Krishna Bhajan मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

पकड़ लो हाथ बनवारी (Pakad Lo Hath Banwari ) - Krishna Bhajan Shyam Bhajan

पकड़ लो हाथ बनवारी (Pakad Lo Hath Banwari) कृष्ण भजन के बोल, भावार्थ और महिमा पढ़ें। संदर्भ एवं व्याख्या सहित भक्ति रस का आनंद लें।

"पकड़ लो हाथ बनवारी" (Pakad Lo Hath Banwari) एक अत्यंत हृदयस्पर्शी और भक्ति रस से परिपूर्ण कृष्ण भजन है, जिसमें साधक अपने आराध्य श्रीकृष्ण के समक्ष पूर्ण शरणागति का भाव प्रकट करता है। 'बनवारी' शब्द श्रीकृष्ण का ही एक प्रिय नाम है, जो उनके वन में विहार करने वाले स्वरूप की ओर संकेत करता है। इस भजन में भक्त अपने जीवन की सभी चिंताओं, भय और अनिश्चितताओं को त्यागकर प्रभु से यह प्रार्थना करता है कि वे उसका हाथ थाम लें और उसे संसार सागर से पार लगाएं। यह भजन श्याम भजन परंपरा का सुंदर उदाहरण है, जिसमें भक्ति का भाव अत्यंत सरल, सहज और गहन है। भजन की भाषा में जो आत्मीयता और विश्वास झलकता है, वह श्रोता के अंतर्मन को तुरंत छू लेता है। भक्ति संगीत की परंपरा में ऐसे भजन विशेष स्थान रखते हैं, जो भगवान और भक्त के बीच पिता-पुत्र, माता-शिशु या सखा-सखा जैसे घनिष्ठ संबंध को दर्शाते हैं। यह भजन विशेष रूप से एकादशी, जन्माष्टमी, राधाष्टमी तथा नित्य संकीर्तन के समय गाया जाता है। इसका भाव यह है कि जब भक्त स्वयं अपने प्रयासों से थक जाता है, तब वह प्रभु के चरणों में समर्पण कर देता है और प्रभु उसका हाथ थामकर उसे सुरक्षित मार्ग दिखाते हैं।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

पकड़ लो हाथ बनवारी | Pakad Lo Hath Banwari

मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन — शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें


॥ मुखड़ा ॥

पकड़ लो हाथ बनवारी,
अब तो पकड़ लो हाथ बनवारी।
तुम बिन मेरा कौन सहारा,
अब तो पकड़ लो हाथ बनवारी।।

॥ अंतरा १ ॥

भव सागर में डूब रहा हूँ,
कोई नहीं है तारन हारी।
तुम हो नैया के खेवनहारा,
अब तो पकड़ लो हाथ बनवारी।।

॥ अंतरा २ ॥

माया मोह में बंधा हुआ हूँ,
काम क्रोध ने घेरा है भारी।
तुम हो संकट के भंजन हारे,
अब तो पकड़ लो हाथ बनवारी।।

॥ अंतरा ३ ॥

राधा वल्लभ श्याम सलोने,
मुरली मनोहर नंद दुलारे।
शरण तिहारी आया हूँ प्रभु जी,
अब तो पकड़ लो हाथ बनवारी।।

॥ अंतरा ४ ॥

तुम हो दीन दयाल कृपा निधि,
भक्त वत्सल भव दुख टारी।
चरण शरण में रख लो स्वामी,
अब तो पकड़ लो हाथ बनवारी।।

॥ अंतरा ५ ॥

जन्म जन्म का नाता तेरा,
तुम बिन कौन सुनै पुकारी।
अब तो आओ श्याम सलोने,
पकड़ लो हाथ बनवारी।।


