gurudev Bhajan मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

ना कोई है ना कोई था जिंदगी में तुम्हारे सिवा तुम देना साथ मेरा गुरूजी (Na Koi Hai Na Koi Tha Jindagee Me Tumhare Siwa Guru Ji Bhajan)

ना कोई है ना कोई था जिंदगी में तुम्हारे सिवा गुरु भजन के बोल और भावार्थ पढ़ें। सद्गुरु के प्रति अपनी अनन्य निष्ठा और शरणागति को समर्पित यह पावन भजन।

गुरु भजन एवं शरणागति

अपडेट किया गया: 2026 | श्रेणी: गुरु भजन, सत्संग, शरणागति | पढ़ने का समय: 12 मिनट

सनातन संस्कृति और भक्ति परंपरा में सद्गुरु का स्थान साक्षात परम ब्रह्म के तुल्य माना गया है। "ना कोई है ना कोई था जिंदगी में तुम्हारे सिवा तुम देना साथ मेरा गुरूजी" यह अत्यंत ही पावन, हृदयस्पर्शी और भक्ति रस से ओत-प्रोत गुरु भजन है। यह भजन जीवात्मा के अपने गुरु के प्रति अनन्य प्रेम, निष्ठा, समर्पण और एकांत पुकार का जीवंत प्रतीक है। जब मनुष्य संसार के तमाम प्रपंचों, दुखों और अकेलापन से घिर जाता है, तब केवल और केवल गुरु के चरण कमलों का आश्रय ही उसे भवसागर से पार उतारने में समर्थ होता है। इस भजन का प्रत्येक शब्द साधक के भीतर के विरह और मिलन की उस अकुलता को जागृत करता है, जहाँ गुरु के अतिरिक्त संसार का हर आकर्षण फीका पड़ जाता है। भक्ति संगीत की इस अनमोल रचना के माध्यम से हम जानेंगे कि कैसे एक साधक अपने गुरु को अपनी संपूर्ण जीवन-नैया का कर्णधार मानकर उनसे जीवनभर साथ निभाने की प्रार्थना करता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

स्थायी (Mukhda):

ना कोई है, ना कोई था जिंदगी में तुम्हारे सिवा,
तुम देना साथ मेरा, ओ मेरे गुरूजी...
तुम देना साथ मेरा, मेरे प्यारे गुरूजी,
ना कोई है, ना कोई था जिंदगी में तुम्हारे सिवा।

पहला अंतरा (Antara 1):

दुनिया की इस भीड़ में हम अकेले रह गए,
दर्द अपने दिल के हम किससे जाकर कहें।
तुमने ही संभाला है हर एक मोड़ पर आकर,
चरणों से अपने हमको कभी दूर न करना,
ना कोई है, ना कोई था जिंदगी में तुम्हारे सिवा।

दूसरा अंतरा (Antara 2):

आशा की किरण हो तुम, विश्वास का दीया,
तुमने ही तो जीवन को नया रूप है दिया।
भटक रहे थे पथ हम अज्ञान के अंधेर में,
ज्ञान का प्रकाश तुमने भर दिया है फेर में,
ना कोई है, ना कोई था जिंदगी में तुम्हारे सिवा।

तीसरा अंतरा (Antara 3):

सांसों की हर माला पे तेरा ही नाम हो,
सुबह-शाम मेरे लबों पे तेरा ही काम हो।
जब तलक ये सांस चले, तेरा ही ध्यान रहे,
तेरे दर पे झुकना ही मेरी पहचान रहे,
ना कोई है, ना कोई था जिंदगी में तुम्हारे सिवा।

अन्तिम अंतरा एवं समापन (Conclusion):

भवसागर की लहरों में नैया डगमगाए जब,
हाथ पकड़ लेना मेरा बनकर तू रक्षक तब।
तेरे सिवा इस जग में मेरा कोई नहीं मीत,
गुरु चरणों में गाने की यही है सच्ची प्रीत,
ना कोई है, ना कोई था जिंदगी में तुम्हारे सिवा,
तुम देना साथ मेरा, ओ मेरे गुरूजी!

