Matarani Bhajan मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

प्रीत गुरां नाल ला के ता वेखो (Preet Guruan Nal La Ke Ta Vekho)

प्रीत गुरां नाल ला के ता वेखो भजन का सम्पूर्ण पाठ, हिंदी अर्थ एवं महिमा जानें। संदर्भ एवं व्याख्या सहित पढ़ें Bhaktilok पर यह मधुर गुरु भजन।

"प्रीत गुरां नाल ला के ता वेखो" (Preet Guruan Nal La Ke Ta Vekho) एक अत्यंत ही मधुर, भावपूर्ण और आध्यात्मिक रस से सराबोर गुरु भजन है। यह भजन मुख्य रूप से गुरु के प्रति अनन्य प्रेम, पूर्ण समर्पण और कृतज्ञता (शुकराना) के भाव को अभिव्यक्त करता है। सनातन धर्म और भारतीय संत परंपरा में गुरु को साक्षात परब्रह्म का रूप माना गया है, जो अज्ञान के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं। इस भजन का मुख्य स्वर पंजाबी मिश्रित हिंदी भाषा में है, जो साधक के हृदय को सीधे झंकृत करता है। जब कोई भक्त अपने सतगुरु के चरणों में शरण लेता है, तो उसके जीवन के समस्त कष्ट, संशय और भय स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं। यह भजन सत्संगों, गुरु पूजा, शुकराना सभाओं और दैनिक प्रार्थना के समय गाया जाता है। इसके श्रवण और गायन से मन में असीम शांति, संतोष और दिव्य आनंद की अनुभूति होती है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

प्रीत गुरां नाल ला के ता वेखो

प्रीत गुरां नाल ला के ता वेखो,
थां मिलूगी चरणां दे विच बह के ता वेखो।
प्रीत गुरां नाल ला के ता वेखो...

दर-दर ते क्यों धक्के खांदे हो,
इक वार गुरां दे दर आ के ता वेखो।
प्रीत गुरां नाल ला के ता वेखो...

दुख सारे दूर हो जावणगे,
सुख झोली दे विच पा के ता वेखो।
प्रीत गुरां नाल ला के ता वेखो...

जो मंगोगे सोई पाओगे,
झोली चरणां दे विच फैला के ता वेखो।
प्रीत गुरां नाल ला के ता वेखो...

तारनहार है मेरा सतगुरु,
नाम गुरां दा ध्या के ता वेखो।
प्रीत गुरां नाल ला के ता वेखो...

शुकराना हर पल करदे रहो,
जय गुरु जी मुख तों कह के ता वेखो।
प्रीत गुरां नाल ला के ता वेखो,
थां मिलूगी चरणां दे विच बह के ता वेखो।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस पावन भजन का केंद्रीय भाव गुरु-भक्ति की महिमा और उनके प्रति अटूट विश्वास पर आधारित है। भजन की शुरुआत इस आह्वान के साथ होती है कि "एक बार अपने सतगुरु से सच्चा प्रेम करके तो देखो।" सांसारिक प्रेम में अक्सर स्वार्थ, अपेक्षा और अंततः निराशा छिपी होती है, परंतु गुरु से किया गया प्रेम निष्काम और शाश्वत होता है। जब जीवात्मा गुरु के चरणों में बैठती है, तो उसे संसार के सबसे सुरक्षित और पवित्र स्थान की प्राप्ति होती है।

