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बसेलू गंगा तीर (Baselu Ganga Teer) - Ravindra Singh Jyoti माँ विंध्यवासिनी भजन New Devi Geet

पढ़ें बसेलू गंगा तीर (Baselu Ganga Teer) - Ravindra Singh Jyoti माँ विंध्यवासिनी भजन New Devi Geet - Bhaktilok का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ,

Ravindra Singh Jyoti माँ विंध्यवासिनी भजन

अपडेटेड: 2026 | श्रेणी: Devi Bhajan / Devi Geet

माँ विंध्यवासिनी के चरणों में समर्पित यह पावन भजन 'बसेलू गंगा तीर' गायक रवींद्र सिंह ज्योति (Ravindra Singh Jyoti) द्वारा अत्यंत भावपूर्ण शैली में गाया गया है। भारतीय सनातन संस्कृति में माँ विंध्यवासिनी को आदि शक्ति जगदम्बा का साक्षात स्वरूप माना जाता है, जिनका धाम उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में माँ विंध्याचल पर्वत श्रृंखला पर स्थित है। गंगा नदी के तट और विंध्य पर्वत की इस पावन उपत्यका में माँ भगवती की आराधना करने से साधक के जीवन के समस्त ताप और कष्ट स्वतः ही शांत हो जाते हैं। इस भजन में भक्त की आर्त पुकार, माँ के प्रति अनन्य प्रेम, विरह और शरणगति के भावों का अत्यंत सजीव चित्रण किया गया है। यह रचना न केवल कर्णप्रिय है, बल्कि श्रोताओं को आत्मिक शांति और भक्ति की पराकाष्ठा का अनुभव कराती है। इसे विभिन्न देवी अनुष्ठानों, नवरात्र पर्व, सत्संग और जागरण के अवसरों पर अत्यधिक श्रद्धा के साथ गाया और सुना जाता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

बसेलू गंगा तीर, माई विंध्यवासिनी।
आवे आ बाहर, माई मुझको गले लगावे॥

बसेलू गंगा तीर, माई विंध्यवासिनी।
माँ माई, माई मुझको गले लगावे।
बसेलू गंगा तीर, माई विंध्यवासिनी॥

जब से तेरी मैं सन्तान, माई तेरा नाम धरूं।
मगर मुझको गले लगावे, हे माई मुझको गले लगावे।
बसेलू गंगा तीर, माई विंध्यवासिनी॥

चरणों की सेवा पाऊँ, यही मन में चाव रहे।
तेरी रहमत की छांव में, मेरा पूरा जीवन बितावे॥
बसेलू गंगा तीर, माई विंध्यवासिनी।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

रवींद्र सिंह ज्योति द्वारा स्वरबद्ध इस लोकप्रिय देवी गीत 'बसेलू गंगा तीर' का आध्यात्मिक और दार्शनिक अर्थ अत्यंत गहरा है। भजन के मुखड़े में ही माँ विंध्यवासिनी के पावन धाम की अवस्थिति का सुंदर वर्णन किया गया है, जहाँ गंगा नदी की पवित्र धारा प्रवाहित होती है और माँ विंध्याचल की पहाड़ियों पर जगतजननी विराजमान हैं। भारतीय आध्यात्मिकता में 'गंगा तीर' केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं है, बल्कि यह चेतना की वह उच्च भूमि है जहाँ मनुष्य के सभी पाप और संताप धुल जाते हैं।

भक्त माँ से विनती करता है कि हे माँ! तू गंगा के तट पर निवास करने वाली महाशक्ति है, मुझ दीन-हीन बालक को अपनी शीतल छांव में ले और अपने प्रेम से गले लगा ले। भक्त का यह आग्रह किसी भौतिक वस्तु की प्राप्ति के लिए नहीं, बल्कि माँ की करुणा और वात्सल्य को पाने के लिए है। 'जब से तेरी मैं सन्तान, माई तेरा नाम धरूं' पंक्ति यह दर्शाती है कि एक बार जब जीव माँ की शरण में आ जाता है, तो उसका एकमात्र कर्म और जप केवल माँ का नाम जपना ही रह जाता है। माँ की ममता अपने हर शिशु के प्रति समान रूप से बहती है, और यही विश्वास इस भजन के हर शब्द से झलकता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

