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सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके लिरिक्स हिंदी (Sarva Mangal Mangalye Lyrics in Hindi) - Durga Mantra (108 Times )

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके मंत्र हिंदी अर्थ सहित पढ़ें। माँ दुर्गा के इस शक्तिशाली मंत्र के जाप और महिमा की संपूर्ण जानकारी प्राप्त करें।

दुर्गा मंत्र (108 Times) - Bhaktilok

सनातन धर्म और शाक्त परंपरा में आदिशक्ति माँ दुर्गा संपूर्ण ब्रह्मांड की मूल ऊर्जा, चेतना और पालनकर्ता के रूप में पूजनीय हैं। देवी भागवत पुराण और मार्कण्डेय पुराण के अंतर्गत 'देवी महात्म्यम्' (दुर्गा सप्तशती) का यह परम पवित्र मंत्र "सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके" केवल एक साधारण श्लोक नहीं, बल्कि समस्त अमंगल, दुखों, बाधाओं और नकारात्मक ऊर्जा का नाश करने वाला महामंत्र है। जब साधक या भक्त इस मंत्र का 108 बार या नित्य नियम के साथ स्मरण और जाप करता है, तो उसके जीवन में आरोग्यता, सुख-समृद्धि, आध्यात्मिक चेतना और माँ जगदम्बा की असीम अनुकंपा का संचार होता है। नवरात्रि, मंगलवार, शुक्रवार और विशेष अनुष्ठानों के दौरान इस पावन दुर्गा मंत्र का श्रवण और जाप करना साधक के मन को शांत और ऊर्जावान बनाता है। दुर्गा सप्तशती पाठ के विभिन्न मंत्रों में इस स्तुति का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है जो साधक को माता के कल्याणकारी स्वरूप से जोड़ता है।

सम्पूर्ण मंत्र लिरिक्स | Complete Mantra Lyrics

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते॥


हिंदी अर्थ सहित संपूर्ण पाठ:
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके,
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते॥

(हे सभी प्रकार के मंगलों को मंगल प्रदान करने वाली, कल्याणमयी, समस्त पुरुषार्थों एवं मनोकामनाओं को सिद्ध करने वाली, शरण में आए हुओं की रक्षा करने वाली, तीन नेत्रों वाली, हे माता गौरी और हे नारायणी देवी! आपको हमारा बारम्बार प्रणाम है।)

मंत्र उच्चारण एवं पद-विच्छेद | Mantra Pronunciation & Padaccheda

वैदिक एवं पौराणिक मंत्रों के शुद्ध उच्चारण (Sanskrit Pronunciation) से ही उनकी पूर्ण ऊर्जा और सकारात्मक स्पंदन की प्राप्ति होती है। इस मंत्र का पद-विच्छेद इस प्रकार है:

  • सर्व-मङ्गल-माङ्गल्ये: (सर्व + मंगल + मांगल्या) - सबका कल्याण करने वाली और मंगलकारिणी।
  • शिवे: (शिवे) - कल्याण स्वरूपिणी या माँ पार्वती का स्वरूप।
  • सर्व-अर्थ-साधिके: (सर्व + अर्थ + साधिके) - सभी प्रकार के अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष रूपी पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली।
  • शरण्ये: (शरण्ये) - शरण लेने योग्य, शरणागत वत्सला।
  • त्र्यम्बके: (त्रि-अम्बके) - तीन नेत्रों वाली (सूर्य, चन्द्र और अग्नि रूपी नेत्रों से युक्त)।
  • गौरी: (गौरी) - गौर वर्ण वाली, प्रकृति और ऊर्जा की अधिष्ठात्री देवी।
  • नारायणि: (नारायणि) - नारायण की शक्ति, महालक्ष्मी या महाकाली का स्वरूप।
  • नमोऽस्तु ते: (नमः + अस्तु + ते) - आपको हमारा प्रणाम है।

