bholenath bhajan lyrics बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

चलो चले भोले की नगरिया (Chalo Chale Bhole Ke Nagariya)

चलो चले भोले की नगरिया भजन के बोल, अर्थ और सावन मास विशेष महिमा पढ़ें। संदर्भ एवं व्याख्या सहित भक्तिमय सामग्री।

Bholenath Bhajan & Sawan Special

चलो चले भोले की नगरिया | Chalo Chale Bhole Ke Nagariya | Sukh Sagar Bholenath Sawan Song 2022

अद्यतन तिथि: सावन मास विशेष | श्रेणी: Bholenath Bhajan, Latest Bhakti Song

सनातन धर्म में देवाधिदेव महादेव भगवान शिव की आराधना का विशेष स्थान है। विशेषकर पवित्र सावन मास में जब प्रकृति झूम उठती है और चहुं ओर हरियाली छा जाती है, तब शिव भक्तों के हृदय में भोले बाबा के दर्शन की तीव्र लालसा जागृत होती है। इसी पावन और अलौकिक भक्ति भाव को समर्पित अत्यंत लोकप्रिय भजन "चलो चले भोले की नगरिया" (Chalo Chale Bhole Ke Nagariya) सुख सागर द्वारा प्रस्तुत एक ऐसा ही अमृतमयी सावन गीत है। यह भजन साधಕ के मन को भौतिक संसार की असारता से मुक्त कर कैलाश पति भोलेनाथ की पावन नगरी की ओर ले चलता है, जहाँ केवल प्रेम, शांति, शिव स्मरण और मोक्ष का साम्राज्य है। इस लेख में हम इस भजन के संपूर्ण बोल, विस्तृत भावार्थ, शिव भक्ति के गूढ़ रहस्यों और सावन मास में इसके श्रवण के आध्यात्मिक महत्व पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ स्थायित्व / मुखड़ा ॥

डमरू वाले की डमरू की धुन पर, चलो चले भोले की नगरिया!
जहाँ विराजे हैं त्रिपुरारी, भरते सबकी झोली खाली!
चलो चले भोले की नगरिया, शिव की सुंदर नगरिया...

॥ प्रथम अंतरा ॥

कंकड़-कंकड़ में शंकर बसते, गंगा जटाओं में विराजे,
गले में मुंडमाला सोहे, विष को कंठ में धारे साजे।
भक्तों की हर पीड़ा हरने, आते डमरू बजाते कन्हैया...
चलो चले भोले की नगरिया, शिव की सुंदर नगरिया...

॥ द्वितीय अंतरा ॥

सावन की फुहार है छाई, भक्तों ने कांवड़ है उठाई,
बम-बम भोले के जयकारों से, गूंज उठी है सारी राई।
आओ मिलकर शीश झुकाएं, गाएं महिमा सुख सागर गैया...
चलो चले भोले की नगरिया, शिव की सुंदर नगरिया...

॥ समापन चरण ॥

जो भी शरण में तेरी आया, उसने नवजीवन है पाया,
महादेव तेरा यह दर है, सब तीर्थों से धाम सवाया।
पार लगा दो नैया हमारी, हे शिव शंभू त्रिपुरारी...
चलो चले भोले की नगरिया, शिव की सुंदर नगरिया!

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह अत्यंत पावन भजन जीवात्मा की परमात्मा के प्रति अनन्य प्रेम, पुकार और पूर्ण शरणागति का जीवंत प्रतीक है। सनातन धर्म में संकीर्तन और प्रभु नाम का जाप कलयुग का परम साधन बताया गया है। इस भजन के प्रत्येक शब्द में साधक का अपने मूल स्रोत, अर्थात् भगवान शिव से मिलने का तीव्र अनुराग झलकता है।

मुखड़े का भाव: भजन की शुरुआत भगवान शिव के पवित्र डमरू की ध्वनि के साथ होती है। डमरू की यह नाद 'प्रणव ओंकार' का प्रतीक है, जो ब्रह्मांड की उत्पत्ति और चेतना का द्योतक है। भक्त अपने सगे-संबंधियों और अन्य भक्तों को आमंत्रित करता है कि सांसारिक मोह-माया को छोड़कर उस परम कल्याणकारी भोलेनाथ की नगरिया (कैलाश या शिवलोक) की ओर चलें, जहाँ भक्तों की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

प्रथम अंतरे का भाव: यहाँ शिव के सर्वव्यापक स्वरूप का वर्णन है। सनातन मान्यता के अनुसार "कंकड़-कंकड़ में शंकर हैं"। उनकी जटाओं से मां गंगा का प्राकट्य, उनके गले में नागराज और रुद्राक्ष की माला, तथा विषपान कर नीलकंठ कहलाने वाले भोलेनाथ का स्वरूप त्याग, करुणा और लोक-कल्याण का संदेश देता है। वे अपने भक्तों के संकटों को हरने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं।

