भगवान शिव को समर्पित यह भजन "चले मेरे शिव भोले हो नंदी पे असवार" भक्ति साहित्य की उस परंपरा का अनमोल रत्न है जिसमें देवाधिदेव महादेव की दिव्य बारात का मनोहारी चित्रण किया गया है। इस भजन में शिवजी की भस्म-धारण, डमरू-नाद, जटा-जूट, गंगा-धारण और नंदी पर आरूढ़ होकर चलने का वर्णन अत्यंत भावपूर्ण शब्दों में हुआ है। यह रचना केवल एक गीत नहीं, अपितु साधक के हृदय में शिव-चेतना जागृत करने का एक माध्यम है। जब भक्त "चले मेरे शिव भोले" का उच्चारण करता है, तो वह अपने भीतर के अहंकार को नंदी पर आरूढ़ करता है और आत्मा को परमात्मा की ओर अग्रसर करता है। शिव भक्ति में वैराग्य और करुणा का अद्भुत संगम है — जहाँ एक ओर श्मशान-वासी शिव नश्वरता के प्रतीक हैं, वहीं दूसरी ओर भोले-भंडारी भक्तों के कल्याणकारी आश्रय हैं। यह भजन उसी द्वंद्वातीत चेतना का सजीव साक्षात्कार कराता है।
मूल संस्कृत श्लोक / पावन पाठ
चले मेरे शिव भोले हो नंदी पे असवार।
जटा में गंगा बहती, डमरू करे पुकार।।
भस्म रमाये अंग में, भोले भंडारी दातार।
चले मेरे शिव भोले हो नंदी पे असवार।।
गण संग चलें, भूत-प्रेत संग चलें,
डमरू की ध्वनि से दिशाएँ गूँज उठें।
हे शिव शंकर, भक्तों के तारणहार,
चले मेरे शिव भोले हो नंदी पे असवार।।
पदच्छेद एवं अन्वय
इस भजन के मुख्य पदों का पदच्छेद एवं अन्वय इस प्रकार है — "चले मेरे शिव भोले" में 'चले' क्रिया है, 'मेरे' सम्बन्धवाचक सर्वनाम, 'शिव' कर्ता, 'भोले' विशेषण है। "नंदी पे असवार" में 'नंदी' वाहन, 'पे' अधिकरण, 'असवार' आरूढ़ अर्थ में प्रयुक्त है। "जटा में गंगा बहती" में 'जटा' शिव की जटाएँ, 'गंगा' पवित्र नदी, 'बहती' क्रिया। "डमरू करे पुकार" में 'डमरू' वाद्य, 'करे पुकार' नाद उत्पन्न करना। "भस्म रमाये अंग में" में 'भस्म' पवित्र राख, 'रमाये' लगाना, 'अंग' शरीर। "भोले भंडारी दातार" में 'भोले' सरल, 'भंडारी' भंडार के स्वामी, 'दातार' दानी। "गण संग चलें" में 'गण' शिव के अनुचर, 'संग' साथ। "भूत-प्रेत संग चलें" में 'भूत-प्रेत' शिव के परिवार, 'संग चलें' साथ चलना। "डमरू की ध्वनि से दिशाएँ गूँज उठें" में 'डमरू' वाद्य, 'ध्वनि' नाद, 'दिशाएँ' चारों ओर, 'गूँज उठें' प्रतिध्वनित होना। "हे शिव शंकर, भक्तों के तारणहार" में 'शिव शंकर' सम्बोधन, 'भक्तों के' सम्बन्ध, 'तारणहार' उद्धारक।
विस्तृत शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ | व्याकरणिक रूप |
|---|---|---|
| चले | गमन करते हैं, प्रस्थान करते हैं | क्रिया, वर्तमान काल |
| शिव | कल्याणकारी, मंगलमय, महादेव | संज्ञा, पुल्लिंग |
| भोले | सरल, निष्कपट, भक्त-वत्सल | विशेषण |
| नंदी | शिव का वाहन, वृषभ, धर्म के प्रतीक | संज्ञा, पुल्लिंग |
| असवार | आरूढ़, सवार, बैठे हुए | विशेषण |
| जटा | शिव की उलझी हुई लटें, मुकुट | संज्ञा, स्त्रीलिंग |
| गंगा | पवित्र नदी, मोक्षदायिनी | संज्ञा, स्त्रीलिंग |
| डमरू | शिव का वाद्य, नाद-ब्रह्म का प्रतीक | संज्ञा, पुल्लिंग |
| भस्म | पवित्र राख, नश्वरता का प्रतीक | संज्ञा, स्त्रीलिंग |