विस्तृत शब्दार्थ एवं पद-विच्छेद | Word-by-Word Meaning

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संस्कृत शब्द / पद पद-विच्छेद सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं प्रासंगिक अर्थ
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये सर्व + मङ्गल + माङ्गल्ये सब मंगलों की मंगल जो संपूर्ण जगत में सभी प्रकार के मंगलों और शुभता का उद्गम स्त्रोत है।
शिवे शिवे कल्याणमयी जो स्वयं कल्याण का प्रतीक हैं, जिनका स्वरूप केवल जीव मात्र का भला करना है।
सर्वार्थसाधिके सर्व + अर्थ + साधिके सब कार्यों को सिद्ध करने वाली जो साधક के भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक सभी लक्ष्यों को पूरा करती हैं।
शरण्ये शरण्ये शरण देने वाली संसार के दुखों से त्रस्त प्राणी को अपनी गोद में आश्रय देने वाली करुणामयी माता।
त्र्यम्बके त्रि + अम्बके तीन नेत्रों वाली ब्रह्मा, विष्णु, शिव की शक्ति तथा भूत, भविष्य, वर्तमान को देखने वाली त्रिदृष्टि स्वरूपा।
गौरी गौरी माता गौरी पवित्रता, तपस्या और सौंदर्य की प्रतीक माँ पार्वती।
नारायणि नारायणि नारायण की शक्ति समस्त ब्रह्मांड के पालक भगवान विष्णु की आद्या शक्ति, महामाया।
नमोऽस्तु ते नमः + अस्तु + ते आपको नमस्कार हो चरणों में पूर्ण समर्पण भाव से बारम्बार नमन।

सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Hindi Meaning & Bhavarth

यह मंत्र देवी दुर्गा के उस सर्वोच्च और विराट स्वरूप का वर्णन करता है जो इस संपूर्ण सृष्टि के संचालन, पोषण और संघार की शक्ति रखती है। 'सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये' का अर्थ है कि इस संसार में जो कुछ भी शुभ, सुंदर, पवित्र और मंगलकारी है, वह सब देवी की ही कृपा का परिणाम है। यदि संसार में प्रेम, करुणा और शांति है, तो उसका मूल आधार आदिशक्ति की चेतना है।

माता को 'शिवे' कहा गया है, जिसका तात्पर्य है कि उनका स्वभाव पूर्णतः कल्याणकारी है। वह अपने भक्तों का अहित कभी नहीं सोचतीं, भले ही कई बार उनकी परीक्षा कठिन होती है। 'सर्वार्थसाधिके' शब्द यह सिद्ध करता है कि माता के चरणों में श्रद्धा रखने वाले साधक को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति सहज ही हो जाती है। जीवन की हर बड़ी से बड़ी बाधा, शत्रु भय, संकट या मानसिक अशांति को दूर करने के लिए यह मंत्र एक अचूक आध्यात्मिक औषधि की तरह कार्य करता है। जब भक्त 'शरण्ये त्र्यम्बके गौरी' कहकर माता को पुकारता है, तो वह अपने अहंकार का त्याग कर पूर्ण रूप से उस परम माता के चरणों में समर्पित हो जाता है। जैसे एक छोटा बालक अपनी माँ की गोद में सुरक्षित महसूस करता है, वैसे ही साधक भी माँ के संरक्षण में निर्भय हो जाता है। आप श्री दुर्गा चालीसा पाठ के साथ भी इस मंत्र का नियमित अभ्यास कर सकते हैं।

मंत्र का भाव एवं आध्यात्मिक संदेश | Spiritual Message

इस पावन मंत्र का मुख्य संदेश आत्मसमर्पण (Surrender) और विश्वास है। मनुष्य जीवन में अनगिनत संघर्ष, असमंजस और चुनौतियाँ आती हैं। भौतिकता की दौड़ में इंसान अक्सर मानसिक रूप से विक्षिप्त या निराश हो जाता है। ऐसे में यह मंत्र सिखाता है कि समस्त शक्तियों का केंद्र बिंदु कोई बाहरी सत्ता नहीं, बल्कि हमारे भीतर विराजमान वही आद्या शक्ति है जो पूरे ब्रह्मांड को चला रही है।

जब हम माँ को 'नारायणि' के रूप में नमन करते हैं, तो हम यह स्वीकार करते हैं कि नर और नारी, जड़ और चेतन सब में उसी एक परम चेतना का वास है। यह मंत्र हमें ईर्ष्या, द्वेष, भय और अज्ञान के अंधकार से निकालकर प्रेम, ज्ञान और प्रकाश की ओर ले जाता है।