भजनकार आगे समझाते हैं कि मनुष्य सुख और शांति की खोज में दर-दर भटकता रहता है, भौतिक वस्तुओं और सांसारिक संबंधों में आनंद ढूंढता है, परंतु उसे केवल मानसिक अशांति और कष्ट ही प्राप्त होते हैं। भजन में प्रेमपूर्वक सीख दी गई है कि इस व्यर्थ की भटकन को छोड़कर एक बार गुरु के पावन दरबार में आकर देखो। गुरु का दरबार वह कल्पवृक्ष है जहां आते ही साधक के सारे संताप मिट जाते हैं। गुरु के चरणों में अपनी झोली फैलाने से, अर्थात अपनी समस्त चिंताओं और अहंकार को समर्पित कर देने से, जीवन में सुख, समृद्धि और परम शांति का आगमन होता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन केवल एक संगीतमय रचना नहीं है, बल्कि यह साधना मार्ग का एक व्यावहारिक मार्गदर्शिका भी है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • समर्पण का संदेश: यह भजन साधक को सिखाता है कि भक्ति का पहला और अंतिम चरण समर्पण (शरणागति) है।
  • शुकराना भाव: "शुकराना" अर्थात ईश्वर और गुरु के प्रति हर परिस्थिति में धन्यवाद का भाव रखना। यह मानसिक तनाव को दूर कर सकारात्मकता का संचार करता है।
  • सरलता और सुगमता: पंजाबी और हिंदी के सरल शब्दों के समन्वय के कारण यह भजन हर वर्ग के साधक के हृदय को छू लेता है।
  • तारनहार की अवधारणा: गुरु को "तारनहार" (भवसागर से पार उतारने वाला) मानकर उनके नाम-स्मरण पर बल दिया गया है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि गुरु की आराधना के लिए हर क्षण शुभ माना गया है, फिर भी इस भजन के गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष परिस्थितियां अत्यंत फलदायी मानी जाती हैं:

  • प्रातः काल की साधना: सुबह के समय शांत वातावरण में इस भजन को सुनने से दिन की शुरुआत सकारात्मक ऊर्जा और मानसिक स्पष्टता के साथ होती है।
  • सत्संग और गुरु पूजा: गुरुवार के दिन, गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर या किसी भी गुरु सत्संग के दौरान सामूहिक रूप से इस भजन का संकीर्तन करना अत्यंत कल्याणकारी होता है।
  • शुकराना सभा: जब भक्त अपने जीवन में गुरु कृपा का अनुभव करते हैं, तब वे कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए इस भजन का गायन करते हैं।
  • गायन विधि: इस भजन को गाते समय मन में पूर्ण श्रद्धा, शांत चित्त और गुरु की छवि का ध्यान होना चाहिए। तालियों की संगति और वाद्य यंत्रों के साथ इसका सामूहिक गायन वातावरण को भक्तिमय बना देता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन निराकार और साकार दोनों ही रूपों में गुरु तत्व को समर्पित है। सनातन परंपरा में गुरु को त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) का संयुक्त रूप माना गया है। आधुनिक काल में, यह भजन विशेष रूप से "गुरु जी" (डुगरी वाले गुरु जी) के भक्तों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। गुरु जी के भक्त उन्हें भगवान शिव का अवतार मानते हैं। इस भजन के माध्यम से भक्त अपने गुरु के प्रति अनन्य श्रद्धा प्रकट करते हैं और उनके द्वारा दिखाए गए कल्याणकारी मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन की रचना लोक-भक्ति परंपरा के अंतर्गत हुई है। पंजाब की समृद्ध सूफी और सिख गुरु परंपरा में शब्द-कीर्तन और गुरु-महिमा का विशेष स्थान रहा है। इसी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से प्रेरित होकर इस भजन की रचना की गई है। इसमें प्रयुक्त शब्द "प्रीत", "चरणां", "ध्या के" और "तारनहार" सीधे तौर पर मध्यकालीन संत काव्य और गुरुवाणी के प्रभाव को दर्शाते हैं। यह भजन समय के साथ विभिन्न गायकों द्वारा गाए जाने के बाद जन-जन का कंठहार बन गया है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा अत्यंत सरल, सुबोध और प्रवाहमयी पंजाबी-मिश्रित हिंदी है। इसकी काव्य शैली "संबोधनात्मक" है, जिसमें कवि सीधे तौर पर संसारी मनुष्यों और साधकों को संबोधित कर रहा है। इसमें अनुप्रास और रूपक अलंकारों का सुंदर प्रयोग देखने को मिलता है। "झोली फैलाना" और "प्रीत लगाना" जैसे मुहावरों का आध्यात्मिक संदर्भ में उपयोग करके कविता को और अधिक प्रभावशाली बनाया गया है। इसकी लयबद्धता और गेयता इतनी सुगम है कि एक बार सुनने पर ही यह मन में रच-बस जाता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें व्यावहारिक जीवन के लिए कई महत्वपूर्ण सीख देता है:

  1. अहंकार का त्याग: गुरु के चरणों में बैठने का अर्थ है अपने अहंकार को विसर्जित करना। जब तक अहंकार रहेगा, तब तक ज्ञान और शांति का प्रवेश असंभव है।
  2. धैर्य और विश्वास: "जो मंगोगे सोई पाओगे" का अर्थ यह भी है कि गुरु पर पूर्ण विश्वास रखें, वे हमारी पात्रता के अनुसार हमें सर्वश्रेष्ठ प्रदान करेंगे।
  3. कृतज्ञता का जीवन: जीवन में जो कुछ भी मिला है, उसके लिए शिकायत करने के बजाय "शुकराना" करने की आदत डालें।
  4. भटकाव से मुक्ति: बाहरी दुनिया में सुख खोजने के बजाय अपने अंतर्मन में स्थित गुरु तत्व से जुड़ें।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
प्रीत (Preet) प्रेम, अनुराग ईश्वर या गुरु के प्रति निष्काम और निस्वार्थ प्रेम।
गुरां (Guruan) गुरुदेव, सतगुरु अज्ञान का नाश करने वाले आध्यात्मिक मार्गदर्शक।
थां (Thaan) स्थान, जगह गुरु के चरणों में मिलने वाला परम आश्रय।
धक्के खांदे (Dhakke Khande) भटकना, कष्ट उठाना संसार की नश्वर चीजों में सुख की व्यर्थ खोज।
तारनहार (Taranhar) पार उतारने वाला वह सत्ता जो जीवात्मा को भवसागर से मुक्त करती है।
शुकराना (Shukrana) धन्यवाद, आभार हर परिस्थिति में गुरु की रजा में सुखी रहने का भाव।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

1. "प्रीत गुरां नाल ला के ता वेखो, थां मिलूगी चरणां दे विच बह के ता वेखो।"
हे मानव! तूने संसार में सबसे प्रेम करके देख लिया, अब एक बार अपने सतगुरु से सच्चा प्रेम करके देख। जब तू उनके चरणों में बैठेगा, तो तुझे वह दिव्य स्थान और शांति मिलेगी जो संसार में कहीं और सुलभ नहीं है।

2. "दर-दर ते क्यों धक्के खांदे हो, इक वार गुरां दे दर आ के ता वेखो।"
तू अपनी समस्याओं के समाधान के लिए और सुख की चाह में दर-दर भटक रहा है और कष्ट उठा रहा है। इस व्यर्थ की भटकन को छोड़ और एक बार पूर्ण विश्वास के साथ गुरु के पावन द्वार पर आकर देख, तेरी सारी भटकन शांत हो जाएगी।

3. "दुख सारे दूर हो जावणगे, सुख झोली दे विच पा के ता वेखो।"
जैसे ही तू गुरु की शरण में आएगा, तेरे संचित कर्मों के दुख और मानसिक संताप दूर हो जाएंगे। तू अपनी झोली को गुरु की कृपा से भरकर तो देख, वहां केवल सुख और आनंद की वर्षा होगी।

4. "जो मंगोगे सोई पाओगे, झोली चरणां दे विच फैला के ता वेखो।"
गुरु दयालु और कृपालु हैं। वे अपने भक्तों की हर जायज मनोकामना पूरी करते हैं। तू बस निष्कपट भाव से उनके चरणों में अपनी प्रार्थना रखकर तो देख।

5. "तारनहार है मेरा सतगुरु, नाम गुरां दा ध्या के ता वेखो।"
मेरे सतगुरु इस संसार रूपी सागर से पार उतारने वाले खेवनहार हैं। तू एक बार सच्चे मन से उनके नाम का ध्यान और सुमिरन करके तो देख, तेरा कल्याण निश्चित है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