| भंडारी | भंडार का स्वामी, अन्नपूर्ण | संज्ञा, पुल्लिंग |
| दातार | दानी, कृपालु, वरदायक | विशेषण |
| गण | शिव के अनुचर, सेवक | संज्ञा, पुल्लिंग |
| भूत-प्रेत | शिव के परिवार के अंग, अदृश्य शक्तियाँ | संज्ञा, पुल्लिंग |
| तारणहार | उद्धार करने वाले, मुक्तिदाता | संज्ञा, पुल्लिंग |
सरल हिंदी भावार्थ एवं व्याख्या
इस भजन का मूल भाव यह है कि भक्त अपने आराध्य शिव को नंदी पर आरूढ़ होकर चलते हुए देखता है। यह केवल एक दृश्य-वर्णन नहीं है, अपितु भक्त के हृदय में उमड़ती श्रद्धा की अभिव्यक्ति है। जब भक्त कहता है "चले मेरे शिव भोले", तो वह अपने अंतर्मन में शिव की उपस्थिति का अनुभव करता है। शिव की जटाओं में बहती गंगा मोक्ष की धारा है, जो साधक के समस्त पापों को बहा ले जाती है। डमरू की पुकार सृष्टि के आदि-नाद की प्रतीक है, जो साधक को ध्यान की गहराई में ले जाती है। भस्म रमाये अंग का अर्थ है कि शिव नश्वरता के बोध से युक्त हैं — वे जानते हैं कि यह शरीर अंततः राख में मिल जाएगा, अतः वे उसी राख को अपने अंगों पर धारण करते हैं। यह वैराग्य का परम प्रतीक है। "भोले भंडारी दातार" कहकर भक्त शिव की दानशीलता का गुणगान करता है — शिव भंडार के स्वामी हैं, जो अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करते। गण और भूत-प्रेत का साथ चलना यह दर्शाता है कि शिव के साथ समस्त सृष्टि, समस्त शक्तियाँ चलती हैं — कोई भी उनसे अलग नहीं है। शिव का दरबार समानता का दरबार है, जहाँ देवता और भूत-प्रेत सभी समान हैं। यह भजन भक्त को यह सिखाता है कि जीवन में जो कुछ भी है, वह शिव की कृपा से है। जब भक्त "हे शिव शंकर, भक्तों के तारणहार" कहता है, तो वह अपने समस्त भय, चिंता और दुःख को शिव के चरणों में समर्पित कर देता है। यह भजन भक्ति, वैराग्य, करुणा और समर्पण का सुंदर संगम है। इसका गायन करते समय साधक को चाहिए कि वह शब्दों के अर्थ में गहराई से उतरे और शिव की उपस्थिति का अनुभव करे। तब यह भजन केवल श्रवण का विषय नहीं, अपितु आत्म-साक्षात्कार का साधन बन जाता है।
शास्त्रीय एवं पौराणिक संदर्भ
शिव भक्ति की परंपरा वेदों से आरंभ होती है। ऋग्वेद में रुद्र की स्तुति "रुद्राष्टाध्यायी" और "शतरुद्रीय" के रूप में मिलती है। शिव को "रुद्र" कहा गया है — जो रोदयति इति रुद्रः, अर्थात् जो दुःख का नाश करता है। शिव पुराण, लिंग पुराण, स्कंद पुराण और शिव महापुराण में शिव की महिमा का विस्तृत वर्णन है। शिव पुराण के अनुसार शिव निराकार ब्रह्म के साकार रूप हैं, जो सृष्टि के आदि में प्रकट हुए। नंदी शिव के प्रमुख गण हैं, जिन्हें शिव ने अपना वाहन बनाया। नंदी धर्म के प्रतीक हैं — जो सत्य, संयम और सेवा का प्रतीक है। शिव की जटाओं में गंगा का अवतरण समुद्र मंथन की कथा से जुड़ा है, जब भगीरथ की तपस्या से गंगा धरती पर आईं और शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में धारण किया। डमरू शिव के हाथ में सृष्टि के आदि-नाद का प्रतीक है, जिससे संस्कृत वर्णमाला और नाद-ब्रह्म की