gurudev Bhajan मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

कही गुण गाये जग के झमेले में भजन इन हिंदी लिरिक्स

कही गुण गाये जग के झमेले में भजन के हिंदी लिरिक्स और भावार्थ। गुरु महिमा और वैराग्य से भरे इस भजन का पाठ करें और आत्मिक शांति प्राप्त करें। अभी पढ़ें।

यह भजन "कही गुण गाये जग के झमेले में भजन" सनातन भक्ति परंपरा का एक अत्यंत पावन और भावपूर्ण गीत है, जो साधक को संसार के द्वंद्वों के बीच भी प्रभु-नाम और गुरु-चरणों में अनुरक्त रहने की प्रेरणा देता है। इस भजन का मुख्य स्वर शरणागति, वैराग्य और निरंतर स्मरण का है। जब मनुष्य संसार के झमेलों, मोह-माया और सांसारिक चिंताओं में उलझा रहता है, तब भजन-कीर्तन ही वह साधन है जो उसे अपनी मूल आत्मिक सत्ता से जोड़े रखता है। यह भजन विशेष रूप से गुरु महिमा, गुरुदेव भजन और सतगुरु भजन की परंपरा से जुड़ा हुआ है, जिसमें साधक गुरु-कृपा और प्रभु-नाम की महिमा गाता है। भजन की भाषा सरल, हृदयस्पर्शी और भक्ति-रस से परिपूर्ण है, जिससे यह सामान्य श्रोता से लेकर गंभीर साधक तक सभी को आत्मिक शांति और आनंद प्रदान करता है। इसका गायन प्रायः प्रातःकाल, संध्या-आरती, सत्संग, गुरु-पूर्णिमा, गुरुवार व्रत तथा एकादशी जैसे पावन अवसरों पर किया जाता है। भक्ति-भाव से गाया गया यह भजन मन की चंचलता को शांत करता है और साधक को आत्म-कल्याण के मार्ग पर अग्रसर करता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

कही गुण गाये जग के झमेले में भजन

कही गुण गाये जग के झमेले में भजन,
गुरु चरणों में लीन रहे मेरा मन।
संसार की माया में उलझा जीवन,
तब भी न छूटे प्रभु का स्मरण।।

जग के झमेले हैं अनगिनत यहाँ,
सुख-दुःख के बंधन में बंधा जहाँ।
पर जो हरि-नाम में रमता रहता,
वह भव-सागर से पार हो जाता।।

गुरु कृपा से मिलता है ज्ञान,
गुरु कृपा से मिटता अज्ञान।
गुरु चरणों में जो शीश झुकाता,
वह जीवन में सुख पाता।।

कही गुण गाये जग के झमेले में भजन,
गुरु चरणों में लीन रहे मेरा मन।
नाम-संकीर्तन ही है सच्चा साधन,
यही है कलयुग का परम साधन।।

मोह-माया के बंधन तोड़ो,
प्रभु-चरणों में मन को जोड़ो।
जो निरंतर हरि-गुण गाता,
वह जन्म-मरण से छूट जाता।।

कही गुण गाये जग के झमेले में भजन,
गुरु चरणों में लीन रहे मेरा मन।
सतगुरु की महिमा अपरंपार,
उनके चरणों में मिलता संसार।।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस भजन का मूल भाव यह है कि मनुष्य चाहे संसार के कितने ही झमेलों, समस्याओं और मोह-माया के बंधनों में घिरा हो, यदि उसका मन गुरु-चरणों और प्रभु-नाम में लीन रहे, तो वह कभी पतित नहीं होता। भजन का पहला पंक्ति "कही गुण गाये जग के झमेले में भजन" यह दर्शाती है कि सांसारिक जीवन में रहते हुए भी भजन-कीर्तन करना संभव है और यही सच्ची साधना है। यहाँ "जग के झमेले" से तात्पर्य संसार के द्वंद्व, चिंताएँ, आकर्षण और भौतिक बंधन हैं, जो जीवात्मा को उसके वास्तविक स्वरूप से विमुख करते हैं। भजन कहता है कि इन सबके बीच भी मन का गुरु-चरणों में लीन रहना ही सच्ची साधना है।

दूसरा भाव यह है कि संसार में सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान सब कुछ चलता रहता है, परंतु जो साधक हरि-नाम में रमता है, वह इन सबसे अप्रभावित रहता है और भव-सागर से पार उतर जाता है। गुरु-कृपा का महत्व इस भजन में विशेष रूप से रेखांकित किया गया है। गुरु कृपा से ही अज्ञान का अंधकार मिटता है और ज्ञान का प्रकाश मिलता है। जो साधक गुरु-चरणों में शीश झुकाता है, वह जीवन में सच्चा सुख और शांति पाता है।

