प्रस्तुत भजन "कोशिश ता कीती है | Koshish Ta Kiti Hai" गायिका चेतली दत्त (Chetali Dutt) की भक्तिमय प्रस्तुति है, जो जय गुरु जी (Jai Guru Ji) एवं तारणहार (Taranhar) की कृपा को समर्पित है। यह भजन गुरु महिमा, शरणागति एवं आशीर्वाद (Blessings) की भावना से ओत-प्रोत है। भजन का मुख्य स्वर यही है कि साधक अपनी ओर से समस्त प्रयास करता है, किंतु अंतिम कृपा एवं उद्धार गुरु कृपा से ही होता है। 'तारणहार' शब्द का अर्थ ही है — पार लगाने वाला, अर्थात् गुरुदेव जो शिष्य को भवसागर से पार उतारते हैं। यह भजन उसी दृढ़ विश्वास, अटूट श्रद्धा और गुरुचरणों में पूर्ण समर्पण का जीवंत उदाहरण है। भक्ति संगीत की परंपरा में गुरु भजन का विशेष स्थान है, क्योंकि सनातन परंपरा में गुरु को ईश्वर से भी पहले माना गया है — "गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पाय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।" इस भजन को प्रायः सत्संग, गुरु पूर्णिमा, गुरुवार व्रत, आश्रम उत्सव एवं दैनिक भक्ति सत्रों में गाया जाता है। इसका भाव भक्ति रस, करुणा एवं आत्मसमर्पण से भरा हुआ है, जो श्रोता के अंतर्मन को झंकृत कर देता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
मुखड़ा (Mukhda):
कोशिश ता कीती है, कोशिश ता कीती है,
बाकी गुरु जी की कृपा, बाकी गुरु जी की कृपा।
जय गुरु जी, जय गुरु जी, तारणहार गुरु जी।
अंतरा १:
जब-जब भटका मन मेरा, जब-जब डगमग पाँव रहे,
तेरे चरणों की छाया में, हर बार सहारा पाया।
तूने ही थामा हाथ मेरा, तूने ही दी है राह नई,
कोशिश ता कीती है, बाकी गुरु जी की कृपा।
अंतरा २:
संसार के इस जाल में, माया के इस जंजाल में,
तेरा नाम ही सहारा है, तेरा नाम ही आधार है।
जो तेरे चरणों में आया, वो भवसागर तर जाए,
कोशिश ता कीती है, बाकी गुरु जी की कृपा।
अंतरा ३:
आशीर्वाद की बरसात हो, हर दिन तेरी सौगात हो,
तेरी कृपा से जीवन में, भक्ति की हर बात हो।
तारणहार तू है मेरा, तू ही है मेरा संसार,
कोशिश ता कीती है, बाकी गुरु जी की कृपा।
अंतरा ४:
जय गुरु जी, जय गुरु जी, तेरे चरणों में शीश झुका,
तेरी महिमा अपरंपार, तेरी कृपा अनंत है।
जो भी तेरे दर आया, वो कभी खाली न जाए,
कोशिश ता कीती है, बाकी गुरु जी की कृपा।
समापन (Closing):
जय गुरु जी, जय गुरु जी, तारणहार गुरु जी।
कोशिश ता कीती है, बाकी गुरु जी की कृपा।
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस भजन का केंद्रीय भाव यह है कि मनुष्य अपनी ओर से जो भी संभव प्रयास है, वह करता है — साधना करता है, नाम जपता है, भक्ति करता है, किंतु अंतिम उद्धार एवं सफलता गुरु की कृपा से ही प्राप्त होती है। "कोशिश ता कीती है" वाक्य में साधक की विनम्रता एवं आत्मसमर्पण झलकता है। यह अहंकार का त्याग है — यह स्वीकार करना कि मैं अकेला कुछ नहीं कर सकता, गुरु कृपा ही मेरा वास्तविक बल है।
"बाकी गुरु जी की कृपा" — यह पंक्ति भक्ति की पराकाष्ठा है। सनातन परंपरा में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु, महेश का प्रतिनिधि माना गया है। गुरु वह दिव्य माध्यम हैं जो शिष्य को अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाते हैं। भजन में 'तारणहार' शब्द का प्रयोग अत्यंत गहन है — यह गुरु को उस नाविक के रूप में चित्रित करता है जो शिष्य को भवसागर से पार लगाता है।
पहले अंतरे में साधक अपने भटकते मन एवं डगमगाते पाँवों का वर्णन करता है। यह मानव जीवन की वास्तविकता है — हम सब कभी-कभी राह भूल जाते हैं, कभी-कभी निराशा के गर्त में डूब जाते हैं। किंतु गुरु की छाया में आकर हमें सहारा मिलता है। यह छाया केवल शारीरिक नहीं, आध्यात्मिक आश्रय है।
दूसरे अंतरे में संसार की माया एवं जंजाल का वर्णन है। यह भौतिक जगत का मोह है जो आत्मा को बाँधता है। गुरु का नाम ही इस बंधन से मुक्ति का साधन है। "जो तेरे चरणों में आया, वो भवसागर तर जाए" — यह पंक्ति श्रीमद्भगवद्गीता के शरणागति सिद्धांत का सार है।
तीसरे अंतरे में आशीर्वाद एवं कृपा की बरसात की कामना है। यह भक्त की सात्विक इच्छा है — भक्ति, शांति एवं दिव्य अनुग्रह की प्राप्ति। चौथे अंतरे में पूर्ण समर्पण का भाव है — "तेरे चरणों में शीश झुका"। यह नम्रता, विनय एवं विश्वास का प्रतीक है।