उत्पत्ति मानी जाती है। भस्म शिव की नश्वरता-चेतना का प्रतीक है। शिव की बारात का वर्णन शिव-पार्वती विवाह की कथा से जुड़ा है, जब शिव अपने गणों, भूत-प्रेतों और देवताओं के साथ पार्वती के घर बारात लेकर गए थे। यह बारात सामाजिक समानता और दिव्यता का प्रतीक है। इस भजन की परंपरा लोकगीतों और भजन-परंपरा से जुड़ी है, जिसमें भक्त शिव की लीलाओं का गुणगान करते हैं। विक्की संधू जैसे समकालीन गायकों ने इस परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुँचाया है।
दार्शनिक एवं आध्यात्मिक महत्व
इस भजन का दार्शनिक आधार अद्वैत वेदांत, काश्मीर शैव दर्शन और नाथ संप्रदाय की परंपरा में निहित है। शिव केवल एक देवता नहीं, अपितु परम चेतना हैं — जो सृष्टि के आदि, मध्य और अंत में विद्यमान हैं। "शिव" शब्द का अर्थ है "कल्याण" — जो समस्त दुःखों का नाश करता है। नंदी पर आरूढ़ शिव यह दर्शाते हैं कि परम चेतना धर्म (नंदी) पर आरूढ़ है — अर्थात् ब्रह्म धर्म के आधार पर स्थित है। जटा में गंगा का बहना यह दर्शाता है कि ज्ञान की धारा सदा शिव से प्रवाहित होती है। डमरू का नाद अनाहत नाद है — जो ध्यान में सुनाई देता है। भस्म का अर्थ है कि शिव नश्वरता के ज्ञाता हैं — वे जानते हैं कि यह जगत अस्थिर है। यह वैराग्य का दर्शन है। कर्म सिद्धांत के अनुसार, प्रत्येक कर्म का फल होता है, परंतु शिव की कृपा से कर्मों का बंधन कट जाता है। शिव को "कर्मफलदाता" और "कर्मक्षयकार" कहा गया है। ध्यान की दृष्टि से, यह भजन साधक को ध्यान की गहराई में ले जाता है। जब साधक "चले मेरे शिव भोले" का जाप करता है, तो उसका मन शिव-चेतना में लीन हो जाता है। यह भजन अजपा जप की स्थिति प्रदान करता है, जहाँ श्वास के साथ शिव का नाम जुड़ जाता है। शिव की बारात का दर्शन यह सिखाता है कि जीवन में जो कुछ भी है, वह शिव की लीला है। सुख-दुःख, जन्म-मृत्यु, लाभ-हानि — सब शिव की इच्छा से होता है। जो साधक इस सत्य को समझ लेता है, वह मोह-माया से मुक्त हो जाता है। यह भजन भक्ति और ज्ञान का संगम है — जहाँ भावना और विचार एक साथ प्रवाहित होते हैं।
दैनिक जीवन में इस रचना की उपयोगिता
विद्यार्थियों के लिए
विद्यार्थियों के लिए यह भजन एकाग्रता और स्मरण शक्ति का वरदान है। प्रातःकाल इस भजन का गायन करने से मन शांत होता है और पढ़ाई में मन लगता है। शिव की कृपा से बुद्धि तीव्र होती है और परीक्षा में सफलता मिलती है।
पेशेवरों के लिए
पेशेवर जीवन में तनाव, प्रतिस्पर्धा और चिंता सामान्य हैं। इस भजन का नियमित श्रवण और गायन मन को स्थिर करता है, निर्णय क्षमता बढ़ाता है और कार्यक्षेत्र में सफलता प्रदान करता है। शिव की कृपा से व्यवसाय में वृद्धि होती है।
मानसिक शांति के लिए
मानसिक तनाव, अवसाद और चिंता से ग्रस्त व्यक्ति के लिए यह भजन औषधि के समान है। इसके गायन से मन की वृत्तियाँ शांत होती हैं और आत्मिक शांति का अनुभव होता है। शिव ध्यान का पर्याय है।
परिवार और समाज के लिए
