महाराष्ट्र के महान संत शिरोमणि संत एकानाथ महाराज हैं, जो पैठण के रहने वाले थे और वारकरी संप्रदाय के स्तंभों में गिने जाते हैं। संत एकानाथ जी ने लोकभाषा मराठी में भगवद्गीता, भागवत पुराण के अध्यायों और अनेकों अभंगों व भजनों की रचना कर समाज में भक्ति और समरसता की अलख जगाई थी। उनके भजनों की मुद्रा "एका जनार्दनी" होती है, जो उनके गुरु श्री जनार्दन स्वामी के प्रति उनकी अगाध निष्ठा को दर्शाती है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

संत एकानाथ महाराज ने अपनी साधना और लोक-कल्याण की यात्रा के दौरान अनेक भजनों और अभंगों की रचना की। "मनमोहन मुरलीवाला नंदाचा अलबेला" भजन उसी परंपरा का एक दिव्य पुष्प है। उस काल में जब समाज जातियों और पाखंडों में बंटा हुआ था, संत महापुरुषों ने संकीर्तन के माध्यम से यह संदेश दिया कि ईश्वर सबके हैं और हर व्यक्ति प्रेम के मार्ग से उन तक पहुँच सकता है। विदुरा जी के यहाँ भोजन और कुब्जा उद्धार के प्रसंगों को जोड़कर संत जी ने यह प्रमाणित किया कि भगवान केवल भाव के भूखे हैं।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

यह भजन मराठी भाषा की संतों द्वारा प्रयुक्त लोक-शैली में रचित है, जिसमें ब्रजभाषा और हिंदी के कुछ शब्दों का सुंदर मिश्रण देखने को मिलता है। 'मनमोहन', 'मुरलीवाला', 'नंदाचा अलबेला' जैसे शब्द कृष्ण के उत्तर भारतीय बाल्यकाल की याद दिलाते हैं, जबकि इसकी लय और रचना शैली महाराष्ट्र की समृद्ध वारकरी भजन परंपरा से जुड़ी है। इसमें अनुप्रास और उपमा अलंकारों का सहज प्रयोग हुआ है जो इसके काव्य सौंदर्य को और अधिक प्रखर बनाते हैं.

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन मनुष्य को जीवन जीने की एक नई दृष्टि प्रदान करता है:

  1. अहंकार का त्याग: ईश्वर को पाने के लिए धन, बल या विद्या नहीं, बल्कि अहंकारहीन सरल हृदय की आवश्यकता होती है।
  2. समता का भाव: समाज में किसी भी व्यक्ति को छोटा या हीन नहीं समझना चाहिए, क्योंकि भगवान हर प्राणी के भीतर विराजमान हैं।
  3. शरणागति: सुख-दुःख की हर परिस्थिति में अपने आराध्य का स्मरण करते हुए जीवन बिताना ही सच्ची भक्ति है।
  4. संतों का संग: संत जनों के विचारों और उनके द्वारा रचित भजनों का स्मरण मनुष्य को भवसागर से पार लगाता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / पदावली सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक / साहित्यिक संदर्भ
मनमोहन मन को मोहने वाला भगवान श्रीकृष्ण का एक नाम जो सबका चित्त आकर्षित करता है।
नंदाचा अलबेला नंद बाबा का अनूठा और प्यारा लाडला श्रीकृष्ण की बाल्यकाल की अद्वितीय सुंदरता और नटखटपन।
जगजेठी संपूर्ण जगत के स्वामी या श्रेष्ठ समस्त ब्रह्मांड के संचालक भगवान विष्णु/कृष्ण।
कुब्जेसी रत जाला कुब्जा पर कृपा करने वाले या उसके प्रेम में मग्न होने वाले श्रीकृष्ण द्वारा कंस की दासी कुब्जा के प्रति दिखाई गई अकारण करुणा।
कण्या चावल के छोटे कण या टुकड़े महात्मा विदुर द्वारा अत्यंत प्रेम से भगवान को परोसा गया सादा भोजन।
परमानंदें धाला परम आनंद से तृप्त हो गए भक्त के प्रेमभाव को पाकर भगवान की आंतरिक पूर्णता और संतुष्टि।
एका जनार्दनीं निमाला संत एकानाथ अपने गुरु जनार्दन स्वामी की कृपा से प्रभु में लीन हो गए जीवात्मा का परमात्मा में पूर्ण विलय (मोक्ष)।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

पंक्ति 1: मनमोहन मुरलीवाला । नंदाचा अलबेला ॥
भावार्थ: हे प्रभु! आप ही मन को मोहने वाले मुरलीधर हैं और नंद बाबा के सबसे प्यारे और निराले दुलारे हैं। आपकी मोहिनी मूरत संपूर्ण विश्व को आकर्षित करती है।

पंक्ति 2: भक्तासाठीं तो जगजेठी । कुब्जेसी रत जाला ॥
भावार्थ: जो समस्त संसार के स्वामी और पालक हैं, वे अपने भक्तों के उद्धार के लिए और उनके प्रेम वश होकर कुब्जा जैसी साधारण स्त्री पर भी अपनी कृपा बरसा देते हैं।

पंक्ति 3: विदुरा घरच्या भक्षुनि कण्या । परमानंदें धाला ॥
भावार्थ: प्रभु ने हस्तिनापुर में विदुर जी के घर जाकर उनके द्वारा दिए गए चावल के साधारण कणों (कण्या) को बड़े चाव से खाया और परम संतोष तथा आनंद को प्राप्त किया।

