Durga Bhajan Lyrics मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

Bhole Girjapati Hun Tumhari Sharan I Shiv Bhajan I LAKHBIR SINGH LAKKHA

लखबीर सिंह लक्खा का प्रसिद्ध शिव भजन 'Bhole Girjapati Hun Tumhari Sharan' के संपूर्ण लिरिक्स, भावार्थ और महिमा पढ़ें। संदर्भ एवं व्याख्या सहित।

भगवान शिव को समर्पित अत्यंत लोकप्रिय एवं भावपूर्ण भजन "Bhole Girjapati Hun Tumhari Sharan I Shiv Bhajan I LAKHBIR SINGH LAKKHA" देवादिदेव महादेव के चरणों में पूर्ण आत्मसमर्पण और शरणागति का अनूठा प्रतीक है। प्रसिद्ध भजन सम्राट लखबीर सिंह लक्खा की सुरीली और गूंजती आवाज में गाया गया यह शिव भजन साधक के मन में वैराग्य, भक्ति और आध्यात्मिक शांति का संचार करता है। 'गिरिजापति' अर्थात माता पार्वती के स्वामी भगवान भोलेनाथ, जो आशुतोष हैं और अपने भक्तों की एक पुकार पर ही प्रसन्न हो जाते हैं, उनकी शरण में जाने का मार्ग यह भजन प्रशस्त करता है। इस लेख में हम इस पावन भजन के सम्पूर्ण लिरिक्स, शब्दार्थ, विस्तृत भावार्थ, शिव भक्ति के दार्शनिक पहलुओं और श्रवण विधि पर विस्तार से चर्चा करेंगे, जो आपके आध्यात्मिक अनुभव को और अधिक प्रगाढ़ बनाएगा।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

स्थाई (Mukhda):
भोले गिरिजापति हूं तुम्हारी शरण, रख लो मेरी लाज ओ भोलेनाथ जी!
डमरू वाले बाबा मेरे, तुम हो जगत के पालनहार जी,
भोले गिरिजापति हूं तुम्हारी शरण, रख लो मेरी लाज ओ भोलेनाथ जी!

अंतरा 1:
भस्म रमी है तन पे तुम्हारे, नाग गले में विराजे,
शीश पे गंगा चंदा साजे, रूप तुम्हारा सुहाए,
नाथ अनाथों के तुम ही सहारे, भव से पार उतारो जी,
भोले गिरिजापति हूं तुम्हारी शरण, रख लो मेरी लाज ओ भोलेनाथ जी!

अंतरा 2:
कैलाश पर्वत है डेरा तुम्हारा, नंदी पे असवार,
देवों के देव महादेव तुम, हो त्रिपुरारी अवतार,
चरणों में तेरे जो भी झुक जाए, मिलते हैं सारे सुख द्वार जी,
भोले गिरिजापति हूं तुम्हारी शरण, रख लो मेरी लाज ओ भोलेनाथ जी!

अंतरा 3:
मोह माया के इस बंधन में, फंसा हुआ संसार,
तेरी कृपा बिन प्रभु जी कोई, न पाए बेड़ा पार,
'लक्खा' भी गुण गाए तेरे, पूरी करो मन की आस जी,
भोले गिरिजापति हूं तुम्हारी शरण, रख लो मेरी लाज ओ भोलेनाथ जी!

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन साधक की भगवान शिव के प्रति अनन्य और अनन्य शरणागति (Surrender) को दर्शाता है। भजन के मुखड़े में साधक पुकारता है कि हे भोले गिरिजापति (माता पार्वती के स्वामी शिव), मैं आपकी शरण में आया हूँ। जिस प्रकार एक बालक अपने पिता की शरण में आकर भयमुक्त हो जाता है, उसी प्रकार भक्त शिव के चरणों में अपनी समस्त चिंताओं को समर्पित कर देता है।

प्रथम अंतरे में शिव के वैराग्यमय और अलौकिक स्वरूप का वर्णन किया गया है। उनके शरीर पर श्मशान की भस्म रमी है, गले में नागराज वासुकी सुशोभित हैं और मस्तक पर माँ गंगा तथा अर्धचंद्र विराजमान हैं। यह रूप संसार को यह संदेश देता है कि भगवान शिव भौतिक मोह-माया से परे हैं और केवल आंतरिक शुद्धता व सच्चे प्रेम के भूखे हैं।