भजन का तीसरा भाव यह है कि कलयुग में नाम-संकीर्तन ही परम साधन है। श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीमद्भागवत में भी कहा गया है कि कलियुग में हरि-नाम संकीर्तन ही जीव के उद्धार का सर्वश्रेष्ठ साधन है। यह भजन साधक को मोह-माया के बंधन तोड़ने और प्रभु-चरणों में मन जोड़ने की प्रेरणा देता है। जो निरंतर हरि-गुण गाता है, वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। अंत में भजन सतगुरु की महिमा को अपरंपार बताता है और कहता है कि उनके चरणों में ही सच्चा संसार और सच्चा सुख मिलता है।

भावार्थ की दृष्टि से यह भजन शरणागति, वैराग्य, गुरु-भक्ति और नाम-महिमा का सुंदर संगम है। यह साधक के अंतर्मन को झंकृत करता है और उसमें भक्ति रूपी अमृत का संचार करता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह गुरु-भक्ति और प्रभु-नाम की महिमा को एक साथ प्रस्तुत करता है। भजन की भाषा सरल और हृदयस्पर्शी है, जिससे यह हर आयु वर्ग के श्रोताओं को आत्मिक शांति प्रदान करता है। इसका संगीतमय स्वर और भक्ति-भाव श्रोता को गहन आनंद की अनुभूति कराता है।

धार्मिक दृष्टि से यह भजन गुरु-परंपरा, सत्संग और नाम-संकीर्तन की महत्ता को स्थापित करता है। सनातन परंपरा में गुरु को भगवान का साक्षात रूप माना गया है। "गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरः" के अनुसार गुरु ही त्रिदेवों का स्वरूप हैं। यह भजन उसी गुरु-तत्व की स्तुति करता है।

इस भजन के श्रवण और गायन से मन की चंचलता दूर होती है, आत्मविश्वास बढ़ता है, और साधक आध्यात्मिक साधना की ओर प्रेरित होता है। यह भजन विशेष रूप से उन साधकों के लिए है जो सांसारिक जीवन में रहते हुए भी आध्यात्मिक उन्नति चाहते हैं।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन का गायन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में, संध्या-आरती के समय, तथा रात्रि में सोने से पूर्व किया जा सकता है। गुरुवार, गुरु-पूर्णिमा, एकादशी, सत्संग, भजन-संध्या और गुरु-आराधना के विशेष अवसरों पर इसका गायन अत्यंत फलदायी माना जाता है।

गायन की विधि में सर्वप्रथम स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें, फिर गुरु-चरणों या प्रभु-प्रतिमा के समक्ष दीपक प्रज्वलित करें। हाथ में माला लेकर या ताली बजाकर भक्ति-भाव से भजन गाएं। भजन गाते समय मन को एकाग्र रखें और शब्दों के भाव में डूबें। भजन के बाद गुरु-आरती और प्रसाद वितरण करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: यह भजन किस देवता या गुरु को समर्पित है?

यह भजन मुख्य रूप से गुरु-तत्व और प्रभु-नाम को समर्पित है। इसमें सतगुरु की महिमा और हरि-नाम की महत्ता का गुणगान किया गया है।

प्रश्न 2: इस भजन का गायन कब करना चाहिए?

इस भजन का गायन प्रातःकाल, संध्या-आरती, गुरुवार, गुरु-पूर्णिमा और सत्संग के समय करना शुभ माना जाता है।

प्रश्न 3: क्या इस भजन को सुनने से मन की शांति मिलती है?

हाँ, भक्ति-भाव से इस भजन को सुनने और गाने से मन की चंचलता दूर होती है और आत्मिक शांति की अनुभूति होती है।

प्रश्न 4: क्या इस भजन का कोई विशेष फल है?

सनातन परंपरा के अनुसार नाम-संकीर्तन और गुरु-भजन से साधक के पाप कर्म नष्ट होते हैं, मन शुद्ध होता है और आध्यात्मिक उन्नति होती है।

प्रश्न 5: क्या यह भजन किसी विशेष संप्रदाय से जुड़ा है?

यह भजन सनातन भक्ति परंपरा का हिस्सा है और गुरु-भक्ति तथा नाम-संकीर्तन से जुड़ा है। यह किसी एक संप्रदाय तक सीमित नहीं है।

प्रश्न 6: क्या इस भजन को गाते समय किसी विशेष नियम का पालन करना चाहिए?

भजन गाते समय शुद्धता, भक्ति-भाव और मन की एकाग्रता का पालन करना चाहिए। स्वच्छ स्थान और पवित्र वस्त्र धारण करना उत्तम माना जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसमें भजन के मूल पाठ, भावार्थ और आध्यात्मिक महत्व को सनातन परंपरा के संदर्भों के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। भजन की व्याख्या में श्रीमद्भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत और गुरु-महिमा से जुड़े पारंपरिक स्रोतों का सहारा लिया गया है। पाठकों से अनुरोध है कि वे भजन को भक्ति-भाव से गाएं और श्रवण करें।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 10 Oct 2026

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