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन केवल शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि एक शिष्य की अपने गुरु के प्रति परम शरणागति (Surrender) का सजीव दस्तावेज है। भारतीय दर्शन में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का अवतार कहा गया है। जब भजन की पहली पंक्ति गूंजती है— "ना कोई है, ना कोई था जिंदगी में तुम्हारे सिवा"—तो यह इस बात का उद्घोष है कि सांसारिक रिश्ते-नाते क्षणिक और स्वार्थी हैं। माता, पिता, बंधु-बांधव और मित्र सुख के समय साथ हो सकते हैं, किंतु संकट के गर्त में और आध्यात्मिक यात्रा के पथ पर केवल सद्गुरु ही एक ऐसा संबल है जो कभी साथ नहीं छोड़ता।

अन्तरों के माध्यम से कवि या भक्त यह स्पष्ट करता है कि संसार रूपी मरुस्थल में जब वह अकेला और असहाय महसूस कर रहा था, तब गुरु की अहैतुकी कृपा ने ही उसे संभाला। अज्ञान के अंधकार में भटकती हुई जीवात्मा को जब सद्गुरु का सानिध्य मिलता है, तो उसके जीवन के सारे संशय और भ्रम स्वतः समाप्त हो जाते हैं। भजन का अंतिम भाग साधक की इस उत्कट इच्छा को दर्शाता है कि उसकी अंतिम सांस तक केवल गुरु का ही स्मरण रहे। यह भक्ति का वह उच्च स्तर है जहाँ द्वैत समाप्त हो जाता है और शिष्य अपने गुरु में ही संपूर्ण ब्रह्मांड के दर्शन करने लगता है। ऐसे भावपूर्ण भजनों का स्मरण करने से मन को अलौकिक शांति और मानसिक स्थिरता की प्राप्ति होती है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

  • पूर्ण शरणागति (Total Surrender): यह भजन साधक को अहंकार त्यागकर गुरु चरणों में समर्पित होने की प्रेरणा देता है।
  • सत्संग की महिमा: गुरुभक्ति और सत्संग के माध्यम से मानसिक विकारों जैसे काम, क्रोध, लोभ और मोह से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
  • विरह और प्रेम का समन्वय: गुरु के प्रति एकनिष्ठ प्रेम और उनके बिछड़ने या दूर होने के भय से उपजा मार्मिक विरह इस भजन की मुख्य विशेषता है।
  • कलयुग में तारक मंत्र: संत परंपरा के अनुसार, कलयुग में नाम जप और गुरु भजन ही भवसागर पार करने का सबसे सुगम और सरल मार्ग है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

भक्ति संगीत का प्रभाव समय और वातावरण पर भी निर्भर करता है। इस गुरु भजन को गाने या सुनने के लिए निम्नलिखित समय और विधियां अत्यंत उत्तम मानी जाती हैं:

ब्रह्ममुहूर्त एवं प्रातःकाल

सुबह उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर शांत चित्त से गुरु का ध्यान करते हुए इस भजन का मानसिक या मौखिक पाठ करना पूरे दिन सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।

गुरुवार सत्संग एवं पूर्णिमा

गुरुवार के दिन विशेष रूप से गुरु पूजन, श्री गुरु गीता पाठ अथवा सामूहिक सत्संग के दौरान इस भजन का संकीर्तन करने से विशेष आध्यात्मिक फल की प्राप्ति होती है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से सद्गुरु देव को समर्पित है। सनातन परंपरा में गुरु को ब्रह्म, विष्णु और महेश से भी उच्च स्थान दिया गया है क्योंकि वही ब्रह्म से साक्षात्कार कराते हैं। कबीर दास जी, तुलसीदास जी, मीराबाई और गुरु नानक देव जी जैसे संतों ने हमेशा गुरु महिमा का गुणगान किया है। इसी परंपरा का पालन करते हुए आधुनिक संत समाज और भजन गायकों द्वारा गुरु वंदना के रूप में इस प्रकार के भजनों की रचना की गई है। अधिक जानने के लिए आप हमारे संत वाणी और विचार अनुभाग को देख सकते हैं।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा बेहद सरल, सहज और आम बोलचाल की हिंदी (खड़ी बोली एवं मिश्रित ब्रज-अवधि प्रभाव) है, ताकि हर आयु वर्ग का भक्त इसे आसानी से समझ सके और गा सके। इसमें उपमा, रूपक और अनुप्रास अलंकारों का सुंदर प्रयोग हुआ है। "जिंदगी में तुम्हारे सिवा", "आशा की किरण", और "ज्ञान का प्रकाश" जैसे प्रयोग इसे काव्यात्मक रूप से अत्यंत समृद्ध बनाते हैं। यह संगीत के दादरा या কাহারवा ताल में आसानी से गाया जाने वाला एक सुमधुर भजन है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

