आदिशक्ति माता दुर्गा, महालक्ष्मी और महासरस्वती को समर्पित यह भजन "शेरावाली माँ के आये नवराते" जगत जननी की कृपा, ममता और महिमा का गान करता है। सनातन परंपरा में स्त्री शक्ति को सृष्टि का आदि कारण माना गया है — जहाँ प्रकृति है, वहाँ शक्ति है, और जहाँ शक्ति है, वहाँ मंगल है। यह भजन विशेष रूप से नरेंद्र चंचल (NARENDRA CHANCHAL) की भक्ति-भाव से ओतप्रोत प्रस्तुति के रूप में प्रसिद्ध है, जिसमें शेरावाली माँ के प्रति पूर्ण समर्पण, श्रद्धा और आत्म-निवेदन की भावना झलकती है। भजन का मूल स्वर माता के प्रति शरणागति का है — जब भक्त माता के चरणों में प्रणाम कर अपनी प्रार्थना रखता है, तो देवी माँ उसके समस्त कष्टों को हर लेती हैं। यह भजन साधक के भीतर शक्ति, करुणा, तेज और पवित्रता का संचार करता है। नवरात्रि, चैत्र-शारदीय नवरात्र, दुर्गा पूजा, जागरण, माता के दरबार में होने वाले भंडारे तथा घर-मंदिर की नित्य आराधना में यह भजन अत्यंत श्रद्धा से गाया जाता है। इसकी लय सरल, मधुर और हृदयस्पर्शी है, जिससे सामान्य श्रोता भी सहज ही भक्ति-रस में डूब जाता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
शेरावाली माँ के आये नवराते
(भक्ति भाव एवं शुद्ध उच्चारण के साथ स्मरण करें)
शेरावाली माँ के आये नवराते,
जय जय माँ जय जय माँ,
भक्तों ने मिलकर शीश झुकाये,
जय जय माँ जय जय माँ।
माँ की महिमा अपरंपार,
दुःख हरती है भक्तों के द्वार,
जो भी आया शरण तिहारी,
पूरी हुई मन की सब आस।
जय जय माँ जय जय माँ।
शेर पे सवारी माँ की सुहावन,
हाथ में त्रिशूल सोहे मन भावन,
दुष्टों का संहार करे माँ,
भक्तों का उद्धार करे माँ।
जय जय माँ जय जय माँ।
नौ दिन का व्रत रखें भक्त प्यारे,
माँ के चरणों में ध्यान लगायें,
ज्योति जले मंदिर में तेरी,
भक्ति हो हर दिल में घेरी।
जय जय माँ जय जय माँ।
शेरावाली माँ के आये नवराते,
जय जय माँ जय जय माँ,
भक्तों ने मिलकर शीश झुकाये,
जय जय माँ जय जय माँ।
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस भजन का केंद्रीय भाव माता के प्रति पूर्ण समर्पण और शरणागति है। "शेरावाली माँ" अर्थात् सिंह पर सवारी करने वाली माँ दुर्गा — जो शेर पर विराजमान होकर यह संदेश देती हैं कि जिसके साथ माँ की शक्ति हो, उसका कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता। "नवराते आये" का अर्थ है — नौ रातों का पवित्र पर्व, जिसमें भक्त उपवास, जागरण, कीर्तन और पूजन के माध्यम से माँ को प्रसन्न करते हैं। भजन की पंक्ति "भक्तों ने मिलकर शीश झुकाये" सामूहिक भक्ति और विनम्रता का प्रतीक है — जब अनेक भक्त एक साथ माँ के चरणों में नतमस्तक होते हैं, तो वहाँ दिव्य ऊर्जा का संचार होता है।
"माँ की महिमा अपरंपार, दुःख हरती है भक्तों के द्वार" — यह पंक्ति देवी की करुणा को दर्शाती है। देवीभागवत पुराण के अनुसार माता की उपासना से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — चारों पुरुषार्थ सिद्ध होते हैं। "शेर पे सवारी माँ की सुहावन, हाथ में त्रिशूल सोहे मन भावन" — यहाँ माँ के वीर रूप का वर्णन है। सिंह वाहन शक्ति और साहस का प्रतीक है, त्रिशूल तीनों गुणों (सत्, रज, तम) पर विजय का संकेत है। "दुष्टों का संहार करे माँ, भक्तों का उद्धार करे माँ" — यह द्वंद्व स्पष्ट करता है कि माँ दुष्टों के लिए भय और भक्तों के लिए अभय हैं।
"नौ दिन का व्रत रखें भक्त प्यारे" — नवरात्रि का व्रत केवल शारीरिक तप नहीं, बल्कि मन, वाणी और कर्म की शुद्धि का साधन है। "ज्योति जले मंदिर में तेरी" — अखंड ज्योति आत्म-ज्योति का प्रतीक है, जो साधक के भीतर अज्ञान-अंधकार को दूर करती है। अंत में भजन पुनः मुखड़े पर लौटकर एक चक्र पूर्ण करता है — जैसे भक्ति का कोई अंत नहीं, वैसे ही माँ की महिमा का कोई अंत नहीं। यह भजन साधक को आत्म-विश्वास, धैर्य और करुणा का संदेश देता है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
