Chhath Puja Geet मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

बहंगी लचकत जाए (Bahangi Lachkat Jaaye) - ChhathPuja Geet Pushpa Rana

लोक गायिका पुष्पा राणा की आवाज में प्रसिद्ध छठ गीत 'बहंगी लचकत जाए' के लिरिक्स और भावार्थ पढ़ें। छठ महापर्व के इस पावन गीत का आनंद लें।

बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के सबसे पावन लोक पर्व 'छठ पूजा' का नाम आते ही मन में जो सबसे पहला और मधुर स्वर गूंजता है, वह है—"बहंगी लचकत जाए"। यह पारंपरिक छठ गीत न केवल एक भजन है, बल्कि यह करोड़ों श्रद्धालुओं की अगाध श्रद्धा, पवित्रता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संगीतमय प्रतीक है। सुप्रसिद्ध लोक गायिका पुष्पा राणा की सुरीली और भावपूर्ण आवाज में गाया गया यह गीत छठ महापर्व की संपूर्ण आत्मा को अपने भीतर समेटे हुए है। इस गीत में प्रयुक्त 'बहंगी' (बांस की टोकरियों को ले जाने वाला ढांचा) और 'कांच ही बांस' (कच्चा बांस) जैसे शब्द सीधे तौर पर प्रकृति से जुड़ाव और सादगी को दर्शाते हैं। यह गीत साधक के अंतर्मन को झंकृत कर उसमें भक्ति रूपी अमृत का संचार करता है और हमें यह सिखाता है कि किस प्रकार अत्यंत साधारण और प्राकृतिक वस्तुओं के माध्यम से परम सत्ता की आराधना की जा सकती है।

सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics

बहंगी लचकत जाए — छठ पूजा गीत

कांच ही बांस के बहंगिया,
बहंगी लचकत जाए...
बहंगी लचकत जाए...

होई ना बलम जी कहरिया,
बहंगी घाट पहुंचाए...
बहंगी घाट पहुंचाए...

कांच ही बांस के बहंगिया,
बहंगी लचकत जाए...

बांट जे पूछेला बटोहिया,
बहंगी केकरा के जाए...
बहंगी केकरा के जाए...

तू त अन्हर हो रे बटोहिया,
बहंगी छठी मैया के जाए...
बहंगी छठी मैया के जाए...

कांच ही बांस के बहंगिया,
बहंगी लचकत जाए...

केरा जे फरेला घवद से,
ओह पर सुगा मेड़राए...
ओह पर सुगा मेड़राए...

मारबो रे सुगवा धनुष से,
सुगा गिरे मुरझाए...
सुगा गिरे मुरझाए...

कांच ही बांस के बहंगिया,
बहंगी लचकत जाए...

उ जे खैहें सुगनी जे रोइहें,
आदित होइहें सहाय...
आदित होइहें सहाय...

कांच ही बांस के बहंगिया,
बहंगी लचकत जाए...
होई ना बलम जी कहरिया,
बहंगी घाट पहुंचाए...
बहंगी घाट पहुंचाए...

गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth

यह पावन लोक गीत छठ पूजा की तैयारी, पवित्रता और भगवान सूर्य देव (आदित्य) व छठी मैया के प्रति पूर्ण समर्पण को दर्शाता है। इसके प्रत्येक अंतरे का अत्यंत गहरा और मार्मिक अर्थ है:

प्रथम अंतरा: बांस की बहंगी और घाट की यात्रा

गीत की शुरुआत में नवविवाहिता या व्रती महिला अपने पति से कहती है कि यह बहंगी (पूजा की सामग्री ले जाने वाला बांस का ढांचा) कच्चे बांस से बनी है, जो बहुत ही लचीली और नाजुक है। वह अपने पति से अनुरोध करती है कि वे 'कहरिया' (भार उठाने वाले) की भूमिका निभाएं और इस अत्यंत पवित्र बहंगी को सुरक्षित रूप से नदी के घाट तक पहुंचाएं, ताकि पूजा की सामग्री में कोई अशुद्धता न आए।

द्वितीय अंतरा: बटोहिया और छठी मैया का मार्ग

रास्ते में जाते समय जब कोई राहगीर (बटोहिया) पूछता है कि यह सुंदर और सजी हुई बहंगी किसके लिए जा रही है, तो उसे उत्तर मिलता है कि "हे राहगीर! क्या तुम नहीं जानते? यह पावन बहंगी साक्षात छठी मैया के घाट पर जा रही है।" यह संवाद दर्शाता है कि छठ पूजा का महत्व इतना सर्वव्यापी है कि हर कोई इसके प्रति नतमस्तक रहता है।