शास्त्रीय संदर्भ, ऋषि, छंद एवं देवता | Scriptural Origin

  • ग्रंथ संदर्भ: मार्कण्डेय पुराण, दुर्गा सप्तशती (श्री दुर्गा माता स्तुति / नारायण स्तोत्र अध्याय)।
  • अधिष्ठात्री देवता: माँ दुर्गा, महालक्ष्मी, महाकाली और महासरस्वती का संयुक्त स्वरूप (आदिशक्ति)।
  • प्रमुख परंपरा: शाक्त संप्रदाय, वैदिक एवं तांत्रिक साधना पद्धति।
  • उपयोगिता: नवरात्रि अनुष्ठान, संकट निवारण, शांति पाठ और दैनिक पूजन।

मंत्र जप विधि, नियम एवं शुभ मुहूर्त | Chanting Method & Vidhi

किसी भी मंत्र की पूर्ण सिद्धि और ऊर्जा प्राप्त करने के लिए शास्त्रीय नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक होता है:

  1. समय: प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त (4:00 से 6:00 बजे) या संध्याकाल गोधूलि बेला में जप करना सर्वाधिक फलदायी माना गया है।
  2. आसन: कुशा या ऊनी आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  3. संख्या: इस मंत्र का 108 बार (एक माला) या 54 बार नियमबद्ध जाप करना चाहिए। दुर्गा मंत्र 108 टाइम्स का ऑडियो श्रवण भी मानसिक शांति प्रदान करता है।
  4. पवित्रता: स्नान करके स्वच्छ लाल या पीले वस्त्र धारण करें। सामने घी का दीपक और धूपबत्ती प्रज्वलित करें।
  5. संकल्प: जप शुरू करने से पहले माँ दुर्गा का ध्यान करें और मन में अपनी मनोकामना या मानसिक शांति का संकल्प लें।
  6. सावधानियां: जप के दौरान एकाग्रता बनाए रखें, मोबाइल या बाहरी व्यवधानों से दूर रहें।

मंत्र का दार्शनिक एवं आध्यात्मिक महत्व | Philosophical Significance

वेदांत दर्शन और शाक्त दर्शन के अनुसार, यह संपूर्ण जगत 'प्रकृति' और 'पुरुष' के मिलन से चल रहा है। 'पुरुष' निष्क्रिय चेतना (शिव) हैं और 'प्रकृति' सक्रिय ऊर्जा (शक्ति/दुर्गा) हैं। जब तक शिव और शक्ति दोनों का योग नहीं होता, तब तक सृष्टि में कोई स्पंदन या क्रिया संभव नहीं है। यही कारण है कि मंत्र में 'शिवे' और 'नारायणि' शब्दों का प्रयोग करके शिव और विष्णु की शक्तियों का एकीकरण किया गया है। यह मंत्र साधक को द्वैत भाव से ऊपर उठाकर अद्वैत और पूर्णता का अनुभव कराता है। साधक यह समझता है कि उसके भीतर की ऊर्जा ही माँ दुर्गा का रूप है।

मंत्र के आध्यात्मिक लाभ | Spiritual Benefits

  • मानसिक शांति: नियमित जप से तनाव, चिंता, अनिद्रा और मानसिक अवसाद दूर होते हैं।
  • नकारात्मक ऊर्जा का नाश: घर और मन की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होकर सकारात्मक aura का निर्माण होता है।
  • भय मुक्ति: अज्ञात भय, शत्रुओं की बाधा और बुरी नजर से रक्षा होती है।
  • आत्मविश्वास में वृद्धि: निर्णय लेने की क्षमता और आंतरिक शक्ति मजबूत होती है।
  • पारिवारिक सुख-शांति: घर में सुख, समृद्धि, आरोग्यता और माँ अन्नपूर्णा की कृपा बनी रहती है।

Quick Information Table | एक नजर में मंत्र की जानकारी

बिंदु विवरण
मंत्र का नाम सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके (दुर्गा मंत्र)
प्रमुख देवता माँ दुर्गा, आदिशक्ति, माँ पार्वती
मुख्य ग्रंथ दुर्गा सप्तशती (मार्कण्डेय पुराण)
उद्देश्य / थीम कल्याण, संकट निवारण, सर्वसिद्धि प्राप्ति
जप संख्या 108 बार (1 माला) या नित्य 11/21 बार
सर्वोत्तम समय प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त, नवरात्रि, मंगलवार, शुक्रवार
शुभ माला रुद्राक्ष या स्फटिक की माला
मुख्य लाभ मानसिक शांति, भयमुक्ति, समृद्धि और आरोग्य