गुरु की महिमा को दर्शाने वाले कुछ अत्यंत पवित्र श्लोक निम्नलिखित हैं, जिनका स्मरण इस भजन के साथ किया जा सकता है:

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

अर्थ: गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं और गुरु ही भगवान शंकर हैं। गुरु ही साक्षात परब्रह्म हैं, ऐसे परम पूज्य गुरुदेव को मेरा बारंबार नमस्कार है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम प्रीत गुरां नाल ला के ता वेखो (Preet Guruan Nal La Ke Ta Vekho)
मुख्य विषय गुरु महिमा, शरणागति, शुकराना और भक्ति
भाषा पंजाबी मिश्रित हिंदी (भक्ति लोक शैली)
भक्ति भाव समर्पण भाव, प्रेम भाव, कृतज्ञता (Shukrana Bhava)
उपयुक्त अवसर गुरुवार पूजा, सत्संग, गुरु पूर्णिमा, शुकराना सत्संग
संबंधित कड़ियां गुरु भजन संग्रह, शुकराना गुरु जी भजन

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन का मुख्य संदेश यह है कि सांसारिक मोह-माया और भटकाव को छोड़कर यदि मनुष्य सच्चे मन से अपने गुरु के चरणों में समर्पित हो जाए, तो उसे परम शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

"शुकराना" का अर्थ है कृतज्ञता व्यक्त करना। यह सिखाता है कि हमें जीवन की हर परिस्थिति के लिए गुरुदेव का धन्यवाद करना चाहिए, जिससे हमारे भीतर सकारात्मकता और संतोष का उदय होता है।

यह भजन मुख्य रूप से पंजाबी मिश्रित हिंदी भाषा में लिखा गया है, जो उत्तर भारत की लोक-भक्ति शैली का एक सुंदर उदाहरण है।

इसे प्रातः काल की प्रार्थना के समय, गुरुवार के दिन, गुरु पूर्णिमा पर या किसी भी धार्मिक सत्संग के दौरान गाना और सुनना अत्यंत शुभ माना जाता है।

"तारनहार" का अर्थ है वह जो हमें इस संसार रूपी भवसागर (जन्म-मृत्यु के चक्र) से पार उतार दे। सनातन धर्म में गुरु को ही सच्चा तारनहार माना गया है।

हाँ, इस भजन की शांत और मधुर धुन मन को एकाग्र करने में मदद करती है, इसलिए यह दैनिक ध्यान और मानसिक शांति के लिए अत्यंत उपयोगी है।

गुरु जी (जैसे बड़े मंदिर वाले गुरु जी) के सत्संगों में यह भजन अत्यंत श्रद्धा के साथ गाया जाता है। यह भक्तों को गुरु जी के दिव्य प्रभामंडल से जोड़ने का कार्य करता है।

यह भजन हमें सिखाता है कि जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव से घबराने के बजाय हमें गुरु पर अटूट विश्वास रखना चाहिए और सदैव कृतज्ञता का जीवन जीना चाहिए।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख भक्ति रस से परिपूर्ण भजन "प्रीत गुरां नाल ला के ता वेखो" के आध्यात्मिक और व्यावहारिक पहलुओं का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इस सामग्री का संकलन और संपादन सनातन धर्म की गुरु-शिष्य परंपरा, विभिन्न प्रामाणिक सत्संग संकलनों और लोक-भजन शैलियों के गहन अध्ययन के आधार पर किया गया है। यह "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" पाठकों को न केवल भजन के लिरिक्स प्रदान करती है, बल्कि उन्हें इसके अंतर्निहित दार्शनिक अर्थ से भी अवगत कराती है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भगवद्गीता - गुरु और ज्ञान योग प्रसंग।
  • संत कबीर और गुरु नानक देव जी की वाणी - गुरु महिमा के पद।
  • पारंपरिक गुरु सत्संग संकीर्तन संग्रह।
  • भक्ति लोक (Bhaktilok.in) आंतरिक शोध एवं संपादन टीम।

संबंधित भजन एवं लेख

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 12 Oct 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!