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निन्दीया से जागी मोरी मईया (Nindiya Se Jaagi Mori Maiya) - Kiran Singh Devigeet

किरण सिंह का प्रसिद्ध देवी गीत 'निन्दीया से जागी मोरी मईया' सुनें। जानिए इसके बोल, संदर्भ एवं व्याख्या सहित संपूर्ण भक्ति पाठ।

आदिशक्ति माता दुर्गा, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती की स्तुति में गाया जाने वाला यह भक्ति गीत "निन्दीया से जागी मोरी मईया" श्रद्धालुओं के हृदय में माता के प्रति गहन प्रेम, समर्पण और विश्वास का संचार करता है। गायिका किरण सिंह के भावपूर्ण स्वर में प्रस्तुत यह देवीगीत माता के ममतामयी, करुणामयी और दुष्टनाशिनी स्वरूप का सजीव चित्रण करता है। सनातन परंपरा में जगत जननी को सृष्टि का आदि कारण, शक्ति का मूल स्रोत और भक्तों की सर्वोच्च रक्षक माना गया है। जब भक्त माता के चरणों में नतमस्तक होकर अपनी व्यथा सुनाता है, तो माँ अपनी संतान के समस्त कष्ट हर लेती हैं। यह गीत विशेष रूप से नवरात्रि, दुर्गा पूजा, चैत्र नवरात्रि, शारदीय नवरात्रि तथा देवी भक्तों के घरों में होने वाले जागरण एवं माता के जागरण-कीर्तन के अवसरों पर गाया जाता है। इसकी लोकप्रियता भोजपुरी, पंजाबी एवं हिंदी भाषी क्षेत्रों में विशेष रूप से देखी जाती है, जहाँ श्रद्धालु इसे अत्यंत भक्तिभाव से गाते और सुनते हैं। यह गीत केवल एक संगीत रचना नहीं, बल्कि भक्त और भगवान के बीच का वह पवित्र सेतु है जो साधक को आंतरिक शक्ति, धैर्य और आत्मविश्वास प्रदान करता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

निन्दीया से जागी मोरी मईया,
निन्दीया से जागी मोरी मईया।
हे मईया दुर्गे, हे मईया भवानी,
तेरे चरणन में आई शरण,
निन्दीया से जागी मोरी मईया।

जय जय जगत जननी मईया,
जय जय दुःख हरनी मईया।
तेरी महिमा अपरंपार,
तेरे गुण गावे सारा संसार,
निन्दीया से जागी मोरी मईया।

शेरों वाली मईया, हे दुर्गे मईया,
तेरे दर पे आया हूँ मैं,
अपनी संतान को गले लगा ले,
निन्दीया से जागी मोरी मईया।

दुष्टों का नाश करने वाली,
भक्तों की रक्षा करने वाली।
तेरी जय जयकार करे सारा जग,
तेरे चरणों में शीश झुकाया,
निन्दीया से जागी मोरी मईया।

महालक्ष्मी, महासरस्वती,
महाकाली का रूप तिहारा।
तीनों लोकों में है उजियारा,
तेरे नाम की महिमा न्यारी,
निन्दीया से जागी मोरी मईया।

भक्त जो तेरे दर पे आवे,
सुख-समृद्धि सब पावे।
तेरी कृपा से दुःख मिट जावे,
निन्दीया से जागी मोरी मईया।

निन्दीया से जागी मोरी मईया,
निन्दीया से जागी मोरी मईया।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस भजन का केंद्रीय भाव माता के प्रति पूर्ण समर्पण, शरणागति और वात्सल्य की भावना पर आधारित है। भजन की पहली पंक्ति "निन्दीया से जागी मोरी मईया" का अर्थ है — मेरी माँ नींद से जाग गई हैं। यह पंक्ति प्रतीकात्मक रूप से यह दर्शाती है कि जब भक्त पुकारता है, तो माँ तुरंत जाग जाती हैं और अपनी संतान की रक्षा के लिए उपस्थित हो जाती हैं। यहाँ 'निन्दीया' शब्द केवल नींद नहीं, बल्कि माता के उस सजग, करुणामयी और तत्पर स्वरूप का प्रतीक है जो सदैव अपने भक्तों की रक्षा के लिए तैयार रहता है।