कुल मिलाकर यह भजन भक्ति, शरणागति, गुरु महिमा एवं आशीर्वाद की भावना का सुंदर संगम है। यह साधक को यह सिखाता है कि प्रयास करना मनुष्य का धर्म है, किंतु फल एवं कृपा गुरु के हाथ में है। यही भाव इस भजन को अत्यंत हृदयस्पर्शी एवं आध्यात्मिक रूप से गहन बनाता है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
यह भजन गुरु भक्ति परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसकी प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- गुरु महिमा: भजन में गुरु को 'तारणहार' कहकर संबोधित किया गया है, जो उनके उद्धारक स्वरूप को दर्शाता है।
- शरणागति का भाव: "कोशिश ता कीती है, बाकी गुरु जी की कृपा" — यह पंक्ति पूर्ण समर्पण एवं विनम्रता का प्रतीक है।
- भक्ति रस: भजन में करुणा, प्रेम, विश्वास एवं आशीर्वाद की भावना एक साथ प्रवाहित होती है।
- सरल भाषा: भजन की भाषा सरल एवं हृदयग्राही है, जिससे सामान्य श्रोता भी इसे सहजता से गा सकता है।
- सार्वभौमिक संदेश: यह भजन किसी विशेष संप्रदाय तक सीमित नहीं, बल्कि समस्त गुरु-शिष्य परंपरा का सार है।
इस भजन को सुनने एवं गाने से मन में शांति, विश्वास एवं सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह साधक को आत्मविश्वास एवं गुरु कृपा पर अटूट श्रद्धा प्रदान करता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
गुरु भजन का गायन एवं श्रवण किसी भी शुभ अवसर पर किया जा सकता है, किंतु कुछ विशेष समय एवं अवसर इस प्रकार हैं:
- गुरुवार: गुरुवार का दिन गुरु पूजन एवं भजन के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
- गुरु पूर्णिमा: यह पर्व गुरु भक्ति का सर्वोच्च अवसर है।
- प्रातःकाल: सुबह स्नान के बाद दीप प्रज्वलित कर भजन गाना चाहिए।
- संध्या काल: आरती के समय भी इस भजन का गायन शुभ होता है।
- सत्संग एवं आश्रम: सामूहिक सत्संग में इस भजन का गायन विशेष फलदायी होता है।
विधि: पूर्व दिशा की ओर मुख करके, स्वच्छ वस्त्र धारण कर, गुरु चरणों में पुष्प अर्पित करें। दीपक एवं धूप जलाएं। फिर शुद्ध उच्चारण एवं भक्ति भाव के साथ भजन गाएं। भजन के बाद गुरु आरती अवश्य करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: "कोशिश ता कीती है" भजन किसने गाया है?
यह भजन गायिका चेतली दत्त (Chetali Dutt) द्वारा प्रस्तुत किया गया है, जो गुरु भक्ति एवं आशीर्वाद की भावना से ओत-प्रोत है।
प्रश्न 2: इस भजन का मुख्य संदेश क्या है?
इस भजन का मुख्य संदेश यह है कि मनुष्य अपनी ओर से प्रयास करता है, किंतु अंतिम उद्धार एवं कृपा गुरु की शरण में ही प्राप्त होती है।
प्रश्न 3: "तारणहार" शब्द का क्या अर्थ है?
'तारणहार' का अर्थ है — पार लगाने वाला, उद्धारक। यह गुरु के उस स्वरूप को दर्शाता है जो शिष्य को भवसागर से पार लगाता है।
प्रश्न 4: यह भजन कब गाना चाहिए?
इसे गुरुवार, गुरु पूर्णिमा, प्रातःकाल, संध्या आरती एवं सत्संग के समय गाना शुभ माना जाता है।
प्रश्न 5: क्या यह भजन किसी विशेष संप्रदाय से संबंधित है?
यह भजन गुरु भक्ति परंपरा से जुड़ा है और इसका संदेश सार्वभौमिक है — यह समस्त गुरु-शिष्य परंपरा का सार है।
प्रश्न 6: इस भजन को सुनने से क्या लाभ होता है?
इस भजन को सुनने से मन में शांति, विश्वास, सकारात्मक ऊर्जा एवं गुरु कृपा पर अटूट श्रद्धा का संचार होता है।
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसमें भजन के मूल पाठ, भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व को प्रामाणिक भक्ति परंपरा के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। भजन की व्याख्या सनातन गुरु-शिष्य परंपरा, शरणागति सिद्धांत एवं भक्ति रस के संदर्भ में की गई है। पाठकों से अनुरोध है कि वे भजन को शुद्ध उच्चारण एवं भक्ति भाव के साथ स्मरण करें।
संदर्भ: गुरु भक्ति परंपरा, श्रीमद्भगवद्गीता (शरणागति सिद्धांत), संत वाणी एवं लोक भक्ति परंपरा।
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