  • दिव्य धाम का वर्णन: विंध्याचल धाम और माँ गंगा के पवित्र मिलन स्थल की महिमा का सुंदर बखान।
  • वात्सल्य और समर्पण: माँ और संतान के पवित्र रिश्ते तथा अनन्य समर्पण भाव की अभिव्यक्ति।
  • शरणगति सिद्धांत: भगवान या देवी के चरणों में पूर्ण रूप से समर्पित हो जाने का आध्यात्मिक संदेश।
  • लोकप्रिय गायन शैली: रवींद्र सिंह ज्योति की ओजस्वी और भावुक आवाज में गाया गया लोकप्रिय देवी गीत।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस पावन भजन को नवरात्रि के दिनों, विशेषकर चैत्र और शारदीय नवरात्र में मां विंध्यवासिनी के पूजन के समय सुनना अत्यंत फलदायी माना जाता है। इसके अतिरिक्त:

  • प्रातःकालीन वंदना: सुबह स्नान के पश्चात माँ के सम्मुख दीप प्रज्वलित करके इसे सुन सकते हैं।
  • संध्या आरती: संध्या के समय घर के मंदिर में माता की आराधना के दौरान यह मन को शांति प्रदान करता है।
  • माता के जागरण और चौकी: देवी के जागरण, मंडली और सत्संग कार्यक्रमों में इसे सामूहिक रूप से गाया जाता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन की आराध्य देवी माँ विंध्यवासिनी हैं, जिन्हें आदिशक्ति महालक्ष्मी, महाकाली और महासरस्वती का सम्मिलित स्वरूप माना जाता है। विंध्याचल त्रिकूट पर्वत पर स्थित यह शक्तिपीठ उन प्रमुख स्थानों में से एक है जहाँ माता सती के अंग गिरे थे। यहाँ माँ गंगा की धारा भक्तों के पापों का क्षालन करती है और विंध्यवासिनी उन्हें अभयदान देती हैं। गायक रवींद्र सिंह ज्योति ने अपनी कला के माध्यम से इसी पौराणिक और आध्यात्मिक ऊर्जा को संगीतबद्ध किया है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / पद सरल अर्थ सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक संदर्भ
बसेलू निवास करने वाली माता का विंध्याचल क्षेत्र में विराजमान होना
गंगा तीर गंगा का तट पवित्रता, शुद्धि और मोक्ष का प्रतीक स्थान
विंध्यवासिनी विंध्य पर्वत पर निवास करने वाली माँ दुर्गा का प्रसिद्ध स्वरूप एवं शक्तिपीठ
सन्तान बालक / संतान भक्त का माँ के साथ आत्मीय और पारिवारिक संबंध
चाव इच्छा / उमंग भक्ति भाव को प्राप्त करने की तीव्र आंतरिक लालसा

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"बसेलू गंगा तीर, माई विंध्यवासिनी।"
इस पंक्ति में कवि या भक्त माँ के निवास स्थान का स्मरण कर रहा है। माँ विंध्यवासिनी गंगा के तट के पास पवित्र विंध्य पर्वत पर निवास करती हैं, जहाँ दर्शन मात्र से भक्तों के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं।

"आवे आ बाहर, माई मुझको गले लगावे।"
भक्त की यह पुकार उसके भीतर की विरह वेदना को दर्शाती है। वह चाहता है कि माँ अपने वात्सल्य का आंचल फैलाकर उसे अपने हृदय से लगा ले, जिससे उसे संसार के दुखों से मुक्ति मिल सके।

