सनातन धर्म की समृद्ध संकीर्तन परंपरा में "रे मन हरी सुमिरन कर लीजे" (Re Man Hari Sumiran Kar Leeje) एक ऐसा कालजयी और परम पावन भजन है, जो जीवात्मा को सांसारिक मोह-माया की निद्रा से जगाकर परमात्मा की शरण में जाने का संदेश देता है। यह भजन मुख्य रूप से वैराग्य, विनय, और अनन्य समर्पण के भाव (शरणागति भाव) से ओतप्रोत है। संत कबीरदास जी और अन्य महान वैष्णव संतों की वाणी से प्रेरित यह भजन मनुष्य जीवन की नश्वरता और ईश्वर नाम-स्मरण की शाश्वतता को अत्यंत सरल किंतु मर्मस्पर्शी शब्दों में रेखांकित करता है। कलयुग में नाम-संकीर्तन को ही मोक्ष का सबसे सुलभ और अचूक साधन माना गया है, और यह भजन उसी दिव्य दर्शन का संगीतमय प्रकटीकरण है। इस भजन के नियमित श्रवण और गायन से साधक के अंतःकरण में सात्विक विचारों का उदय होता है और मन को असीम शांति प्राप्त होती है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
॥ रे मन हरी सुमिरन कर लीजै ॥
स्थायी:
रे मन हरी सुमिरन कर लीजै।
मानुष जनम का लाभ यही है, और न दूजा कीजै॥
रे मन हरी सुमिरन कर लीजै।
अंतरा १:
ऐसी देह मिली दुर्लभ जो, बार-बार नहीं पावै।
काल अचानक झपट करेगा, तब कछु काम न आवै॥
रे मन हरी सुमिरन कर लीजै।
अंतरा २:
सम्पति विपत्ति सबहिं के संगी, अंत समय तज जावै।
हरि के भजन बिना जग माही, जीव जनम गँवावै॥
रे मन हरी सुमिरन कर लीजै।
अंतरा ३:
काम, क्रोध, मद, लोभ निवारो, हरि सरनागत लीजै।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, राम नाम रस पीजै॥
रे मन हरी सुमिरन कर लीजै।
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
यह भजन जीवात्मा को संबोधित करते हुए जीवन के परम सत्य का उद्घाटन करता है। इसका विस्तृत भावार्थ इस प्रकार है:
प्रथम भाग (स्थायी): कवि अपने मन को सचेत करते हुए कहते हैं कि हे मन! तू भगवान श्री हरि का स्मरण कर ले। इस अमूल्य मानव जीवन को प्राप्त करने का एकमात्र वास्तविक लाभ और उद्देश्य यही है कि हम उस परमेश्वर की भक्ति करें। इसके अतिरिक्त संसार के अन्य प्रपंचों में पड़कर समय व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए।
द्वितीय भाग (अंतरा): यह मानव शरीर अत्यंत दुर्लभ है, जो चौरासी लाख योनियों के चक्र के बाद बड़ी कठिनाई से प्राप्त होता है। यह शरीर बार-बार नहीं मिलने वाला। मृत्यु (काल) कब अचानक झपट्टा मार दे, यह कोई नहीं जानता। जब अंत समय आएगा, तब संसार की कोई भी वस्तु, धन-दौलत या सगे-संबंधी काम नहीं आएंगे। इसलिए समय रहते ईश्वर की शरण ग्रहण कर लेनी चाहिए।
तृतीय भाग (अंतरा): संसार में संपत्ति और विपत्ति तो आती-जाती रहती हैं, और सांसारिक मित्र केवल सुख के साथी होते हैं। मृत्यु के समय सब साथ छोड़ देते हैं। जो मनुष्य इस संसार में आकर भगवान का भजन नहीं करता, वह अपने इस अमूल्य जीवन को व्यर्थ ही गंवा देता है।
चतुर्थ भाग (अंतरा): अंत में संत कबीरदास जी कहते हैं कि अपने भीतर के काम, क्रोध, अहंकार (मद) और लोभ जैसे विकारों को दूर करो और भगवान की शरण में जाओ। हे संतों! सुनो, इस जीवन को सार्थक करने के लिए निरंतर राम नाम के दिव्य रस का पान करते रहो।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
यह भजन केवल एक संगीतमय रचना नहीं है, बल्कि यह उपनिषदों और श्रीमद्भगवद्गीता के सार को समेटे हुए एक महान आध्यात्मिक उपदेश है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- वैराग्य भाव की जागृति: यह भजन मनुष्य को संसार की क्षणभंगुरता का बोध कराता है, जिससे मन में अनासक्ति और वैराग्य का भाव जाग्रत होता है।