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भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस भजन का केंद्रीय भाव पूर्ण शरणागति (Complete Surrender) है। 'पकड़ लो हाथ बनवारी' का अर्थ है — हे वन में विहार करने वाले श्रीकृष्ण, अब आप मेरा हाथ थाम लीजिए। भक्त यह स्वीकार करता है कि वह स्वयं अपने बल पर संसार सागर को पार नहीं कर सकता। जब मनुष्य को लगता है कि उसके सभी प्रयास विफल हो रहे हैं और जीवन की नैया डगमगा रही है, तब वह प्रभु की शरण में आता है। भजन का पहला अंतरा 'भव सागर' का प्रतीक है — यह संसार रूपी समुद्र, जिसमें जीव जन्म-मरण के चक्र में डूबता-उतराता रहता है। भक्त कहता है कि इस सागर में कोई तारने वाला नहीं है, केवल श्रीकृष्ण ही नैया के खेवनहार हैं।

दूसरे अंतरे में भक्त माया, मोह, काम और क्रोध जैसे शत्रुओं का उल्लेख करता है, जो मनुष्य को निरंतर घेरे रहते हैं। ये आंतरिक शत्रु बाहरी शत्रुओं से अधिक शक्तिशाली होते हैं और मनुष्य को सन्मार्ग से भटका देते हैं। भक्त इनसे मुक्ति के लिए प्रभु से प्रार्थना करता है। तीसरे अंतरे में 'राधा वल्लभ', 'श्याम सलोने', 'मुरली मनोहर' और 'नंद दुलारे' जैसे मधुर नामों से श्रीकृष्ण का स्मरण किया गया है। ये नाम भक्ति साहित्य की विशिष्ट परंपरा का हिस्सा हैं और भक्त के हृदय में प्रेम का संचार करते हैं।

चौथे अंतरे में भक्त श्रीकृष्ण को 'दीन दयाल', 'कृपा निधि' और 'भक्त वत्सल' कहकर पुकारता है। ये सभी विशेषण शास्त्रीय भक्ति परंपरा में प्रभु के करुणामय स्वरूप को दर्शाते हैं। अंतिम अंतरे में भक्त जन्म-जन्म के नाते का स्मरण करता है और कहता है कि प्रभु के बिना उसकी पुकार कौन सुनेगा। यह भाव दर्शाता है कि भक्त और भगवान का संबंध केवल इस जन्म का नहीं, बल्कि अनादि काल से चला आ रहा है। इस प्रकार यह भजन भक्ति के नवधा भाव में 'आत्मनिवेदन' और 'शरणागति' का सुंदर उदाहरण है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन श्याम भजन परंपरा का एक अनमोल रत्न है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • देवता: भगवान श्रीकृष्ण (बनवारी, श्याम, नंदलाल, राधावल्लभ)।
  • भाव: शरणागति, आत्मसमर्पण, विश्वास और प्रेम।
  • शैली: सरल हिंदी, मधुर पदावली, संकीर्तन योग्य।
  • संगीत: पारंपरिक हारमोनियम, ढोलक, मंजीरा और तबला के साथ गाया जाता है।
  • महत्व: यह भजन साधक के मन से भय, चिंता और अहंकार को दूर करके प्रभु के चरणों में स्थिर करता है।

शास्त्रों में कहा गया है कि कलियुग में भगवान के नाम संकीर्तन से ही जीव का उद्धार संभव है। यह भजन उसी संकीर्तन परंपरा का हिस्सा है। जब भक्त पूरे भाव से 'पकड़ लो हाथ बनवारी' का गायन करता है, तो उसका अंतःकरण शुद्ध होता है और उसे आंतरिक शांति का अनुभव होता है। भजन सुनने और गाने से मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, भय और अवसाद कम होते हैं, तथा जीवन में आत्मविश्वास और धैर्य बढ़ता है। यह भजन विशेष रूप से उन साधकों के लिए है जो जीवन की कठिनाइयों से घिरे हुए हैं और प्रभु की शरण में आश्रय खोज रहे हैं।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन का गायन किसी भी शुभ अवसर पर किया जा सकता है, परंतु कुछ विशेष समय और पर्व इसे और अधिक प्रभावी बनाते हैं:

  • प्रातःकाल: स्नान के बाद, पूजा स्थल पर दीपक जलाकर।
  • संध्या काल: आरती के समय, विशेषकर गोधूलि बेला में।
  • विशेष पर्व: जन्माष्टमी, राधाष्टमी, एकादशी, होली, गोवर्धन पूजा और कार्तिक मास।
  • साप्ताहिक: प्रत्येक बुधवार और रविवार को श्रीकृष्ण की विशेष उपासना में।

गायन विधि: सर्वप्रथम पूजा स्थल को स्वच्छ करें, गंगाजल का छिड़काव करें, दीपक और धूप प्रज्वलित करें। श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र के समक्ष बैठें। मन को शांत करके 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का तीन बार जाप करें। इसके पश्चात हारमोनियम या ढोलक-मंजीरे की संगत में भजन आरंभ करें। भजन को ताल और लय के साथ, पूर्ण भक्ति भाव से गाएं। अंत में श्रीकृष्ण की आरती करें और प्रसाद वितरित करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: 'बनवारी' शब्द का क्या अर्थ है?

उत्तर: 'बनवारी' शब्द 'वन' और 'वारी' से बना है, जिसका अर्थ है — वन में विहार करने वाले। यह श्रीकृष्ण का एक प्रिय नाम है, जो उनके वृंदावन के वनों में गौ-चारण और लीला करने वाले स्वरूप को दर्शाता है।

प्रश्न 2: यह भजन किस परंपरा से संबंधित है?

उत्तर: यह भजन श्याम भजन और कृष्ण भक्ति परंपरा से संबंधित है, जो मुख्यतः उत्तर भारत, ब्रज क्षेत्र और भक्ति आंदोलन की संकीर्तन परंपरा में प्रचलित है।

प्रश्न 3: क्या इस भजन को गाने के लिए किसी विशेष दीक्षा की आवश्यकता है?

उत्तर: नहीं। भक्ति भाव सर्वोपरि है। कोई भी साधक शुद्ध मन और श्रद्धा के साथ इस भजन का गायन कर सकता है। हाँ, यदि गुरु दीक्षा प्राप्त हो तो और भी उत्तम है।

प्रश्न 4: इस भजन का गायन कितनी बार करना चाहिए?

उत्तर: नित्य प्रातः और संध्या के समय कम से कम ११ बार या २१ बार गायन करना शुभ माना जाता है। विशेष पर्वों पर १०८ बार संकीर्तन किया जा सकता है।

प्रश्न 5: क्या इस भजन के गायन से कोई विशेष लाभ होता है?

उत्तर: भक्ति परंपरा के अनुसार, इस भजन के नियमित गायन से मन की चंचलता कम होती है, भय और चिंता दूर होती है, तथा प्रभु कृपा से जीवन में स्थिरता और शांति का अनुभव होता है।

प्रश्न 6: इस भजन को किस राग या लय में गाया जाता है?

उत्तर: यह भजन सामान्यतः भैरवी, खमाज या पीलू राग के मधुर स्वरों में गाया जाता है। लोक परंपरा में इसे सरल कीर्तन लय में गाया जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसमें भजन के मूल पाठ, भावार्थ, महत्व एवं गायन विधि को शास्त्रीय भक्ति परंपरा और लोक संकीर्तन परंपरा के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। भजन के बोल पारंपरिक लोक गायन शैली से संकलित हैं और उनका भावार्थ वैष्णव भक्ति साहित्य, भागवत परंपरा तथा ब्रज संकीर्तन शैली के अनुरूप व्याख्यायित किया गया है। पाठकों से अनुरोध है कि वे भजन को श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ ग्रहण करें तथा किसी भी शास्त्रीय संदेह की स्थिति में अपने गुरु या विद्वान से परामर्श करें।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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