द्वितीय और तृतीय अंतरे में कवि लखबीर सिंह लक्खा ने भगवान शिव के निवास स्थान कैलाश और उनके वाहन नंदी का स्मरण करते हुए संसार के दुखों का निवारण करने की प्रार्थना की है। यह भाव स्पष्ट करता है कि संसार रूपी सागर में मोह-माया के बंधनों से यदि कोई तार सकता है, तो वह केवल आशुतोष भोलेनाथ की कृपा ही है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सरलता, मार्मिकता और लखबीर सिंह लक्खा की ऊर्जावान एवं भावभीनी गायन शैली है। शिव पुराण और वैदिक परंपराओं के अनुसार, भगवान शिव को 'आशुतोष' कहा जाता है, जिसका अर्थ है जो अत्यंत शीघ्र प्रसन्न होते हैं। यह भजन साधक के भीतर अहंकार को समाप्त कर विनम्रता और भक्ति के भाव को जागृत करता है। प्रदोष काल, महाशिवरात्रि या सोमवार के पावन व्रतों के अवसर पर इस भजन का श्रवण मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

शिव भजनों का आनंद और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करने के लिए कुछ विशेष समय और नियमों का पालन करना उत्तम माना जाता है:

  • समय: प्रातःकाल ब्रह्म बेला में या संध्याकाल प्रदोष बेला में इस भजन का श्रवण या गायन अत्यंत फलदायी होता है।
  • स्थान: घर के पूजा स्थल, मंदिर में शिवलिंग के समक्ष या एकांत में शांत चित्त होकर इसे सुनना चाहिए।
  • विधि: शिव जी के समक्ष धूप, दीप प्रज्वलित कर, जल या बेलपत्र अर्पित करने के पश्चात इस भजन का स्मरण करना मन को एकाग्र करता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन के केंद्र में देवादिदेव महादेव (भगवान शिव) और माता पार्वती (गिरिजा) हैं। भगवान शिव संहारक और कल्याणकारी शक्ति के प्रतीक हैं, जबकि माता पार्वती प्रकृति और चेतना का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसके प्रसिद्ध गायक लखबीर सिंह लक्खा हैं, जिन्होंने अपने हजारों लोकप्रिय भजनों के माध्यम से भारतीय devotional संगीत जगत में अमिट छाप छोड़ी है। उनकी आवाज़ में रचे-बसे शिव भजन भक्तों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

भजन सम्राट लखबीर सिंह लक्खा द्वारा गाए गए यह गीत पारंपरिक शिव स्तुति और आधुनिक भक्ति संगीत का एक सुंदर संगम हैं। इस प्रकार के भजनों की रचना का मुख्य उद्देश्य आम जनमानस को कठिन दार्शनिक प्रसंगों में उलझाए बिना, सहज रूप से भगवान शिव की भक्ति और शरणागति से जोड़ना है। ऐसे भजन भारत के हर कोने में कांवड़ यात्रा, शिवरात्रि और सावन मास के दौरान अत्यंत श्रद्धा के साथ बजाए जाते हैं.

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल हिंदी, ब्रज और खड़ी बोली का सुंदर मिश्रण है, जिसे भारत का हर वर्ग आसानी से समझ सकता है। इसमें रूपक अलंकार और उपमाओं का सहज प्रयोग हुआ है, जैसे शिव को 'जगत का पालनहार' और 'अनाथों का सहारा' बताना। काव्य शैली में टेक (Refrain) और अंतरे की सुव्यवस्थित संरचना इसे गाने में अत्यंत कर्णप्रिय बनाती है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन केवल एक गीत नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक आध्यात्मिक दर्शन है:

  • शरणागति का भाव: जीवन की कठिनाइयों के बीच स्वयं को ईश्वर के सुपुर्द कर देना ही सच्ची भक्ति है।
  • वैराग्य और सादगी: भगवान शिव का भस्मधारी स्वरूप हमें सिखाता है कि भौतिक वस्तुएं नश्वर हैं, वास्तविक सौंदर्य आंतरिक चेतना का है।
  • विनम्रता: अहंकार त्यागकर शिव चरणों में झुकने से मानसिक शांति और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / पद सरल अर्थ संदर्भ
गिरिजापति पर्वतराज हिमालय की पुत्री गिरिजा (माता पार्वती) के स्वामी भगवान शिव का एक नाम
शरण आश्रय, सुरक्षा या संरक्षण भक्त का ईश्वर के प्रति समर्पण
भस्म विभूति, राख शिव के वैराग्य रूप का प्रतीक
त्रिपुरारी त्रिपुर नामक असुर का वध करने वाले महादेव का रौद्र एवं रक्षक रूप
बेड़ा पार भवसागर से मुक्ति पाना जीवन के दुखों का अंत होना