इस भजन से मिलने वाली मुख्य जीवन सीख यह है कि मनुष्य को अपने अहंकार का त्याग कर देना चाहिए। जब तक अहंकार जीवित है, तब तक गुरु या ईश्वर की कृपा का अनुभव नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त, जीवन के उतार-चढ़ाव में धैर्य रखना और अपने इष्ट-गुरु पर अटूट विश्वास बनाए रखना ही एक सच्चे आस्तिक की पहचान है। कठिनाइयों से घबराने के बजाय गुरु चरणों में शरण लेना ही सभी दुखों की एकमात्र औषधि है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
गुरूजी अध्यात्मिक गुरु, शिक्षक ज्ञान चक्षु खोलने वाली परम सत्ता
भवसागर संसार रूपी समुद्र जन्म-मृत्यु का चक्र जिससे पार पाना है
अज्ञान अंधकार, अविद्या सत्य को न पहचान पाना
मीत मित्र, साथी आत्मा का सच्चा साथी और मार्गदर्शक
प्रीत प्रेम, अनुराग ईश्वर या गुरु के प्रति अनन्य भक्ति

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"ना कोई है, ना कोई था जिंदगी में तुम्हारे सिवा..."
इस प्रारंभिक पंक्ति का भाव यह है कि साधक का मन संसार के तमाम भोग-विलासों से विरक्त होकर केवल गुरु के चरणों में रम चुका है। अतीत में भी कोई उसका अपना नहीं था और वर्तमान में भी गुरु के अतिरिक्त उसका कोई अन्य रक्षक नहीं है।

"दुनिया की इस भीड़ में हम अकेले रह गए..."
जब व्यक्ति सत्य और अध्यात्म के मार्ग पर चलता है, तो वह पाता है कि स्वार्थी दुनिया में कोई किसी का वास्तविक सहचर नहीं है। ऐसे में केवल गुरु का हाथ ही उसे अकेलापन महसूस नहीं होने देता।

"भवसागर की लहरों में नैया डगमगाए जब..."
जीवन में आने वाले संकटों और बाधाओं को 'भवसागर की लहरें' कहा गया है। इन विपरीत परिस्थितियों में जब मनुष्य की बुद्धि काम करना बंद कर देती है, तब गुरु ही कर्णधार बनकर नैया पार लगाते हैं।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

अगुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

अर्थ: गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं और गुरु ही महादेव महेश्वर हैं। गुरु ही साक्षात् परब्रह्म हैं, ऐसे श्री गुरु को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम है।

इस प्रकार के अन्य श्लोकों के लिए पढ़ें वैदिक मंत्र एवं स्तोत्र संग्रह।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम ना कोई है ना कोई था जिंदगी में तुम्हारे सिवा गुरूजी
समर्पित सद्गुरुदेव / गुरु वंदना
विधा भक्ति गीत / गुरु भजन
भाषा सरल हिंदी / ब्रज-अवधि प्रभाव
मुख्य भाव शरणागति, प्रेम, विरह, विश्वास
उपयुक्त अवसर गुरुवार पूजा, सत्संग, प्रातःकालीन स्मरण

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन पूरी तरह से गुरु के प्रति अनन्य प्रेम, निष्ठा और पूर्ण शरणागति (Surrender) पर आधारित है। इसमें भक्त अपने गुरु को ही अपना सब कुछ मानता है।

इस भजन को प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में, संध्या वंदन के समय, अथवा विशेषकर गुरुवार के दिन सत्संग और गुरु पूजन के समय गाना अत्यंत फलदायी माना गया है।

सनातन धर्म में गुरु को अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले जाने वाला दिव्य मार्गदर्शक माना गया है। गुरु के बिना ईश्वर की प्राप्ति असंभव मानी जाती है।

हाँ, इसे एकांत में ध्यान के समय या घर पर पूजा के दौरान पूरी तन्मयता के साथ अकेले या परिवार के साथ गाया जा सकता है।

गुरु भजनों में सकारात्मक आध्यात्मिक तरंगें होती हैं जो मन के विकारों, तनाव और चिंताओं को शांत करके आंतरिक शांति प्रदान करती हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख और भजन प्रस्तुति संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसे प्राचीन सनातन गुरु परंपरा, संत साहित्यों और पारंपरिक लोक भजनों के गहन अध्ययन के पश्चात पाठकों के लिए प्रस्तुत किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध, प्रामाणिक और उच्च कोटि की भक्ति सामग्री पहुँचाना है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • सनातन गुरु परंपरा एवं संत वाणी ग्रंथ
  • श्री गुरुगीता (स्कंद पुराण अंतर्गत)
  • पारंपरिक लोक भजन एवं संकीर्तन संग्रह

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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