- नाम संकीर्तन की महिमा: कलयुग में केवल नाम-स्मरण को ही भवसागर से पार उतरने का माध्यम बताया गया है, जिसकी पुष्टि गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस की चौपाइयां में भी की है - "कलिजुग केवल नाम अधारा। सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा॥"
- मानव जीवन की दुर्लभता: शास्त्रों में कहा गया है कि "बड़े भाग मानुष तन पावा"। यह भजन इसी सत्य को दोहराते हुए सचेत करता है कि इस अवसर को व्यर्थ न जाने दें।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस भजन को गाने और सुनने के लिए कोई कठिन नियम नहीं हैं, परंतु भक्ति भाव की प्रगाढ़ता के लिए निम्नलिखित समय और विधि सर्वोत्तम मानी जाती है:
- सर्वोत्तम समय: इस भजन का गायन सुबह के समय (ब्रह्ममुहूर्त या प्रातःकाल) अथवा संध्या आरती के समय अत्यंत फलदायी होता है। सुबह के शांत वातावरण में इसका पाठ करने से मन दिनभर शांत और केंद्रित रहता है।
- गायन की विधि: इसे शांत चित्त होकर, आँखें बंद करके, हृदय में भगवान विष्णु या श्री राम के स्वरूप का ध्यान करते हुए गाना चाहिए।
- सत्संग और कीर्तन: सामूहिक सत्संग, पारिवारिक पूजा, या एकादशी व्रत के जागरण के समय इस भजन का सामूहिक संकीर्तन करने से वातावरण अत्यंत पवित्र और सकारात्मक हो जाता है।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्री हरि (विष्णु/राम) को समर्पित है। सनातन धर्म में श्री हरि ही जगत के पालनहार हैं, जो अपने भक्तों के उद्धार के लिए विभिन्न अवतार ग्रहण करते हैं। इस भजन की अंतिम पंक्तियों में संत कबीरदास जी का नाम आता है, जो मध्यकालीन भारत के महान समाज सुधारक, कवि और निर्गुण-सगुण भक्ति के अद्भुत समन्वयकर्ता थे। कबीरदास जी ने सदैव बाह्य आडंबरों का विरोध करते हुए अंतःकरण की शुद्धि और राम नाम के आंतरिक स्मरण पर बल दिया है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
इस भजन की पृष्ठभूमि मध्यकालीन भक्ति आंदोलन से जुड़ी हुई है। उस काल में जब समाज विभिन्न कुरीतियों और जटिलताओं से जूझ रहा था, तब संतों ने लोकभाषा में भजनों की रचना की ताकि जन-साधारण तक ईश्वर की भक्ति का सरल संदेश पहुंच सके। यह भजन उसी परंपरा की एक अनमोल कड़ी है, जो जनमानस को सीधे हृदय से जोड़ती है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और जनसामान्य की भाषा (सधुक्कड़ी या मिश्रित ब्रजभाषा) है। इसकी काव्य शैली उपदेशात्मक और संवादात्मक है, जहाँ कवि सीधे अपने ही मन को संबोधित कर रहे हैं। मन को संबोधित करने की यह शैली भारतीय अध्यात्म में अत्यंत प्राचीन और प्रभावी रही है, क्योंकि मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है ("मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः")।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन हमें दैनिक जीवन में निम्नलिखित महत्वपूर्ण सीख देता है:
- प्राथमिकता का निर्धारण: संसार के समस्त कर्तव्यों को पूरा करते हुए भी हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता ईश्वर का स्मरण होनी चाहिए।
- आंतरिक शत्रुओं पर विजय: काम, क्रोध, मद और लोभ जैसे विकार हमारे आध्यात्मिक पतन का कारण बनते हैं। इनसे मुक्ति पाकर ही हम सच्चे सुख का अनुभव कर सकते हैं।
- समय का सदुपयोग: मृत्यु अटल है और समय सीमित है। इसलिए शुभ कार्यों और साधना में विलंब नहीं करना चाहिए।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| सुमिरन (Sumiran) | स्मरण / ध्यान करना | निरंतर भगवान के नाम का जप करना। |
| देह (Deh) | शरीर / काया | पंचतत्वों से बना नश्वर मानव शरीर। |