द्वितीय अंतरे का भाव: यह सावन मास की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महिमा को दर्शाता है। सावन का महीना शिव को अत्यंत प्रिय है। इस मास में शिव भक्त कांवड़ यात्रा करते हैं, हाथों में जल लेकर 'बम-बम भोले' के जयकारों के साथ आगे बढ़ते हैं। प्रकृति और भक्ति का यह अद्भुत मिलन अंतर्मन को पवित्र कर देता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

शिवतत्व का बोध

यह भजन साधक को यह याद दिलाता है कि संसार की भागदौड़ से परे एक शाश्वत आध्यात्मिक चेतना (शिव) है, जो हर जीव के भीतर निवास करती है।

सावन मास का उल्लास

सावन के पावन अवसर पर शिव भक्तों में ऊर्जा, उत्साह और भक्ति का संचार करने वाला यह एक आदर्श संकीर्तन गीत है, जो विशेष रूप से कांवड़ियों के बीच लोकप्रिय है।

सामूहिक संकीर्तन

इस भजन की लय और धुन ऐसी है कि इसे सत्संग, जागरण, कांवड़ शिविरों और मंदिरों में आसानी से सामूहिक रूप से गाया जा सकता है, जिससे सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

शिव भजनों के गायन और स्मरण के लिए कुछ विशेष समय और नियमों का पालन करने से साधना का पूर्ण फल प्राप्त होता है:

  • सावन मास और सोमवार: सावन के पूरे महीने और विशेषकर प्रत्येक सोमवार को प्रातःकाल स्नान के पश्चात शिव मंदिर में इस भजन का स्मरण करना अत्यंत फलदायी होता है।
  • प्रदोष काल: संध्या समय (प्रदोष काल) में दीपक प्रज्वलित कर भगवान शिव का ध्यान करते हुए इस भजन को गाने से मानसिक शांति और एकाग्रता मिलती है।
  • शिवरात्रि व महाशिवरात्रि: मासिक शिवरात्रि और महाशिवरात्रि के रात्रि जागरण में इस भजन के माध्यम से शिव महिमा का गुणगान किया जाता है।
  • कांवड़ यात्रा शिविर: सावन में कांवड़ यात्रा के मार्ग पर विश्राम स्थलों और शिविरों में यह गीत भक्तों की थकान मिटाकर उनमें नई ऊर्जा भर देता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity

यह भजन पूर्णतः भगवान शिव (महादेव, भोलेनाथ, शंभू, त्रिपुरारी) को समर्पित है। सनातन धर्म में भगवान शिव को 'आशुतोष' कहा जाता है, जिसका अर्थ है जो अत्यंत शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं। उन्हें प्रसन्न करने के लिए किसी बड़े अनुष्ठान की नहीं, बल्कि सच्चे भाव, एक लोटा जल, बेलपत्र और अनन्य प्रेम की आवश्यकता होती है। सुख सागर द्वारा प्रस्तुत यह रचना इसी आशुतोष भाव की अभिव्यक्ति है।

संबंधित पावन ग्रंथों और स्तोत्रों के अध्ययन के लिए आप शिव तांडव स्तोत्र और महामृत्युंजय मंत्र के पावन पाठ का भी स्मरण कर सकते हैं, जो शिव साधना के स्तंभ माने जाते हैं।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

वर्ष 2022 के सावन मास में रिलीज़ हुआ यह भजन "सुख सागर" बैनर के अंतर्गत संगीत प्रेमियों के बीच आया। इस गीत का मुख्य उद्देश्य आधुनिक पीढ़ी को पारंपरिक शिव भक्ति और कांवड़ यात्रा के सांस्कृतिक उत्सव से जोड़ना था। इसके संगीत संयोजन में लोक धुनों और आधुनिक वाद्ययंत्रों का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है, जो श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देता है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा अत्यंत सरल, सुबोध और लोक-भाषा से जुड़ी हुई हिंदी-अवधी मिश्रित शैली है। इसमें ऐसे शब्दों का चयन किया गया है जो आम जनमानस के हृदय को तुरंत स्पर्श करते हैं। डमरू, जटा, गंगा, मुंडमाला, कांवड़ जैसे पारंपरिक प्रतीकों के माध्यम से एक सजीव चित्रकारी की गई है, जिससे श्रोता मानसिक रूप से कैलाश पर्वत और शिव की नगरी की कल्पना करने लगता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