"हे मईया दुर्गे, हे मईया भवानी, तेरे चरणन में आई शरण" — यह पंक्ति भक्त की पूर्ण शरणागति को दर्शाती है। जब जीव संसार के दुःखों से पीड़ित होकर माता की शरण में आता है, तो माँ उसके समस्त कष्टों को हर लेती हैं। भक्त यह स्वीकार करता है कि उसकी शक्ति, बुद्धि और सामर्थ्य सब माता की कृपा से ही हैं।

"जय जय जगत जननी मईया, जय जय दुःख हरनी मईया" — यहाँ माता को जगत जननी अर्थात् सम्पूर्ण सृष्टि की जननी कहा गया है। सनातन परंपरा में आदिशक्ति को ही ब्रह्मांड की मूल कारण माना गया है। देवीभागवत पुराण एवं मार्कंडेय पुराण में वर्णित है कि समस्त देवता, ऋषि-मुनि और सम्पूर्ण सृष्टि माता की ही अभिव्यक्ति है। "दुःख हरनी" अर्थात् भक्तों के समस्त दुःखों को दूर करने वाली माता की महिमा अपरंपार है।

"शेरों वाली मईया" — यह माता दुर्गा के सिंहवाहिनी स्वरूप का वर्णन है। सिंह शक्ति, साहस और पराक्रम का प्रतीक है, जो यह दर्शाता है कि माता स्वयं परम शक्तिशाली हैं और अपने भक्तों को भी साहस एवं शक्ति प्रदान करती हैं। "दुष्टों का नाश करने वाली, भक्तों की रक्षा करने वाली" — यह पंक्ति माता के द्वंद्वात्मक स्वरूप को दर्शाती है, जहाँ वे दुष्टों के लिए विनाशकारी और भक्तों के लिए रक्षक हैं।

"महालक्ष्मी, महासरस्वती, महाकाली का रूप तिहारा" — यह पंक्ति माता के त्रिदेवी स्वरूप की ओर संकेत करती है। महालक्ष्मी धन, समृद्धि और सौभाग्य की देवी हैं, महासरस्वती ज्ञान, विद्या और कला की देवी हैं, तथा महाकाली शक्ति, काल और संहार की देवी हैं। तीनों मिलकर आदिशक्ति का पूर्ण स्वरूप प्रस्तुत करती हैं। भक्त जब इन तीनों स्वरूपों की उपासना करता है, तो उसे जीवन के तीनों पक्षों — भौतिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक — में पूर्णता प्राप्त होती है।

अंत में "भक्त जो तेरे दर पे आवे, सुख-समृद्धि सब पावे" — यह पंक्ति भक्त की अटूट आस्था और विश्वास को व्यक्त करती है कि माता के दरबार में जो भी शरणागत होकर आता है, वह कभी निराश नहीं लौटता। यह भजन साधक के भीतर शक्ति, करुणा, तेज और पवित्रता का संचार करता है तथा उसे आत्मिक बल प्रदान करता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन मुख्य रूप से आदिशक्ति माता दुर्गा को समर्पित है, जिन्हें दुर्गा, भवानी, अंबे, शेरों वाली, जगत जननी, दुःख हरनी आदि अनेक नामों से पुकारा जाता है। भजन की भाषा में भोजपुरी, हिंदी और पंजाबी का सुंदर मिश्रण देखने को मिलता है, जो इसे विभिन्न क्षेत्रों के श्रद्धालुओं के लिए सुलभ और प्रिय बनाता है।

इस भजन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें माता के प्रति पुत्र-भाव अर्थात् वात्सल्य भाव की प्रधानता है। भक्त माता को अपनी जननी मानकर उनसे प्रेम, स्नेह और रक्षा की याचना करता है। यह भाव भक्ति मार्ग का सर्वोच्च भाव माना जाता है, जहाँ भक्त और भगवान के बीच दूरी समाप्त हो जाती है और वे एक पारिवारिक संबंध में बंध जाते हैं।