| काल (Kaal) | मृत्यु / समय | अपरिहार्य अंत जो हर जीव का होना है। |
| मद (Mad) | अहंकार / घमंड | स्वयं को श्रेष्ठ समझने का अज्ञान। |
| सरनागत (Sarnagat) | शरण में आया हुआ | परमात्मा के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण। |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"रे मन हरी सुमिरन कर लीजै। मानुष जनम का लाभ यही है, और न दूजा कीजै॥"
हे चंचल मन! तू व्यर्थ के विचारों को छोड़कर भगवान हरि के नाम का स्मरण कर। इस अमूल्य मानव जन्म को प्राप्त करने का वास्तविक फल यही है कि हम मोक्ष की प्राप्ति के लिए साधना करें। इसके अलावा अन्य कोई भी सांसारिक कार्य जीवन का मुख्य उद्देश्य नहीं हो सकता।
"ऐसी देह मिली दुर्लभ जो, बार-बार नहीं पावै। काल अचानक झपट करेगा, तब कछु काम न आवै॥"
यह मानव शरीर देवताओं के लिए भी दुर्लभ माना गया है। यह अवसर बार-बार नहीं मिलता। मृत्यु रूपी काल कब अचानक हमारे जीवन का अंत कर देगा, इसका कोई भरोसा नहीं है। उस समय संसार की कोई भी शक्ति या संपत्ति हमारी रक्षा नहीं कर पाएगी।
"सम्पति विपत्ति सबहिं के संगी, अंत समय तज जावै। हरि के भजन बिना जग माही, जीव जनम गँवावै॥"
संसार में धन, वैभव और संबंधी केवल अनुकूल परिस्थितियों के साथी हैं। अंत समय में सब यहीं छूट जाता है। जो मनुष्य इस सत्य को न जानकर केवल भौतिक संग्रह में लगा रहता है और भगवान का राम भजन नहीं करता, वह अपने जीवन को व्यर्थ ही नष्ट कर देता है।
"काम, क्रोध, मद, लोभ निवारो, हरि सरनागत लीजै। कहत कबीर सुनो भाई साधो, राम नाम रस पीजै॥"
अपने अंतःकरण को शुद्ध करने के लिए काम, क्रोध, अहंकार और लोभ का परित्याग करो और भगवान की शरण में जाओ। संत कबीरदास जी कहते हैं कि हे सज्जनों! इस संसार सागर से पार उतरने का एकमात्र उपाय राम नाम के दिव्य रस का निरंतर पान करना है।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के भावों की पुष्टि करने वाले कुछ अत्यंत प्रभावशाली शास्त्रीय मंत्र और श्लोक निम्नलिखित हैं, जिनका पाठ इस भजन के साथ किया जा सकता है:
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
यह महामंत्र कलयुग के समस्त पापों का नाश करने वाला और मन को एकाग्र करने वाला है। इसके अतिरिक्त श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक भी शरणागति के इसी भाव को दर्शाता है:
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामी मा शुचः॥
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| भजन का नाम | रे मन हरी सुमिरन कर लीजे (Re Man Hari Sumiran Kar Leeje) |
| मुख्य आराध्य | भगवान श्री हरि (विष्णु / राम) |
| रचयिता / प्रेरणा | पारंपरिक संत वाणी (संत कबीरदास जी) |
| भाषा | सरल हिंदी / ब्रजभाषा / सधुक्कड़ी |
| मुख्य भाव | वैराग्य, भक्ति, शरणागति और आत्मबोध |
| उपयुक्त अवसर | प्रातःकालीन प्रार्थना, संध्या आरती, सत्संग, एकादशी व्रत |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ और भावार्थ को विभिन्न प्रामाणिक वैष्णव ग्रंथों, संत वाणियों और सनातन धर्म की संकीर्तन परंपराओं के गहन अध्ययन के पश्चात तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध और प्रेरणादायक आध्यात्मिक ज्ञान पहुँचाना है ताकि वे अपने दैनिक जीवन में भक्ति और शांति का अनुभव कर सकें।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्भगवद्गीता (नाम-महिमा एवं शरणागति योग)
- संत कबीर ग्रंथावली (साखी एवं पद संग्रह)
- सनातन धर्म की पारंपरिक भजन एवं कीर्तन संकलन पुस्तकें
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