पंक्ति 4: भक्तिसुखें सुखावला । एका जनार्दनीं निमाला ॥
भावार्थ: भक्त की दी हुई भक्ति के सुख से भगवान स्वयं प्रफुल्लित होते हैं, और संत एकानाथ महाराज कहते हैं कि गुरु जनार्दन की कृपा से वे भी इसी भक्ति में सराबोर होकर ब्रह्म में लीन हो गए हैं।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

भगवान श्रीकृष्ण के स्मरण और संकीर्तन को संबल प्रदान करने वाले पवित्र श्लोक:

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने ।<प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः ॥

अर्थ: वासुदेव नंदन, समस्त क्लेशों का नाश करने वाले, परम आत्मा स्वरूप भगवान श्रीकृष्ण और गोविंद को हम बारंबार प्रणाम करते हैं।

इसके अतिरिक्त भगवान के नाम संकीर्तन का महामंत्र भी निरंतर जपना चाहिए: हरे कृष्ण महामंत्र का जाप इस भजन के प्रभाव को और अधिक तीव्र कर देता है। भगवान की स्तुति के लिए आप श्री कृष्ण स्तोत्र का पाठ भी कर सकते हैं।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विशेषता विवरण
भजन का नाम मनमोहन मुरलीवाला नंदाचा अलबेला (Manmohan Murali Wala)
आराध्य देव भगवान श्रीकृष्ण / नंदनंदन
रचयिता / संत संत एकानाथ महाराज (वारकरी संप्रदाय)
भाषा मराठी (संत भाषा / मिश्रित लोक शैली)
प्रमुख विषय भक्त-वत्सलता, भगवान की सरलता और शरणागति
भक्ति भाव (Bhava) प्रेम, भक्ति, समर्पण और आत्मीयता
उपयुक्त अवसर जन्माष्टमी, एकादशी, सत्संग, दैनिक पूजा, संकीर्तन

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस पावन भजन के रचयिता महाराष्ट्र के महान संत एवं वारकरी संप्रदाय के प्रतिष्ठित संत श्री एकानाथ महाराज हैं। उनकी रचनाओं में 'एका जनार्दनी' मुद्रा का प्रयोग मिलता है।

इस पंक्ति का अर्थ है कि भगवान श्रीकृष्ण ने हस्तिनापुर प्रवास के दौरान दुर्योधन के महलों के राजसी भोजन को छोड़कर महात्मा विदुर के घर जाकर उनके द्वारा दिए गए साधारण चावल के कणों (कण्या) को प्रेमपूर्वक खाया और तृप्त हुए। यह भगवान की भक्त-वत्सलता को दर्शाता है।

यह भजन मराठी भाषा की पारंपरिक संतों की शैली में रचित है, जिसमें कृष्ण प्रेम के कारण हिंदी और ब्रजभाषा के कुछ लोकप्रिय शब्दों का भी सुंदर समन्वय है।

इस भजन को प्रातःकालीन पूजा, संध्या वंदन, एकादशी व्रत, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव और किसी भी धार्मिक सत्संग या संकीर्तन के दौरान श्रद्धा के साथ गाया जा सकता है।

वारकरी संप्रदाय मुख्य रूप से नामस्मरण और भजनों के संकीर्तन पर आधारित है। ऐसे अभंग और भजन समाज में आध्यात्मिक जागृति, भक्ति रस और मानवीय समानता का संदेश फैलाते हैं।

जब भगवान श्रीकृष्ण मथुरा पधारे थे, तब उन्होंने त्रिवक्र यानी कुब्जा नामक दासी पर कृपा करके उसके शरीर के विकारों को दूर किया और उसे परम सुंदर तथा प्रेम से परिपूर्ण कर दिया। यह प्रसंग भगवान की अहेतुकी कृपा का प्रतीक है।

इसके नियमित गायन और श्रवण से मन को असीम शांति मिलती है, भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में अनन्य प्रेम बढ़ता है और जीवन की तमाम चिंताओं से मुक्ति का अनुभव होता है।

हाँ, इस भजन को परिवार के साथ या मित्रों की मंडली के बीच ताली बजाकर और संगीत के साथ सामूहिक रूप से गाने से घर का वातावरण पूरी तरह से पवित्र और भक्तिमय हो जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह मार्गदर्शिका और भजन पाठ भक्तों की आध्यात्मिक जिज्ञासाओं को शांत करने और प्रामाणिक सामग्री प्रदान करने के उद्देश्य से तैयार की गई है। सभी पंक्तियों और उनके अर्थों का संकलन पारंपरिक वारकरी साहित्य एवं संत एकानाथ ग्रन्थ साहिब के संदर्भों पर आधारित है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत इस आलेख में भाषा की शुद्धता, भक्ति भाव की गहराई और SEO मानकों का पूर्ण ध्यान रखा गया है ताकि पाठकों को सर्वोत्तम आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त हो सके।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • संत एकानाथ गाथा (श्रीकृष्ण संकीर्तन एवं अभंग संग्रह)
  • वारकरी भजन संहिता एवं पारंपरिक संगीत ग्रंथ
  • श्रीमद्भागवत महापुराण (विदुर प्रसंग एवं कुब्जा उद्धार अध्याय)
  • सनातन धर्म एवं भक्ति साहित्यकोश

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संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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