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"भोले गिरिजापति हूं तुम्हारी शरण, रख लो मेरी लाज ओ भोलेनाथ जी!"
यहाँ भक्त अपने आराध्य के सम्मुख अपनी लाचारी और पूर्ण समर्पण को स्वीकार करते हुए विनती करता है कि हे माता पार्वती के स्वामी! मैं संसार के प्रपंचों से थककर आपकी शरण में आया हूँ, अब मेरी प्रतिष्ठा और मेरा जीवन आपके हाथों में है।

"भस्म रमी है तन पे तुम्हारे, नाग गले में विराजे..."
इस पंक्ति में कवि शिव के डरावने प्रतीत होने वाले किंतु परम शांत स्वरूप का वर्णन करता है। श्मशान की भस्म और गले के सर्प यह दर्शाते हैं कि शिव मृत्यु और भय से परे हैं।

"मोह माया के इस बंधन में, फंसा हुआ संसार..."
यह पंक्ति मनुष्य की वास्तविक स्थिति का यथार्थ चित्रण करती है कि किस प्रकार इंसान सांसारिक मोह-माया के जाल में उलझकर दुखी रहता है और केवल शिव कृपा से ही उसे मुक्ति मिल सकती है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के साथ साधक निम्नलिखित पावन मंत्रों का भी स्मरण कर सकता है:

  • महामृत्युंजय मंत्र: ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
  • शिव पंचक्षर मंत्र: ॐ नमः शिवाय
  • शिव ध्यान मंत्र: ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसम्।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम Bhole Girjapati Hun Tumhari Sharan
गायक लखबीर सिंह लक्खा (Lakhbir Singh Lakkha)
आराध्य देव भगवान शिव (देवादिदेव महादेव)
भाषा हिंदी / भक्ति संगीत
भक्ति भाव शरणागति, विनय और वैराग्य
उपयुक्त अवसर सावन मास, महाशिवरात्रि, सोमवार व्रत, सत्संग
संबंधित पावन लेख अधिक जानकारी के लिए पढ़ें शिव तांडव स्तोत्र एवं श्री हनुमान चालीसा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस प्रसिद्ध शिव भजन के गायक लोकप्रिय भजन सम्राट लखबीर सिंह लक्खा हैं।

'गिरिजापति' का अर्थ है पर्वतराज हिमालय की पुत्री गिरिजा (माता पार्वती) के पति या स्वामी, जो भगवान शिव हैं।

यह भजन सावन मास, महाशिवरात्रि, प्रत्येक सोमवार के व्रत और शिव सत्संग के दौरान सुनने पर विशेष आध्यात्मिक आनंद और शांति प्रदान करता है।

शिव भक्ति का मूल संदेश अहंकार का त्याग करना, सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठना और अपनी आत्मा को परमात्मा की शरण में समर्पित करना है।

हाँ, प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में या पूजा के समय इस भजन का श्रवण और गायन मन को पूरे दिन सकारात्मक और ऊर्जावान बनाए रखता है।

'आशु' का अर्थ है शीघ्र और 'तोष' का अर्थ है संतुष्ट होने वाला। जो भगवान बहुत जल्दी अपने भक्तों की सच्ची पुकार से प्रसन्न हो जाएं, उन्हें आशुतोष कहते हैं।

साधक भगवान शिव से अपनी लाज रखने, भवसागर से पार उतारने और जीवन के मोह-माया रूपी बंधनों से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना करता है।

भस्म यह दर्शाती है कि यह शरीर नश्वर है और अंततः इसे राख हो जाना है। यह वैराग्य और भौतिकता से विरक्ति का प्रतीक है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

भक्तिकुल (Bhaktilok) पर प्रकाशित यह आलेख सनातन संस्कृति, शिव पुराण की मान्यताओं और पारंपरिक भक्ति संगीत के संरक्षण को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों को प्रामाणिक भजन लिरिक्स और उनके दार्शनिक अर्थ से अवगत कराना है। यह सामग्री संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत पूर्णतः शोधित और श्रद्धालुओं के लिए उपयोगी है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • शिव महापुराण - गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशन।
  • पारंपरिक शिव स्तुति एवं लोक भजन संग्रह।
  • भक्तिकुल अर्काइव - भजन एवं स्तोत्र अनुसंधान विभाग।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 10 Oct 2026

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