तृतीय अंतरा: फल की शुद्धता और सुगा (तोता) का प्रसंग

इस अंतरे में केले के बड़े घौद (गुच्छे) का वर्णन है, जिस पर तोता मंडरा रहा है। लोक आस्था के अनुसार, छठ का प्रसाद अत्यंत शुद्ध होना चाहिए। यदि कोई पक्षी उसे चख लेता है, तो वह जूठा और अपवित्र हो जाता है। इसलिए व्रती कहती है कि वह उस तोते को धनुष से मारेगी ताकि प्रसाद की पवित्रता बची रहे। यह प्रतीक रूप में हमारी इंद्रियों और विकारों को नियंत्रित करने का संदेश देता है, ताकि हमारी भक्ति निष्कलंक रहे।

गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message

इस गीत की मुख्य भावना परम पावनता (Absolute Purity) और प्रकृति पूजा है। छठ पूजा एक ऐसा अनूठा पर्व है जिसमें किसी पुरोहित या मूर्ति की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि सीधे प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्य और उनकी शक्ति छठी मैया की आराधना की जाती है। यह गीत हमें सिखाता है कि ईश्वर की साधना में अहंकार का कोई स्थान नहीं है। राजा हो या रंक, सभी को अपने सिर पर बहंगी उठाकर घाट तक जाना होता है। यह सामाजिक समरसता और समानता का सबसे बड़ा उदाहरण है।

गीत की जानकारी | Song Information

विवरण श्रेणी महत्वपूर्ण जानकारी
गीत का नाम (Song Name) बहंगी लचकत जाए (Bahangi Lachkat Jaaye)
मुख्य गायिका (Singer) पुष्पा राणा (Pushpa Rana)
भाषा (Language) भोजपुरी / मैथिली (पारंपरिक लोक भाषा)
मुख्य पर्व (Festival) छठ पूजा (Chhath Puja)
मुख्य देवता (Deity) छठी मैया एवं भगवान सूर्य देव (आदित्य)
संगीत शैली (Music Style) पारंपरिक लोक संगीत (Folk Devotional)
मुख्य विषय (Theme) समर्पण, पवित्रता, प्रकृति प्रेम और लोक आस्था

गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators

यद्यपि "बहंगी लचकत जाए" एक सदियों पुराना पारंपरिक लोक गीत है, जिसकी रचना अज्ञात ग्रामीण कवियों द्वारा लोक कंठ के माध्यम से हुई है, परंतु आधुनिक समय में इसे जन-जन तक पहुंचाने का श्रेय सुप्रसिद्ध लोक गायिका पुष्पा राणा को जाता है। उनकी सुरीली, गंभीर और भक्ति रस से सराबोर आवाज ने इस गीत को एक नया जीवन दिया है। पुष्पा राणा ने पारंपरिक वाद्यों जैसे ढोलक, मंजीरा और बांसुरी के सुंदर संयोजन के साथ इस गीत को गाकर हर घर में छठ के आगमन का अहसास कराया है।

कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings

कठिन शब्द सरल हिंदी अर्थ सांस्कृतिक संदर्भ
कांच ही बांस कच्चा या हरा बांस पवित्रता और लचीलेपन का प्रतीक, जिससे सूप और दउरा बनते हैं।
बहंगिया / बहंगी बांस का बना हुआ कांवड़ छठ का प्रसाद और फल घाट तक ले जाने का साधन।
कहरिया भार उठाने वाला / कहार यहां पति या परिवार के पुरुष सदस्य को आदरपूर्वक कहा गया है।
बटोहिया राहगीर / यात्री संसार रूपी मार्ग पर चलने वाला साधारण मनुष्य।
सुगवा / सुगा तोता (पक्षी) प्रकृति के जीवों और प्रसाद की रक्षा के संदर्भ में प्रयुक्त।
आदित आदित्य / सूर्य देव प्रत्यक्ष देव जो संपूर्ण सृष्टि को ऊर्जा प्रदान करते हैं।

गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance

छठ महापर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक पद्धति है। इस गीत में प्रयुक्त प्रत्येक प्रतीक का गहरा आध्यात्मिक महत्व है:

  • बांस की बहंगी: बांस को सनातन धर्म में वंश वृद्धि और अत्यंत पवित्र माना गया है। कच्चे बांस की बहंगी यह दर्शाती है कि हमारी पूजा पूरी तरह से प्राकृतिक और पर्यावरण के अनुकूल होनी चाहिए।
  • पवित्रता की पराकाष्ठा: तोते वाले प्रसंग से यह स्पष्ट होता है कि छठ पूजा में शुद्धता का स्तर कितना ऊंचा होता है। यहां तक कि पक्षी द्वारा छुए गए फल को भी पूजा में वर्जित माना गया है।
  • सामूहिकता का संदेश: जब पति बहंगी उठाता है और पत्नी व्रत रखती है, तो यह पारिवारिक एकता और मिलकर धर्म के मार्ग पर चलने का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है।