- देवी केंद्रित भक्ति: यह भजन माँ दुर्गा के शेरावाली स्वरूप को समर्पित है, जो शक्ति, साहस और करुणा का प्रतीक है।
- नवरात्रि विशेष: नौ रातों के पावन पर्व में यह भजन विशेष रूप से गाया जाता है और भक्तों के हृदय में उत्साह भरता है।
- सामूहिक भक्ति का प्रतीक: "भक्तों ने मिलकर शीश झुकाये" पंक्ति सामूहिक कीर्तन और एकता की भावना को बल देती है।
- भावनात्मक शुद्धि: भजन की सरल भाषा और मधुर लय श्रोता के मन को शांति और भक्ति-रस से भर देती है।
- नरेंद्र चंचल की प्रस्तुति: इस भजन को NARENDRA CHANCHAL की भक्ति-भरी आवाज़ में प्रस्तुत किया गया है, जो इसे और भी हृदयस्पर्शी बनाती है।
- श्रवण एवं गायन का लाभ: नियमित श्रवण से मानसिक तनाव कम होता है, सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और आत्मविश्वास बढ़ता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस भजन को गाने और सुनने का सर्वोत्तम समय नवरात्रि का है, विशेषकर चैत्र और शारदीय नवरात्रि। इसके अतिरिक्त निम्न अवसरों पर भी यह भजन अत्यंत फलदायी माना जाता है:
- प्रातःकाल: स्नान के बाद, दीप प्रज्वलित करके माँ के समक्ष भजन गाएं।
- संध्या आरती: संध्या के समय आरती के बाद सामूहिक भजन-कीर्तन करें।
- जागरण एवं भंडारा: माता के जागरण, भंडारे और दुर्गा पूजा के अवसर पर।
- मंगलवार एवं शुक्रवार: ये दिन माँ दुर्गा की उपासना के लिए विशेष माने जाते हैं।
विधि: स्वच्छ वस्त्र धारण करें, माँ के चरणों में जल एवं पुष्प अर्पित करें, धूप-दीप जलाएं और शुद्ध भाव से भजन गाएं। भजन के साथ ताली या मंजीरा बजाना भक्ति-भाव को और गहरा करता है। भजन के बाद माँ की आरती अवश्य करें और प्रसाद वितरित करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: "शेरावाली माँ के आये नवराते" भजन किस देवी को समर्पित है?
यह भजन माँ दुर्गा के शेरावाली स्वरूप को समर्पित है, जो शक्ति, साहस और करुणा की प्रतीक हैं।
प्रश्न 2: इस भजन को किसने गाया है?
यह भजन NARENDRA CHANCHAL की भक्ति-भरी प्रस्तुति में प्रसिद्ध है, जो देवी भजनों के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं।
प्रश्न 3: क्या यह भजन केवल नवरात्रि में ही गाया जाता है?
नहीं, यह भजन नवरात्रि के अतिरिक्त मंगलवार, शुक्रवार, दुर्गा पूजा, जागरण और किसी भी शुभ अवसर पर गाया जा सकता है।
प्रश्न 4: इस भजन को सुनने से क्या लाभ होते हैं?
नियमित श्रवण से मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा, आत्मविश्वास और भक्ति-भाव में वृद्धि होती है।
प्रश्न 5: भजन गाते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
शुद्ध उच्चारण, विनम्र भाव, स्वच्छ वस्त्र और माँ के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव रखना चाहिए।
प्रश्न 6: क्या इस भजन का कोई विशेष व्रत है?
नवरात्रि के नौ दिनों में व्रत रखकर इस भजन का गायन विशेष फलदायी माना जाता है।
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसमें भजन के मूल भाव, अर्थ, महत्व और गायन विधि को शास्त्रीय एवं परंपरागत संदर्भों के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। भजन के बोल लोक-परंपरा में प्रचलित रूप में सम्मिलित किए गए हैं। पाठकों से अनुरोध है कि वे भजन को श्रद्धा एवं शुद्ध भाव से ग्रहण करें।
संदर्भ: देवीभागवत पुराण, दुर्गा सप्तशती, लोक-परंपरा एवं भक्ति-संगीत परंपरा।
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