परिवार में सुख-शांति और समाज में सद्भाव के लिए यह भजन अत्यंत उपयोगी है। सामूहिक गायन से पारिवारिक एकता बढ़ती है और सामाजिक समरसता का विकास होता है। शिव की बारात समानता का प्रतीक है।
साधना, पाठ विधि एवं शुभ मुहूर्त
इस भजन का पाठ करने का सर्वोत्तम समय प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त (4 से 6 बजे) और सायंकाल संध्या के समय है। सोमवार, प्रदोष काल, शिवरात्रि और श्रावण मास विशेष रूप से शुभ माने जाते हैं। पाठ से पूर्व स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। शिवलिंग के समक्ष या शिव मंदिर में बैठकर पाठ करें। रुद्राक्ष माला से 108 बार इस भजन का जाप करें। धूप, दीप, बेलपत्र, धतूरा, भांग और जल अर्पित करें। "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जाप भी साथ में करें। पाठ के बाद शिव आरती करें और प्रसाद वितरित करें। नियमित पाठ से मानसिक शांति, रोग नाश, धन वृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: इस भजन का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: यह भजन शिव की दिव्य बारात का वर्णन करता है और भक्त को वैराग्य, भक्ति और समर्पण का संदेश देता है।
प्रश्न 2: क्या इस भजन का गायन किसी विशेष मुहूर्त में करना चाहिए?
उत्तर: सोमवार, प्रदोष काल, शिवरात्रि और श्रावण मास विशेष शुभ हैं, परंतु प्रातः और सायंकाल किसी भी दिन पाठ किया जा सकता है।
प्रश्न 3: क्या इस भजन का पाठ करने से मानसिक शांति मिलती है?
उत्तर: हाँ, नियमित पाठ से मन शांत होता है, चिंता दूर होती है और आत्मिक आनंद की प्राप्ति होती है।
प्रश्न 4: क्या इस भजन का संबंध किसी विशेष पुराण से है?
उत्तर: यह भजन शिव पुराण, लिंग पुराण और लोक परंपरा से प्रेरित है, जिसमें शिव की बारात और लीलाओं का वर्णन है।
प्रश्न 5: क्या इस भजन को सुनने मात्र से लाभ होता है?
उत्तर: हाँ, श्रद्धा और भक्ति भाव से श्रवण करने पर भी मन शुद्ध होता है और शिव की कृपा प्राप्त होती है।
प्रश्न 6: क्या इस भजन का पाठ करते समय किसी विशेष नियम का पालन करना चाहिए?
उत्तर: स्वच्छता, सात्विक आहार, ब्रह्मचर्य और श्रद्धा का पालन करना चाहिए। पाठ से पूर्व स्नान करना आवश्यक है।
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिकता
यह लेख भक्तिलोक (BhaktiLok.in) के संपादकीय मंडल द्वारा तैयार किया गया है। इसमें प्रस्तुत विवरण शिव पुराण, लिंग पुराण, स्कंद पुराण, वेदों के रुद्र सूक्त और प्रामाणिक भक्ति परंपरा पर आधारित है। भजन का मूल पाठ विक्की संधू द्वारा गाया गया लोकप्रिय संस्करण है, जिसे भक्तिलोक द्वारा प्रामाणिक रूप में प्रस्तुत किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को शुद्ध, प्रामाणिक और आध्यात्मिक रूप से पोषक सामग्री प्रदान करना है। सभी तथ्य शास्त्रीय स्रोतों से सत्यापित हैं। यदि कोई त्रुटि या सुझाव हो, तो हमें अवश्य सूचित करें।
समीक्षक: भक्तिलोक आध्यात्मिक शोध समिति
प्रकाशन तिथि: सोमवार, श्रावण मास
स्रोत: शिव पुराण, लिंग पुराण, वेद, लोक परंपरा
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