इस पावन पर्व के दौरान श्रद्धालु छठ पूजा व्रत कथा का श्रवण करते हैं और पूरी श्रद्धा के साथ सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं।

गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons

यह पारंपरिक लोक गीत हमें आधुनिक जीवन के लिए कई महत्वपूर्ण सीख देता है:

  1. प्रकृति का संरक्षण: गीत में मिट्टी के चूल्हे, बांस के सूप, और ताजे फलों का उपयोग दर्शाया गया है, जो हमें प्रकृति के करीब रहने की प्रेरणा देते हैं।
  2. कठिन अनुशासन: छठ का व्रत अत्यंत कठिन होता है। यह गीत हमें जीवन में अनुशासन, धैर्य और मानसिक दृढ़ता बनाए रखने की सीख देता है।
  3. अहंकार का त्याग: घाट की ओर जाते समय सभी लोग एक समान होते हैं। यह सामाजिक समरसता का संदेश देता है।

गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing

यह गीत मुख्य रूप से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तिथि तक चलने वाले चार दिवसीय छठ महापर्व के दौरान गाया और सुना जाता है। विशेष रूप से:

  • खरना के दिन: जब व्रती प्रसाद तैयार करते हैं।
  • संध्या अर्घ्य के समय: जब सूप और दउरा सजाकर घाट की ओर प्रस्थान किया जाता है।
  • उषा अर्घ्य के समय: जब उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है।

इसके अतिरिक्त, हिंदू धर्म के अन्य महत्वपूर्ण त्योहारों जैसे गोवर्धन पूजा व्रत कथा और सरस्वती पूजा के समय भी घरों में इस प्रकार के पारंपरिक लोक गीतों का गायन किया जाता है जो वातावरण को भक्तिमय बना देते हैं।

एक नजर में गीत की जानकारी | Song at a Glance

मुख्य बिंदु संक्षिप्त विवरण
गीत का शीर्षक बहंगी लचकत जाए (Bahangi Lachkat Jaaye)
प्रसिद्ध संस्करण पुष्पा राणा (Pushpa Rana)
मुख्य पर्व छठ पूजा (Chhath Parv)
काव्य रूप पारंपरिक लोक गीत (Bhojpuri Folk Song)
मुख्य वाद्य यंत्र ढोलक, मंजीरा, बांसुरी, शहनाई
आध्यात्मिक संदेश पूर्ण समर्पण, कायिक-वाचिक-मानसिक पवित्रता

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस गीत का मुख्य अर्थ यह है कि कच्चे बांस से बनी अत्यंत पवित्र बहंगी (कांवड़) जिसमें छठी मैया का प्रसाद रखा है, वह लचीली होने के कारण लचक रही है। व्रती अपने पति से इसे सुरक्षित रूप से घाट तक पहुंचाने का आग्रह करती है।

गीत में सुगा (तोता) पवित्र फलों को जूठा करने का प्रयास करता है। यह प्रसंग दर्शाता है कि छठ पूजा का प्रसाद अत्यंत शुद्ध होना चाहिए और उसमें किसी भी प्रकार की अशुद्धता या विघ्न स्वीकार्य नहीं है।

यह एक पारंपरिक लोक गीत है जिसे शारदा सिन्हा, अनुराधा पौडवाल, और देवी जैसे कई महान कलाकारों ने भी अपनी आवाज दी है, परंतु पुष्पा राणा का संस्करण भी अत्यंत लोकप्रिय है।

बांस को हिंदू धर्म में अत्यंत शुद्ध, शुभ और वंश वृद्धि का प्रतीक माना जाता है। यह पूरी तरह से प्राकृतिक और पर्यावरण के अनुकूल होता है, जो प्रकृति पूजा के सिद्धांत के अनुकूल है।

यह गीत मुख्य रूप से भोजपुरी और मैथिली लोक भाषाओं के मिश्रण में रचित है, जो पूर्वी भारत की अत्यंत मीठी और आत्मीय भाषाएं हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख लोक आस्था के महापर्व छठ और उसके पारंपरिक गीतों के सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। गीत के बोल और उनके भावार्थ को पारंपरिक मान्यताओं और लोक विधाओं के गहन अध्ययन के पश्चात संकलित किया गया है। यह सामग्री पूरी तरह से संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जो पाठकों को शुद्ध और प्रामाणिक जानकारी प्रदान करती है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भागवत पुराण एवं भविष्य पुराण (सूर्य देव की महिमा)
  • बिहार एवं उत्तर प्रदेश की पारंपरिक लोक संस्कृति एवं मौखिक इतिहास
  • पुष्पा राणा के आधिकारिक भक्ति संगीत संग्रह

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 11 Oct 2026

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