"जब से तेरी मैं सन्तान, माई तेरा नाम धरूं।"
भक्त गर्व से कहता है कि हे माँ! जब से मैं तेरी संतान बना हूँ, तब से मेरा केवल एक ही कार्य रह गया है - हर पल तेरा ही नाम जपना और तेरी महिमा का गुणगान करना।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं विंध्यवासिन्यै नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु माँ विंध्यवासिनी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम बसेलू गंगा तीर (Baselu Ganga Teer)
गायक रवींद्र सिंह ज्योति (Ravindra Singh Jyoti)
आराध्य देवी माँ विंध्यवासिनी (भगवती दुर्गा)
संगीत शैली देवी गीत / भोजपुरी एवं हिंदी भक्ति संगीत
मुख्य भाव वात्सल्य, शरणागति और अनन्य भक्ति
उपयुक्त अवसर नवरात्र, देवी जागरण, माता की चौकी, दैनिक पूजा
संबंधित लेख अन्य लोकप्रिय देवी भजन और स्तोत्र

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

'बसेलू गंगा तीर' भजन के गायक कौन हैं?

इस लोकप्रिय भजन को प्रसिद्ध गायक रवींद्र सिंह ज्योति (Ravindra Singh Jyoti) ने अपने मधुर स्वरों में गाया है।

माँ विंध्यवासिनी का प्रसिद्ध मंदिर कहाँ स्थित है?

माँ विंध्यवासिनी का पावन धाम उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में विंध्याचल नामक स्थान पर गंगा नदी के तट के निकट स्थित है।

इस भजन को किस अवसर पर सुनना सबसे अच्छा रहता है?

इस भजन को शारदीय और चैत्र नवरात्र, माँ के मासिक दर्शन, मंगलवार/रविवार की पूजा अथवा किसी भी देवी जागरण के दौरान सुनना अत्यंत फलदायी होता है।

इस भजन का मुख्य केंद्रीय भाव क्या है?

इस भजन का मुख्य भाव माँ के प्रति अनन्य प्रेम, उनके चरणों में समर्पण और माँ के वात्सल्यपूर्ण आलिंगन की तीव्र अभिलाषा है।

क्या यह भजन अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी उपलब्ध है?

यह भजन मुख्य रूप से भोजपुरी और हिंदी की लोक-भक्ति परंपरा से जुड़ा हुआ है, जिसे उत्तर भारत में बहुत चाव से सुना जाता है।

माँ विंध्यवासिनी की उपासना से क्या लाभ मिलता है?

माँ विंध्यवासिनी की आराधना से भक्तों के सभी भय दूर होते हैं, जीवन में सुख-शांति आती है और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

इस भजन को घर पर कैसे गाएं?

प्रातःकाल या संध्या बेला में माँ के चित्र या मूर्ति के समक्ष दीपक जलाकर एकाग्रचित्त होकर इसे भावपूर्ण ढंग से गाया जा सकता है।

क्या भक्तिलok पर ऐसे अन्य भजन भी मिल सकते हैं?

हाँ, भक्तलोक पर आपको माँ दुर्गा, हनुमान जी, भगवान शिव और श्री कृष्ण से जुड़े अनेकों भजन, चालीसा और कथाएं मिल जाएंगी।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह सामग्री विंध्याचल क्षेत्र की धार्मिक परंपराओं, देवी आराधना के लोकगीतों और प्रामाणिक भक्ति साहित्य के अध्ययन पर आधारित है। इसे पाठकों की आध्यात्मिक जिज्ञासा को शांत करने और भक्ति रस का संचार करने के लिए तैयार किया गया है।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री | Bhaktilok Editorial Board

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • भारतीय लोक संगीत एवं देवी गीत परंपरा
  • विंध्याचल महात्म्य एवं पुराण संदर्भ
  • रवींद्र सिंह ज्योति के लोकप्रिय एल्बम एवं ऑडियो रिकॉर्डिंग
  • पारंपरिक भोजपुरी भक्ति साहित्य एवं भजन संग्रह

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 12 Oct 2026

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