देवीभागवत पुराण के अनुसार, माता की उपासना से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — चारों पुरुषार्थों की सिद्धि होती है। इस भजन के नियमित श्रवण एवं गायन से साधक के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, मानसिक शांति प्राप्त होती है, भय एवं चिंता का नाश होता है तथा आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। विशेष रूप से नवरात्रि के दिनों में इस भजन का गायन माता को प्रसन्न करने का सरल और प्रभावी साधन माना जाता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन का गायन एवं श्रवण किसी भी शुभ अवसर पर किया जा सकता है, किंतु कुछ विशेष समय और पर्व इसे और अधिक फलदायी बनाते हैं:

  • नवरात्रि के नौ दिन: चैत्र एवं शारदीय नवरात्रि में प्रतिदिन माता के आगे इस भजन का गायन करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • दुर्गा पूजा एवं दुर्गाष्टमी: बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश एवं पंजाब में दुर्गा पूजा के अवसर पर यह भजन विशेष रूप से गाया जाता है।
  • मंगलवार एवं शुक्रवार: ये दिन माता दुर्गा एवं महालक्ष्मी की उपासना के लिए विशेष माने जाते हैं।
  • प्रातःकाल एवं संध्या काल: स्नान-ध्यान के पश्चात् शुद्ध मन से इस भजन का गायन करना चाहिए।
  • जागरण एवं कीर्तन: माता के जागरण, भागवत कथा एवं सामूहिक कीर्तन में इस भजन का विशेष स्थान है।

गायन विधि: सर्वप्रथम माता की मूर्ति या चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित करें, पुष्प एवं धूप अर्पित करें। तत्पश्चात् शुद्ध उच्चारण एवं भक्ति भाव के साथ भजन का गायन आरंभ करें। गायन के समय मन को माता के चरणों में एकाग्र रखें। भजन के पश्चात् माता की आरती करें और प्रसाद वितरित करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन मुख्य रूप से आदिशक्ति माता दुर्गा को समर्पित है, जिन्हें भवानी, अंबे, शेरों वाली, जगत जननी एवं दुःख हरनी के नाम से भी जाना जाता है। भजन में माता के महालक्ष्मी, महासरस्वती एवं महाकाली स्वरूपों का भी वर्णन किया गया है।

यह भजन प्रसिद्ध देवीगीत गायिका किरण सिंह के भावपूर्ण स्वर में प्रस्तुत किया गया है। उनकी मधुर आवाज़ एवं भक्ति भाव से भरा गायन इसे श्रद्धालुओं के बीच अत्यंत लोकप्रिय बनाता है।

हाँ, नवरात्रि के नौ दिनों में इस भजन का नियमित गायन एवं श्रवण अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इन दिनों में माता की उपासना से साधक को विशेष आशीर्वाद एवं शक्ति प्राप्त होती है।

इस भजन का मुख्य संदेश यह है कि जो भक्त पूर्ण श्रद्धा एवं समर्पण के साथ माता की शरण में आता है, माता उसकी समस्त पीड़ाओं को हर लेती हैं और उसे सुख, शांति एवं समृद्धि प्रदान करती हैं। यह भजन शरणागति एवं वात्सल्य भाव का सुंदर उदाहरण है।

हाँ, इस भजन के श्रवण से मन को गहन शांति एवं सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। भक्ति संगीत मन को एकाग्र करता है, तनाव कम करता है और आत्मिक आनंद प्रदान करता है।

भजन का गायन शुद्ध उच्चारण, भक्ति भाव एवं एकाग्र मन से करना चाहिए। स्नान-ध्यान के पश्चात् स्वच्छ वस्त्र धारण कर माता के समक्ष दीप प्रज्वलित करें और पूर्ण श्रद्धा से भजन गाएं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसे सनातन परंपरा, देवी उपासना एवं भक्ति संगीत के प्रामाणिक स्रोतों के आधार पर संकलित किया गया है। भजन के भावार्थ एवं महत्व की व्याख्या देवीभागवत पुराण, मार्कंडेय पुराण एवं शाक्त परंपरा के ग्रंथों में वर्णित सिद्धांतों पर आधारित है। पाठकों से अनुरोध है कि वे इस सामग्री को श्रद्धा एवं भक्ति भाव से ग्रहण करें तथा अपनी स्थानीय परंपरा एवं गुरु के मार्गदर्शन का भी सम्मान करें।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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