गोवर्धन पूजा, जिसे 'अन्नकूट' के नाम से भी जाना जाता है, सनातन धर्म में प्रकृति और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का महापर्व है। यह भजन "पूजा गोवर्धन की करले, गिरिराज महिमा" भगवान श्री कृष्ण की उस लीला का स्मरण कराता है, जिसमें उन्होंने ब्रजवासियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा उंगली पर धारण किया था। यह भजन न केवल एक भक्ति गीत है, बल्कि यह अहंकार के विनाश और शरणागति के महत्व का एक जीवंत संदेश है। गोवर्धन पूजा के पावन अवसर पर जब भक्त इस भजन का गायन करते हैं, तो वे स्वयं को गिरिराज धरण की शरण में पाते हैं। यह संकीर्तन मन को चंचलता से मुक्त कर उसे भक्ति के अमृत से सराबोर कर देता है, जिससे साधक के हृदय में प्रभु के प्रति अनन्य प्रेम का उदय होता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
(मुखड़ा)
पूजा गोवर्धन की करले, गिरिराज महिमा तू गाले,
भक्तों की रक्षा करने वाले, कृष्ण कन्हैया मतवाले।
पूजा गोवर्धन की करले, गिरिराज महिमा तू गाले॥
(अंतरा 1)
इंद्र का मान घटाने को, ब्रज को विपदा से बचाने को,
उंगली पर पर्वत उठाया, प्रभु ने अद्भुत खेल दिखाया।
सात दिवस तक थामे रखा, भक्तों का संताप मिटाया,
ऐसे दयालु प्रभु की महिमा, मन में तू अब बसा ले।
पूजा गोवर्धन की करले, गिरिराज महिमा तू गाले॥
(अंतरा 2)
छप्पन भोग सजाए प्यारे, गिरिराज को भोग लगाए सारे,
श्रद्धा से जो शीश झुकाए, प्रभु उसके सब कष्ट मिटाए।
गोवर्धन की परिक्रमा कर, जीवन के सब पाप बहा ले,
भक्ति की गंगा में गोता, तू भी आज लगा ले।
पूजा गोवर्धन की करले, गिरिराज महिमा तू गाले॥
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस भजन का भावार्थ अत्यंत गहरा है। "पूजा गोवर्धन की करले" का अर्थ केवल पत्थर की पूजा करना नहीं, बल्कि उस सर्वशक्तिमान सत्ता के प्रति कृतज्ञ होना है जो हमें जीवन का आधार प्रदान करती है। गोवर्धन पर्वत ब्रज का प्राण है, और भगवान कृष्ण ने इसे उठाकर यह सिद्ध किया कि जो भक्त उनकी शरण में आता है, उसकी रक्षा का भार स्वयं परमात्मा उठाते हैं। भजन में इंद्र के अहंकार के खंडन का उल्लेख यह सिखाता है कि मनुष्य को कभी भी अपनी शक्ति या पद पर गर्व नहीं करना चाहिए। "छप्पन भोग" और "परिक्रमा" का भाव यह है कि हम जो कुछ भी अर्जित करते हैं, वह प्रभु का ही प्रसाद है। यह भजन हमें सिखाता है कि संसार के कार्यों में उलझकर भी यदि मन गिरिराज की शरण में रहे, तो भवसागर पार करना सुगम हो जाता है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
- अहंकार का त्याग: यह भजन इंद्र के गर्व को तोड़ने और कृष्ण की शरणागति को प्रमुखता देता है।
- प्रकृति प्रेम: गोवर्धन पर्वत प्रकृति का प्रतीक है, जिसकी पूजा पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती है।
- भक्ति रस: यह भजन विशेष रूप से गोवर्धन पूजा और दीपावली के अगले दिन गाए जाने के लिए अत्यंत उपयुक्त है।
- मानसिक शांति: इस भजन का निरंतर श्रवण करने से मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस भजन को गोवर्धन पूजा के दिन, विशेषकर अन्नकूट महोत्सव के दौरान गाएं। इसे सुबह की पूजा या संध्या आरती के समय गाना अत्यंत शुभ माना जाता है। गायन करते समय मन में गिरिराज जी का ध्यान रखें और संभव हो तो गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करते समय इस भजन का कीर्तन करें।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द | सरल अर्थ | संदर्भ |
|---|---|---|
| गिरिराज | पर्वतों का राजा (गोवर्धन) | भगवान कृष्ण द्वारा धारण किया गया पर्वत |
| अन्नकूट | अन्न का ढेर (भोग) | गोवर्धन पूजा का मुख्य प्रसाद |
| संताप | दुःख या कष्ट | भक्तों के सांसारिक कष्ट |
| परिक्रमा | चारों ओर घूमना | ईश्वर के प्रति समर्पण की एक विधि |
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | पूजा गोवर्धन की करले |
| आराध्य | भगवान श्री कृष्ण (गिरिराज धरण) |
| विषय | गोवर्धन पूजा एवं शरणागति |
| उपयुक्त अवसर | गोवर्धन पूजा, अन्नकूट महोत्सव |
| भाव | समर्पण एवं कृतज्ञता |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
- गोवर्धन पूजा क्यों की जाती है? यह भगवान कृष्ण द्वारा इंद्र के अहंकार को तोड़ने और ब्रजवासियों की रक्षा के उपलक्ष्य में की जाती है।
- क्या इस भजन को घर पर गाया जा सकता है? हाँ, यह भजन घर में पूजा के समय गाने के लिए अत्यंत पावन है।
- गोवर्धन पूजा का मुख्य प्रसाद क्या है? अन्नकूट (विभिन्न प्रकार के व्यंजनों का मिश्रण) मुख्य प्रसाद है।
- गिरिराज जी की परिक्रमा का क्या महत्व है? परिक्रमा करने से मन की शुद्धि होती है और प्रभु के प्रति श्रद्धा बढ़ती है।
- क्या यह भजन बच्चों को सिखाया जा सकता है? अवश्य, यह बच्चों में भक्ति और संस्कृति के संस्कार डालने का उत्तम माध्यम है।
- गोवर्धन पूजा किस तिथि को होती है? यह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाई जाती है।
- भजन का मुख्य संदेश क्या है? अहंकार का त्याग और भगवान की शरण में पूर्ण विश्वास।
- क्या इस भजन के साथ वाद्य यंत्र बजा सकते हैं? हाँ, मृदंग, करताल और हारमोनियम के साथ यह भजन और भी प्रभावशाली लगता है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
यह सामग्री श्रीमद्भागवत पुराण के दशम स्कंध (गोवर्धन लीला प्रसंग) और पारंपरिक वैष्णव भक्ति साहित्य पर आधारित है।
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