  • अहंकार का त्याग: जैसे भोलेनाथ भस्म रमाते हैं और सादा जीवन जीते हैं, यह भजन हमें सिखाता है कि जीवन में बाहरी दिखावे और अहंकार का त्याग कर सरल जीवन अपनाना चाहिए।
  • कठिनाइयों में धैर्य: भगवान शिव ने विषपान किया था परंतु संसार को अमृत दिया। संकट के समय धैर्य और सहनशीलता रखना ही सच्ची शिव भक्ति है।
  • समर्पण भाव: सांसारिक मोह-माया के चक्रव्यूह से निकलकर अपने आराध्य के चरणों में समर्पित हो जाना ही जीवन का परम लक्ष्य होना चाहिए।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / पदावली सरल हिंदी अर्थ सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक संदर्भ
नगरिया छोटा नगर या पावन धाम यहाँ भगवान शिव के निवास स्थान कैलाश या शिवलोक का प्रतीक है।
त्रिपुरारी तीनों पुरों (नगरों) का नाश करने वाले भगवान शिव का एक नाम जिन्होंने त्रिपुरासुर का वध किया था।
डमरू शिव का वाद्य यंत्र ब्रह्मांड की प्रथम ध्वनि (नादब्रह्म) और ॐकार का प्रतीक।
कांवड़ पवित्र जल ले जाने का बाँस का उपकरण सावन मास में गंगा जल लाकर शिव अभिषेक करने की प्राचीन परंपरा।
सुख सागर आनंद का महासागर ईश्वर के चरणों में मिलने वाली परमानंद की स्थिति।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"डमरू वाले की डमरू की धुन पर, चलो चले भोले की नगरिया..."
इस पंक्ति में कवि आवाहन कर रहा है कि भगवान शिव के डमरू की गूंज को सुनकर अपने मन को एकाग्र करो और उस अलौकिक नगर की ओर प्रस्थान करो जहाँ आध्यात्मिक शांति प्राप्त होती है।

"कंकड़-कंकड़ में शंकर बसते, गंगा जटाओं में विराजे..."
यह पंक्ति अद्वैत दर्शन को दर्शाती है कि ईश्वर कण-कण में व्याप्त हैं। उनकी जटाओं से बहने वाली गंगा पवित्रता और मोदायिनी धारा का प्रतीक है।

"सावन की फुहार है छाई, भक्तों ने कांवड़ है उठाई..."
सावन के आगमन पर प्रकृति के श्रृंगार के साथ भक्तों द्वारा शिव आराधना के लिए कांवड़ उठाने के दृश्य का सुंदर वर्णन किया गया है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

ॐ नमः शिवाय ॥

मृत्युंजय महादेवा त्राहि मां शरणागतम्। जन्म-मृत्यु जरा-व्याधि पीडितं कर्मबन्धनैः॥

भजन के साथ इस पंचाक्षर मंत्र (ॐ नमः शिवाय) का जाप करने से मानसिक शांति और शिव कृपा की प्राप्ति होती है। आप संपूर्ण विधि के लिए महामृत्युंजय मंत्र जप विधि भी पढ़ सकते हैं।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम चलो चले भोले की नगरिया (Chalo Chale Bhole Ke Nagariya)
प्रस्तुतकर्ता / एल्बम सुख सागर (Sukh Sagar Bholenath Sawan Song 2022)
आराध्य देव भगवान शिव / भोलेनाथ / महादेव
भाषा सरल हिंदी / ब्रधी-अवधी मिश्रित लोक भाषा
मुख्य विषय / थीम शिव भक्ति, सावन उत्सव, कांवड़ यात्रा, शरणागति
प्रमुख भाव भक्ति, उल्लास, प्रेम, समर्पण
उपयुक्त अवसर सावन मास, सोमवार व्रत, शिवरात्रि, सत्संग

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन वर्ष 2022 के सावन मास में "सुख सागर" बैनर के तहत रिलीज़ किया गया एक अत्यंत लोकप्रिय शिव भक्ति गीत है।

सावन मास, प्रत्येक सोमवार, प्रदोष काल और शिवरात्रि के अवसरों पर इस भजन का गायन व श्रवण विशेष रूप से फलदायी माना गया है।

भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए पंचाक्षर मंत्र "ॐ नमः शिवाय" या महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना अत्यंत उत्तम है।

सावन मास में भक्त पवित्र नदियों से जल लाकर अपने नजदीकी या प्रसिद्ध शिवालिकों में भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं, जिससे जीवन के समस्त कष्ट दूर होते हैं।

हाँ, यह एक अत्यंत मधुर और ऊर्जावान संकीर्तन भजन है जिसे घर के सत्संग, जागरण और पारिवारिक अनुष्ठानों में आसानी से गाया जा सकता है।

'आशुतोष' का शाब्दिक अर्थ है—जो बहुत शीघ्र प्रसन्न हो जाएं। भगवान शिव थोड़े से जल और बेलपत्र से ही प्रसन्न हो जाते हैं।

रुद्राक्ष को भगवान शिव के आंसुओं का प्रतीक माना जाता है। इसे धारण करने और इसका जाप करने से मन शांत रहता है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।

यह भजन हमें सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर अपने भीतर की दिव्यता को पहचानते हुए शिव चरणों में पूर्ण समर्पण करने की प्रेरणा देता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

प्रस्तुत सामग्री "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" है जिसे सनातन भक्ति परंपरा, लोक संगीत संस्कृति और शिव आराधना के ग्रंथों के आधार पर प्रामाणिक रूप से संकलित किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध और प्रेरणादायक devotional content पहुँचाना है।


स्रोत एवं संदर्भ (Sources & References):

  • शिव पुराण एवं लिंग पुराण - कोटि रुद्र संहिता
  • सनातन लोक संगीत एवं सावन कांवड़ परंपरा ग्रंथ
  • भक्ति लोक संगीत संग्रह - सुख सागर प्रकाशन

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 14 Oct 2026

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