मुख्य आध्यात्मिक संदेश | Key Takeaways

  • सृष्टि का हर मंगल और शुभ कार्य आदिशक्ति की कृपा पर आधारित है।
  • भगवान शिव और माँ दुर्गा का मिलन ही संपूर्ण ब्रह्मांड का संतुलन है।
  • नियमित मंत्र जाप से जीवन की बड़ी से बड़ी बाधाएं स्वतः समाप्त होने लगती हैं।
  • शरणागति (पूर्ण समर्पण) ही ईश्वर प्राप्ति और शांति का सबसे सरल मार्ग है।
  • यह मंत्र साधक को भौतिक सुख के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति भी प्रदान करता है।
  • नकारात्मकता को दूर भगाने और आत्मबल बढ़ाने के लिए यह अचूक मंत्र है।
  • नियमित साधना से साधक के अंतःकरण में करुणा और प्रेम का विकास होता है।

संबंधित मंत्र, श्लोक, स्तोत्र एवं प्रार्थनाएं

माँ दुर्गा और शक्ति उपासना से जुड़े अन्य पावन पाठ जिनका आप स्मरण कर सकते हैं:

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस मंत्र का अर्थ है—"हे सभी मंगलों को मंगल प्रदान करने वाली, कल्याणमयी, समस्त मनोकामनाओं को सिद्ध करने वाली, शरण में आए हुओं की रक्षा करने वाली, तीन नेत्रों वाली माँ नारायणि! आपको बारम्बार नमस्कार है।"

इस मंत्र का सर्वश्रेष्ठ फल पाने के लिए एक बार में 108 बार (एक माला) जाप करना उत्तम माना जाता है। समय के अभाव में आप इसे नित्य 11, 21 या 51 बार भी श्रद्धापूर्वक जप सकते हैं।

यह पावन मंत्र मार्कण्डेय पुराण के अंतर्गत रचित 'दुर्गा सप्तशती' (देवी महात्म्यम्) ग्रंथ से लिया गया है, जहाँ देवी की विभिन्न स्तुतियां की गई हैं।

प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त (सूर्योदय से पहले) या संध्याकाल का समय इस मंत्र के जप के लिए सर्वोत्तम माना गया है। इसके अलावा नवरात्रि के नौ दिनों में इसका विशेष अनुष्ठान किया जाता है।

हाँ, माँ दुर्गा की कृपा पाने के लिए कोई भी भक्त सच्चे मन, शुद्ध आचरण और श्रद्धा के साथ इस मंत्र का स्मरण और जाप कर सकता है। इसमें किसी भी प्रकार की आयु या वर्ग की पाबंदी नहीं है।

निश्चित रूप से। इस मंत्र के नियमित जप और श्रवण से मन की उथल-पुथल शांत होती है, नकारात्मक विचार दूर होते हैं और एक असीम आंतरिक शांति की अनुभूति होती है।

माता दुर्गा के मंत्रों के जप के लिए रुद्राक्ष की माला या स्फटिक की माला का प्रयोग करना अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है।

हाँ, 'दुर्गा मंत्र 108 टाइम्स' का ऑडियो या संगीत रूप में श्रवण करने से भी वातावरण शुद्ध होता है और मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

भक्तलोक (Bhaktilok.in) पर प्रकाशित यह लेख सनातन धर्म के प्राचीन ग्रंथों, मार्कण्डेय पुराण, दुर्गा सप्तशती और पारंपरिक विद्वानों के मार्गदर्शक वचनों के आधार पर संकलित किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों को शुद्ध उच्चारण, प्रामाणिक अर्थ और सही साधना विधि से अवगत कराना है। यह सामग्री संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत पूर्ण श्रद्धा और शोध के साथ प्रस्तुत की गई है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • मार्कण्डेय पुराण - दुर्गा सप्तशती (श्री दुर्गा माता स्तोत्र एवं मंत्र खंड)।
  • सनातन वैदिक कर्मकांड एवं शाक्त संप्रदाय की परंपराएं।
  • पारंपरिक पाठ विधि एवं देववाणी संस्कृत शब्दकोश।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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